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Full text of "1179 Hindi-rasgngadhar"

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परिचय 


जयपुर राज्य के शेखावादी प्रांत मे खेतड़ी राज्य है। वहाँ के राजा 
श्रीअजीतसि'इजी बद्दादुर बड़े यशस््री और विद्याप्रेमी हुए। गणित 
शास्त्र में उनकी अद्भुत गति थी। विज्ञान उन्हे बहुत प्रिय था। 
राजनीति में बह दक्ष और गुणग्राहिता में अद्वितीय थे। दर्शन और 
अध्यात्म की रुचि उन्हे इतनी थी कि विलायत जाने के पहले और पीछे 
स्वामी विषेकानंद उनके यहाँ महीनों रहे । खामीजी से घंटो शास्र-चर्चा 
हुआ करती । राजपूताने में प्रसिद्ध है कि जयपुर के पुण्यश्लेक महा- 
राज श्रीरामसिंदजी को छोड़कर ऐसी सर्वेतोम्ुख प्रतिसा राजा श्रीक्जीत- 
सिंहजी दी में दिखाई दी । 

राजा श्रीश्रजीतसिंदजी की रानी आडआ ८ सारवाड़ ) चाँपावतजी 
के गर्भ से तीन संतति हुई'--दो कन्या, एक पुत्र । ज्येष्ठ कन्या श्रीमती 
सूयकुमारी थीं जिनका विवाह शाहपुरा के राजाधिराज सर श्रीनाहर- 
सिंहजी के ज्ये४्ठ चिरंजीव और युवराज राजकुमार भ्रीउमेद्सिहजी से 
हुआ | छोटी कन्या श्रीमती चदिकु चर का विवाह प्रतापगढ़ के महा- 
रावल साहब के युवराज मद्ाराजकुमार श्रीमानसिंहजी से हुआ । तीसरी 
संतान जयसिंहजी थे जो राजा श्रीक्रजीतसि ह जी और रानी चौपावतजी 
के खगवास के पीछे खेतड़ी के राजा हुए । 

इन तीनों के शुभचिंतकों के लिये तीने की स्सघृति, संचित कर्मो' के 
परिणाम से, दुःखमय हुईं। जयसिंहजी का स्थर्गवास सत्रह वर्ष की 
अवस्था मे हुआ। सारी प्रजा, सब शुभचिंतक, संबंधी, मित्र और 
गुरुजनां का हृदय आज भी उस आँच से जल दी रहा है। अभ्वत्यासा के 
तन्रण की तरह यद घाव कभी भरने का नहीं | ऐसे आशामय जीवन का 
ऐसा निराशात्मक परिणाम कदाचित्‌ ही हुआ दे।। श्रीसूयकृमारीजी 
को एक सात्र भाई के वियेग की ऐसी ठेस छगी कि दो ही तीन 
वर्ष में इनका शरीरांत हुआ।। श्री्चांदकु वर बाईजी को वैधब्य की 
विषम यातना सोगनी पड़ी और ज्ञातृवियोग और पति-वियोग दोनें का 


(३१३२) 

असद्व दुःख वे सेल रही है। उनके एकमात्र चिरंजीव प्रतापगढ़ के कु बर 
श्रीरामसि हजी से मातामह राजा श्री्रजीतसिंदजी का कुछ भ्रजावान्‌ है। 

श्रीमती सूच्यकुमारीजी के काईं सैतति जीवित न रद्दी । उनके बहुत 
आग्रह करने पर भी राजकुमार श्रीयमेद्सि हज्ी ने उनके जीवन-काह में 
दूसरा विवाह नहीं किया | किंतु उनके वियोग के पीछे,उनके आज्ञालुसार, 
कृष्णगढ़ में विवाह किया जिससे उनके चिरंजीव <शांकुर विद्यमान है। 

श्रीमती सूय्यकुमारीजी बहुत शिक्षिता थीं। उनका भ्रध्ययन बहुत 
विस्तृत था । उनका हि दी का पुस्तकालय परिपूर्ण था । हि'दी इतनी 
अ्रच्दी लिखती थीं और अचर इतने सुंद्र होते थे कि देखनेवाले चम- 
रक्ृत रह जाते | स्वगंवास के कुछ समय के पू्वे श्रीमत्ती ने कद्दा था कि 
स्वामी विषेकानंदजी के सब भंथों, ध्याख्यानों और छ्लेखों का प्रामाणिक 
हि दी अनुवाद मैं छुपवाऊँगी । बाल्यकाज् से ही स्वामीजी के लेखों 
और अध्यात्म विशेषतः अद्दौत वेदांत की ओर श्रीमती की रुचि थी। 
श्रीमती के निदेशाजुसार इसका कार्यक्रम बाधा गया। साथ ही श्रीमती 
ने यह इच्छा प्रकट की कि इस संबंध मे हि दी में उत्तमोत्तम अंथों के 
प्रकाशन के लिये एक अक्षय निधि की व्यवस्था का भी सूत्रपात हो जाय । 
इसका व्यवस्थापन्न घनते बनते श्रीमती का स्वर्गंवास हे गया। 

राजकुमार उमेद्सि इजी ने श्रीमती कीं अंतिम कामना के श्रजुसार 
बीस हजार रुपए देकर काशी-नागरीप्रचारिणी सभा के द्वारा इस 
अंथमाकछा के प्रकाशन की व्यवस्था की है। स्वामी विवेकानंदनी के 
थावत्‌ निर्बंधों के अतिरिक्त और भी उत्तमोत्तम अ'थ इस अधमाक्ा में 
छापे जायेंगे और अक्प मूल्य पर सर्वताधारण के लिये सुल्भ होंगे। 
अंथमाछा की बिक्री की आय इसी में क्षयाई जायगी। ये श्रीमती 
सूय्यक्ष॒मारी तथा श्रीमान्‌ उमेदसि'हजी के पुण्य तथा थश की निरंतर 
वृद्धि होगी और हि'दी भाषा का अभ्युद्य तथा उसके पाठकों को 
ज्ञान-लास होगा । 


_3--.-.0-त38स्‍ाकदाइाााककाममक, 


निवेदन 
पुश्लीभूतिः सुबहुजनिभिः श्रेय्ां संचितानाम्‌ 
साक्षादभाग्यं नतु निवसतां नन्दपल्लीषु पुंसाम्‌। 
पात्र प्रेम्णां त्रजनववधूमानसादुद्गतानाम्‌ 
आज़ायानां किमपि हृदय स्मयंतां मज्जुमूति ॥ 


उद्देश्य और परिस्थिति 


जिस समय मैं श्रोनाथद्वार की संस्कृत पाठशाला मे श्रध्या- 
पक था, उस समय मेरे एक मित्र वैद्य श्रोकृष्ण शर्मा हिंदी 
साहित्य सम्मेलन की मध्यमा परीक्षा दे रहे थे। थे कभी 
कभी मेरे पास भी रसें और अ्रत्लंकारों का विषय समभने के 
लिये आ जाया करते थे । मुझे उस समय झनुभव हुआ कि 
हिंदी भाषा में रसें क्लौर भावों के विषय को प्राचीन शैल्ली से 
यथार्थ रूप मे समम्का देनेवाला कोई भी अँथ नही है। उन्होंने 
मुझसे आग्रह भी किया था कि आप इस विषय मे कुछ लिखिए; 
पर अवसराभाव से उस समय कुछ भी न हो सका। अस्तु। 

उस बात को आज कोई चार-पॉच वर्ष हो गए। विक्रम 
संवत्‌ १८८२ के माघ मास में मैंने किसी विशेष कारण-वश 
श्रोनाथट्वार छेड़ दिया। उसके कुछ ही दिनों बाद--.चैन्र में--- 
बंबई निवासी गोस्रामिकुलकास्तुम श्रोगोकुलनाथजी महाराज 


[  ] 

ने मुझे जूनागढ़ भ्रौर चापासनी( जोधपुर, मारवाढ़ ) के झ्राचार्या- 
सनें पर विराजमान चि० गोखासी अश्रीपुरुषोत्तमज्ञाल्जी 
तथा चि० गोखामी श्रोत्रजभूषणल्ालजी के अ्रध्यापन के लिये 
नियुक्त किया । इसी अवसर मे मुझ्ते काशी फी साहित्याचार्य 
परीक्षा के लिये रसगंगाधर के प्रध्ययन्त और सनन की आव- 
श्यकता हुई। रसगंगाघर से परिचित सभी संस्क्रताभिज्ञ इस 
वात फो सानते हैं कि रसें पश्लौर सावों का जैसा विशद 
विवेचन रसगंगाधर मे है, वैसा और कही नहों है। अतः 
इस समय मेरे हृदय मे अपने पूर्वोक्त मित्र के आग्रह की स्घति 
जागरित हुई पैर विचार हुआ कि क्‍या ही प्रच्छा हो, यदि 
यह अंथ हिंदी-भाषा-साषियों के भी उपयोग मे झा सके । 
इस विचार के कुछ दिन पूपे, मेरे मित्र और भूपाल्ष-नोबल्स- 
स्कूल, उदयपुर (मेवाड़ ) के भ्रध्यापक साहित्यशाश्षों श्रीगिरि- 
धर शर्मा व्यास ने मुझसे इस अलन्नुवाद के लिये कद्दा सी था। 
कदाचित्‌ उनका यह विश्वास था कि मेरा अनुवाद संस्कृत 

रसगगाधर के अध्येता छात्रो के लिये भी उपयोगी द्वोगा | 
चापासनो एक छोटा सा गॉव है, इतना छोटा कि वहाँ 
सव मिल्ञाकर सी मनुष्यों की भी बस्तो नहीं है। यद्यपि 
अध्ययन, भ्रध्यापन क्रौर सेजन-निर्माणादि के कारण ( क्योंकि 
मैं यहाँ सकुद्ुंध नही रहता था) बहुत ही कम समय बच पाता 
था; तथापि यहाँ कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जो मुझसे इस 
समय को भी छीन लेता । हॉ, यदि मैं उसका दुरुपयोग ही 


[ ३ ] 

करना चाहता ते! बात दूसरी थी । सो मैंने इस अनुवाद का 
काये आरम्भ कर ही डाला । 

पर पूर्वोक्त आचायेकुमार यहाँ स्थिर रूप से नहों रह पाते | 
उन्हें भारतवर्ष के अधिकांश भाग मे फिरते रहना होता है । 
और मैं ते रदह्दा उनके साथ; इस कारण तथा अन्यान्य कारणों 
से भी मुझे खूब ही भ्रमण करना पड़ता है। से इस ( प्रथ- 
सानन ) के अनुवाद के लिखते समय मैंने करॉची, हैदराबाद 
( सिध ), जोधपुर ( कई बार ) जयपुर ( कई बार ), भददमदा- 
वाद, बड़ौदा, इंडर, बीकानेर, नागार, जूनागढ़ ( कई बार ), 
काशी, मथुरा और श्रोनाथद्वार भरादि अनेक प्रसिद्ध नगरों के 
अतिरिक्त काठियावाड़ के शताबधि गावेंड्रों मे--प्राय: राज 
पहुँचे और कल् चले, इस हिसाव से--भ्रमण किया है, श्रौर 
श्राज भी यही क्रम वत्तमान है | 

गाबंड़ो में प्राय: किसानों के घरों मे रहना द्वोता है। उन 
गोमयरंधी अ्ंधतमसाबृत तथा खटमलों और पिस्सुओां के नियत 
निवासे| मे जिन कष्टों का अ्रतुभव द्वोता है, उन्हें अनुभविता 
के अतिरिक्त कान समझ सकेगा ? हाँ, कभी-कभी भ्रच्छे घर 
भी प्राप्त हो जाते हैं; पर भाग्य से ही। फिर वहाँ पहुँचते ही 
घर जमाना, भेजन बनाना, पूर्वोक्त कुमारों फो पढ़ाना और 
आवश्यकता हो ते व्याख्यानादि भी देना पड़ता है। इसके 
उपरांत यदि सद्भाग्य से कुछ समय प्राप्त हो गया और शरीर 
तथा मन स्वस्थ रहा ते! इस अनुवाद के लिखने का अवसर 


[ ४ ] 

आता है। पर, ऐसी परिस्थिति मे एकाग्रता और स्वास्थ्य 
कट्दों तक रह सकते हैं, इसका पता भुक्तमोगी को ही 
हो सकता है | 

मुझे इस बात का बोध है कि में यह सब लिखकर आपका 
आर अपना देनो का समय नष्ट कर रहा हूँ; तथापि यह समझ्क- 
कर कि मेरी परिस्थिति का भ्रभुभव हो जाने के फारण, भाप, 
इस अनुवाद मे कदाचित्‌ कोई तन्रुटि रह गई हो ते क्षमा कर 
सकेगे, ये बातें लिख दी गई' हैं। मैं भ्राशा करता हूँ कि 
आप मुझे इस समय घातित्व के दोष से मुक्त कर देगे । 


अनुवाद 


मैं अनुवाद उसे मानता हूँ, जिसे, जिस भाषा मे वह लिखा 
गया है, उस भाषा-मात्र को जाननेवाला मनुष्य समझ 
सके उसे मूलमंथ की भाषा के अध्ययन की आवश्यकता 
दी नपड़े। पर, झ्राजकल हिदी-भाषा में संस्कृत-भाषा ऐसी 
मिल्ल गई है कि बिना उसके हिंदी का कुछ काम ही नहीं चत्न 
सकता, इसे उससे सर्वथा प्रथक कर देना प्रसंभव ही है। 
जब समाचारपन्नो को भाषा भी संस्क्रतप्रचुर देती जा रही है, 
तब पुस्तकों की भाषा के विषय में ते! कहना हो क्या है | 
फिर यह ते एक ऐसे अंथ का अनुवाद है जिसके विषय 
और भाषा इतने गंभीर हैं कि उनकी टक्कर से, ऐसे वैसे 
संस्कृतन्नों का ते सिर चकराने छगता है। ऐसी स्थिति में 


[ ४५ |] 

हमारे जैल्ा अत्पक्ष और व्यग्नचिच प्राणी इस काये मे ऋृत- 
कृत्य देने की आशा करे, यह यद्यपि दुस्साहस-मात्र हों है 
तथापि यह समककर कि संस्कृत-भाषा के महा विद्वाद ते 
इस काम को हाथ मे लेंगे नहो; क्योंकि वे वहुधा हिंदी में 
लेख लिखने मे अ्रपना प्रपमान मानते हैं, हमने अपनी अयो- 
ग्यता समभते हुए भी यह कुचेश कर हो डाली । हाँ, इसमे 
कोई संदेह नहीं कि हमने अपने पूर्वोक्त सिद्धांत के अनुसार, 
जहाँ तक दे सका, अनुवाद के सरक् और घापवद्ाविरे वनाने 
के प्रयक्न मे किसी प्रकार की कमी नहीं की; श्र नव्य न्याय 
की शैली से लिखे हुए इस प्रंथ के अनुवाद में भी, बिना 
किसी विशेष कारण के, कही अवच्छेदक तथा अवच्छिन्न शब्द 
नहीं झ्राने दिया और उन स्थलों का तातपये लिखने का प्रयत्न 
किया है। अब हम सफल्ञ हुए अथवा असफल, इस बात का 
निणेय विद्वान लोग करेगे। वे क्ृपाकर इस बात को भी 
ध्यान से रखेंगे कि शास््लीय विषय सरल से सरंत् करने पर भी 
कहानी नहीं बन सकता | 


पद्मानुवाद 
हमने एक और कुचेष्टा की है। वह है उदाहरण-पद्यों 
का पद्यालुवाद । इसका कारण केवल यह है कि पद्य मे जे। 
एक प्रकार की बन्धकृत विशेषता होती है, वह केवल्न गद्यानुवाद 
में नहीं आ सकती; श्र हमारी इच्छा थी कि हिंदी के 


[ ६ ॥ 

ज्ञाता मात्र भी उसका अनुभव कर सकें। अतएवं हमने अनुवाद 
में इस बात का ध्यान रखा है कि मूल्न मे जहाँ नागरिका, उप- 
नागरिका अथवा प्राम्य वृत्ति है वहा अनुवाद मे भी वही 
वृत्ति रहे, यहाँ तक कि जहाँ एक पद्म मे तीन-वीन वृत्तियों 
बदली हैं, वद्दों भी उनके निर्वाह का यथाशक्ति प्रयक्न किया 
जाय। इतने पर भी मतभेद हे! खकता है, और ऐसा 
होना अनिवार्य भी है। 


विषय-विवेचन 


हमने एक अनधिकार चेष्टा और की है। वह है भूमिका 
का 'विषय-विवेचन! भाग। इसमें हमने जिन विषयों का 
विवेचन किया है, वे अत्यन्त गंभीर और अत्यधिक सामग्री 
तथा अध्ययन की भ्रपेक्षा रखते हैं; शोर हमे विश्वास है कि 
इस विपय मे इमारे जैसे अल्पक्ष और अल्पबुद्धि प्राणी से अनेक 
भूले' हुई हैगी। झौर कई बातें की कमी तो दमारे जानते 
मे भी रह गई है, जिसे हम, पूरा नही कर सके | सद्भाग्य 
से यदि हमारे सामने इसके द्वितीय संस्करण का सुयोग आदबेगा 
म,्रौर उस समय हमारी परिर्थिति अच्छो होगी, ते हम उसे 
पूर्ण करने का प्रयत्न करेगे । इतने पर सी यह समझकर कि 
हमारे इस विषय फो छोड़ देने पर, संभव है, कोई भावी विद्वान 
इसे सवोगपूर्ण बना सके और इस समय भी जैसा कुछ संभव है 
वह इन विपयो के अ्रध्येताओ के उपयोगी हो, इससे जो कुछ 


[ ७ ] 

बन पढ़ा लिख ही दिया है। इसके लिखने में भी हमे श्रपनी 
परिस्थिति के फारण भअत्यंत कष्ट उठाना पड़ा है। हम आशा 
करते हैं कि हमारे गुणप्राहक विद्वान हमारी अल्पज्ञता और 
परिस्थिति को समझकर तथा भगवान्‌ श्रीकृष्णचंद्र की इस उत्ति 
को स्मरण करके कि “सर्वारंभा हि देषेण धूमेनाभिरिवाइता:?? 
देषों पर दृष्टि न देंगे और हमे क्षमा करेगे । “विषय विवेचन! 
प्रकरण मे जो आचायों के काल्न लिखे गए हैं, वे प्रायः म०म० 
श्रोदुर्गाप्रसादजी द्विवेदी क्री साहित्यदर्पण की भूमिका से और 
श्रोसुशीजकुमार दे, एम० ए० के 'संस्क्रव पोयूटिक्स” से लिए 
गए हैं, एतदथथ उन्हे धन्यवाद है। 


अड़चने 


अनुवाद करने मे हमे अनेक झ्रड़चनें भी उपस्थित हुई । 
खबसे बड़ी अ्रडचन ते। यह थी कि इस अंथ पर कोई विवेचना- 
पूर्ण प्लौर विशद्‌ व्याख्या नहों है, केवल नागेश भट्ट की गुरुममें- 
प्रकाश नामक टिप्पणो है, जिसमे उसके नामानुसार मोटे मोटे 
मम्में। पर प्रकाश डाक्षा गया है, अतः अधिकांश स्थल्ञों की 
विवेचना का भार इस अ्रत्पज्ञ की तुच्छ बुद्धि पर द्वी आ पढ़ा । 
दूसरी भ्रद्चन यह थी कि यह अंथ अब तक हे खाने से 
प्रकाशित हुआ है। एक काशी से और दूसरा “कान्यमात्ाः 
में बंबई से। पर,न जाने क्‍यों दोनों ही संस्करण स्थान 
स्थान पर अशुद्ध हैं। काशीवाल्ञां संस्करण ते। मुद्रणेपयोगी 


[८ ]] 

लेख-चिह्ो से भी शून्य है, उसमें ते! विशेषत: पाराआफ तोड़ने 
का भी परिश्रम नहीं किया गया। यशथेष्ट व्याख्या से रहित 
अशुद्ध भार जटिल प्रंथ का शुद्ध करके उसका यथोचित अजु- 
वाद करने में कितनी कठिनता होती है, उसे वही समझ 
सकता है, जिसे यह काम पड़ा हो । से यह भार भी इस 
तुच्छ बुद्धि पर ही आ पड़ा। पर इसमे कोई संदेह नही 
कि देनों पुस्तकों के संवाद से हमे संशोधनकारय मे बहुत कुछ 
सहायता मिक्नी है। तीसरी अड़चन यह थी कि उपयुक्त 
अमण के कारण हमे प्रपेक्षित पुस्तकादि भो नहीं प्राप्त हो 
सफती थीं; श्रौर सुतरां काठियावाड़ मे; क्योंकि यहाँ संस्कृत 
भाषा का बिलकुल प्रचार नहों है। इसके श्रतिरिक्त हमारे 
स्वास्थ्य ने भो समय समय पर अंतराय उपस्थित कर दिंया। 
पर, इन सब अड़चनों के होते हुए भी जहाँ तक हो सका, 
हमने गड़बड़-घेटाज्ञा चक़्ाने की कोशिश नहीं की ; इस प्रकार 
प्रथभानन का यह अनुवाद आप की सेवा में उपस्थित है। 
इसमें संद्दे्द नहीं कि यदि हमारी परिस्थिति और स्वास्थ्य 
अच्छे होते तो यह अलुवाद इससे कही अच्छे रूप मे सिद्ध 
होता। अरतु, इेशवरेच्छा । हे 


अनुग्राहक 


अब अत मे हम अपनी अनुग्राहक मंडी का स्मरण कर- 
के इस कथा को समाप्त करते हैं-- 


[ 5 ] 
इस विषय में हम सबसे पद्दले अपने परमपृजनीय पितृ- 
चरण पंडित श्रीमघुरालालजी चतुवंदी का, जे इस समय झनंत 
सुख का अलुमव कर रहे हैं, स्मरण करेगे; क्योंकि यह जे 
कुछ आपके सामने है, वह उन्हीं के अक्नत्रिम प्रेम, संस्क्रत- 
शिक्षण, श्रम और हार्दिक आशीर्वाद का फल है । 


तदनंतर श्रोमद्वल्तभाचाये के प्रधान पीठ पर विराजमान 
गोस्वामितिलक श्रीगोवर््धनलालजी सहाराज और उनके विद्या- 
प्रेमी कुमार श्रीदामोदरलालजी महोदय के निःस्वा्थ भ्रनुमह 
और, मेरे विद्यागुरु शीत्र कवि श्रोनन्दकिशोर शाख्त्रीजी के उप- 
कार का स्मरण आवश्यक है; क्‍योंकि इस अकिंचन का, 
किशोरावस्था के अनंतर, शिक्षण प्रौर रक्षण उन्हीं की सहा- 
यता से हुआ है। 


इसकी बाद हमारे परममानलीय महामददोपाध्याय पं० 
श्रोगिरिधरशर्मा चतुर्वेदीजी का स्मरण अपेक्षित है; क्योंकि 
रसगंगाघर की अनेक अंथ-प्रंथियों के शिथिलीकरण मे उनका 
बहुत कुछ हाथ है। 


झब यदि इस अवसर पर हम अपने परम सुहृदु काशी- 
निवासी साहित्यभूषण श्रोसॉवलजी नागर का स्मरण न करे, 
ते कदाचित्‌ हमारा सा क्ृतन्न कोई न द्वोगा, क्योंकि इस 
पुस्तक का लेखन और प्रकाशन उनके उत्साहदान और निष्काम 
साहाद से बहुत कुछ संबंध रखता है। 


[ १० |] 
अत में श्रोगोवद्धंनंधरण से प्राधेना करते हैं कि वे इस 
अनुवाढ को साहित्यानुरागियों का प्रेमपात्र भर चिरायु करें | 
इति शम्‌ । 


वैशाख ऋष्ण ८ शुक्रवार 
से० १८८४ जयपुर 


| पुरुषोत्तम शर्स्मा चतुर्वेदी 


हु 


पंडितराज का परिचय 


जाति, वंश, अभ्युदय और शिष्य आदि 


पंडिवराज जगन्नाथ पैज्ंग* जाति के ब्राक्षण थे। उनका 
जातीय उपनाम वेगिनाडु अथवा वेस्लनाडु था, जिसे वेस्लना- 
टीय* भी कहा जाता है और जे श्रोमद्वल्तभाचाय के सजा- 
तीय उत्तरभारतीय तैलंगो का, भ्रव तक, उपनाम है। इनका 
एक 'उपनाम' त्रिशूली,३ भी था, जे। कि जयपुर की जनता में 
भ्रब तक भी प्रसिद्ध है। उनके पिता का नाम पेरुभट्ट* अथवा 
पेरम* भट्ट था श्रौर माता का नाम क्वच्मी?” । पेरुभट्ट 
महाविद्वान्‌ थे । उन्होने ज्ञानेद्र" मिक्षु नामक विद्वान यति से 
वेदांत शास््र, महदेद्र पंडित से न्याय और वैशेषिक शाल्र, खड- 


१--...तैलंग कुल्लावतंसेन पंडितजगन्नाथेव...? ( 'आसफविलढास' 
का आरंभ ) | 

२--कुछपति मिश्र ने ( आगे उद्धुत ) अपने पद्य में 'बेल्ञनाटीय” 
शब्द ही लिखा है । 

३--मिश्र जी ने भी यह उपनाम लिखा है, अतः यह संदेह अनुचित 
है कि त्रिशूली जगन्नाथ कोई अन्य था । 

४--रसगंगाघर में ! 

ई--प्रायाभरण में ! 

६--रसगंगाधर से । 

७--रसगंगाघर के आरंस का द्वितीय पद्म । 


| [ १२ | 

देव पंडित से पूर्वमीमांसा शाक्ष और शेष? वीरेश्वर पंडित से 
व्याकरण महाभ्राष्य पढ़ा था। इसके अतिरिक्त वे वेदादिक 
अन्य शास्रों के भी ज्ञाता थे, जेसा कि रसगंगाधर के 'सर्च 
विद्याधर! पद से सूचित होता है। पंडितराज ने प्राय: इन्ही 
से भ्रध्ययत किया था; पर इनके गुरु शेष वीरेश्वर से भी झुछ 
पढ़ा हो ऐसा प्रतीत होता है, यह बात भनेरमाकुचमर्दन! 
नामक म्रंथ के 'भस्मद्गुरुपंडितवीरेश्वराणाम! इस पद से सूचित 
होती है। थे खं भी बेद, वेदांत, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, 
व्याकरण और साहित्य आदि शास्नों के मद्दाविद्वान थे, ऐसा 
रसगंगाघर मे स्थान स्थान पर उद्धृत प्रमाणों, लेखें प्रौर 
प्रतिपादन-शै्ञी से सिद्ध है और इस विषय में किसी प्रकार 
के प्रमाण की आवश्यकता नही रहती | 

जब्र ये नवयुवक ही थे, उसी समय, इनका, तत्कालीन बाद- 
शाह शाहजहो के दरबार मे प्रवेश हे गया था, श्रौर बादशाह 
ने इनकी बिद्वत्ता से संतुष्ट होकर इन्हें 'पंडितराज! रे की पदवी 
प्रदान की थी । इसकी युवावस्था का अधिकांश शाहजहाँ*१ 





१--थयह' उनका उपनाम था । 

२-- एतेन तदितिरशास्रवेदाविज्ञातृष्व॑ सूचितम्र' (गुरुमर्मप्रकाशः) | 

३---...सार्वमैमशीशाइजह प्रसादाद्धिगत्पंडितराजपद्वीकैन, .. *? 
( 'आसफविलास? का आरंभ )। 

४-- दिकलीवल्लभपाणिपक्लवतले नीत॑ नवीने वय.! ( भामिनी- 
विलास )। 


[ १३ | 
तथा उसके पुत्र दाराशिकाह* की छत्नच्छाया मे ही व्यतीत 
हुआ धा । शाही जमाने के संस्कृव-पंडितों मे हम इन्हें 
परम भाग्यशाज्ञी मानते हैं, क्योंकि 'तस्तताऊसः और 
ताजमहल” आदि परम-रम्य वस्तुओं के वनवानेवाल्े और बड़ी 
भारी शान-शाकत से रहनेवाले सार्वमैौम शाहजहाँ के उस 
शक्रोपम वैभव के भोग मे इनका भी एक भाग था | 
'संग्राम-सार”र और “रस-रहस्य”रे आदि ग्रंथों के 

निर्माता, जयपुर-नरेश श्रीरामसिंहजी प्रथम के आश्रित, ब्रजभाषा 
के सुप्रसिद्ध कवि माथुर चतुर्वेदी श्रोकुल्षपति मिश्र, जे आगरे के 
रहनेवाले थे, इनके शिष्य थे और इन पर उनकी प्रत्यंत श्रद्धा 
भक्ति थी। इसके प्रभमाण मे हम सिंग्राम-सार! से दे पद्च 
उद्धृत करते हैं। बे ये हैं-- 

शब्द-जोग में शेष, न्याय गोतम कनाद मुनि । 

सांख्य कपिल, अरु व्यास ब्रह्मपथ, कर्मनु जैमिनि ॥ 

वेद झेग-जुत पढ़े, शील-तप ऋषि वसिष्ठ सम । 

अलंकार-रस-रूप अष्टभापा-कविता-क्षम ॥ 





१--जगढ़ाभरण” नामक ग्रंथ मे दाराशिकाह का ही वर्णन है । 

२---समआाम-सार'! वि० सं० १७३३ मे घना था, यह म० म० 
ओगिरिधरशर्मा चतुर्वेदीजी के पिता कविवर श्री गोकुलचंद्रजी का 
कथन है । 

३---.'रस-रहस्थ” का समय ते कवि ने ख्यं ही लिखा है---'सबत्‌ 
सन्नह सौं वरष ( अरु ) बींते सत्ताईस । कातिक बदी एकादशी बार 
बरनि वानीश ।? ( रसरहस्य, अष्टम-व्ृत्तांत, पद्य २११ ) 


[ १४ |] 
तैलंग वेलननाटीय द्विज जगन्नाथ तिरशूलघर । 
शाहिजहा दिल्लीश किय पंडितराज प्रसिद्ध घर ॥ 
,.. उनके पण को ध्याच घरि इृष्टदेव सम जानि | 
उक्ति-जुक्ति बहु भेद भरि अंथहि कह्ौं बखानि ॥ 
“--संग्रामसार, प्रथम परिच्छेदू, पद्य ४-६ 
इसके अतिरिक्त 'रस-रहस्य” मे जे उन्होंने काव्यलक्षण 
दिखा है, वह भी इन्हीं की शैली का है। काव्यप्रकाश 
तथा साहित्यदपंण के काव्यल्क्षण प्रथक्‌ लिखे गए हैं तथा 
साहित्यदर्पण के काव्यक्कक्षण का ते खंडन भी किया गया है। 
रसरहस्य का का्यत्नक्षण थों है--- ४ 


जग ते अद्भुत सुख-सदुन शब्द रु अर्थ फवित्त | 
यह लक्षण मैदे किये समुझ्ि अंथ बहु चित्त ॥ 


पर मिश्रजी के इस पद्य से एवस्‌ उनके रचित समप्र रस- 
रहस्य से भी यह सिद्ध द्वोता है कि जिस समय पंडितराज 
प्रौर मिश्रजी का समागम रहा, उस समय या ते पंडितराज 
रसगंगाधर लिख नहीं पाए थे, या इनका समागम ही स्वल्प 
रहा था; क्योंकि उस पुस्तक से फेवल इस लक्षण फे अति- 
रिक्त जितनी बाते लिखी गई हैं, वे सब 'काव्यप्रकाश” से ली. 
गई हैं प्रौर इस लक्षण में भी शब्द और अथे दे।नें के काव्य 
साना यया है, जे कि 'रसगंगाधरः के लक्षण के विरुद्ध है। 

पंडितराज के एक दूसरे शिष्य का भी पता लगता है। वे 
पंडितराज के सजातीय थे और उत्तका नाम नारायण भट्ट था। 


[ १५४ ] 

उनके विषय मे उनके भतीजे हरिहर भट्ट ने, जो महाविद्वान्‌ 
थे, स्वनिर्मित 'कुलप्रबंध! नामक काव्य मे यों लिखा है कि-- 

लव्ध्या चिद्या निखिलाः पंडितराजाजगन्नाथात्‌ 

नारायणस्तु॒ दैवादल्पायुः खपुरीसगमत्‌ ॥ 
अर्थात्‌ पंडितराज जगन्नाथ से खब विद्याएँ प्राप्त करके नारा- 
यण भट्ट ता, भाग्यवशात्‌, थोड़ी ही अवस्था मे खर्ग फो 
सिधार गए* | 

इस सबसे यह्द पता ल्गवा है कि पंडितराज के, संस्कृत 

प्रौर हिंदी देवों भाषाओं के ज्ञाता, प्रनेक् अच्छे अच्छे 
विद्वाव शिष्य थे | 


किंवदंतियाँ और समय 
पंडितराज के विषय में अनेक किवदंतियाँ प्रसिद्ध हैं। 
छुछ लोग कद्दते हैं कि “जगन्नाथ पंडितराज ने तैछ॑ंग देश से 
जयपुर आकर वहाँ एक पाठशाल्ञा स्थापित की थी और वहीं 
उन्होने किसी काजी को, जो दिल्ली से झ्राया था, मुसलमानों 
के मजहवी प्रंथों को बहुत शीघ्र पढ़कर विवाद से हरा दिया 
धा। वह काजी जब दिल्‍ली गया, ते उसने: बादशाह के 


१०-नारायण भट्ट और हरिहर भट्ठ के वंश में इस समय शुद्धाह त- 
भूषण भट्ट श्रीरमानाथ शाल्घोजी (वैबई ) तथा साहिल्याचाय्ये भट्ट 
श्रीमशुरानाथ शास्रीजी ( जयघुर ) आदि अनेक 'भट्ट विद्यमान हैं और 
उनकी भ्राप्त की हुईं जीविका को भोगते हैं । 


[ १६ | 

खामने पंडितराज की विद्या-बुद्धि की बढ़ी प्रशंशा की । बाद- 
शाह यह सब सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ और उसने इन्हे जय- 
पुर से दिल्ली वुल्लाकर इनका बड़ा आदर-सत्कार किया। 
चहाँ ये महाशय किसी यवन-कन्या पर आसक्त हो गए और 
बादशाह की कृपा से इनका उसके खाथ व्याह भी द्वो गया। 
इस तरह इन्होंने अपनी यावनावस्था बादशाह के आश्रय मे 
मे ही सुखपूर्वक बिताई। जब थे बुड़्ढे हुए तब काशी चल्ले 
गए। पर वहाँ भ्रप्पय दीक्षित भ्रादि विद्वानों ने यह कहकर कि 
'यह ते! यवनी के संसग से दूषित है? इनका तिरस्कार किया भ्रोर 
इन्द्दे जाति से निकाल दिया। तब ये गंगातट पर गए झौर सबसे 
ऊपर की सीढ़ी पर बैठकर उसी समय बनाए हुए अपने पद्यो से 
( जिनका संग्रह “गंगाल्नदरी? नामक पुस्तक मे है ) लगे गंगाजी 
की स्तुति करने | फिर क्‍या था, भक्तवत्सला गंगाजी प्रसन्न हुई 
और प्रत्येक श्लोक पर एक एक सीढ़ी चढ़ती गई" श्रौर बावनवे 
पद्य के पढ़ने पर पंडितराज के पास आ पहुँची, एव उस यवन- 
कन्या सहित इन महाशय के अपनी प्रेमपूर्ण गोदी मे बिठा- 
कर स्नान करवा दिया | इंष्या-द्वेष से कछ्लुषित बेचारे काशी 
फे पंडित पंडितराज के इस प्रभाव को देखकर अत्यंत चकित 
हो गए और फिर कुछ न बोल सके /? 

दूसरे लोगो का यह भी कहना है कि--“जब ये महाशय 
दिल्ली-नरेद्र शाइजहों के कृपापात्र हे गए और उनकी कृपा 
से इन्हे भ्रच्छी संपत्ति प्राप्त दे गई, तब, जवानो के दिन ते 


[ ९१७ |] 

थे ही, इनके विवेक का प्रकाश लुप्त हे! गया भर ये अंधे 
होकर किसी यवनयुवती पर आसक्त हो गए। पर थोड़े 
समय के बाद वद्द सर गई। बेचारे पंडितराज उप्तके विरह 
मे बड़े घबड़ाए और दिल्‍ली छोड़कर काशी चल्ले गए। पर 
वहाँ के पंडितों ने, जे। पहल्ले इनके आचरणों को सुन चुके 
थे, इनका भ्रनादर किया और ये स्वयं भी पंडितों के तिरस्कार 
एवं प्रियतमा की विरहाप्ि से दुःखित हुए और कही चैन न 
पा सके | परिणाम यह हुआ कि अपनी बनाई हुई गंगा- 
लहरी को पढ़ते हुए, जब बरसात मे गंगा की बाढ़ आ रही 
थी तब, उसमे कूद पड़े ग्रैर डबकर मर गए ।?? 

एक किवदंती यह भी है कि---“/जब ये वृद्ध होकर काशी 
में जा रहे थे, तब एक दिन प्रभात के खमय, ठंडी ठंडी हवा 
में, पंडितराज अपनी उस यवनयुवती को बगल मे लिए हुए, 
गंगावट पर, झुँह् पर बस्न श्रेढ़े हुए सोए हुए थे और इनकी 
सफेद चोटो खटिया से नीचे लटक रही थी । इतने में झप्पय 
दीक्षित वहाँ स्नान करने चल्ले आए | उन्हें एक वृद्ध मनुष्य 
की यह दशा देखकर दुःख हुआ और कहने क्गे कि 
“कि-निश्शंक शेषे, शेषे बयसि स्वमागते सृद्ौ ।?? अर्थात्‌ महा- 





३---ये दोनें किंवदृतियाँ काव्यमाछा से प्रकाशित रसगंगाघर की 
भूमिका से ली गई हैं । वहाँ यवनी की आसक्ति के भ्रमुमापक श्लेक 
भी लिखे हैं, पर उन्हे अश्लीक समझकर हमने छोड़ दिया है और दे 
सर्वेन्न प्रसिद्ध भी हैं। 


[ १७८ ] 

शय, मैतत आ चुकी है, अब इस शेष वय मे क्‍यों निडर होकर 
से रहे हे ? अब ते कुछ ईश्वर का स्मरण-भंजन करो और 
अपने जीवन को छुधारो । पर, इस पद्म के घुनते ही पंडित- 
राज ने ज्योहदी झुँह उधाड़कर उनकी तरफ़ देखा, त्योंही 
पंडितराज का पहचानकर अप्पय दोज्षित मे इस पद्च का 
उत्तराधे यों पढ़ दिया कि “अथवा सुख शयोथा, निकटे 
जागत्ति जाहृ॒बी भवत:”” प्र्थात्‌ अधवा आप सुख से सोते रहिए 
क्योंकि आपके पास मे भगवती जाह॒बी जग रही हैं। बस, 
झापको फिकर उन्हे है, आप निडर रहिए |? 

यह भी कहा जाता है कि “पंडितराज जिस समय काशी 
में पढ़ते थे, उस समय जयपुर-तरेश मिरजा राजा जयसिंहजी 
काशीयात्रा करने गए थे। वहाँ की बिद्वन्मंडली मे इनकी 
प्रग्भता देखकर वे बड़े प्रसन्‍न हुए और इन्हे झपसे साथ 
जयपुर ले भ्राए। साथ के आने का कारण यह था कि शाही 
दरबार मे राजपूत लोगो के विषय मे मुन्ना लोग यह कहा 
करते थे कि “आप लोग वास्तविक क्षत्रिय नही हैं; क्योंकि 
जब परशुरामजी ने प्रृथ्वी को २९ बार निःज्षत्रिय. कर दिया, 
दे फिर आप ज्ोएें के पूवज बच कहाँ से सकते थे ९? दूसरे, 
यह भी कहा जाता था कि अरबी साषा संस्कृत-भाषा से 
प्राचीन है?। ये बातें पूर्वोक्त नरेश को बहुत खटका करती 
थी। पंडितराज ने बादा किया था कि हम उन्हे निरुत्तर कर 


३--पह किंवदृत्ती कुवढयानंद (मिणंय सागर) की सूमिका मे है। 


[ १८5 ] 
देगे। जब बे उन्हें साथ ले आए, तब पंडितराज ने कह्दा कि-- 
'पहल्ली बात का--अर्थात्‌ राजपूत लोगों के वास्तविक क्षत्रिय होने 
का--जवाव ते हम आज ही दे सकते हैं; पर दूसरी वात का--- 
प्र्थात्‌ अरबी संस्कृत से प्राचीन है, इसका--जवावद तव दिया 
जा सकता है जब हम भ्ररवी पढ़ ले। सो राजाजी ने उन्हें 
अरबी पढ़ने की अनुमति दी और उन्होंने कुछ दिन आगरे मे रह- 
कर पभ्ररवी का यथेष्ट ज्ञान प्राप्त कर लिया । तदनंतर ये वादशाह 
के सामने उपस्थित किए गए । पूछने पर इन्होंने पहली बात 
का यह प्रत्युत्तर दिया कि--निःक्षत्रिय होने का भ्रथ यदि यह 
ज्गाया जाता है कि एक भी क्षत्रिय नहीं बचा, ते फिर आप 
ही कहिए कि प्रथ्वी २१ वार कैसे नि.क्षत्रिय हुई, क्योंकि 
क्षत्रियमात्र की समाप्ति ते एक ही बार मे हो गई होगी। 
ओर यदि यह कट्ठो कि कुछ बच रहते थे, ते! जब २० वार 
बचते रहे ते २१ वीं बार भी अवश्य द्वी कुछ बच रहे होंगे । 
वस, उन्हीं की संतान थे राजपूत लोग हैं ! और दूसरी बात 
के उत्तर के विषय मे यों कहा जाता है कि अरबी भाषा में 
मुसल्षमानों की एक धमेपुस्तक वताई जाती है, जिसका नाम 
“हदोस” है। उससे एक जगह यह लिखा है कि--ऐ 
सुसल्लमानो ! हिंदू लोग जिस तरह मानते हैं, उससे उल्टा 
तुम्हें मानना चाहिए ।” सो पंडितराज ने कहा कि “बिता 
भाषा के ते कोई धर्म हे! नहीं सकता, और आपका “हदीस? 
इस बात की सूचना देता है कि उस वाक्य से पहले भी हिंदुओं 


[ २० |] 

का फोई धरम था। अतः जब धर्म था ते भाषा अवश्यमेव थी 
ओऔर हिंदुओं की घामिक भाषा संस्कृत के अतिरिक्त अन्य कोई 
दे! नही सकती; इस कारण आपको मानना पड़ेगा कि संस्क्रत 
अरबी से प्राचीन है ।! कहा जाता है कि इन तकोंँ से बाद- 
शाह बहुत प्रसन्न हुआ और तब से शाही दरबार में इनका 
भारी दवदवा हो गया [? 

यह ते हुई किवदंतियों की बात | अब समय का विचार 
कीजिए। इस विषय में अब तक लोगों ने मेटे तैर पर यह 
सेच जिया है कि शाहजहाँ का राज्यासिपेक सन्‌ १६२८ 
ईं० में हुआ और सन्‌ १६५८ ई० मे औरंगजेब के हारा वह 
कैद कर लिया गया तथा सम्‌ १६६६ ६० मे मर गया । बस, 
यही पंडितराज का समय है। अतएवं यह कहा जाता 
है कि 'अप्पय दीक्षित पंडितमज के समकालिक नहीं थे 
एव उनके इनफे कुछ विरोध नहीं था? इत्यादि । 

पर, इस विषय से झब कुछ नवीन प्रमाण भी प्राप्त हुए 
हैं, जिन पर विचार करना आवश्यक है। प्रप्पय दीक्षित का 
एक अंथ सिद्धान्तलेशसंग्रह” नाम का है। उसके कुंभकाण- 
वाले संस्करण की भूमिका मे विद्वान भूमिका-लेखक ने २-३ 
शोक ऐसे लिखे हैं कि जिनसे पंडितराज के समय के घिषय 





भह कि चढ ती महामह्देपाध्याय भ्रीगिरिधर शर्माजी चतुचेठी के 
सुख से सुनी गई है, और अन्य किंवद॒॑तियें की अपेत्ता कुछ प्रामाणिक 
प्रतीत होत्ती है | 


[ २१ |] 


में कुछ सूक्ष्म विचार द्वो सकता है कौर पहली किंवदंती का 
छुछ अंश सिद्ध सा हे। जाता है। उतमें से पहला रोक, 
जिसको उन्होंने काव्यप्रकाश की व्याख्या मे नागेश भट्ट का 
लिखा हुआ बतलाया है, यह ऐ-- ' 
दष्यवृद्ाविदृदुअंहअह वशान्म्लि.्' गुरुद्गोहिया 
यब्म्लेच्छेति चचे5विचिन्त्य सदुसि प्रोढेअपि भद्दोजिना । 
तत्सत्यातितमेव घैयनिधिना यत्स ज्यस्दूनात्कुच” 
निेध्याउस्थ मनेरमामत्रशयत्रप्यप्पयाद्यान्‌ स्थितान्‌ ॥ 


अर्थात्‌ गर्बयुक्त द्राविड़ ( अप्पय दीक्षित अथवा द्राविड़ 
छ्लोगों ) के दुराग्रह रूपी भूत के आबेश से गुरुद्रोही भट्टोजि 
दीक्षित ने भरी सभा मे बिना सोचे-समभे ( पंडितराज से ) 
अरस्पष्टया जो म्लेच्छ' यह शब्द कह दिया था उसको 
चैयनिधि पंडितराज ने सत्य कर दिखाया, क्योंकि इतने अप्प- 
यादिक विद्वानों के विग्मान रहते हुए, उन्हें विवश करके 
भरट्टोजि दीक्षित की मनोरमा ( सिद्धांतकामुदी की व्याख्या ) 
का कुचसदन ( खंडन ) कर दिया। बात भी ठीक है, जब 
पंडितराज को स्लेच्छ ही बना दिया गया, ते वे स्लेच्छ कहने- 
वाले की मनोरमा ( स्ली ) का कुचमर्दन करके क्‍यों न उसे 
म्लेच्छवा का चमत्कार दिखा देते । 
दूसरा श्लोक 'शब्दकास्तुभशाणोत्तेजन? नाप्रक पुस्तक का 
है। वह योँ है-- ५ 
अप्पय्यहुअदविचेतितचेतनानामायहुद्दमयमहं शमयेडवलेपान्‌ । 


[ २२ |] 

अर्थात्‌ अप्पय दीक्षित के दुराग्रद से जिनकी बुद्धि 
मूच्छित हो गई है, उन गुरुद्रोहियों के गयों” को यह मैं 
शाॉंतकर रहा हैँ । 

तीसरा ःछोक बाल कवि का बनाया हुआ बताया जाता है, 
जिनके अ्रप्पय दीक्षित के आता के पैत्र नीलकंठ ने 'नत्त- 
चरितः नामक अंथ मे प्रप्पय दीक्षित के समकालिक माना है। 
उन्होंने लिखा है कि--.- 


यहूं विश्वजिता यता परिघरं सबे बुधा निजिता 
भद्येजिप्रमुखाः, स पंडित जगन्नाथी5पि निस्तारितः । 
पूव 5घे, चरमे, द्विसप्ततितमस्याउब्द्स्य सद्िश्विजि-- 
थाजी यश्र चिदुम्बरे खमसजज्ज्येतिः सर्ता पश्यताम ॥ 


अर्थात्‌ अप्पय दीक्षित ने अपनी आयु फे ७९वें वर्ष के 
पूर्वांध मे, विश्वजित्‌ यज्ञ करने के लिये, पृथ्वी के चारों 
तरफ घूमते हुए भट्टोजि दीक्षित आदि सब विद्वानों को विजय 
किया और उस---सुप्रसिदध-पंडित जगन्नाथ का भी उद्धार कर 
दिया। फिर उसी वर्ष के उत्तराधे मे विश्वजित्‌ यज्ञ किया 
और चिदबरज्षेत्र मे सब सत्जनों के देखते हुए आत्मज्याति को 
प्राप्त दो गए। 

अब यहाँ विचार करने की बात यह है कि अप्पय दीक्षित 


पंडितराज के समकालिक हो! सकते हैं, झ्रथवा नहीं। 
हमारी समझ से समकालिक हो! सकते हैं। कारण यह 


[ २३ |] 
है कि भट्टोजि दीक्षित के गुरु शेषश्रीकृष्य थे! | झऔर 
शेषवीरेश्वर शेषश्रोक्ृष्ण के पुत्र थे यद्द भी सिद्ध है'। यही 
शेषवीरेश्बर पंडितराज के पिता पेरुभट्ट के एवं पंडितराज 
के गुरु हैं, जैसा कि पहले बताया जा चुका है। सो 
यह सिद्ध दो जाता है कि शेषपीरेश्वर और भट्टोजि दीक्षित 
समकालिक थे; क्योंकि एक शेषश्रीकृष्ण के पुत्र थे और 
दूसरे शिध्य। भर बहुत संभव है कि शेषवीरेश्वर भट्टोजि 
दोजक्षित से बड़े रहे हों। कारण, एक ते उन्होंने अपने 
विद्यमान रहते भी मनाोरमा का खेंडन अपने श्र और 
शिष्य ( पंडितराज ) के द्वारा करवाया और अपने स्वयं 
पिता की पुस्तक के खंडन के प्रतिवाद मे, कुछ भी न लिखा, 
जिसका रहस्य यही प्रतीत द्वोता है कि उन्होंने अपने से छोटों 
की प्रतिहृद्विता करना अनुचित समकता है। यह अझर्स- 
भव भी नही; क्योंकि प्राचीन पंडितों के शिष्य ते झ्मति बुद्धा- 
वस्था तक--किबहुना, देहावसानव तक--हुआ करते थे पर 
झ्राज-दिन भी ऐसा देखा जाता है। पर, इसमें कोई 
संदेह नहीं कि दोनों समकात्षिक थे। साथ ही पूर्वोद्धत कोकों 
से भी यह सिद्ध हे! जाता है कि भट्टोजि दीक्षिव और अप्पय 
दीक्षित समकालिक थे। तब, जब पंडितराज शेषवीरेश्वर से 


१०-+ ,, »««रेषवंशावतंसानां श्रीकृष्णपंडितान चिरायाचिंतयेः 
पादुकगे!ः असादादासादित्तशब्दानुशासनाः .. ..! ( 'सनेारसाक्ुच- 
सदन! में भड्दोजि दीक्षित का विशेषण ) | 

३--मनेारमाकुचमर्दन” का चही आरंस का भाग । 


[ २४ ] 
पढ़ सकते थे, ते! भट्टोजि दीक्षित और झप्पय दीक्षित भी उनके 
समय मे रहे हो ते। कोई आराश्चय की घांत नहीं । 
पर, यहाँ एक और भी विचारणोय बात है, जिसने कि 
अ्प्पय दीक्षित को जगन्नाथ के समकालिक मानने मे ऐतिहा- 
सिकों को आंत कर दिया है। वह यह है कि पूर्वोक्त नी- 
कंठ दीक्षित, जे अप्पय दीक्षित के श्राता फे पौत्र थे, अपने 
बनाए हुए 'नीत्॒कंठविजय” नामक चंपू मे लिखते हैं--- 
अट्टन्रिंशदुपस्क्ृतसपशताधिकचतुःसहस्र घु । 
कलिवर्षेघु गतेघु अधित. किल नीलकंठविजयेउ्यम्‌ ॥ 
अर्थात्‌ बह 'नीलकंठविजयः कलियुग फे ४७१८ वर्ष 
चीतने पर लिखा गया है। 
यह समय ईंसवी सन १६३८ के लगभग होता है भर 
उस समय शाहजहाँ का राजत्वकात था। सो यह सिद्ध 
किया जाता है कि यह नीलकंठ पंडितराज का समकालिक 
था, इसके दादा अप्पय दीक्षित नही | 
नीलकंठ ने खनिर्मित त्यागराजस्तव' मे यह लिखा है कि-- 
योहतनुताब्चुजसूनु जसनुप्रहेणात्मतुल्यसहिमानस्‌ ॥ 
अर्थात्‌ जिन (अप्पय दीक्षित) ने अपने छोटे भाई के 
पैज्न ( मुझ ) को, अनुपम करके, अपने समान श्रभाववाल्ा 
वना दिया। इससे यह सिद्ध होता है कि नीलकंठ ने अप्पय 
दीचित से अध्ययन किया था। पर उसी भूमिका मे “अक्म- 
विद्यापत्रिकः का हवाला देकर यह लिखा गया है-- 


[२४ ] 
'नीजकंठविजय” को कवि ने झपनी आयु के तीसवे वर्ष मे लिखा 
है औ्लैर कवि जिस समय बारह वर्ष का था, उसी समय संत्तर 
बे के वृद्ध अरप्पय दीक्षित ने उस पर अनुअह किया था। 
अतः अप्पय दीक्षित का जन्म सन्‌ १५५० ई० होता है 
ऊपर उद्धृत बाक्त कवि के श्लोक से यह सिद्ध होता है 
कि अप्पय दीक्षित का देहावसान ७२ वर्ष की अवस्था मे हुआ 
था। महामहेपाध्याय श्री गंगाधर शासत्रीजो ने सिद्धांवलेश- 
संप्रह के फाशीवाल्ले संस्करण की भूमिका मे एक पद्म ख्य॑ 
अप्पय दीक्षित का भी उद्धृत किया है। वह यों है--वरयांसि 
सम सप्ततेरुपरि नैव भेगे स्पृह्द न किचिदद्मथेये शिवपद॑ दिदक्षे 
परस्‌। श्र्थात्‌ मेरी अवस्था इस समय ७० वर्ष से ऊपर है, व 
' मुझ्ते विषय-सेग की अमिल्लाषा नही रहो, अब ते केवल कैलास- 
वास की इच्छा है ।! इससे भी यही सिद्ध होता है कि उनका 
प्रयाण उपयुक्त श्लोक के वर्णित समय मे ही हुआ द्वोगा | से 
प्रह्मविद्यापत्रिका के अनुसार उनका मृत्युक्ाल १६२२ ३० सिद्ध 
दोता है, जो शाहजहों के राजत्व काल्न से पहले है | 
पर यह बात पृणेतया निर्यीत नही कही जा सकती। 
, क्योंकि यह मानना कि 'दीज्षितजों ने सत्तर वर्ष की अवस्था मे 


१---“बक्मविद्यापत्रिकाकारास्तु--- नील्कंठविजयश्च कविना बरिंशे 
घर्ष आणायि। कविश्च द्वादशवष एवं सप्ततिवयसा दीक्षितेना- 
सुग्रृहीत:। अतस्तेपामवतारकाल' कल्पाव्दः ४६५०, शकाब्दः १४७१, 
सन्‌ १५११० इत्युजाददु:”” । ( सिद्धांतलेशभूमिका ) | 


[ २६ ] 

१२ वर्ष के पौच्र पर अनुम्नह किया था?, केबन्न किंवदंतीमूलक 
है, और पूर्वोक्त सिद्धांतलेशसंप्रह के भूमिका-लेखक भी इसके 
मानने मे विप्रतिपन्न हैं। अश्रतः हमारी समझ मे तो यह 
श्राता है कि नीजकंठविजय” के लिखते समय दीक्षितजो भी 
उपस्थित थे, और पौत्र की अवस्था उस समय ३० वर्ष की थी । 
नीक्षक॑ठ ने खययं भी भ्रप्पय दीक्षित की वंदना मे वतेमान काल का 
प्रयोग किया है, और ७०-७२ वर्ष के दादा के ३० वष्े का पौत्र 
होना कुछ असभव भी नहीं। सो यह सिद्ध द्वो जाता है कि 
अप्पय दीक्षित भी शाहजहाँ के राजत्वकाल तक विद्यमान थे | 
अब यह विचार कीजिए कि पंडितराज दारा के विनाश 
और शाहजहों के कारावास तक दिल्लो मे थे अथवा नही। 
यह कहा जा सकता है कि दारा के अभ्युदय और 
यौवन तक बे वहाँ थे, जेसा कि 'जगदाभरणः के प्रणयन 
से सिद्ध होता है। से। यह ते! उस दुघंटना के बहुत पू्वेकाल 
मे भी बन सकता है । कारण, औरंगजेब के राज्यारोहण 
“का बय चालीस वर्ष है, जो इतिहासअसिद्ध है। तब 
वह शाहजहाँ के राज्यारोहण के समय दस वर्ष का सिद्ध 
होता है। पर, दारा ते उससे ज्गभग ६ वर्ष बड़ा द्वोना, 
चाहिए, क्योकि औरंगजेब से बड़ा शुजा प्रौर उससे बड़ा 
दारा था। सो इं० सब १६३८ तक, जो 'नीक्॒कंठविजय' का 


१--ओऔम्रानप्पयदीक्षित स जयति श्रीऊंडविद्यागुरु”ः ( नीढकठ- 
विजय ) । 


[ २७ | 
लेखनकाल है, दारा सत्ताईंस वर्ष के ्गभग सिद्ध होता है, 
जध कि उसका पूर्ण यौक्‍न कहा जा सकता है। अव, यदि 
हम पंडितराज को दारा के समवयरक मान ते ते कोई अछ्लुप- 
पत्ति न होगी; प्रत्युत यह सिद्ध हे। सकता है कि समषयसस्‍्कों 
मे प्रीति प्रधिक हुआ करती है, इस कारण समवयस्क ही रहे 
हैं।। और, यदि रह माना जाय कि दारा का उनके पास 
भ्रध्ययनादि, जो कि उसके हिंदूधर्म की अभिरुचि घर संस्कृत- 
ज्ञान आदि ऐतिहासिक बृत्तों से विदित है, हुआ हो, ते! क्रधिक 
वय भी हो सकता है। निदान यह सिद्ध हो जाता है कि 
पंडितराज श्रप्पय दीक्षित की वृद्धावत्था मे प्रवश्य विद्यमान थे | 
हाँ, यह कहा जा सकता है कि अप्पय दीक्षित और भट्टोजि 
दीक्षित आदि बृद्ध रहे होंगे श्रार पंडितराज थुवा । अतएव 
उस समय के उन कट्टर साम्राजिक लोगों ने; वादशाही 
दरबार मे रहने के कारण, इस पर संदेह फरके इन्हे तिरस्कृत 
किया हो ते कोई आश्चय की बात नहीं। अ्रप्पय दीक्षित 
द्राविड़ थे, भट्टोजि दीक्षित मद्दाराष्ट्र और पंडितराज तैलंग; और 
झाज-दिन तक भी इन जातियों मे परस्पर सहभोज होता है; 
अतः अप्पय दोक्षित और भट्टोजि दीक्षित ने, जे उस समय वृद्ध 
थे, इनकी पंचायती में प्रघानता पाई है। ते कोई असंभव बात 
नहीं | अप्पय दीक्षित अंतिम वय में कुछ समय काशी रहे भी 
थे और वहाँ के समाज में उनका श्रच्छा सम्मान था, यह भी 
उसी भूमिका से सिद्ध होता है। पंडितराज ने भी रस- 


[ र८ ] 

गंगाघर में अप्पय दोक्षित के नाम के स्थान पर, कई जगह, 
(टरविडशिरोमशिमि:” और 'द्रविडपुड्डबे. शब्द लिखे हैं, जो 
कि इनके सरपंच होने की सूचना देते हैं । 

जब यह बात ठीक हो गई कि अप्पय दोक्षित और भट्टोजि 
दोज्षित इनके समय मे थे, ते! पूर्वोक्त श्लोकों के अथे को 
सिथ्या सानने मे कोई विशेष उपपत्ति नहीं रह जाती | भ्रब 
यह बात सामने आती है कि भट्टोजि दोक्षित ने इन्हें भरी सभा 
मे स्ल्ेच्छः क्‍यों कहा था। विचारने पर इसके दे कारण 
हे। सकते हैं--एक ते। यद्द कि यवन सम्राट के दरबार मे 
रहने फे कारण इन पर यबवनों के संसग का आजक्षेप किया 
गया हो, भर दूसरा वही, जो सर्वत्र प्रसिद्ध है कि 
इनका किसी यवनयुवती से संपर्क रहा दे। पहले कारण 
मे ते प्रमाण देने की कोई अ्रवश्यकता द्वी नहीं; क्योकि वे 
शाहजहों और दाराशिकाह के ऋृपापात्र थे यह निस्संदेह 
है। रही दूसरी बात, से वह भी सर्वथा असंभव ते नहीं है; 
क्योंकि दिल्‍लीश्वर के कृपापातन्न अतएवं सर्वविध संपत्ति से 
संपन्न और तत्कालीन दिल्लो जैसे विज्ञासमय नगर के निवासी 
नवयुवक को, उन उन्मादक नवयैवन के दिवसों ने, जो 
कंगाल्नों को भी पागल बना देते हैं, यदि किसी यवन विला- 
सिनी पर आसक्त होने के लिये विवश कर दिया हे और 
उन्होंने किसी यवनी का रख लिया दो ते आाश्चये की क्‍या 
बात है। रही काव्यमालासंपादक फी यह बात, कि यवन 


[ २८ |] 
युवती की आसक्ति को. प्रमाणित करनेवाले श्लोक उनकी किसी 
पुक्षक मे नहीं मिल्षते । से यह कोई ऐसी दुःसमांधेय घात नहीं 
है; क्योंकि सभी कवियों के सभी पथ पुस्तकों मे संग्रहीत नहीं 
होते, कुछ फुटकर भी रह जाते हैं। फिर पंडितराज जैसे विद्वाद्‌ 
प्रपनी पुस्तक से उन डन्‍्मादक दिवसों के लिखे हुए कुसंसर्ग- 
सूचक ज्छोकी को संगृहीत करते यह भी अघटित ही है। 
अस्तु , कुछ भी है । दम एक महा विद्वान को कलंकित 
करना नहीं चाहते; पर इतिद्दास की दृष्टि से हमार विचार मे 
जो कुछ सत्य आया, उसे छिपाना भी उचित नहों था। 
हाँ, इतना भ्रवश्य सिद्ध है कि अप्पय दोक्षित और भट्टोजि दीक्षित 
पंडितराज के समय मे वर्तमान और जाति फे सरपंच थे, भै(र 
उत्तको इन पर यवन-संसर्ग का संदेह था, तथा इसी कारण इनका 
उनका मनेमालिन्य था | बाल कवि के श्लोक से यह भी सिद्ध 
है कि अप्पय दीक्षित की अतिमावस्था में इनका निस्तार भी हो 
गया था। पर, इनका वर्षों का द्वेष इतने मात्र से सर्वथा 
शुद्ध न हुआ और वह रसगंगाधर में फल्क ही श्ावा है | 
हाँ, दूसरी किवदंती में जो यह कद्दा गया है कि वे छूब 
मरे? से सर्वथा मिथ्या है; क्ष्योंकि रखगंगाधर गंगालहरी के 
बहुत पीछे बना है और इसमे स्थान स्थान पर उसके पद 
उद्धृत हैं। तीसरी किंवदंती भी मिथ्या प्रतीत द्वोती है; क्योंकि 
अप्पय दीक्षित के सामने पंडितराज का वृद्ध होना किसी 
तरह सिद्ध नहीं होता । 


[ ३० ] 
स्व॒भावादि 
पंडितराज का स्वभाव उद्धत, अमिमानपूण् और महान से 
महान्‌ पुरुष के भी दोपों को सह्दसा उघाड़ देनेवाला था। 
नमूने के तौर पर एक एक उदाहरण सुनिए । पहले उद्धतता 
को लीजिए | किसी कविं से उसके बनाए हुए पद्म सुनने के 
पहले श्राप कह रहे हैं कि--. 
निर्माणे यदि मा्मिकाडसि नितरामत्यंतपाकद्ध व- 
स्टद्वीकामधुमाधुरीमद्परीहारोद्धराणां गिरामर । 
काव्यं तहि सखे सुखेन कथय त्व॑ सम्मुखे माइशां 
ने चेदुष्कृतमात्मना कृतमिव ख्ांताहहिमां कृषाः । 
हे सखे ! यदि शाप अत्यंत पक जाने के कारण टपकती 
हुई दाख और शहद की मधघुरता के मद को दूर कर देने मे 
तत्पर वचनों की रचना के गतया मर्मज्ञ हैं, तब ते। अपनी 
फविता को मेरे से मनुष्यों के सामने बड़े मजे से कद्दते रहिए । 
पर यदि आपसे वह शक्ति न हा, ते, जिस तरह मनुष्य 
अपने किए हुए पाप को किसी के सामने प्रकट नही करता, उसी 
तरह आप भी अपनी कविता के अपने हृदय से वाहर न होने 
दोजिए। आप अपने उस अ्रपराघध को मन फे मन में ही 
रखिए, कहो ऐसा न दो कि जबान पर आ जाय | 
देखिए ते। केसी उद्धवता है। कविता को शपराध ते 
बना ही दिया, केवल सजा देना बाकी रह गया। सो, 
शाथद, वह बेचारा वैसे पद्य वेज्ञा ही न होगा, अन्यथा, अधिक 


[ हे? ] 


नही ते, एकाथ थप्पड़ का पुरस्कार ते अवश्य ही प्राप्त 
हो जाता | 
अब अमभिमान्‌ की बात सुनिए। आप कहते हैं--- 
आमूलादल्षसानार्मठछयवछूयितादा च कूछात्पयेधे- 
याँवन्‍्तः सन्ति काव्यप्रणयनपटवस्ते विशर्कूं वद॒न्तु । 
स्ठ्ीकामध्यनियन्मसुणरसमरी माधुरी साग्यभाजां 
वाचामाचायताया' पद्मनुभवितुं क्ले5स्ति धन्यो मद्न्यः ॥ 


धुमेरु पर्वत की तरहटो से लेकर मज्ञयाच्ष से घिरे हुए 
समुद्रतट तक, जितने भी कविता करने मे निपुण पुरुष हैं, वे 
निर्भय होकर कहें कि दाखों के अंदर से निकत्ननेवाली 
चिकनी रसधारा की मधुरता का भग्य जिन्हें प्राप्त है--अर्थात्‌ 
जिनकी कविता उसके समान मधुर है, उन वाणियों के आचार्य 
पद का अनुभव करने के लिये मेरे अतिरिक्त कान पुरुष धन्य हो 
सकता है। इस विषय मे ते मैं एक ही धन्य हूँ, दूसरे किसी 
की क्‍या मजाल है कि वह इस पद को प्राप्त कर सके । 

देखिए ते आचारयजी महाराज कितने अमिमत्त हो गए 
हैं। आपने किसी दूसरे के धन्यवाद की भी ते अपेक्षा नहों 
रखी, उस रस्म को भी अपने आप ही पूरा कर लिया; क्योंकि 
शायद किसी झन्य को यह धन्यवाद देने-का सैभाग्य प्राप्त दो 
जाता ते आचायजी को ऋृतज्ञता दिखाने के लिये उसके 
सामने थोड़ी देर ते आँखें नीची करनी पड़ती ही । 

अच्छा, अब देधोद्घाटन की तरफ भी दृष्टि दोजिए | 
अप्पय दोज्षितादि को ते! छोड़िए; क्योंकि उनके देषेद्धाटन 


[ ३२ ] 

में ते आपने हद द्वी की है । पर आप ध्वनिकार श्रीआलंदव्ध॑ना- 
चाये के परस भक्त है, समय समय पर आपने उनका बड़े आदर 
से स्मरण किया है; कितु उस देषदरशिनी दृष्टि के पंजे से वे 
भी कैसे बच सकते थे ? एक जगह ( रूपकध्वनि के उदाहरण 
मे ) चकर मे आ ही गए। फिर क्‍या था, झट से लिख दिया 
आनंदवधेनाचार्यास्तु ..? भर “तत्चित्यमू! । 

आपके उदाहरणों मे शाही जमाने की कत्तक भी आ ही 
जाती है। उस समय कबूतरों के जोड़े पालने का बहुत प्रचार 
था, और अब भी यवनें मे इस बात का प्रचार है। से भापने 
ल्त्जा;भाव की ध्वनि के उदाहरण मे लिख ही दिया--- 

निरुद्धथ यान्ती तरसा कपेती कुजत्कपेतस्य पुरो ददाने । 

मयि स्मिताओ वदनारविन्द' सा सन्दुमन्‍्द' नमयाम्बभूव ॥* 

उत्तर भारत मे रहने पर भी आप पर दाक्षिणात्यता का 
प्रभाव ज्यों का त्यों था। देखिए ते भावशब्ञता का दृष्टांव 
किस तरह का दिया गया है-- 

नारिकेलनलक्षीरसिताकदुछूमिश्रणे । 
विज्ञक्षणो यथा स्वादे! भावानां सइते तथा ॥ 

अर्थात्‌ जिस तरह नारियल के जल, दूध, मिश्रो और केल्ञों 
के मिश्रण मे विज्कक्षण खाद उत्पन्न हो जाता है, उसी तरह 
भावों के मिश्रण में भी होता है। क्‍या इस विल्क्षण मिक्‍्ल्वर 
को दाक्षियात्यों के सिवा कोई पहचान सकता है ? 


१--इसका अर्थ अजुचाद से देख लीजिए । 


_ हेड ] 


इसी दरह अन्यान्य बातें भी इस पुस्तक के पाठ से आपके 
हृदय में अवतरित हो! सकेंगी, हम अधिक उदाहरण देकर इस 
प्रकरण को विस्तृत नहीं करना चाइते । 


धर्म और अंतिम वय 


आप वैष्णवर्धर्भ के अनुयायों श्रैर भगवान श्रीक्षष्णचंद्र 
तथा भगवती भागीरथी के परम भक्त थे; यह मंगलाचरण से 
लिखित और स्थान स्थान पर उदाहत क्ोकों से सिद्ध है। पर 
शिव तथा देवी झादि की स्तुति करने मे भी द्विचकते नहों थे । 
श्रीमद्भागवत' और वेदव्यास' पर आपको प्रत्यंत श्रद्धा थी । 
भगवन्नामे।च्चारण मे आपको बड़ा आनंद प्राप्त होता था। 
देखिए, आपने लिखा दै कि-- 
मद्वीका रसिता सिता समशिता रफीतं निपीतं पयः 
खर्यातेन सुधारप्यधायि कतिधा रम्साघरः खण्डितः । 
तत्त्व शरृहि सदीय जीव भवता भय भवे आस्थता 
कुष्णेत्यक्षरयारय मचुरिसेह्वारः कचिल्कछित: ॥ 
हे भेरे जीवात्मन ! तूने अंगूर चाखे हैं, मिश्री अच्छी 
तरह खाई है और दूध ते! खूब ही पिया है। इसके अति- 
रिक्त ( पहल्के जन्में मे कभी ) स्वर्ग मे जाने पर अ्रम्रत भी 
पिया है और स्थर्गीय अप्सरां रंभा के झघर को भी खंडित 
१--देखिए, 'रस नव ही क्ये। है? आदि अकरण । 
२--ऋतुराज॑ अ्रमरहितं यदाहमाकर्ययासि, नियमेच । आरोहति 


स्टृतिपयं तदैव भगवान्‌ सुनिर्ष्यासः? ( स्मरणा्ंकवार ) आदि। 
य 


[ ३४ ] 

किया है। सेतू बता कि संसार मे बार बार घूमते हुए 
तूने, कऋष्ण” इन दे! अक्षरों मे जो मधुरता का उमार है, उसे 
भी कद्दीं देखा है? ओह ! यह श्रपूर्व माघुरी और कहीं 
कैसे प्राप्त हे सकती है | देखा भावोद्रेक ! 

वास्तव मे सरसहृदयों के द्विये, भक्ति के भ्रतिरिक्त अन्य 
कोई, भगवद्माप्ति का सर्वोत्तम और सुंदर साधन है भी नही । 

अतिम वय से पंडितराज काशी अथवा सथुरा मे जा बसे 
थे और भगवत्सेवा करते रहते थे।' 

निर्मित ग्रंथ 

१९--अश्वुतलहरी--इसमे यमुनाजी की स्तुति है। 
यह काव्यमाल्षा मे मुद्रित दे चुकी है । 

२--अ्रासफविलास--इसमे नवाब झसफर्खों का 
वर्णन है। काव्यमाला-संपादक ने लिखा है कि यह अंथ हमे 
नही मिल सका, कुछ पंक्तियाँ ही सित्ली हैं। 

३--करुणालहरी--इसमे विष्णु की स्तुति है। यह 
काथ्यमाल्ा से मुद्वित हे चुकी है | 

४--चिचस्मीझ्चाँंसाखंडन--इसमे रसगंगाधर मे स्थान 
स्थान पर जो चित्रमीमांसा के अंशो का खंडन किया गया है, 
उसका संग्रह है प्रौर काव्यप्राज्ा मे छप चुका है| 


आअक्ाप््क्‍एणःण०/्/-ज््््+-++++--++त+_+त_ततमतततततततन्‍त+_ 


१--भासिनी दिल्ञास! के अत मे 'सम्पत्य्धकशापवस्य नगरे तस्तव॑ 
परं चिन्त्यते! और कुछ पुस्तकों में 'सैप्रत्युज्छितवासन॑ मधुपुरीमध्ये 
हरि' सेच्यते” लिखा हुआ है। 


[ ३२५ ] 

१--जगदास्रण--इसमें शाइजहों के पुत्र दारा- 
शिकाह की प्रशंसा है। काव्यमाज्ञा के संपादक का कथन है 
कि प्राणाभरण से और इसमे इतना ही सेद है कि इसमें प्राण- 
नारायण के नाम के स्थान पर दाराशिकाह का साम है । 

६--पीयूबलहरी--इ्सका सुप्रसिद्ध नाम गंगालहरी 
है और यह अनेक जगह अनेक वार छप चुकी है । 

9 -पग्राणाभरण--इसमे नैपालनरेश ग्राथनारायण का 
वर्णन है और यह काव्य-माला मे छप चुका है। 

८--भामिनीधिलास---यह पण्डितराज के पद्मों का 
संग्रद् है श्र अनेक बार छप चुका है । 

६--मनेरमाकुचमदन--यद सिद्धान्वकैमुदी की 
मनेरमा व्याख्या का खंडन है, पर इसका प्रचार नहीं है । 

१० --चसुनावर्णन--वह पंथ गद्य से लिखा गया है; 
क्‍योंकि रसगंगाघर के उदाहरणों में इसके दे! तीन गद्यांश उद्धृत 
किए गए हैं; पर मिलता नहीं । 

११९--लह्मीलहरसी--इसमे लक्ष्मीजी की स्तुति है 
और यह काव्यमाला झःदि में छप चुकी है । 

१२--रसगंगाधर--यह आपके सामने प्रस्तुत है। 
पंडित्राज का सबसे प्रौ़ और मुख्य अंथ यही है; परंतु आज 
दिन तक न यह पूरा मिल सका और न पूरा मिलने की 
अब आशा है| 

कुछ लोगों का कथन है कि इनके अतिरिक्त शशिसेन्रा?, 


[ १६ ] 

'पंडितराजशतक? नामक दे! और पंथ भी पंडितराज फे बनाए 

हुए हैं; पर वे देखने से नहीं आते । 

अंतिम ग्रंथ 

काव्यसाल्ञा-संपादक का कथन है कि--रसर्गगाधर पंडित- 
राज का अंतिम भंथ नहीं है, इसके बनाने के अनतर भी वे 
जीवित रहे। इसका कारण वे यह बताते हैं कि पंडितराज 
ने इसके अनेतर “चित्रमीमोसा्खंडन! लिखा है। पर, हमारी 
समभ्त मे, यह हेतु यथेष्ट नहीं। इसका कारण यह है कि 
(चित्रमीमांसाखंडन? कोई स्वतंत्र अंथ नहीं है, उसमे रसगंगाधर 
के वे अंश, जिनसे उस पुस्तक का खंडन आया है. ज्यों के त्यों 
संगृहीत कर लिए गए हैं | संग्रह का कारण यह प्रतीत द्वोता है 
कि उस समय आज-कत्न की तरह मुद्रण-कत्षा का प्रचार नहीं 
था, इस कारण किसी भी अंथ का दूर देशो तक प्रचार बहुत विलंब 
से होता था और पंडितराज को अप्पय दीक्षित के हिमायतियों 
को उनकी भूले दिखा देने की बहुत आतुरता थी, वे चाहते थे 
कि लोगों पर जे! अप्पय दीक्षित का प्रभाव पड़ा हुआ है, वह 
मेरे सामने ही कम द्वो जाय। स्रो पूर्वोक्त संग्रह की अनेक 
प्रतियाँ, जे समग्र रसगंगाधघर की अपेक्षा थोड़े समय और व्यय 
मे है! सकती थी श्रौर रसगंगाधर की समाप्ति के पूर्व ही उन 
ज्ञोगो के हाथों मे पहुँचाई जा सकती थी, लिखवाकर उन्होने उन 
सब लोगो के पास सिजवा दी और आगे का भंथ लिखते रहे । 


[ ३७ ] 
अन्यथा जे! सब बाते रसगंगाघर में झा गई थीं उत्तके पृथक्‌ 
संग्रद की--और वह भी ऐसे संग्रह की कि जिसमें कुछ भी 
सवीनता नहीं है--क्या आवश्यकता थी। “चित्रमीमांखा- 
खंडन” के झ्रारंभ मे यह श्लोक लिखा है--- 
सूक्ष्म विभाव्य सयका समुदीरितानामप्पय्यदीक्षितक्ताविह दूषणानास्‌ । 
निर्मत्सरों यदि समुद्धरणं विदद्धयात्तस्याहसुज्ज्यलसतेश्चरणौ चद्धामि ॥ 
अथोत्‌ इस भअ्रप्पय दीक्षित की कृति ( चित्रमीमांसा ) में 
मैंने, सूचम विचार करके, जो कुछ दुधण दिखाए हैं, उनका 
यदि कोई निर्सत्सर पुरुष उद्धार कर दे ते उस निर्म्वुद्धि 
पुरुष के दोनों पैरों को मैं अपने सिर पर रखूँगा। इससे 
भी इस संग्रह का कारण यहीं प्रतीत होता है | 
काव्यमात्षा-संपादक ने यह भी लिखा है कि इतना 
अनुमान किया जा सकता है कि पंडित्तराज ने अप्पय दीक्षित 
के द्वेष से रसगंगाधर के द्वारा “चित्रग्नीमासा! का अनुकरण 
करना प्रारंभ किया था, से उन्होंने भी अपने अंध का असमाप्त 
ही छोड़ दिया। पर यह बात वनती नहीं । कारण, यदि 
यह अथ चित्रमीमांस! के अनुऋरण पर ही लिखा गया होता 
ते मीमांसा में ते काव्यलक्षण, रस, भाव, गुण आदि का 
कहीं निशान भी नहीं। फिर भल्ना इस पुस्तक में इन सब 
विषयों के विवेचन की क्‍या श्रावश्यकता थी ? और यदि . 
बैसए ही करना था---अर्थात्‌ अधूरा ही छोड़ता धा---वे! क्‍या 
पंडितराज भो चित्रमौमाँंसा की तरह ही, कोई श्लोक वनाकर 


[ रेप ] 

अंत से नहीं रख सकते थे, क्‍यों उत्तरालंकार के उदाहरण के 
तीन पादों पर ही अंथ लटकता रद्द गया ? 

दूसरे, इस बात को ते काव्यमाह्ा-संपादक भी मानते 
हैं कि पंडितराज रसगंगाधर के पाँच आरानन बनाना चाहते थे, 
अतएव उन्होने इस पुस्तक के प्रकरणों का नाम झाननः 
रखा था; क्योंकि गंगाधर ( शिव ) फे पॉच आनन ( झुख ) 
होते हैं। फिर, चित्रमीमांसा का अनुकरण ते। अधिक से अधिक 
अलंकारसभाप्ति तक हो सकता था, जो दूसरे आनन मे समाप्त 
दे! जाता । यदि उसका अनुकरण ही फरना था, ते! वे क्‍यों 
झागे लिखना चाहते थे। तीसरे, रसगंगाधर के उद्देश्यों मे 
भी यह बात नही है कि जिससे यह अनुमान किया जाय । 

श्रतः हमारी तुच्छ बुद्धि के अनुसार ते यह मानना 
उचित है कि पंडितराज का अंतिम ग्रंथ रसगंगाधर ही है भौर 
इसकी समाप्ति के पूर्व ही उनका देहाचसान हो गया था | 

अन्य जगन्नाथ 

इसके अतिरिक्त एक और बात समझ लेने की है। वह 
यह कि अरब तक संस्क्रत भाषा मे अंथ निर्माण करनेवाले 
अनेक जगन्नाथ पंडित हो गए हैं, सो उनके नाम हस यहाँ 
काव्यमाला की भूमिका से इसलिये उद्धृत कर रहे हैं कि कोई 
उनकी पुस्तकों का भी पंडितराज की पुस्तके न समझ लो । 

१९---तंजेरवासी जगन्नाथ--इनके पंथ अश्वधारी, 
रतिसन्मथ और वसुसतीपरिणय हैं | 


| [ ३८ | 

२--जयपुरनिवासी सझ्माट जगन्नाथ--श्नके मंथ 
रेखागणित, सिद्धांतसम्नाट्‌ और सिद्धांतकौस्तुभ हैं। 

३--जगन्नाथ तकंपंचानन--इनका अंथ विवाद- 
भंगायंव है| 

8४--जगन्नाथ  सैथिल--इनका प्रंथ प॒र्ंद्रच॑द्रिक 
नाटक है | 

४--ओऔ निवास के पुत्र जगन्नाथ पंडित--शनका 
ग्रंथ अनंगविजय भाण है | 

६--जगन्नाथ सिश्र--इनका अंथ सभावरंग है । 

$--जगन्नाथ सरस्वती--इनका प्रंथ भ्रद्टेतासत है। 

८--जगद्दाय सूरि--श्नका अंथ सभुदाय प्रकरण है | 

८ैं--जगज्नाथ--इनका अंथ शरभगजविज्ञास है। 

१०--नारायण दैवज्ञ के पुत्र जगन्नाय--इनका 
प्रंथ ज्ञानविज्ञास है | + 

९१९---जगन्नाथ--इनका भंथ अनुसेगकल्पतरु है।' 


वैशाखवदि द्वितीया शनिवार ब्ए 
कद ले परुषात्तमशर्सा चतुषदी 
७ एप्रिल सन्‌ १४२८ जयउुर । 


4--इस प्रकरण में जिन विद्वानों से साक्ञात अथवा उनके पुस्तकादि 
के द्वारा सहायता आप्त हुईं है, उनका, और विशेषतः काब्यमाहा-संपा- 
दुक का, लेखक हृदय से कृतज्ञ है। 


विषय-विवेचन 
काव्यलक्षण का विवेचन 
कवि .और काव्य 
इस प्रंथ को खर्य अंथकर्त्ता ने 'काव्यमीमांसा? कहा है, 
और सबसे पहले काव्य-ल्क्षण का ही विवेचन किया है; अतः 
यह सोचिए कि जिसकी मीमांसा इस गंथ मे की जा रही है 
और जिसका छतक्षण सबसे प्रथम लिखा गया है, वह काव्य 
क्या बस्तु है ? अर्धांत्‌ काव्य शब्द का वास्तविक अथे क्‍या 
है? और साथ ही यह भी सोचिए कि वह काव्य-जक्षण 
झब तक किन किन विवेचकों की टक्करें खाकर किस किस रूप 
में परिणत हो चुका है | 
'काव्य? शेब्द का प्रथे, व्याकरण की रीति से, 'कबि' 
की कृति! होता है, भ्र्धांत कवि जो कार्य करता है, उसे 
काव्य! कहा जाता है। तब यह समझने की आवश्यकता 
होती है कि कवि शब्द का भ्र्थ क्‍या है, मर वह क्‍या कार्य 
करता है। व्याकरण के भ्रमुसार कबि शब्द का अथे 
१--मननतरितीणे विद्याणंवे जगश्नाथपंडितनरे दहूः । रखसगंगाघर- 


चाज्नी करोति कुतुकेन कान्यमीमांसास्‌ ।-प्रथमानन, ७ छोक । 
२--गुणवचनत्राह्मणादिभ्यः कसेणि च! हति कर्मणि प्यज_। 


[ ४२ | 

किसी विषय का कहनेवाला' अथवा प्रतिपादन करनेवाला 
दोता है और कोषकार उसे पंडित शब्द का पर्योय- 
वाची मानते हैं। श्रतः व्याकरण और कोष देनों, भ्रथवा 
यों कहिए कि याग और रूढ़ि दोनों, की दृष्टि से एक साथ 
विचार करने पर इस शब्द का अथे किसी विषय का 
प्रतिपादन करनेवाल्ा विद्वान! होता है। इसी बात की सीधे 
शब्दों में यों कह सकते हैं कि कवि उस जानकार का नाम है, 
जा अपनी जानी हुई वातें का प्रतिपादन कर सके ) 

शुरू शुरू मे यह शब्द इसी अथे मे व्यवह्वत होता था। 
भ्रतएव सर्वेन और, वेदों के द्वारा, सब पदार्थों का सूच्रम रूप 
से प्रतिपादन करनेवाले जगदीश्वर के लिये वेदों मे इस शब्द का 
प्रयोग हुआ है--- 'कविसनीपी परिभू: खर्य॑भू:?! ( शुद्ययजुः- 
संहिता क्र० ४० स० ८) । इसी प्रकार वेदों के सर्व-प्रथम 
विद्वान और प्रकाशयिता श्रह्मा को भी पुराणों में आदिकवि” 
कहा गया है--..तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये? ( श्रीमद्भाग- 
वत १-१-१ )। जिस तरह वैदिक वाणी के प्रधम-प्रकाशक 
ऋ्झा को यह पदवी प्राप्त हुई, इसी प्रकार लैकिक वाणी में 
सर्वप्रथम वर्णयिता महर्षि वाल्मीकि भी “आादिकवि” को 
पदवी से विभूषित किए गए। उसके प्रलंतर मद्दाभारत जैसे 





3--- झुद-शब्दे! कबते इति कवि, 'कबर्णे! इत्यनेन तु नें सिध्यति, 
तथ्य पवर्गीयोपघत्वाद । 
२--संस्याबान्‌ पंद्धितः कचि”, इत्यमरः । 


[ ४३ ] 

महोपाख्यान और अष्टादश महापुराणां के प्रणेता महामुन्ति 
कृष्ण हेपायन (वेदव्यास ) “कबि” पदवी के अधिकारी हुए। 
इसी तरह पुराणों के समय तक अन्यान्य विद्वान वर्णेयिताओं 
को, चाहे उनकी रचनाओं मे सौंदय अधिक मात्रा मे होता था 
न द्वेता, कवि कद्द जाता था; जैसे राजनीति आदि के लेखक 
शुक्राचा्य आदि को | कवि शब्द का बह व्यापक अर्थ, जिसके 
द्वारा प्रत्येक वर्शयिता को कवि कद्दा जा सकता था, पुराणों के 
समय तक प्रचलित था। यह बात भअ्ग्निपुराण के काव्यलक्षण 
से स्पष्ट हो जाती है, जिसका वर्णन अभी किया जायगा । 

परन्तु पीछे से यह शब्द उन विद्वानों के लिये व्यवहृत 
होने जगा, जो सौंद्यपूर्ण विषय का सौंदयपूर्ण वन करते थे 
झऔौर जिनके वर्णन को सुनकर मनुष्य मुग्ध हो जाते थे। 
अतएव व्यास भर वाल्मीकि को कवि मात्र छेने पर भी, 
किसी ने, मनु, याज्ञव्क्य अथवा पराशर जैसे विद्वानों को, 
यद्यपि उन्होने भी छदोबद्ध प्रंथ लिखे हैं, कवि नहों कहा। 
काव्यल्चण मे अनेक परिवतैन द्वोते होते भी, शास्रोय दृष्टि से, 
यह शब्द आाज दिन भी प्राय: इसी अथे मे व्यवहृत होता है। 

अच्छा, यह ते! हुई कवि की वात | शअब यह समम्िए 
कि उसका कार्य क्‍या है। उसका कार्ये, कवि शब्द के 
साधारण अ्रथवा प्रारमिक श्रथे के भ्रतुसार 'किसी विषय का 
प्रतिपदन”ः और विशेष श्रथवा श्राधुनिक भ्रथे के अनुसार 
“किसी सौंदर्यपूणं विषय का सौंद्यपूर्ण वर्शनः है। प्रति- 


[ ४४ |] 

पादन अ्रथवा वर्णन शब्दों फे रूप में होता है, अतः यह 
सममभ्नना भी कठिन नहीं कि वह शब्द ही कवि का काये है।' 
तब इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि प्रारंभ में किसी विषय 
के प्रतिपादन करनेवाले शब्दों को काव्य कहा जाता था। 

अब आप देखिए कि कांव्य का यह साधारण लक्षण किन 
किन विवेचकों की कैसी कैसी विचारधाराओं मे प्रवाहित हुआ 
श्रौर अनेक टकरें खाकर आज वह किस रूप में है । 


अग्निपुराण ( समय अनिश्चित ) 


सबसे प्रथम 'काव्यज्कक्षण! प्राप्य प्रंथों मे से प्रग्निपुराण 
मे मित्रता है। वहाँ लिखा है--- 

स्षेपाद्‌ वाक्यमिद्टार्थव्यवच्छित्ना पदावली । 

ु कायम 7 के ५ से हर हर का 
अर्थात्‌ संक्षेप से जे वाक्य होता है, उसका नाम काव्य 
है। और संक्षेप से वाक्य का अर्थ यह है कि जिस अथे 
को कहना चाहते हैं, पह जितने से कहा जा सकता है, उससे 
न अ्रधिक और न न्‍्यून, इस तरह की पदावली काव्य है। 





:--थद्पि शब्दों की योजना कवि का काय्य है, तथापि जिस 
तरह कुम्हौर का कास घड़े का निर्माण हो जाने पर भी घढ़ा 
माना जाता है, उसी तरह शब्द सी कवि का कफाय्ये कहलाता 
है। तात्पस्थ यह कि यहाँ कर्म शब्द से की जानेचात्वी चीज ली गई , 
है, करना नहीं और यह बात शाखसिद्ध एवं विद्वत्सपत है। 


[ ४५ ] 
इसका स्पष्ट अथ यह है कि “काव्य उस पदांव्ञी को कहते हैं, 
जिसमे, जे! कुछ हम फहना चाहते हैं, वह थोड़े मे पूर्णतया 
कह दिया जाय; न ते ज्यथे का विस्तार हो और न यही हे। 
कि जो बात कह रहे हैं, वही साफ साफ न कद्दी जा सके । 
दंढी ( छठी शताब्दी, अनुमित ) 

'क्षाव्याद्श!!कार आचार्य 'दंडो? का भी, जिनको कि 
प्राचोन आचार्य्यो' मे माना जाता है, प्राय: यही काव्य-लक्षण 
है। उन्होंने भ्रमिपुराण के लक्षण मे से 'संक्षेपाद्‌ वाक्‍्यस्‌? इस 
भाग फो निकालकर केबल उसकी व्याख्या को ही स्वीकार 
किया है; पर देने मे भेद कुछ भी नहीं है। वे कहते है-- 
“शरीर ताबद्ष्टिथेव्यवच्छिन्ना पदावल्षी [? 

रुद्र॒ट ( वामन' से पूर्व ) 

इनके बाद आलंकारिक-शिरोमणि रुद्र का समय आता 
है। उन्होंने अथवा उनकी पूर्ववर्ती किसी आचाये ने, अपनी 
सूक्ष्म दृष्टि से, एक गहरी बात साोची है। बह यों है-- 

हम पहले कह आए हैं कि काव्य शब्द का वास्तविक 
अथे कवि की कृति है। अब सोचिए कि कवि जिस तरह 


३--यद्यपि रुद्वृद का समय पूरतया निश्चित नहीं हो सका है, 
तथापि अल्लंकारसघैरुवकार ने, जे कि काव्यप्रकाशकार से ग्राचीन हैं 
उन्हे वामन से प्राक्तन आराचायों मे समझा है, लो हमने भी वही समय 
स्वीकृत किया है । 


[ ४६ | 
शब्दों को ढंग से जोड़कर पद्यादिक के रूप में परिणत करवा है, 
उसी तरह वह जिन अर्थों का वर्णन करता है, उनको भी 
आवश्यकतानुसार नए साँचे में ढा्न देता है। यही क्यों, 
यदि यथाथे में सोचे ते यह कहा जा सकता है कि कवि के 
वर्णन किए जानेवाले पदार्थ उसी के द्वोते हैं, वे ईश्वरीय सृष्टि 
के वास्तविक पदार्थों से पृथक्‌ एवं केघल कविकल्पनाप्रसूत होते 
हैं। सच पूछिए ते! ऐतिहासिक सीता-शकुंतल्ञा से भवभूति 
और कालिदास की सीता-शकऊंतला निराली हैं। शसी 
अकार कालिदास का हिमाज्ञय और श्रीहृृर्ष का चंद्र भी लौकिक 
हिमालय और चंद्र से विजक्षण हैं। थेड़ा और सोचिए; 
सीता-शक्कुंतला आदि का ते इतिहास से कुछ संबंध भी 
है, पर भवभूति के “माल्तीमाधव” को लीजिए; वह नाटक 
नह्वीं प्रकरण है; और यह सिद्ध है कि प्रकरण का कथानक 
कहिपत होता है। अब बताइए, उसमे जिन माक्तती, माधव 
तथा पन्यान्य पात्रों का वर्णन है, उन्हें किसने उत्पन्न किया ! 
विवश द्वोकर यही फहना पड़ेगा--कवि ने। बस ते 
इसी बात को अन्यत्र भी लगाइए और समम्तिए कि कवि के 
वर्गनीय श्रथे मानस होते हैं, वास्तविक नहीं; अतः शब्दों की 
तरह वे भी कवि की कृति ही हैं। अतएवं अग्निपुराण के ही 
शब्दों को लेकर ध्वन्यात्रोेक मे लिखा है-- 
अपारे काव्यसंसारे कविरेव प्रजापतिः । 
यथास्मै रोचते विश्व” तथेद॑ परिचत्त ते ॥ 


[ ४७ |] 

अर्थात्‌ काव्यरूपी जे अनंत जगत है, उसमे कवि ही 
प्रजापति है--उस जगव्‌ का सृष्टिकर्ता वहां है, डढसे जिस 
तरह का संसार पसंद द्वोता है, इस जगत्‌ को उसी प्रकार 
बदल जाना पड़ता है| 

अरब तक जो केवल शब्द ( पदावली ) को काव्य कहा 
जाता था, वह उन्हें न जँचा और उन्होंने उसके साथ अर्थ को 
भी जोड़ दिया । उन्होंने कद्दा-- ननु  शब्दार्था काज्यस्‌ |” 
तात्पये यह कि रुद्रट के, अथवा रुद्रट और दंडी के मध्य के, 
समय मे पदावल्ली श्रौर उससे वर्णन किए जानेवाले अथे देनों 
फो काव्य कहा जाने लगा | 


वामन ( नवम शताब्दी के पूर्वा्ध से पहले ) 

इनके अनंतर सुप्रसि दर भ्रालंकारिक वामन का समय आता 
है। यद्यपि सौंदययुक्त व्णेन को काव्य मानना अ्रिनिपुराण 
के समय से ही प्रचश्तित हो गया है; यह बात उसके लक्षण 
से पूणेतया सिद्ध न होने पर भी विवेचन से सिद्ध है; तथापि 
चामन फे समय से काव्य में सौंदर्य का प्राधान्य समझता जाने 
छगा। यह बात उनके अल्ंकार-सूत्रो से स्पष्ट दो जाती दे। वे 
कहते हैं--“काव्यं आह्यमल्ंकारात्‌” श्लौर “सैदयेमत्तंकार:”; 
जिसका तात्पर्य यह है कि काव्य छा प्रहण करना उचित है; 
क्योंकि उसमे सुंदरता द्ोती है । 

१---स्रष्टा प्रजापतिवंधा.? इत्यसरः । 

२---““पृष्टप्रतिवाक्ये ननुः” इति तट्टीक्ृकतठु नेमिसाधेहंदयम । 





[ ४८ ] 

यहाँ यह भी समझ लेना चाहिए कि वाभन के समय में 
काव्य की सुंदरता का कारण गुणों और अल्कारों को माना 
जाता धा। उन्होंने लिखा हो है---/'स देषगुणालंकारहाना- 
दानाभ्याम””; अथोत्‌ बह सौंदये देषों के छोड़ देने और गुशों 
तथा अलंकारों के ग्रहण करने से होता है। अतएव बे पूर्वोक्त 
सूत्रों की स्वनिर्मित वृत्ति में काव्यज्कत्षणए” को विषय मे कहते 
हैं--काव्यशब्देप्यं गुणालंकारसंस्कृतयो: शब्दार्थयोरव॑र्ततेः-; 
अर्थात्‌ जिन शब्दों और अर्थों" मे काव्य की पुट लगी हो, वे 
काव्य कहलाते हैं | 

पर, उनके अंथ से यह भी स्पष्ट प्रतीत द्वोता है कि शब्द 
पर अथे के साथ “गुणों और अल्तकारों से युक्त' विशेषण उनकी 
अभिनव ही सृष्टि है; क्योंकि वे उसी के साथ लिखते हैं कि 
“भक्तगा तु शब्दाथमात्रवचने गृह्मते?। इसका तात्पय॑ यह 
होता है कि, भ्रव तक जे केवल शब्द और झ्थ” को काव्य 
कहा गया है, वह काव्य स्वरूप का वास्तविक विवेचन न होने के 
कारण कट्दा गया है, और झ्ब वह रूढ़ हे! गया है; पर उसे 
काव्य शब्द का मुख्य श्रथे नहों, कितु ल्ाच्षणिक अथे सममकना 
चाहिए। से वामन के सिद्धांत के अनुसार काव्य शब्द का 
श्रथे गुणा और अल्लंकारों से युक्त शब्द और हअधे” हुभ्रा । 

आन॑द्वधनाचाये ( नवम शताब्दी का उत्तराध ) 

इनके भ्रनंतर भावी व्यंग्यविवेचना के प्रथम प्रवत्तेक ध्वनिं- 
मसेज्ञ श्रो आानंदवर्धनाचाये ने काव्यत्नक्षण के स्पष्ट रूप मे ते 


[ ४६ ] 
नहीं लिखा है; पर यह अवश्य स्वीकार किया है कि काव्य का 
शरीर शब्द प्लौर श्रथ है। वे एक प्रसड्ज में कहते हैं कि 
“शब्दा्थेशरीरं तावत्‌ काव्यम्‌ ।?? 
भेज ( ग्यारहवीं शताब्दी का उत्तराध ) 

इनके बाद संस्क्ृव-साहित्य के सुप्रसिद्ध प्रेमी धाराधराधी- 
श्वर महाराज भेज का नंबर आता है । यद्यपि उन्होंने स्पष्ट 
रूप से कोई 'काव्यत्षणः नहीं लिखा है; तथापि उनके “निर्देष॑ 
गुणबत्‌ काव्यमलंकारैरलंकृतम्‌ | रसान्वितं कविः कुबेन कीर्ति 
प्रीतिंच विदति ।? इस सरखतीकंठामरणत्थ पद्म से यह 
सिद्ध होता है कि थे भी> शब्द श्रौर श्रथे 'देनेो को ही 
काव्य मानते हैं। क्योकि एक तो उन्होने जो काव्य को 
'रसान्वितम! विशेषण दिया है, वह अथे का काव्य माने बिना 
ठीक ठीक नहीं घट सकता; क्योंकि रस का साज्ञात्‌ अन्वय 
फेवल शब्दें से नहीं हो सकता। दूसरे अलंकार:? से भी 
उन्हें शब्दालंकार भार अथेलंकार देनों अभीष्ट हैं; से भअ्रथ 
को काव्य माने बिना अर्थालंकार अलंकूत किसे करेंगे १ 

मम्मट ( बारहवीं शताब्दी ) 

अब शभ्रागे चलिए। आगे अलंकारिक जगत्‌ के देदी- 
प्यमान रत्न महामति मम्मटाचाये का स्थान है। उन्होंने वामन 
.._ --वामनाचारय झज्कीकर ने काब्यप्रकाश की भूमिका मे जो यह. 


लिखा है--“निर्दोष॑ गुणारंकाररसवद्‌ वाक्य काव्यमिति मोजसतस्र?” 
से अतीत होता है कि पुरःस्फूत्तिक है ) 


[ ५० ] 

के मत को अपनी आल्ोचनात्मक दृष्टि से देखा। बामन का 
शगुणसहितः कहना ते उनकी समझ्त मे आया; पर अल्ंकारों 
पर उतना जोर देना उन्हें न जैंचा । बात भो ठीक है; काव्य 
मे अलंकारे| का अनिवाये दोना सर्वथा आवश्यक भी नहीं है । 
से। उन्होने कहा कि “सब जगह अलंकार रहें; पर यदि कहीं 
वे स्पष्ट न भी रहे; तथापि देषरहित और गुणसदहदित शब्द 
झऔर अ्रथे को काव्य कहा जाना चाहिए”? | 


वाग्मट ( बारहवीं शताब्दी, मम्मट के पीछे ) 

पर, पीछे के विद्वानों का ध्यात, ध्वनिकार फे सिद्धांतों 
का प्रच्छा प्रचार हो जाने के कारण, काव्य फे जीवन रस की 
प्रेर गया। वाग्मट ने देखा, वामन गुणों और अलंकारों 
सहित शब्द और अथे को काव्य, और “रीति! को काव्य 
का आत्मा मानते हैं, और काव्यप्रकाशकार देषरहित श्रौर 
ग़ुणसहित शब्द और अथे को काव्य कहते हैं; तथा रस 
को काव्य का झ्रात्मा कहते हैं; ते ल्ञाओ! हम इन सभी 
को लिख डाले। इसलिये उन्होंने “गुण, भ्रल्ंकार रीति 
गऔर रससहित तथा देषरहित शब्द और झर्थ!ःः को काव्य 
कहना शुरू किया। 


पीयूपवर्ष ( बारहवीं शताब्दी का उत्तराध ) 


इधर पीयूषवष ( चद्राल्लेककार जयदेव ) तो और भी 
बढे। वे ते देोषरहित एवं लक्षण, रीति, गुण, अलंकार, 


[ ५१ | 
रस और वृत्ति--इन सबसे सहित वाणी को काव्य कहते छगे। 
अर्थात्‌ अब तक जो कुछ उत्कर्षाधायक, जीवनदायक अथवा 
शोभाविधायक धमम उन्हे दिखाई पड़े, उन्होंने उन सबका वाक्य 
के साथ मे लगाकर एक लंबा लक्षण बना डाज्ञा। पर, ग्रह 
बात एक प्रकार से मानी हुई दी है कि उनका लक्षण-निर्माण 
सरक्ष और हृदयज्ञम होने पर भी उतना विवेचनापूर्ण नहीं 
है। वही बात यहाँ भी हुई है | 
विश्वनाथ ( चैदहवीं शताब्दी ) 

विक्रम की चैादहवीं शताब्दी से काव्यज्षक्षण का रुख फिर 
से बदला शऔर उप्तकी लंबाई को कम करने का यत्न होने क्गा | 
जहाँ तक हम समभते हैं, सबसे पहले, सुप्रसिद्ध निर्बंध 
साहित्यदप॑ण' के रचयिता महापात्र विश्वनाथ ने उसे कम किया 
और कद्दा कि “जिप्तकी जीवनज्योति रस-भाव आदि हैं, जो 
इन्हों के द्वारा चमत्कारी होता है, उस वाक्य का नाम 
काव्यः है? । उनका अभिप्राय यह है कि वाक्य मे चाहे 
प्रतंकार झादि कोई उत्कर्षाधायक वस्तु न हो और दोष भी 
हों, तथापि यदि उससे रस, भाव और उनके आभासों की 
अभिव्यक्ति द्वाती हो, ते। उसे काव्य कद्दा जा सकता है 

यह बात कुछ नवीन नहीं, बहुत पुरानी है। शौद्धो- 
दनि नामक एक आचाये ने इस बात को बहुत पहले ही लिख 
दिया था, महापात्रजी ने प्रायः उसी को उठाकर लिख दिया 
है। यह बात केशव सिश्र के अलंकारशेखर” से स्पष्ट हो 


[ ४२ ] 

जाती है। वे कहते हैं--.'अल॑कारसूत्र-कार भगवान शौद्धो- 
दनि ने काव्य का खरूप यों लिखा है--“कार्व्य रसादि- 
मद्गाक्‍्य श्रुत सुखविशेषज्षत्‌ ।”” अर्थात्‌ जिस वाक्य में रस झादि 
हों, उसे 'काव्यः कहा जावा है। 'रस आदि? में जे। आदि? 
शब्द है, उससे उन्होने (केशव सिश्र ) अलंकार का अहण किया 
है और कहते हैं कि रस अथवा अलंकार दोनों में से एक के 
होने पर वाक्य को काव्य कह्दा जा सकता है। पर साहित्य- 
दर्षणकार को अलंकारमात्र के होने पर काव्य मानना अभीष्ट 
नही; भरत: उन्होने आदि शब्द को उड़ा दिया और केवल 
'रस? शब्द लिखकर उससे रस भाव-आदि आस्वादनीय व्यंग्यों 
का अद्दण कर लिया है| 


गेदिंद ठक्कुर ' (सेलहवीं शताब्दी का उत्तराध, अलुमित ) 


तदनंतर  काव्यप्रकाश” के भर्मज्ञ काव्यप्रदीप'-कार 
श्रोगेविंद ठकुर का समय आता है। उन्होंने 'काव्यप्रकाश' 
के लक्षण का विवेचन करते हुए यह लिखा है कि--काव्य- 
प्रकाशकार को रस-रहित होने पर और अलंकार के स्पष्ट न 
इंने पर भी शब्द और अथे को काव्य मानता अभीष्ट है। 


पर यह उचित नहीं। क्योकि जहाँ रस न होगा और अर्त॑- 


१--ये यद्ञपि व्याख्याकार है, तथापि हम इन्हें आचारयों में मानते 
है और हमे विश्वास है कि पदीप' के सर्मज्ञों को इससे विश्नतिपत्ति 
नहीं हा सकती । 


[ ५३ |] 

कार भी स्पष्ट न होगा, ते वताइए, वहाँ चमत्कार किसका 
होगा ! श्र काव्य मे चमत्कार ही असली चीज है, 
यदि वहो न रहा, वे उसे काव्य कहा ही कैसे जायगा ? 
अतः यह मानना चाहिए कि जहाँ, रस हो, वहाँ यदि 
अल्लंकार स्पष्ट न हो, तथापि शब्द और भ्रथ को काव्य कद्दा 
जा सकता है; पर जहाँ रस न हो वहा पअलंकार का होना 
आवश्यक है! से रस और अलंकार--इन दोनें मे से 
किसी एक से भी युक्त शब्द और अथे को काव्य कहा जानो 
चाहिए। इनका यह लक्षण प्राय: केशव मिश्र के लक्षण से 
मित्ञ जाता है | 


पंडितरान ( सत्रहवीं शताब्दी ) 
इनके अन॑तर अनुपाद्य पंथ के निर्माता मार्मिक ताकिक 
श्रीपंडितराज का समय है । उन्होने इस' विषय मे जे| मा्मिकर 
विवेचन किया है, वद्द ते झापके सामने है श्रौर उस पर जो 
इस अकिच्चित्कर की टिप्पणी है, वह भी झापके सम्मुख है। 
अत: इस विषय मे अधिक लिखकर हम भ्रापका समय व्यथथे 
नष्ट नही करना चाहते । 


उपसंहार 
जहाँ तक हमारा ज्ञान है, हम कह्ट सकते हैं कि पंडित- 
राज के अ्रनतर इस विषय का भार्मिक विवेचन किसी ने 
नहीं किया। अ्रतएब इसी लक्षण को अंतिम समझकर 


[ ५४ ] 

इम पूर्वोक्त लक्षणों का सिद्दावतोकन करते हुए इस विषय 
को समाप्त करते हैं-- 

यह कहट्दा जा चुका है कि वेदादिक के समय मे 'किसी 
भी अर्थ के वर्णन! को कान्य कहा जाता धा। उसके 
अंतर, पुराणों के समय में, लक्षण के प्राय: प्राचोन रूप 
मे रहने पर भी' 'कविकल्पित सुंदर अथे के सौंदियेयुक्त 
वर्णन! को द्ाब्य माना जाता था। यह वात अम्निपुराण 
के पाठ से पूण॑तया सिद्ध द्वो जाती है; क्‍योंकि उसके लक्षण 
में सौंदर्य पर इतना जार न दिया जाने पर भी, पदार्थों के 
वर्णन के लिये जिस सौंदय का संपादन अपेक्षित है, उसका 
उसमे बिश्तृत विवेचन किया गया है। यह मत संभवतः 
दंडी तक चलता रह्दा | 

तदनंतर रुद्रट, अथवा उनके (र्ववर्त्ती किसी आाचाये, के 
समय से मुंदर प्रथे प्रौर उसके सौंदर्ययुक्त वर्णन” का नाम 





१---अग्निपुराण? में ऐतिहासिक व्यक्तियों का भी प्रवंध ( आख्या- 
यिका आदि ) के अनुरूप वना लेने की अनुमति है। और थोड़ा भी 
फेर-फार होने पर ऐतिहासिकता नष्ट हे! जाती है, क्योंकि इतिहास में 
कल्पना को किंचित्‌ भी स्थान नहीं। अतः हमने अर्थ को “कवि 
कर्पित'! विशेषण छूयाया है। इसी---अर्थात्‌ चर्णनीय अर्थों को 
इच्छानुसार चित्रित कर डालने के ही--कारण, हमने, कान्य से वर्णित 
ऐतिहासिक और अ्नेतिहासिक सभी अथे का 'कल्पितः माना है 
क्योंकि वे यथास्थित पदाथों से श्यक्‌ हो जाते हैं। से इस विशेषण 
को काब्यकक्षण” में सवेत्र अहुस्यूत समम्तिए। 


[ ५४ |] 
' काव्य हुआ। बाद मे, वामन के समय से, 'सैंदियेपूर्ण अथे 
और उसके सौद्यपूर्श वर्णन” को काव्य कहा जाने छगा। 
_धामन झऔर उनके पूर्व के समय में शब्द और अथे दोनें के 
सौंदय का कारण गुणों और अलंकारों का ही माना जाता था । 
उनके बाद आनंदबर्धनाचाये के समय में सौंदये का पूरेतरया 
अन्वेषण हुआ, और तब सौंदय के मूल कारण “रस? का प्राघान्य 
दे! जाने के कारण, अछ्षकारों का आझादर कम हो गया । 
काव्यप्रकाशकार ने अल्लंकारों को गै।णश कर दिया और 
गुणों को केवल रस का धर्म मानकर उनको भमिव्यक्त करने- 
वाली रचना का अधिक सम्मान किया। उनके द्विसाब से 
रस कर रचना सौंदर्य का प्रधान कारण थे और भल्तंकार 
अ्प्रधान। तदनुसार वे भी 'सौंदर्यपूरे अथ और उसके 
सैंदर्यपू्ण वर्णन” का काव्य मानने ज्गे । 
वाग्भठ और पीयूषवर्ष के लक्षण उतने ज्योदक्षम नहीं हैं; 
अतः उन पर विचार करने की आवश्यकता नहीं है | 
साहित्यदपणकार सौंदयेपूरं झथे को काव्य नही मानते; 
कितु उसके वर्शनमात्र को काव्य मानते हैं; भौर सैंदय का कारण 
एक मात्र रस को समझते हैं। ये महाशय पर्णन के सौंदये 
को आवश्यक सानते हैं; पर भ्रनिवायें नहीं। पअ्रतएवं इनके 
हिसाब से वर्णन की निर्देषता श्रौर सालंकारता स्वधा अपेक्षित 
नहीं । यही बात पंडितराज के बिषय में भी समझ लीजिए | 
परंतु पंडितराज के तर्क इस विषय मे इनकी अपेक्षा ठोस हैं । 


[ ५६ | 

केशव मिश्र और गेविद ठक्कुर दोनों ही सांदय का कारण 
रस और अलंकार दोनों को मानते हैं। पर पहले महाशय 
साहित्यदर्पण के समान 'सीदयेपूर्ण भ्रथे के वर्णन! को काव्य 
मानते हैं, और दूसरे काव्यप्रकाश फे अनुयायी होने के कारण 
'सैदयपूर्ण अर्थ और उसके सौंदयेपूर्ण वर्णन? देने को काव्य 
मानते हैं । 

उनके बाद पंडितराज ने भी '"सैौंदर्यपू् भथे के वर्णनः 
को काव्य माना है; पर वे समग्र सौंदये की मूलकारणता एक 
रस को ही दे देना उचित नही समझते । उनका कहना है 
कि चाददे जिस किसी अर्थ के ज्ञान से हमे प्रतैकिक भानंद, 
वद्द थोड़ा हो। या तन्‍्मय कर देनेवात्ना हो, प्राप्त हे जाय, वह 
प्रत्येक अथ सौंदर्य का कारण हो सकता है। उसका रस के 
साथ स्वधा संबंध होना आवश्यक नही 

रही हमारी टिप्पणी । से हमसे और पंडितराज से 
केवल इतना द्वी मतभेद है कि हम केवत्न वर्शन को ही कवि 
की कृति नहों समझते; किंतु काव्य मे वर्णित अर्थों को भी 
उसी की कृति मानते हैं, जेसा कि रुद्रर का मत लिखते समय 
हम सिद्ध कर आए हैं| 


काव्य का कारण 


यह ते हुई काव्य की बात । प्रब इसके आगे इस प्रंध 
मे काव्य के कारण का विवेचन दै। काव्य का कारण 


[ ५७ ] 

प्रतिभा, जिसे शक्ति भी कहा जाता है, है, इस विषय में 
ते आज दिन तक न किसी को विप्रतिपत्ति हुई और न आगे 
कभी हो सकती है। पर मतभेद एक ते इस बात मे है 
कि कुछ विद्वान केवल प्रतिभा को ही काव्य फा फारण 
मानते हैं और कुछ प्रतिमा के साथ व्युतत्ति श्रार अभ्यास 
को और जेोडते हैं। अर्थात्‌ कुछ विद्वानों के हिसाब से 
काव्य का एक फारण है प्रतिभा; और कुछ के हिसाब से 
तीन हैं--प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास । प्रतिमा क्‍या 
पदार्थ है, यह विषय भी विवादप्रस्त है । 

श्रब देखिए, काज्य का एक कारण माननेवालों मे रुद्रट, 
वामन और पंडितराज आदि विद्वान हैं; प्रौर तीन माननेवाल्लों 
मे दंडी, मम्मट, वाग्भट और पीयूषबर्ष आदि हैं। अब इन 
विद्वानों फे विचारों को सुनिए औऔर उन पर एक आज्तोचना- 
त्मक दृष्टि डाल जाइए | 

इनमे से प्राचोनतर आचाये दंडी का कहना है कि 

नेसगिकी च॒ प्रतिभा, श्रुतं व बहु निर्मेठस, 
अमनन्‍्दश्चाउमियोगोउस्या: कारण काव्यसंपदः ॥ 

पर्थात्‌ खतःसिद्ध प्रतिभा, श्रत्यंत और निर्देष शाल- 
अवशण--अर्थात्‌ व्युत्पत्ति, तथा अनल्प' अभ्यास--अर्धात्‌ 

३--अभियेगः पौनःधपुन्येनाइनुसन्धानम! इति बीकानेरराजकीय 


' धुस्तकालयस्था लिखिता काब्यादुर्शब्याख्या। स चाउम्यास पवेत्यस्म- 
हुकओ&5थें न काचन विग्नतिपत्तिः । 


[ ८ ] 

किसी प्रकार की कमी न करते हुए बार बार पद्म बनाते रहना, 
ये सब काव्य की संपत्ति---अर्थात्‌ उसके उत्क्ृ७ होने के कारण 
हैं। पर साथ ही वे एक और बात कहते हैं, जे अवश्य 
ध्यान देने याग्य है। वे कहते हैं-- 

न॒विथते ययपि पूर्ववापनायुणाचुबन्धिप्रतिभावमद्ुुतम्‌ । 

श्रतेन यस्‍्नेन च वागुपासिता भुर्व॑ करोसत्पेव कमप्यनुअदस ॥ 

अर्थात्‌ यद्यपि पूवेजन्म की वासना के गुण जिसके पीछे लगे 
हुए हैं वह संसार को चकित कर देनेवाली प्रतिभा नहीं है, तथापि 
शाक्षश्रवणश--अर्थात्‌ व्युत्तत्ति और यक्न--अ्रधात्‌ अभ्यास-- 
के द्वारा सेवन की हुई वाणी कुछ न कुछ अलुप्रह करती ही 
है। इससे यह पअपिप्राय निकलता है कि यद्यपि काव्य के 
उत्कृष्ट होने के लिये खाभाविक प्रतिभा, व्युत्पत्ति और प्रभ्यास 
तीनों आवश्यक हैं, पर यदि वैसी प्रतिभा न हो, तथापि यदि 
व्युत्पत्ति और भ्रभ्यास का बल्ञ उत्पन्त किया जाय ते काव्य 
बनाया जा सकता है। सारांश यह्द कि विशिष्ट प्रतिभा, 
व्युत्पात्ति और भ्रभ्यास उत्कृष्ट काव्य के कारण हैं; पर साधारण 
प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास से भी काव्य वन सकता है। 

इनके अनंतर रुद्रट एक शक्ति (अतिभा) को ही 
काव्य का कारण मानते हैं प्र उसका विवेचन करते हुए यें 
लिखते हैं--- 

मनसि सदा सुसमाधिनि विस्फुरणमनेकधा<मिघेयस्थ, 
अकिप्टानि पदानि च विभान्ति यस्याससी शक्ति- | 


[ ५८ ] 

अर्थात्‌ जिसके होने पर, अच्छी तरह एकाग्र किए हुए 
मन में अनेक प्रकार के भ्रर्थों की रफ़्त्ति होती है, और अद्धिष्ट 
अर्थात्‌ सरत और सुंदर पद सूक पढ़ते हैं, उसका नाम 
शक्ति है। फिर वे आगे लिखते हैं कि 

सहजोत्पाद्या च सा द्विधा भवति। 
उत्पादा तु कथन्लिद्‌ व्युत्पत्त्या जन्यते परया | 

अर्थात्‌ वह शक्ति दो प्रकार की होती है---एक सहज--- 
प्र्थांत्‌ खत: सिद्ध, भर दूसरी उत्पाय--प्र्थात्‌ उत्पन्न की 
जानेवाली। उनमे से सहज शक्ति ते इंश्वरदत्त अथवा 
प्रदृष्टजन्य द्ोती है; भ्रतः उसके विषय मे तो कुछ कद्दना है 
नहीं; पर जो उत्पाद शक्ति है, वह श्रत्यंत उत्कृष्ट व्युत्पत्ति 
से वत्पन्न की जाती है। इससे यह सिद्ध द्वोता है कि 
प्रतिभा दे तरह की है; जिनमें से एक का कारण प्रद्टष्ट है 
और दूसरी का व्युत्पत्ति | 

उनके बांद वामन ने भी काव्य का कारण केवल प्रतिभा 
को दी भाना है। वे लिखते हैं कि “कबित्वबीज॑ प्रतिभा- 
नम?” और उसका विवरण यों करते हैं कि “कवित्वस्य बीर्ज 
संस्कारविशेष: कश्नितृ; यस्माद्विना काव्य न निष्पद्मयते, निष्पन्ल 
वा हास्यायतन स्यात्‌?? | प्रर्थात्‌ कविता का कारण एक विशेष 
प्रकार का संस्कार है, जिसके बिना काव्य नही बन पाता, 
अथवा यों कहिए कि बना हुआ भी हँसी का पात्र होता है, 
उसे सुनकर लोग उसकी खिल्ली उड़ाते हैं । 


[ ६० ] 
अब आगे काव्यप्रकाशकार मम्भटाचार्य हैं। वे कहते हैं-- 
शक्तिनि पुणवा लेकशास्राब्याद्यवेत्तणात्‌ । 
काव्यज्ञशिक्षयाउभ्यास॒ इति हेतुखदुऋवे ।। 
अर्थात्‌ शक्ति ( प्रतिभा ) और ज्ञोकज्यवह्दार तथा शान 
ओऔर काव्यादिकों के विमशे से उत्पन्न चुई निपुणता --अर्धात्‌ 
व्युत्पत्ति, एवं जो ज्लोग उत्कृष्ट काव्य का बनाना और विचारना 
जानते हैं, उनकी शिक्षा से अभ्यास; ये तीनों सम्मिद्षित रूप से 
काव्य के कारण हैं। सारांश यह है कि काव्य का फारण 
तीन वस्तुएँ हैं--शक्ति, व्युत्पत्ति और अभ्यास । 
इस श्लोक को हम यदि “सलैसर्गिकी च प्रतिभा *'***? 
इस पूर्वोक्त दंडी के श्त्ोक का सुसंस्क्रत अनुवाद कहे वे 
मर्मज्ञ विद्वानों को कुछ भी विप्रतिपत्ति न हांगी। हाँ, इतनां 
अवश्य है कि मम्मठ ने अपनी व्याख्या मे व्युत्पत्ति और 
भ्रभ्यास का अच्छा विवेचल किया है। पर प्रतिभा की 
व्याख्या करते हुए उन्होने जे शब्द ख़िखे हैं, वे ते ज्यों के 
त्यों वामन के कह्दे जा सकते हैं। से इसे दंडी और वामन 
देनें के अभिप्रायों का संकन्नन कहे ते। कोई अत्युक्ति न होगी । 
बाग्मट लिखते हैं-. 
प्रतिभा कारणन्तस्य, व्युत्पत्तिस्तु विभूषणम्‌ । 
अशेत्पत्तिकृदस्‍्पाल इत्यादि कविसकथा ॥ 
अर्थात्‌ प्रतिभा काव्य को उत्पन्न करती है, व्युत्पत्ति उसको 
सुशोमिव बनाती है और अभ्यास उसकी उत्पत्ति को बढ़ाता है, 


[ ६१ ] 
इत्यादि कवि ल्लोगों का कथन है। तात्पय यह कि काव्य 
का, प्रतिभा उत्पादक, व्युत्पत्ति सैंदर्याधायक भ्रथांत्‌ पोषक 
और अभ्यासवर्धक कारण है। 
इसी बात को पीयूषवर्ष ने दृष्टात देकर स्पष्ट कर दिया 
है। बे कहते हैं-.. 
प्रतिभेव भ्रताभ्याससह्विता कवितां प्रति। 
हेतुस दुग्जुसंबद्धबीजोत्पत्तिछंतामिव ॥ 
अर्थात्‌ ब्युत्पत्ति झौर भ्रभ्यास सहित प्रतिभा कविता का 
कारण है; जिस तरह कि मिट्टो भार जल से थुक्त बाज की 
उत्पत्ति ता का । इसका तात्पय यह है कि जिस तरह 
लता का बीज उत्पादक, मिट्टी पोषक प्रौर जज्न वर्धक कारण है, 
उसी तरह प्रतिभा, व्युत्पत्ति मार भ्रभ्यास काव्य के कारण हैं । 
पंडितराज का कथन यह है कि कविता का साक्षात्‌ 
कारण एकमात्र प्रतिभा है, व्युत्पत्ति और शअ्रभ्यास उसके 
साज्ञात्‌ कारण नहीं, कितु परंपरा से हैं। अर्थात्‌ व्युत्पत्ति 
और अभ्यास काव्य के पोषक और वध्धक नहीं, कितु प्रतिभा 
के पोषक और वर्धक हैं श्रेर उसको पुष्ट तथा विवर्धित करके 
काव्य का उपकृत करते हैं । 


प्रतिभा क्या वस्तु है ! 


अच्छा, अब इन सब विचारों पर एक पझ्ालाचनात्मक 
दृष्टि डालिए। सबसे पहले यह सोचिए कि प्रतिभा है 


[ इं२ ] 
क्या पदाथे ९ वास्तव मे प्रतिभा एक्क प्रकार की बुद्धि का नाम 
है। अ्रतएव यह कहा जाता है-- 
वुद्धेनेवनवोन्मेपशालिती प्रतिभा मता । 

अर्थात्‌ जिसमे नई नई सूक हो।ती है, उस बुद्धि को प्रतिभा 
माना जाता है । 

श्रब यह देखिए कि साहित्य के प्राचीन आचारयीं ने 
प्रतिभा अथवा शक्ति का क्‍या अधे किया है? दंडी ते इस 
विषय मे कुछ विशेष लिखते नहीं, पर उनके दिए हुए प्रतिभा 
के विशेषणों से कुछ सिद्ध हो जाता है, जिसे हस झागे 
लिखेगे । हाँ, रुद्रट ने 'शक्ति” की व्याख्या अ्रवश्य की है, जो 
पहले लिखी जा चुड्ली है। उससे यही सिद्ध होता है कि वे 
एक प्रकार के संस्कार को शक्ति मानते हैं; क्योंकि उनके 
हिसाब से 'शक्ति? वह पदार्थ है, जे कविता के अ्रनुकूल् अथो 
श्रौर शब्दों की स्मृति का निमित्त है। इनके बाद वामन और 
सम्मट ने ते! स्पष्ट शब्दों मे एक प्रकार के संस्कार का नाम 
शक्ति! खोकार किया ही है। 

अब देखिए, संस्‍्कार क्‍या वस्तु है ? वास्तव मे संस्कार 
एक प्रकार का खतंत्र गुण है, जिसे पूर्वेजन्म के ज्ञान की 
वासना कह सकते हैं। पर 'काव्यप्रदीप! के संस्कारविशेषः? 
शब्द की व्याख्या फरते हुए नागेश ने “उद्द्योतः मे लिखा है 
कि शक्ति शब्द से यहाँ एक विशेष प्रकार का अद्ृष्ट ( पूर्व- 
जन्म के कर्मों का फल ) लिया गया है। वे लिखते हैं कि 


[ ६३ ] 

“देवताराधघनादिजन्य विज्क्षयादृष्ट 'शक्तोति काव्यनिर्मा- 
शायाप्नये'ति योगाच्छक्तिरित्युच्यते !!ः अथांतू व्याकरण की 
रीति से शक्ति शब्द का अथ “जिसके द्वारा कांव्य बनाया जा 
सकता है? यह द्वोता है, तदनुसार देवता के आराधन 
आदि से उत्पन्न अद्ृष्ट को शक्ति” कहा जाता है। पर 
दंडी और रुद्रठ जिसे प्रतिभा और शक्ति कहते हैं, उसका 
और नागेश की व्याख्या का परस्पर कुछ भी मेल नही मिल्वता। 
देखिए, दंडी ने अपने पद्मयो मे प्रतिभा को दे! विशेषण दिए हैं, 
जिनसे उनका अ्रभिप्राय स्पष्ट हे जाता है कि वे किसे प्रतिभा 
मानते हैं। उनका एक विशेषण है “ैसर्गिकी! शऔर दूसरा 
है, 'पू्ववासनागुणाहुवंधि?; जिनका अथे हम पहले कर आए 
हैं। श्रव सोचिए कि नागेश के कथनानुसार यदि 'संस्कार- 
विशेष! का अथे अदृष्ट माने तो उसे स्वाभाविक विशेषण देना 
व्यू है; क्योंकि अदृष्ट ते पुरुष के प्रयज् से उत्पन्न होता है, 
फिर वह स्वाभाविक कैसा ? दूसरे, उनका 'पूर्ववासनागुणाजु- 
बंधि? विशेषण भी घटित नहीं दे सकता; क्योंकि अद्ृष्ट ते 
पूर्व कमों के फल्व का नाम है, से वह पूर्वजन्म क॑ संस्कार से 
उत्पन्न गुणों का अ्रनुगामी नही, किंतु जनक हे। सकता है | इस 
कारण, इनके हिसाब से ते। प्रतिभा? का अथे एक प्रकार की बुद्धि 
ही दे सकता है, न किसी प्रकार का संस्कार और न अद्दष्ट 
अब रुद्रट की तरफ चलिए | बे प्रतिभा को सहज और 
उत्पाद्य दे तरह की मानते हैं, और उत्पाद प्रतिभा को व्युत्पत्ति 


[ ६४ ] 


के द्वारा उत्पन्न होनेवाली मानते हैं। क्‍या आप कह सकते 
हैं कि व्युत्पत्ति से भी कोई अदृष्ट उत्पन्न होता है और वही 
प्रतिभा है ? यदि नहीं ते बात दूसरी ही है। हमारी समझ 
में ते वामन और मस्मट के सिस्कारविशेष” शब्द का अथे 
पृेजन्मीय वासना मानना ही उचित है। दंडी भी ते इनके 
सर्वथा अनुकूल नही; क्योंकि वे प्रतिभा का 'बासना? नही, 
कितु 'वासनाशुणानुबंधि! मानते हैं। रहे रुद्ठट, से! उनकी 
इनकी भी राय एक नहीं हे सकती, क्योंकि वे ते उसे इस 
जन्म मे भी व्युतपत्ति फे द्वारा उत्पन्न हे सकनेवालो मानते हैं, 
केवल्न सहज ही तनहीं। इस प्रकार इनका मत मिलता नहों है। 
यह ते हुआ इन ज्ञोगों का आपस का मतभेद। अभ्रव 
आप यह सोचिए कि वास्तव मे काव्य बनाने मे कवि को 
कया करना पड़ता है ? इसका उत्तर यद्दी होगा कि सुंदर पदों 
श्र अर्थां की योजना तथा कल्पना । श्रब आप थोड़ा सा 
विचार करते ही समझ सकते हैं कि यह काम बुद्धि से होता 
है। न ते वह हमारी मेग्य वस्तुओं की तरह हमें अदृष्ट के 
द्वारा सिद्ध रूप मे प्राप्त होता है श्र न संस्कार से ही बन सकता 
है । तात्पये यह कि यह काम बिना बुद्धि के नहीं हो सकता | 
अदृष्ट और संस्कार यदि कारण हो सकते हैं, ते हमारी बुद्धि 
को वैसी बनाने के कारण हो सकते हैं, स्वतंत्रतया काव्य के 
नहीं हो सकते। तब .यदि प्रतिमा को काज्य का कारण 
मानना है, ते उसके सुप्रसिद्ध अथ 'तवनवोन्मेषशाल्िनी बुद्धि! 


[ ६५ | 

को ही उसका अथ खीकार करना पड़ेगा, संस्कार भ्थवा 
अद्ृष्ट को नहीं । 

इस संबंध मे पंडितराज कितना भ्रच्छा कह रहे हैं। वे 
कहते हैं कि काव्य बनाने के पमुकूल शब्दों और अथी की उप- 
स्थिति (याद आ जाने ) का नाम प्रतिभा है, जे आपकी वही 
'तवनवे।न्मेषशालिनी बुद्धि? हुईं। श्रौरयह भी कहते हैं कि उसको 
बैसी बनाने का कारण कहीं भरृष्ट देता है और कही व्युत्पत्त 
और भ्रभ्यास, जे। अठुभव-सिद्ध है । भ्रव इस विषय का शेष 
विवरण भाप श्रतुवाद श्र उसकी टिप्पणी मे देख सकते हैं | 


काव्यों के भेद 


इसके भागे प्रस्तुत पुस्तक मे काव्यों के भेशें का वर्णन है; 
पर उनके विषय मे हमे विशेष नही लिखना है; क्योंकि, इस 
विषय मे प्रधिक मतभेद नहीं है। जहाँ तक हमारा ज्ञान 
है-..._इस विषय का विशेषरूपेण विवेचन ध्वन्याल्रोक' के 
तात्पर्यानुसार काव्यप्रकाशकार ने ही किया है। उन्होंने काव्यों 
के तीन भेद माने हैं; ध्वनि, गुणी भूत व्यंग्य और चित्र; जिन्हें 
उत्तम, मध्यम और अधम भी कद्दा जाता है । 

पर साहित्दप॑णकार ने इनमे से पहले दे भेदों फो ही 
काव्य माना है; वे 'चित्रकाव्य' को काव्य मानना नही चाहते। 
इसका कारण यही है कि वे रस आदि के झ्रतिरिक गुणों और 
अलंकारों को सौंदये का कारण नहीं मानते; जैसा कि हम 

कु 


[ इ६ ] 

'काव्यलक्षए? के विवेचन से दिखा ध्राए हैं। पर यह बात 
ठोक नही; क्योकि, लक्ष्य के अठुसार लक्षण हुआ करते हैं, 
सत्तण के अनुसार लक्ष्य नहों। जब कि सारा संसार 
भ्राज दिन तक केवल गुणों और अलंकारों से युक्त वन को 
भी काज्य सानता चल्ना आया है कर आज भी वही परिपाटी 
प्रचत्षित है, तब आप उन्हें काव्यसेशं मे से कैसे निकाज्न सकते 
हैं? हॉ, यह हे सकता है कि आप उन्हे अ्रधप अथवा उससे 
भी नीचे दरजे का मान ले | 

“चित्रमीमांसाकार” ने काव्यप्रकाश” के भेदें को ही 
लिखा है, उनमे किसी प्रकार की न्यूनाधिकता नहों की है। 

इनके बाद पंडितराज ने इस विषय पर कलम उठाई है । 
उन्होने कोव्यप्रकाशकार के भेदें मे एक भेद और बढ़ाकर उन्हें 
चार कर दिया है, जिसे आप अनुवाद से देख लेगे। हा, 
इतना कह देना आवश्यक है कि पंडितराज ने जो एक भेद 
बढ़ाया है, वह सार्मिक है, काव्यो के मेदे को समभूनेवाले 
उसका किसी तरह निषेध नहों कर सकते । दूसरे, काव्य- 
प्रकाशकार की अपेक्षा इन्होंने उसे विशद्‌ भी अच्छा किया है 
पैर अप्पय दीक्षित के साथ शास्मार्थ करके ध्वनि का सर्म 
सममभने की शैज्ी भो स्पष्ट कर दी है। 

रस 

अब रसे की ओर ध्यान दीजिए। यह इतना गंभीर 

विषय है कि इस पर झाज तक अनेक विद्वानों ने विचार 


[ ६७ ] 
किया है और आगे भी न जाने कहाँ तक होता रहेगा। 
परंतु हम प्रस्तुत विषय की ओर चत्नने के पहले आपसे 
नाटकों ( दृश्य* काव्यों ) की उत्पत्ति के विषय में छुछ कहना 
चाहते हैं। इसका कारण यह है कि रस का असुभव, श्रव्य- 
काव्यों की अपेक्षा, दृश्य-क्ाव्यों मे ही स्पष्ट रूप से होता है। 
झतएवं आज दिन तक उन्हों को लेकर इस विषय का विवेचन 
किया गया है | 
, जब किसी भी प्राणी को इष्ट (जिसे धह चाहता है, उस ) 
की प्राप्ति और अनिष्ठ ( जिसे वह नहीं चाहता, उस ) की 
निवृत्ति होती है, ते! उसके अंगो में अपने-आप ही एक प्रकार 
की स्फूत्ति उत्पन्न हो जाती है। भ्रथांत्‌ प्रकृति का नियम है 
कि आंनेंदित प्राणी के अग-उपाँग विचलित हो उठते हैं। जे 
प्राणी गंभीर होते हैं, उनमे वह स्फूत्ति केबल मुख-विकास 
नेत्र-विकास आदि ही करके रह जाती है। पर, जो इतने 
गंभीर नहीं होते, वे ऐसी घटनाओ्रों के होते ही एकदम उछल 
पढ़ते हैं, और उनका वह अ्ानंद इस तरद्द सव पर प्रकट हो 
जाता है। परिणाम यह होता है कि वह प्रानंद उस व्यक्ति 


१--काब्य की पुखके दे। विभागों मे विभक्त है--एक दृश्य और 
दूसरे श्रच्य । इश्य-काच्य उन्हे कहते है, जिनमे वरणि'त चरितन्नो का 
अभिनय किया जाता है--जैते शाकृुन्तल आदि। और अ्रन्य-काव्य 
उनका नाम है, जिनका अभिनय नहीं होता, किन्तु लोग उसे सुनकर 
डी आनन्द बढ लेते हैं--जैसे रघुचंश आदि | 


[ ६ं८ ] 

तक ही सीमित नहीं रहता, कितु जे! ल्लोग उसके सुहृत्‌, संबंधी 
अथवा हिंतैषी होते हैं, जिनमे हैरष्या-द्वेष की प्रवृत्ति उस आनंद 
के अनुभव का प्रतिबंध नहीं करती, वे भी आजनंदित है। उठते 
हैं, मैर उससे सहालुभूति प्रकट करने लगते हैं। बच्चों में 
यह बात बहुत स्पष्ट रूप से देख पड़ती है। यही उछल-कूद 
नाव्य की आादि-जननी है। शुरू शुरू में इष्टप्राप्ति श्रथवा 
अनिष्टनिव्वत्ति के समय उसका प्राप्त करनेवाल्ा और उससे सहा- 
नुभूति रखनेवाले लोग इसी तरह उछल्न-कूद किया करतें थे। 

पर, प्रकृति का एक नियम और है। मलुष्य का वास्त- 
विक वस्तुओं के देखने मे जो आनंद प्राप्त होता है, उससे कद्दी 
अधिक उसका अनुकरण देखने मे प्राप्त होता है। उदाहरण 
के लिये कल्पना कीजिए कि एक सिटरलू बनिया आपका 
पड़ोसी है, जिसे आप सदा'देखा करते हैं, श्रौर उसकी 'चाल- 
ढाज्ञ आदि को देखकर आपको कुछ कातुक भी हुआ करता 
है; पर उसके देखने मे आपको वह पझानंद नही आ सकता, 
जिसे कि एक भाड़ अथवा बहुरूपिया उन्हीं सेठजी की नक॒ण 
दिखलाकर अनुभूत करा सकता है। 

इसके बाद एक बात और भी है। घह यह कि वास्तविक 
एवं बत्तेसान व्यक्ति के हर्पादि के अनुकरण मे हमे सददालुभूति 
भी नहों हे सकती । क्योंकि, उसके वत्तेमान होने से हमारा 
उसके साथ किसी न किसी अकार का राग-द्वेषमूलक संबंध दो 
जाता है; इसलिये उस अनुकरण को देखकर राग-द्वेष की 


[ इईंड ] 

प्रवृत्तियाँ जग उठती हैं, और वे सद्दाचुभूति मे, और कभो 
कभी ते अमिनय में ही, वाधक हे। जाती हैं, और बिना 
सहालुभूति के आनंद की अभिव्यक्ति देती नहीं। इस कारण, 
यदि किसी प्राचीन अथवा कलिपत घटना का अनुकरण किया 
जाय तो उस घटना से संवद्ध व्यक्तियों के साथ हमारा 
आधुनिक संबंध न होने के कारण हमे अभिनय के द्वारा 
उद्गोधित आनंद का यथाथे अनुभव हे। सकता है, क्योंकि 
पहा बाधक प्रवृत्तियों नहीं रहतों। अतएवं अंततेगत्वा 
मनुष्यों के मनोरंजन के लिये इस तरह के अनुकरणमूलक 
अभिनय होने छगे | 

इन अमिनयों के लिये कवि लोग प्राचोन अथवा कटिपत 
घटनाओ्रों को पद्मादिवद्ध कर देते थे, जिससे वे और भी अधिक 
रोचक हो जायें, जेसे कि आज-कल भी कई-एक आसम्य खेल्लों 
मे होता है। इन्हीं अभिनयों का विकसित रूप हैं आपके 
दृश्य-काव्य कौर आधुनिक नाटक-ड्रामा आदि | बस, दृश्य- 
कान्यों की बात हम इतनी ही करेंगे; क्योकि हमारे इस प्रकरण 
से इसका इतना ही संबंध है। 

१--प्रारंभ ही प्रारंभ मे लोग जब इन अ्मिनयों को देखने 
लगे तब उन्हे प्रमुभव हुआ कि इनमे कुछ आनंद अवश्य है। 
साथ ही उनमे से जे। लोग बुद्धिमान्‌ और तकशील थे, उन्होंने 
सोचना शुरू किया कि इस नाट्य की बस्तुओं मे से यह 
झानंद किस वस्तु में रहता है। फिर क्या था, उसकी खेज 


[ ७० | 
प्रारंभ हुई। वही वरतु साहित्य की परिभाषा मे 'रस्यते;सौ 
रस:” इस व्युत्पत्ति के द्वारा 'रस” कही जाती है। 
सोचते सोचते पहले पहल वे लोग स्थूल्न विचार के द्वारा 
इस परिणाम पर पहुँचे कि जिससे इम प्रेम आदि करते हैं, 
बह प्रेम आदि का झालंबन नट को प्रमिनय करते देखकर 
हमारे ध्यान मे आ जाता है, और उसका बार-बार अनुसंघान 
करने से हमे आनंद का अनुभव होता है; अत' वह प्रेम आदि 
का आलंबन--वह विभाव ही रख है। वे कहने छगे 
कि--भाव्यमाना विभाव एवं रसः”। प्र्थात्‌ बार बार 
अनुसंधान किया हुआ प्रेम-भादि का श्राल्ंबन द्वी रस है। 
यह मत प्रस्तुत पुस्तक मे नौवां है। 
२--पर, पीछे से त्ञोगें को इस बात के मानने से विप्रति- 
पत्ति हुईं। उन्होंने सोचा कि यदि प्रेम आदि का आलंबन 
ही रसरूप हो, ते! जब वह प्रेम-आदि के प्रतिकूल चेष्टा करे, 
प्रधवा प्रेम आदि के अनुकूल चेष्टाओं से रहित हे।, तब भी 
उसे देखकर इमे आनंद आना चाहिए; क्योंकि आलंबन ते 
तब भी वही था और अब भी वही है, उसमे कुछ फेर-फार ते 
हुआ नहीं। पर, ऐसा द्वोता नही | इस बात को एक उदा- 
इरण के द्वारा स्पष्ट कर लीजिए। कटपना कीजिए कि एक 
नट ने पहल्ले दिन सीता अथवा शकुंतल्ञा का पार्ट लिया था, 
और उसे देखकर-- उसे अपने प्रेम का आलंवन मानकर-- 
सहस्तों सामाजिक ( दशक ) मुग्ध हो गए थे। उसी नट 


[७१ |] 

को, यदि कोई, दूसरे दिन, उन वेष-भूषाओं और चेष्टाओं 
से रहित देखे, ते क्या तब भी वह उसी भानंद को प्राप्त 
कर सकेगा ? कभी नहीं। बस, ते यही समभकर लोगों 
के विचारों मे परिवत्तेन हुआ और उन्होंने सेचचा कि प्रेम आदि 
का भ्रालंबन रस नहीं, कितु बार बार अनुसंधान की हुईं उसकी 
चेष्टाएँ और शारीरिक स्थितियाँ, जिन्हें अ्रनुभाव कहा जाता 
है, रस हैं। वे कद्दने लगे कि “झनुभावस्तथा” | प्रर्थात्‌ 
बार बार अनुसंधान की हुई विभाव की चेष्टाएँ श्रौर शारीरिक 
स्थितियाँ रस हैं। यह मत प्रस्तुत पुस्तक मे दसचॉ है । 

३--इसके बाद लोग कुछ और आगे बढ़े। उनका 
ध्यान प्रेम-पान्न की चित्तवृत्तियों की तरफ गया । उन्‍होंने सोचा 
-कि कोई भी नट या नटी हजार क्षटका करे; पर यदि वह 
उस पात्र के अंतःकरण के भावों को दर्शकों के सामने यथार्थ 
रूप मे प्रकट न कर सके, ते कुछ भी मजा नहीं आता। 
झतः यह मानना चाहिए कि न विभाव रस हैं, न अनुभाव, 
किंतु प्रेम श्रादि के आलंबन पथवा भ्राश्रय की जे चित्तवृत्तियाँ 
हैं, जिन्द्दे व्यभिचारी भाव कहा जाता है, वे बार बार 
अनुसंधान करने पर रसरूप बनती हैं। थे कहने छगे 
कि “व्यमिचार्येव तथा-तथा परिणमति” | अ्र्थात्‌ प्रेम 
आदि के आत्लंबन तथा शभ्राश्रय की चित्तवृत्तियों ही उस उस 
रस के रूप में परिणत दोती हैं। यह मत प्रस्तुत पुस्तक मे 
ग्यारहवाँ है। 


[ ७२ ] 

४--इसके अनंतर उनमे से बहुतेरे लोगों ने पूर्वोक्त मतों 
की प्राल्लोचना आरंभ की । उन्होंने सोचना शुरू किया कि 
इन तीनों मतों मे से कान ठीक है। अनेक नात्यों के देखने 
से उन्हें अनुभव हुआ कि किसी नाठ्य में सुंदर और सुख- 
ज्त पात्र, किसी मे उनके तयन-विमेहक अमिनय तथा किसी 
मे मनेभावों का मनोहर विश्लेषण मनुष्य को मुग्ध करता है, 
और किसी मे ये तीनो ही रददी होते हैं और कुछ मज़ा नहों 
श्राता। तब उन्होने यह निश्चय किया कि इन तीनो मे से 
जहाँ जे चमत्कारी हो, जे कोई दशक के छित को आह्ना- 
दित कर सके, वहाँ उसे रस कहना चाहिए, भैर यदि चम- 
त्कारी न दो ते तीनो मे से किसी का भी रस कहना उचित 
नहीं। वे कहने क्गे--“न्रिषपु य एवं चमत्कारी स एव 
रसः, अन्यथा तु त्रयोएपि न?। प्र्थात्‌ तोनों में से जो 
कोई चमत्कारी हो, वही रस है, श्रौर यदि चमत्कारी न हों 
ते तीनो ही रस नही कद्दत्ता सकते । यह मत प्रस्तुत पुस्तक 
मे श्राठवा है । 

“7 ]-पडेतराज इस मत के अजुसार भी मरत-सूत्र ( विभावाइु- 
सावव्यभिचारिसयेगाद्रसनिष्पत्तिः ) की व्याज्या करते है। यदि यह 
सत भरत-सूत्रों के बनने के अनंतर चढा हो।, ते मानना पड़ेया कि इस 
समय जो 'नाव्यशास्र' प्राप्त द्वाता है, वह भरत का बनाया हुआ नहीं 
है; क्योंकि उसमे स्थायी भावे! के रसरूप मानने का विस्तृत विवरण है 
और विभाव, अनुभाव अथवा ब्यमिचारी भाव इन तीनों मे से किसी 
एक को रस मानने का ते कहीं नाम भी नहीं है। और यदि यही 


[ ७३ | 

५-.-अब आगे चलिए। आगे यह वात हुई कि रस 
का अन्वेषण करते करते जब लोगों की दृष्टि मना-भाषों की 
'तरफ गई ते उनका भो विवेचन होने जगा । विवेचत करने 
पर विदित हुआ कि उन भावों मे से ८ अथवा < भाव ऐसे हैं कि 
जो नाथ्य भर में प्रतीत द्वोते रहते हैं; जैसे शंगार के अभिनय 
मे प्रेम, करुण के प्रभिनय में शोक इत्यादि। और शेष 
ऐसे विदित हुए कि जो कभो प्रतीत होते थे शौर कभी नहीं; 
जैसे हष, स्थृति, लज्ञा-पादि | जो भाव नाख्य भर से प्रतीत 
होते रहते थे, उन्हे ल्लोग स्थायी कहने लगे; क्योंकि वे स्थिर 
थे। और, जो कभी कभी प्रतीत होते थे, उन्हे व्यमिचारी 
अ्रथवा संचारी कहा जाने गा; क्योंकि वे व्यमिचरित होते 
रहते थे अर्थात्‌ कभी प्रेम के साथ रहते थे ते कभो शोक 
आदि के साथ। जब स्थायी भावों का ज्ञान हो गया तब 
उन्होंने पूर्वानुभूत रख को उन्ही के भ्रतुसार नो भेदें मे विभक्त 

* कर दिया, जिनका सविस्तर वर्णन प्रस्तुत पुस्तक मे है। 
जब यह विभाग हो। गया, तब लोगों को पूर्वोक्त चारों 
मतों की निस्सारता प्रतीत हुईं। उनको. ज्ञात हुआ कि 
विभाव, अनुभाव और व्यमिचारी भाव, इन तीनों मे से किसी 
एक को (फिर वह चमत्कारी हो अथवा अचमत्कारी ) 
नाव्यशासर मरत-निर्मित है तो कहना पड़ेगा कि यह व्याख्या कल्पित 


है। पर, इस झगड़े को ऐतिहासिकों पर छोड़ देने के सिवाय, इस 
समय, हमारे पास और कोई उपाय नहीं है। 


[ ७४ ] 
रसरूप मानना सर्वेथा भ्रम है। इसका कारण यह था कि 
जिस तरह व्याप्र आदि प्रायी भयानक रस के विभाव होते 
हैं, वैसे ही धौर, अद्भुत भार रोद्र रस के भी हो सकते हैं; 
क्योंकि वे जिस प्रकार भय फे आलबन होते हैं, उसी प्रकार 
उत्साह, आश्चर्य और क्रोध के भी भ्रालंबन हो सकते हैं। 
इसी प्रकार अश्रुपात आदि भी जैसे झऋंगार-रस फे अनुभाव 
होते हैं, वैसे ही करुण और भयानक रस के भी हो सकते हैं; 
क्योकि ये जिस तरह प्रेम के कारण उत्पन्न होते हैं, उसी तरह 
शोक प्लौर भय के कारण भी उत्पन्न हो सकते हैं। व्यभि- 
चारी भाव की भी यही दशा है; क्योंकि चिंता आदि चित्त- 
वृत्तियाँ जिस तरद्द शंगार-रस के स्थायी भावप्रेम्न को पुष्ट करती 
हैं, उसी तरह वीर, करुण और भयानक रसें से यथा-- 
उत्साह, शोक और भय को भो पुष्ट कर सकती हैं। अब यदि 
इन तोने मे से किसी-एक को रस माना जाय, ते जो प्रेम 
आदि एक ही चित्तवृत्ति की प्रत्येक नाव्य के पूरे भाग मे स्थिर 
रूप से प्रतीति होती है, वह न बन सके । अतः वे लोग यह 
मानने क्गे--विभावादयश्षय: समुदिता रसा:”। अर्थात्‌ 
विभावादिक तीनों इकट्टे रसरूप हैं, उनमे से कोई एक नहों। 
यह मत प्रस्तुव पुस्तक में सातवों है । 
६--स्थायी भावों का ज्ञान दे जाने और उसके अनुसार 
इसका विभाग स्थिर हो जाने के अनंतर विद्वानों ने उस पर 
फिर विचार किया श्र उन्हे पूर्षोक्त मत भी न जेंचा | उनका 


[ ७५ | 

विदित हुआ कि विभाव, अलुभाव “और व्यमिचारी भाव 
तीनों ही पृथक पथक्‌ अथवा सम्मिल्ित--किसी भी रूप मे-- 
रख नहीं हो सकते । क्योंकि जिस वस्तु का हम आखादन. 
करते हैं, जिससे हमें यह आनंद प्राप्त होता है, वह ये नहीं, 
कितु वही पूर्वोक्त चित्तवृत्ति है, जे भिन्न भिन्न चाध्यों मे मिन्न 
मिन्न रुपों में स्थिरतया प्रतीत होती रहती है। अर्थात्‌ यह 
निर्णीत हुआ कि प्रेम भ्रादि स्थायी भावों का नाम रस है । 
साथ ही यह भी विदित हुआ कि विभाव उस चितश्रवृत्ति को 
उत्पन्न करते हैं, अनुभाव उसके द्वारा उत्तन्न होते हैं और 
व्यभिचारी भाव उसके साथ रहकर उसे पुष्ट करते हैं। इस- 
लिये यह सिद्ध हो गया कि इन सब से स्थायो भाव ही प्रधान 
हैं; क्योंकि ये सब उसके डपकरणभूत हैं; और इन तीने के 
संयोग से वह रसरूप वसकर हमें झानंदित करता है। 
अर्थात्‌ नाव्यादिक मे हम इन तीनों से संयुक्त, परंतु 'इन सब 
से प्रधान, उसी चित्तवृत्ति का झास्वादन करते हैं । 

इसी विमशे को नाव्य-शास्ष के परमाचार्य मद्ठामुनि भरत 
ने दिखा है। उन्होने पूर्वोक्त सिद्धांत को अपने नाव्यशास्तर में 
अच्छी तरह स्थिर कर दिया, और--- 

#विभावानुमावव्यभिचारिसयेगाद्रसनिष्पत्ति: ।! 
यह सूत्र बनाया । यह सूत्र आज दिन तक प्रमाण साना 
जाता है और अनंतरभावी आचायीं ने इसी सूत्र पर अपने 
विचार प्रकट किए हैं । इस सूत्र का अथे यों है कि विभाव, 


[ ७६ ] 
अनुभाव और व्यभिचारी भाव के संयोग--पर्थात्‌ मिश्रए--से 
स्थायी भाव रसरूप बनते हैं। यद्यपि इस सूत्र की अनेक 
व्याख्याएँ हुई हैं, तथापि हमारी अरप बुद्धि के अतुसार यह 
प्रतीत होता है कि भरत मुनि ने इस सूत्र को पूर्वोक्त अथे मे 
ही लिखा है; क्योंकि नाव्यशासत्र मे इस सूत्र की जो व्याख्या' 
लिखी गई है, उससे यही बात सिद्ध होती है । 
भरत मुनि ने इस बात को दृष्टांत देकर स्पष्ट करने के लिये 
जे। दे! कोफ लिखे हैं, उन्हें इम' यहाँ उद्धृव करते हैं; क्योंकि 
इनसे उनके विचार विशदरूपेश विदित हो जाते हैं । वे ये हैं- 
यथा बहुह्व्ययुतैष्यअनेबहुमियु तम्‌ । 
श्रास्वाद्यन्ति धुझ्लाना भक्त भक्तविदों जनाः ॥ 
भावामिनयसंबद्धान्‌ स्थायिसावास्तथा बडुधाः। 
आस्वादयन्ति मनसा तस्मान्नाटयरसाः स्खताः ॥ 
अर्थात्‌ जिस तरह भात के रसज्ञ पुरुष अनेक पदार्थों से 
तथा अनेक दाल-शाक आदि व्यंजनों से युक्त भाव का खाते 
हुए उसका आस्वादन करते हैं, उसी प्रकार विद्वाव लोग भावों 
१-- को इरशतः ? अन्नाह--यथा नानान्यञ्ञवौषधिद्रव्यसंयेगा- 
ब्सनिष्पत्तिः। यथा हि गुडादिमिद्वच्यैष्येजनेराषधिमिश्व पाडवादयो , 
रसा निर्वैत्यन्ते,था नानाभावेपगवा अपि स्थायिने भावा रसत्वमाप्जुव- 
न्‍्तीति ।” इसका तात्पय्ये यह है कि जिस तरह गुड़ वगैरद चध्तुओ, 


भसाल्नों और धनिया-पेदीना बगैरह से 'बटनी वगैरह तैयार की जाती है, 
उसी तरह अनेक भावों से मिश्रित भी स्थायी भाव रस बन जाते हैं। 





[ ७७ | 
और अभसिनयें से संबद्ध स्थायी भावों का आखादन करते हैं; 
परत: ( उन्हें ) नाव्य के 'रस! कहा जाता है। 
इस तरह थह सिद्ध हुआ कि विभावादिक रसरूप 
नहीं, कितु इनसे परिष्कृत स्थायीभाव रसरूप होते हैं* । 


१--यद्यपि इसके आगे हमें अग्निपुराण का रस-विवेचन लिखना 
चाहिए था, क्‍योंकि भरत के अनंतर वही क्रम प्राप्त है; तथापि शुद्ध 
पुस्तक प्राप्त न द्वोने के कारण हम उस पर विशेष विवेचन न कर सके ।. 
इस कारण, जो बुछ हमें उपछण्घध हुआ उस भाग को-और उसके चथा- 
म॒ति भावार्थ को हम टिप्पणी मे दे रहे है। आशा है कि विद्वान्‌ ्ाग 
इसका यथामति उपयोग करेंगे । उसमे लिखा है-- 


अत्रं बढ परम सनातनमर्ज विभुम्‌ । 
वेदान्तेपु वदन्त्पेक॑ चैतन्य' ज्योतिरीश्चरम्‌ ॥ 
आनन्दः सहजस्तस्य व्यज्यते स कदाचन | 
व्यक्तिः सा तस्य चैतन्यचसत्काररसाहया ॥ 
श्राय्रस्तस्य विकारो य. से5हक्लार इति स्मृतः । 
तते5मिसानस्तन्नद॑ समाप्त सुवनन्रयम्‌ ॥ 
झभिमानादततिः सा च॒ परिपेषसुपेयुपी । 
व्यभिचार्यांदिसामान्याच्छ ब्वार इति गीयते ॥ 

' तदभेदाः काममितरे हास्याधा अप्यनेकशः । 
स्वस्वस्थायिविशेषाथ(व्थ) परिधा(पे)पस्चछक्षणाः | 
सर्वादियुणसन्तानाज्जायस्ते परमाव्मनः | 
रागाह॒व॒ति शज्बारो रेद्रस्तैक्षण्यात्मजायते ॥ 
वीरो5वष्टस्भन! सट्ढोचभूबीभत्स इष्यते । 
श््ाराज्जायते दास राद्रात्त करुणो रसः ॥ 


[ ७८ ] 


पूर्वोक्त भरत-सूत्र की सबसे पहली व्याख्या" आचाये 
भट्ट-लोल्लट ने लिखी है, जिसे मीर्मांसा के अनुसार मानता जाता 


चीराच्चारभुतनिष्पत्तिः स्थादू बीसत्सावूसयानकः । 

भ्यड्रारवीरकरुणरौद्ववीरभयानकाः ॥ 

बीभस्धाउुतशान्ताखया: खम्ावान्नतुरो (१) रसाः । 

लक्ष्मीरिव विना त्यागान्न वाणी भाति नीरसा ॥ 

अधाँत्‌ जिसे वेदान्तो मे अविनाशी, निदय, अजन्मा, व्यापक, भ्रद्वि- 

तौय, ज्ञानहप, खत' अफ्ाशमाच अथवा तसे।निवत्तक और सर्वेसमर्थ 
परब्रह्म कहा गया है उसमे खत-सिद्ध आनंद विद्यमान हैे। वह 
आनंद किसी समय प्रकट हे! जाया फरता है और उस आनंद की घह 
अभिव्यक्ति, चैतन्य, चमत्कार अथवा रस नाम से पुकारी जाती है। उसी 
( आनंद की अभिव्यक्ति ) का जो पहला पिकार है, उसे अहंकार माना 
जाता है। उस अहंकार से अभिमान झर्थात्‌ ममता उत्पन्न हेतती है, 
जिसमें यह सारी त्रित्रेकी समाप्त हो गई है। तात्पय्ये यद्द कि 
त्रिज्ेकी मे एक भी वस्तु ऐसी नहीं है, जे किसी न किसी की ममता 
की पात्न व हे। । उसी अभिमान--अथवा समता--से रति अर्थात्‌ प्रेम 
अथवा अनुराग उत्पन्न होता है। वही रति व्यभिचारी आदि भावों की 
समानता से--अ्रथांव्‌ समान रूप मे उपस्थित व्यनिचारी आदि भावे से-- 
परिपुष्ट होकर टू गार-रस कहलाती है। उसी के हास्यादिक अन्य सी 
अनेक भेद्‌ है । € वही रति सत्वादि गुणो के विस्तार से राग, तीए्षण ता, 
गये और संकेच इन चार रूपो से परिणत होती है; उनमे से ) 
राग से «| गार की, तीक्षणता से रैद्व की, गधे से वीर की और संकेच से 
बीमत्स की उत्पत्ति मानी जाती है। स्वभावतः ये चार ही रस हैं । पर, 
बाद में, श् गार से हास, राह से करुण, वीर से अदभुत और बीभत्स से 
अयानक की उत्पत्ति हुईं। ( और रति--अथवा अलुराग के अभाव रूप 


[ ७ ] 
है। उन्होंने इस सूत्र की व्याख्या यों की है--कामिनी 
आदि आलंबन विभाव रति आदि स्थायी भावों को उत्पन्न करते 
हैं, बाग-बगीचे भ्रादि उद्दीपन विभाव उन्हें दद्दौप्त करते हैं, 
कटाक्ष और द्वाथों के छटके आदि अनुभाव उनको प्रवीत 
होने के ये।ग्य बनाते हैं तथा उत्कंठा आदि व्यसिचारी भाव उन्हें 
पुष्ट करते हैं और तब वे रसरूप बन जाते हैं ।” इसके अनंतर 
उन्होंने इस पर यों बिमशे किया है कि यह सब ते ठीक 
है; पर यह सोचिए कि वे रति आदि स्थायी भाव, जिन्हें 
आप रसरूप मानते हैं, रहते किसमे हैं ? मान लीजिए 
कि आप एक ऐसे काव्य का अमिनय देख रहे हैं जिसमे 
दुष्यंत और शक्कुंवला के प्रेम'का वन है। अब यह बताइए 
कि वह प्रेम काव्य मे व्शन किए हुए दुष्यंत से संबंध रखता 
है, अथवा श्राप जिसका अमिनय प्रत्यक्ष देख रहे हैं, उस नट 


निर्वेद से शांत रस की उत्पत्ति हुईं; अर्धात्‌ रति-भाव से आठ रसे। की 
और रति के अभाव से एक रस की उत्पत्ति हुईं । ) इस त्तरह रसों के 
आगार, द्वास्य, करुण, रीद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अदभुत और शान्त 
ये ना नास हुए | जिस्न तरह किसी के पास ल्लक्ष्मी---अथांत्‌ संपत्ति--हो, 
पर बह किसी भी काम से उसका त्याग--अर्धात्‌ व्यय अथवा दान---न 
करता हो, तो वह शेमित नहीं होती, लोगों पर उसका कुद्ध भी प्रभाव 
नहीं पड़ता, ठीक वद्दी दुशा बिना रस की वाणी की होती है । अर्थात्‌ 
नीरस वाणी कृपण के धन के समान निरुपग्रेगी और प्रभावशून्य होती 
है, और उसका द्वोना न होना समान है । 

१--यहां से चार मतों के क्रम आदि काव्यप्रकाश तथा कान्यप्रदीप 
से लिए गए है ! 


[ ८० ] 

से ? आपकी विवश होकर यही कहना पड़ेगा कि दुष्य॑त 
से; क्योंकि काव्य में वर्णित शकुंतज्ञा का प्रेम नट से वे हे। 
नहीं सकता | पर यदि ऐसा माने ते। यह शंका उत्पन्न होती 
है कि भत्ता, उस दुष्यंत के प्रेम से सामाजिक (दर्शक ) 
लोगों को कैसे आनंद मिल्न सकता है; क्योकि दुष्यंत ते उनके 
सामने है नहीं, है तो नट। इसका समाधान वे यह करते 
हैं कि सामाजिक लोग नट को उसी रंग-ढंग का देखकर 
उस पर दुष्यंत का आरोप कर लेते हैं--अर्थात्‌ उसे झूठे दी 
दुष्यंत समझ लेते हैं। बस, इसी कारण उन्हें आनंद प्राप्त 
होता है, दूसरा छुछ नहीं । यह मत प्रस्तुत पुस्तक मे पॉचवों है। 

७--पर, इसी सूत्र के द्वितीय व्यास्याकार आचाये श्री- 
शंकुक को, जिनकी व्याख्या न्यायशास्र के अनुसार मानी जाती 
है, यह वात न जेंची । उन्होंने कहा--आप जे यह कह रहे 
हैं कि “रस मुख्यतया दुर्ष्यव आदि में रहता है, श्रौर नट 
पर उसका आरोप कर जिया जाता है” से ठीक नहीं | इसका 
कारण यह दे कि खींच खॉचकर नट पर रस का झाराप 
कर लेने पर भी दशेक लोगों से तो उसका कुछ संबंध हुआ 
नहीं; फिर बताइए, उन्हे किस तरह पझानेद झा सकता है? 
यदि आप कहें कि उन्हे नट के ऊपर शारोपित रस का 
ज्ञान होता है--वे उसे जानते हैं; परत: उन्हें आनंद का अतु- 
भव होता है, ते! यह भी ठीक नहीं; क्योंकि, यदि जान छेने 
मात्र से ही आनंद प्राप्त होता हो वे! यदि काई रस शब्द चोले 


[5१ ] 

और हम उसका अथे खमस ले, तब भी हमें वही आनंद 
प्राप्त होता चाहिए; क्योंकि हमे शब्द के द्वारा रस का ज्ञान 
ते हो ही गया। पर यदि आप यह युक्ति वतताएँ कि 
अनुभाव आदि के विज्ञान के वत्ष से जे नट पर आरोप किया 
जाता है, उससे आलनंदालुभव होता है, केवल शब्दादि के 
द्वारा ज्ञान से नहीं; तो यह भी उचित नहीं, क्योंकि चंद- 
नादि के छेप आदि से जे आनंद आता है, उसमे हमे न अलजु- 
भाव की आवश्यकता होती है, न विभाव की । फेवल स्पशें- 
द्विय से, अथवा भ्रन्य किसी इंद्रिय से, ज्ञान होते ही झानंद 
थाने लगता है। दूसरे, इस बात मे कोई प्रमाण भी नहीं है 
कि ऐसी कल्पना की जाय। रही भरत-सूत्र की वात, से 
वह दूसरी तरह भी ज्वगाया जा सकता है ! 

श्री शंक्रुक ने इस सूत्र का तात्ये यों समक्राया-- 
'“बिभाबादि के द्वारा नट से अनुमान किया जानेवाला और 
जिस दुष्य॑तादि का अलुकरण किया जा रहा है, उसमें रहने- 
वाला रति आदि स्थायी भाव रस है|” अर्थात्‌ मुख्यतया 
रस दुष्यंतादि मे ही रहता है; पर नट मे उसका झनुमान कर 
लिया जाता है । 

इस वात को स्पष्ट करने के लिये उन्होंने लिखा है कि जगत 
में चार धरह के ज्ञान प्रसिद्ध हैं; सम्यरज्ञान, मिथ्याज्ञान, सेशय- 
ज्ञान और साहश्यज्ञान। राम के देखनेवाले को जे! यह 
राम ही है, यही राम है! और यह राम है ही? ये तीतें 

न 


[८२ | 

ज्ञान द्वोते हैं, वे सम्यग्ज्ञान कहलाते हैं | इनमें से पहले-- 
अर्थात्त यह राम ही है! इस ज्ञान मे 'इसके राम न होने! का--- 
अर्थात्‌ “यह राम नही है? इस ज्ञान का निवारण द्वोता है। 
दूसरे--अर्थात्‌ 'यही राम है? इस ज्ञान से 'इसके अतिरिक्त 
अ्रन्य किसी के रांम होने” का--अर्थात्‌ 'राम और कोई हैः 
इस ज्ञान का--निवारण दोता है। भौर तीखरे प्रांत 'यह 
राम है ही? इस ज्ञान से 'स्वधा रास न होने! का---अर्थात्‌ 
“यह राम है ही नही” इस ज्ञान का निवारण होता है। इन्ही 
तीनों निवारणों को संस्कृत में क्रमशः अयेगव्यवच्छेद, अन्य- 
योगन्यवच्छेद तथा अत्यंतायोगव्यवच्छेद कहते हैं। मिथ्या- 
ज्ञान उसे कहते हैं, जिसमे पहलन्ते से 'यह राम है? ऐसा जान 
पड़ने पर भी पीछे से जान पड़े कि 'यह राम नहीं है?!। यह 
राम है अथवा नहीं? इस परस्पर विरोधी ज्ञान को संशय- 
ज्ञान कहा जाता है, और यह राम के समान है? इस खमा- 
नवा के ज्ञान को साद्वूश्यज्ञान कहते हैं। 

इन चारों ज्ञानों के अतिरिक्त एक और भी ज्ञान होता 
है, जे कि जगत्‌ में प्रसिद्ध नही है; जेसे किसी घोड़े फा 
चित्र देखकर “यह घोड़ा है? ऐसा ज्ञान | -वस, इसी जान 
के द्वारा सामाजिक लोग नट को दुष्यंत आदि सममक बेते 
हैं, और फिर उन्हे सुंदर काव्य के अनुसंधान के वल्ल से तथा 
शिक्षा और अभ्यास के द्वारा उत्पन्न की हुई नट की कार्यपद्धुता 
से, स्थायो भाव के कारण, कार्य श्रार सइकारी, जिन्हे विभाव, 


[ परे ] 

अनुभाव और व्यमिचारी भाव कहा जाता है, ऋत्रिम होने पर 
भी स्वाभाविक प्रतीत होने लगते हैं। श्रर्थात्‌ सामाजिकों 
को उनके बनावटीपन का बिल्कुल्न खयाल्न नहीं रहता; और 
तथ वे लोग नह मे स्थायी भाव का अनुमान कर लेते हैं | बस, 
उस भ्रनुमान का नाम ही रस का भआरास्वादन है; और बह 
भ्रास्वादन सामाजिकों को द्वोता है; भ्रतः यद्द कद्दा जाता है 
कि रस सामाजिकों मे रहता है । 

पर, यहाँ एक शंका दो सकती है। वह यह कि 
किसी भी पदायथे का प्रत्यक्ष होने पर ही आनंद द्ोता है, अलु- 
मान मात्र से नहीं; अन्यथा हम सुख का अनुमान करने पर 
भी सुखी क्यों नहीं हे! जाते। इसका समाधान वे यों करते 
हैं कि रति आदि स्थायी भावों मे कुछ ऐसी सुंदरता है कि 
उसके बल्ञ से बे हमे अत्यंत अ्रभीष्ठ अथवा परम सुखरूप प्रतीत 
होते हैं; अतः यह मानना पड़ता है कि वे अ्रन्यान्य अनुमेय 
पदार्थों से विज्कक्षण हैं, उनमे यह नियम नहीं लगता । तात्पर्य 
यह कि स्थायी भावों की सुंदरता का सामाजिकों पर 
ऐसा प्रभाव पड़ता है कि वे उनका भ्रतुमान करने पर भी आर्- 
दित हो उठते हैं भ्रौर नट को प्रत्यक्ष देखने पर भी यह निश्चय 
नहीं कर सकते कि यह दुष्यंत नहीं है। 

८--भरत-सूत्र के ठृतीय व्यास्याकार आचाये भरद्टननायक 
को, जिनकी व्याख्या सांख्य-सिद्धांत के अनुसार मानी जाती 
है, यह बात भी न जेंची । उन्होंने कहा--श्री शंक्ुक का यह 


[ ८४ ] 

कहना कि “रख का श्रनुमान किया जाता है”, उचित नहों । 
क्योंकि, संसार में जे यह बात प्रसिद्ध है कि प्रलक्ष ज्ञान से 
आनंद प्राप्त होता है, भ्रनुमानादि से नहीं, उसका तिरस्कार 
करके यह करपना करना कि “रति-आ्रादि की सुंदरता के 
बल से अनुमान करने पर भी आनंद प्राप्त हो जाता है” ठीक 
नहों । यदि कहो कि सूत्र का अथे इसी तरह पलुकूल होता 
है, तो यह भी ठोक नहीं; क्योंकि उसका अर्थ दूसरी तरह भी 
ठीक किया जा सकता है। 

अतः यह मानना चाहिए कि काव्य की तीन क्रियाएं 
हैं---अर्थात्‌ वह तीन हरकते पैदा करता है। उनमे से एक 
है भ्रभिधा, जिसके द्वारा काव्य का भ्रथे समझा जाता है; 
दूसरी है भावना--अ्र्थात्‌ उस अथे का भ्रनुसंघान, जिसके 
द्वारा काव्य मे वरशित नायक-नायिका आदि पात्रों की विशेषता 
निवृत्त हे जाती है और वे साधारण बनकर हमारे रसा- 
स्वादन के अनुकूल हो जाते हैं, शलर तीसरी है भेग--प्र्थात्‌ 
आत्मानंद मे विश्राम, जिसके द्वारा हम रस का अलुभव करते 
हैं, अथवा जे स्वयं ही रसरूप है। इस तरह काव्य की 
क्रियाओं से ही हमारा सब कार्य सिद्ध दो जाता है, न आरोप 
की भ्रावश्यकता रहती है, न अनुमान की । यह मत श्रस्तुत 
पुस्तक मे दूसरा है । 

<--पर, आचाये अ्सिनव गुप्त, ने, जे ध्वन्यालोक! की 
ल्ीचन” नामक व्याख्या फे निर्माता हैं, जिनका साहित्यशास् 


[ ८४ ] 
के विद्वानों मे बहुत ऊँचा स्थान है और जिन्हें इस सूत्र के चतुर्थ 
व्याख्याकार भी कह्दा जा सकता है, इस मत को भी पसंद न 
किया । उन्होंने कहा--आपने जे भावना? कौर भोग? नामक 
दे! क्रियाओं की कल्पना की है, उसमे कोई प्रमाण ते है नहीं, 
कोरी मनगढ़ंत है। फिर भला इसे काई कैसे ख्ीकार करेगा ? 
झत: यो मानना चाहिए कि “विभाव, अ्रतुभाव प्लौर 
व्यमिचारी भावों से अभिव्यक्त रति झ्रादि स्थायी भाषों का 
नाम रस है” | प्रस्तुत पुस्तक मे प्रथम मत के 'कः और 'खं? 
भागों मे इसी सिद्धांत का, किचिन्मात्र मतभेद से, ज़विस्तर 
प्रतिपादन किया गया है, सो आप इनका विशेष विवरण वहाँ 
देख ले। आज दिन तक रस के विषय मे यही सिद्धांत प्रामा- 
णिक माना जाता है कर मस्मट भट्ट प्रश्ति साहित्य-शांख् फे 
महाविद्वान्‌ इसे परम-आदरपूर्वक खोकार फरते हैं । 
अब रहा प्रथम मत का गः भाग । छउसमे पंडितराज 
ने यह सिद्ध किया है कि पूर्वोक्त 'कः शलौर 'खः भर्तें में रति 
आदि के साथ भआत्मानंद ते आपका भी क्गाना ही पड़ता 
है, उसफे लगाए बिना ते छुटकारा नहीं; और यह भी सिद्ध ही 
है कि रस झ्ानंद से शून्य नही है; तब जो श्रुतियों में आानंद- 
भय श्रात्मा को रसरूप माना गया है, उसके अनुसार, आनंद- 
सहित रति आदि की श्रपेज्ञा, रति आदि से उपहिित आनंद को 
ही रसरूप मानना उचित है। पक्ौर उनके हिसाब से यही 
वास्तविक मत है। | 


[ ८६ ] 

इसके अनंतर इस विषय से दे! मत और “उत्पन्न हुए हैं। 
उन्ममे से-- 

१०--नवीन विद्वानों का कथन है कि रस को आात्मा- 
संद सहित तथा वासनारूप मे विद्यमान स्थायी भावों के रूप में 
मानना ठीक नही; कितु थों मानना चाहिए कि जब इमें 
फाव्य सुनने अधवा नाथ्य देखने से विभाव झादि का ज्ञान दो 
जाता है, तब हम व्यंजनावृत्ति के द्वारा, शकुंतल्ला आदि फे साथ 
दुष्यंव भादि के जो प्रेम भादि थे, उन्‍हें जान छोते हैं। उसके 
भ्रनेतर सहृदयता के कारण हम उन सुने अथवा देखे हुए 
पदार्थों का बार बार प्रतुसंधान करते हैं। वही बार बार 
अनुसंधान, जिसे भावना कट्दा जाता है, एक प्रकार का दोष 
है। उसके प्रभाव से हमारा अंतःकरण प्रज्ञान से भ्राच्छा- 
दित दो जाता है, झौर तब उस अज्ञानाइत अतःकरण मे, 
सीप मे चॉदी की तरह, अनिर्वचनीय रति आदि स्थायी भाव 
उत्पन्न हो जाते हैं और उनका हमें आत्म-चैतन्य फे द्वारा अबु- 
भव होता है। बस, उन्ही रति आदि का नाम रस है। यह 
मत प्रस्तुत पुस्तक मे तीसरा है । 

ओऔर-- 

११--दूसरे विद्वानों का यह कच्दना है कि न ते! दुष्य॑ंत् 
आदि के रति आदि को समभने के लिये व्यंजनावृत्ति की 
पझावश्यकता है और न अज्ञानाइत अतःकरण मे अनिर्वेचनीय 
रति भादि की कल्पना की। कितु यों मानना चाहिए कि 


[८७ ] 

हम नट की अथवा काव्य-पाठक की चेष्टा श्रादि के द्वारा शर्कु- 
तल्ना आदि के साथ जो दुष्यंत आदि का प्रेम था, उसका प्जु- 
मान कर लेते हैं, और तब पूर्वोक्त भावनारूपी दोष से हम 
अपने को दुष्यंत ग्रादि समझने लगते हैं। परिणाम यह होता 
है कि हमारे अंतःकरण मे ऐसा श्रम उत्पन्न हो! जाता है कि 
हम शक्कृंतला आदि से जो व्यक्ति प्रेम भ्रादि रखता है, उससे 
अभिन्न हैं। बस, इसी भ्रम का नाम रस है। यह मत प्रस्तुत 
पुस्तक मे चौथा है। थे हैं रस के विषय में ११ मत | 


अंतिम दे।| मतें की अमान्यता का कारण 


पर, इन अंतिम देनें मतें का बिल्कुल प्रचार नहीं हुआ । 
इसका कारण यह प्रतीत होता है कि एक ते सभी काव्य 
सुननेवालों अथवा नाटक देखनेवालो को रस फा आखादन 
नही होता; अतः यह मानना ही पड़ता है कि जिनमे वासना- 
रूप से रति भादि विद्यमान होते हैं, उन्हें ही रसानुभव होता 
है। अतएव लिखा गया है कि-- 
सवासनानां सम्यानां रसस्यास्वादर्न भवेत्‌ । 
निर्वासनास्तु रह्ञान्तःकाष्ठकुब्याश्मसनिभाः ॥ , 
भ्र्थात्‌ ( नाटकादि देखने पर भी ) जो सभ्य वासनायुक्त 
दवोते हैं, अर्थात्‌ जिनमे वासनारूप रति आदि भाव रहते हैं, 
उन्हें ही रस का आ्राखादन द्ोता है; प्लौर जिन लोगों मे वह 
वासना नही द्ोती, वे तो नाव्यशाल्ा के अंतर्गत लकड़ो, दीवार 


[ ८८ ] 

और पत्थरों के समान हैं, यदि उन्हें कुछ मजा भावे ते इन्हें 
भी आ सकता है। 

उन वासनारूप रति आदि को छोड़कर अ्रनिर्वचनीय 
रति आदि की कल्पना निरथेक है। दूसरे, रस को सीप की 
चॉदी की वरह् मानना सहृदयों के हृदय के विरुद्ध भी है; 
क्योंकि रस की प्रतीति बाधित नही है। श्र्थात्‌ उसकी प्रतीति 
होने के अनंवर हमे यह बाघ नहीं होता कि भ्रत्न तक जिन 
रति आदि और आजंद की प्रतीति हो रही थी, वे छुछ 
हैं ही नही । 

इसी तरह रस को अ्रमरूप मानना भी शाल्ल भौर अनुभव 
देने प्रभाणों से शून्य है; क्योंकि न ते अयथार्थ ज्ञान को 
किसी शाश्ल मे ही आलंदरूप मान्रा गया है और न अज्ुभव 
ही इस बात को स्वीकार करता है। सहृदयों के अनुभव से 
ते यह सिद्ध है कि रस का आनंद के साथ अमेद संबंध 
भाने चाहे भेद सबंध, पर बह उससे रहित है नही । 

उपसंहार 

अब हस पूर्वोक्त मतों का सिंद्ावल्लोकन करते हुए इस 
विषय को समाप्त करते हैं । 

१--ल्ोगों ने प्रारम्भिक दृश्य-काव्यों का अभिनय देखकर 


सबसे प्रथम यह निम्चय किया कि इन अमिनयों के देखने 
से हमे जो आनंद प्राप्त होता है, वह रति आदि भाषे। के 


[ पर्ड ] 

आलंबन अर्थात्‌ प्रेमपात्र आदि में, जे! नट झ्ादि के रूप मे 
हमारे सामने उपस्थित होते हैं, रहता है | 

२३---तदनंतर उन्होंने सोचा कि उनके हाव-भावों झयौर 
चेश्टाओं में, जिन्हें नट आदि प्रकाशित करते हैं, वह रहता है । 

३--फिर उन्‍होंने समझा कि उनकी मनोवृत्तियों में, जो 
नट आदि फे अभिनय के द्वारा ज्ञात द्वोती हैं, वह रहता है | 

४--पीछे से बिदित हुआ कि इन तीनों मे से जे चम- 
त्कारी द्वोता है, उसमें बह रहता है | 

५--बाद मे पता क्गा कि इकट्ठे तीनों में, अर्थात्‌ विभाव, 
श्रनुभाव और व्यभिचारीभाव के समुदाय में, वह रहता है। 

६--इस के प्रनंतर भरत मुनि, अ्रथवा उनके पूर्ववर्ती किसी 
भ्राचाये, ने यह स्थिर कर दिया कि यह प्रानंद इन तीनों 
के अतिरिक्त, जिन्हें रथाथी भाव कहा जाता है, उन चित्त- 
वृत्तियों मे रहता है और उनका साथ होने पर ये ( विभाव, 
अनुभाव घोर व्यसिचारी भाव ) भी आनंद देने लगते हैं | 

तत्पश्चात्‌ इस मत की व्यास्याएँ होने ज्षगीं। व्याख्याकारों 
ने इस बात का ते मान लिया कि यह भ्रानंद रति आदि 
चित्तवृत्तियों मे रहता है; पर अब यह खेज शुरू हुई और ये 
प्रश्न उपस्थित हुए कि वे चित्तवृत्तियोँ किसकी हैं, काव्य में 
चर्शित नायक-नायिका क्षादि की भ्रधवा स्रामाजिकों की ? कौर 
यदि नायक-नायिका भ्रादि की हैं ते नट को भ्रसितय करते 
. देखकर सामाजिकों को उनसे कैसे आनंद मित्रता है ? फिर 


[ ० ] 

इन प्रश्नों के प्रत्युर्तरों की घारी आई और पहले पहल पुर:- 
स्फूत्तिक दृष्टि से यह समझता गया कि ये चित्तवृत्तियाँ फाव्य 
मे वर्णित नायक-नायिका आदि की हैं। इस प्रकार पहल्षे प्रश्न 
का ते प्रत्युत्तर हो गया। अब रहा वूसरा प्रभ। उसका 
प्रत्युत्तर सबसे पहले इस सूत्र के प्रथम व्याख्याकार आचाये 
भट्ट-लेल्लट ने यों दिया कि सामाजिक ल्लोग उन चित्तवृत्तियों 
को नट पर आरोपित कर लेते हैं ग्रैर उन आरोपित चित्त- 
वृत्तियों के ज्ञान से सामाजिकों को आनंद प्राप्त होता है । 

७--श्री शकुक ने इस मत का खंडन किया और 
कहा --सामाजिक लोग उन चित्तवृत्तियों का अनुमान कर 
लेते हैं। पर, 

८--भट्टनायक ने इन बातें को खोकार न किया; उन्होंने 
फहा--नही, तुम्हारा कद्दना ठोक नहीं । अ्रसली बात यह है 
कि किसी भी काव्य के सुनने अथवा उसका अभिनय देखने से 
तीन कांम होते हैं--पहले उसका अथे समभ मे आता है; 
तदनंतर उस अथ का चिंतन किया जाता है, जिसका हमारे 
ऊपर यह प्रभाव होता है कि हम उसमे सुनी और देखी हुई 
वस्तुओं के विषय मे यह नहीं समर पाते कि वे किसी दूसरे से 
संबंध रखती हैं अ्रधवा हमारी ही हैं; और उसके बाद हमारे 
सत्त्गगुण की अधिकता से रजोगुण क्र तमेगुश दब जाते हैं 
कौर हम आत्मचैतन्य से प्रकाशित एवं साधारण रूप मे उप- 
स्थित रति आदि भावों का अनुभव करवै हैं। भ्र्थात्‌ जिन 


[ 5१ ] 

रति आदि भावों के अनुभव से यह आनंद प्राप्त होता है, वे न 
नायक-नायिका आझादि के होते हैं, न सामाजिकों के, वे तेः 
चिल॒कुल साधारण होते हैं, उनके विषय मे सामाजिकों को 
कुछ ज्ञान नही द्वोता कि वे किसके हैं । 

<- -अमिनवगुप्त और मम्मट-भट्ट को यह बात भी न जेंची | 
उन्होंने भट्ननायक का खंडन करते हुए कहा कि विभाव, अनु- 
भाव झौर व्यमिचारी भावों के द्वारा एक अत्ीकिक क्रिया 
उत्पन्न होती है। उससे, झ्रथवा यों कह्िए कि विभावादिकों के 
आखादन के प्रभाव से ही, हमारे झात्मचेतन्‍्य का आवरण-- 
भ्रज्ञान--दूर हे जाता है| तदनंतर यह होता है कि हमारे हृदय * 
मे, सांसारिक अनुभवों फे कारण, वासना रूप से विद्यमान रति 
आदि का उस आत्मचैतन्य के द्वारा प्रकाश होता है और उस 
भ्रानंदरूप झात्मचेतन्यसद्दित उन रति आदि भावों का यह 
श्रानंदानुभव है। अर्थात्‌ यह अनुभव साधारण रूप से हुए रति 
आदि का नहीं, कितु आात्मानंद सहित और सामाजिकों के 
हृदय मे वासनारूप से विद्यमान रति भ्रादि का है। 

पर, पंडितराज का यह बात भी पसंद न आझाई | उन्होंने 
कहा कि कौर सब बात श्रापकी ठोक है; पर जब आपने यह 
खीकार कर लिया है कि इस अनुभव मे रति आदि का और 
आत्मानंद का साथ है, तब उस झानंद को गोण और रति 
झआादि को प्रधान मानना उचित नही । झतः यह मानना चाहिए, 
जो श्रुति-सिद्ध भी है, कि यह आनंद प्रात्मरूप ही है। हो, 


[ २ ] 

इतना श्रवश्य है कि वह आनंद रति आदि से परिच्छिन्न होकर 
प्रतीव द्वोता है, समाधि की तरह भ्रपरिच्छिन्न रूप में नहीं | 

इसके भनंतर जो दे! मत उत्पन्न हुए हैं, उनमें से एक मे-- 

१०--इस झआानंद को भ्रात्मचैदन्य से प्रकाशित घर श्रांति 
से उत्पन्न रति आदि का माना गया है। और दूसरे मे-- 

११--फेवल भ्रमरूप । 

गुण 
भरत और भामह 

अब इसके शभ्रागे प्रस्तुत पुस्तक में विवेचनीय विषय हैं 
गुण । गुणों के विषय मे प्रधानतया दे! मत हैं--एक प्राचीनों 
का कर दूसरा नवीनों का। प्राचीनों ने श्लेष , प्रसाद, समता, 
समाधि, माधुरय, भ्रेज, सुकुमारता, अधेव्यक्ति, उदारता और 
कांति ये दश गुण माने हैं। इनके आविष्कारक भरत अथवा 
उनके पूर्ववर्ती कोई झ्ाचाय हैं। पर भामह' ने अपने पंथ में 
इनमे से फंवत्त तीन ही गुणों के भाम लिखे हैं, श्र आगे 
जाकर काव्यप्रकाशकारादिकों ने प्राचीनों के सब गुणों का 

१--श्लेप. प्रसाद: समता समाधिमांधुयमेजः पद्साकुमायम्र । 
अथैस्य च व्यक्तिददारता च कान्तिश्व कान्या्थंगुणा दशेते ॥-- 
नाव्यशात्र । 

२---'माधुयस भिवान्डुन्त, ध्रसाठ॑ च सुमेघलः | समासवन्ति भूयांसि 
न॒पदानि श्रवुक्षते। केचिदेजेडमिघधित्सन्तः समस्यन्ति घहुल्मपि (? 
( भामह का 'काव्यारुडूार ) 


[ #$ ] 
इन्हीं मे समावेश कर दिया है; वे हैं माघुये, ओेज और प्रसाद । 
से इस सबका सारांश यह हुआ कि दशगुणवाद के आवि- 
प्कारक हैं भरत और त्रिगुणवाद के हैं भामह। 
प्राचीनों के मतभेद 

यद्यपि प्राचीनों को दशगुणवादी कद्दा जाता है, तथापि 
उनमे परस्पर बढ़ा मतसेद है। सच पूछिए ते काव्यप्रकाश- 
कार के पहल्ले इस विषय में अराजकता ही रही है प्लौर जिसकी 
जैसी इच्छा हुई, उसने उसी प्रकार के क्कक्षण बनाकर उतने ही 
गुण मान लिए हैं। उस झराजकता के समय का भी कुछ 
दिग्दशन यहाँ कराया जाता है । 

शुणों के विषय मे प्राचोनों के पॉच मत विशेषतः प्रसिद्ध हैं 
पऔर उनके प्रवर्तक क्रशः भरत, अप्रिपुराण, दंडी, वामन और 
भोज हैं। उनमे से भरत के गुण हम गिना चुके हैं| 

अभिपुराण ने श्लेष' , छातित्य, याम्भीय, सौकुमाये, उदा- 
रता, सती (? ) भर यैगिकी ( ९ ) इस तरह सात शब्द- 
गुण; माधुये , संविधान, कोमज्षता, उदारता, प्रौढ़ि और सास- 
यिकत्व इस तरह छः अर्थगुण; भर प्रसाद, सौभाग्य, यथा- 

१--शल्षेषो ल्वालित्यगाम्भीयें सैकुमायमुदारता। सत्येव (१) 
यैगिकी (१) चेति युणाः शब्दस्य सप्चा । 

२--माछुय संविधान च कोमलत्वमुदारता । प्रौढिः सामयिकत्व॑ 
च तदूसेदाः पट चकासतति । 

,. रै--तस्य असादः सैभाग्य' यथासंख्यमुदारता । पाको राग इति 

भाशेः पद (अ)पन्न (१ ४ ) प्रपन्लिताः। 


[ ञचं४ ] 
संख्य, उदारता, पाक और राग इस तरह छ: उभयगुण---भर्थात्‌ 
शब्द और अ्थे दोनों के गुण; यों सब मिलाकर “न्नोस गुण 
गिनाए हैं। पर इनमें से कुछ भरतादि के गुणों में समाविष्ट, 
कुछ अप्रचलित कौर शुद्ध पुस्तक की अप्राप्ति के कारण अस्पष्ट से 
श्रत: उन्हे प्रपंचित करके हम इस' भूमिका का आकार 
बढ़ाना नहीं चाद्दते | 
दंडी ने नाप और संख्या ते भरत की ही रखी है; पर 
उनके क्रम और लक्षणों में बहुत कुछ फेर-फार फर दिया है | 
पर उनमे से भी कुछ अप्रचलित और अधिकांश वामन के गुयों 
में समाविष्ठ हो जाते हैं; अत: उनका विस्तार भी निरधेक है । 
वामन ने इन गुणों का बहुत द्वी विशद विवेचन किया है 
और “काव्यप्रकाश'कार भ्रादि ने उसे ही प्राचीनों का मत माना 
है। थद्द तो नहीं कद्दा जा सकता कि भरत पर दंडी के 
लक्षित गुणों का उनमे सर्वीश मे संग्रह हो जाता है, पर इसमें 
संदेह नहीं कि श्रधिकाँश में वे उनमे समाविष्ट दे जाते हैं | 
रसगंगाधर मे जो भ्रत्यंत प्राचोनों के दस शब्दगुण और दस 
अधेगुण लिखे हैं, वे बामन के मत से ही संग्रहीव किए गए हैं। 
से उनके लक्षणों प्लौर उदाहरणों का आप देख द्वी लेगे। 
अब रहे सोजराज' | उन्होंने वामन के देख शब्द- 
गुणों के अतिरिक्त उदात्तता, ऊर्जितता, श्रेयान, सुशब्दता, 





१--रलेपः प्रसाद: समता माधुय सुकुमारता । 
अर्थव्यक्तिसथा कान्तिरुदारत्वम्लुदात्तता 


[ <४ ] 
सूच्मता, गंभीरता, विस्तर, संक्षेप, संमितत्व, भाविक, गति, 
रीति, उक्ति भर प्रौढि इस तरह चैदह प्रन्य गुण मानकर 
इनकी संख्या चैबीस कर दी है। पर इन सब का समावेश 
प्राय: वामन के गुणों मे हे जाता है, अतः इसे आप केवल 
नाम-भेद सा ही समक्तिए । 
इन सबके अनंतर वाग्भट ने दंडी के, और पीयूषवर्ष ने 
भरत के, मत का पुनः स्पशे किया है। उनमे से वाग्भट ने 
ते प्राय: दंडी के शु्यों का अनुवाद कर दिया है, से उसे ते 
अतिरिक्त मत कटद्दा ही नहीं जा सकता। हा, पीयूषवर्ष ने 
भरत के दस गुणों मे से कांति को झूंगार-रस में और अधथे- 
व्यक्ति का प्रसाद-गुण मे समाविष्ट करके उन्हे आठ ही रख 
लिया है, और एकाघ गुय के लक्षण में भेद भी कर दिया है; 
पर कोई नई बात उसमे भी नहीं है । 
इस सबका तात्पये यह हुआ कि भरत ने दस गुण माने, 
अग्निपुराण ने उन्नीस, भामह ने तीन, दंडी ने पुनः दस, वामन 
ने वीस, भोजदेव ने चेबीस, वाग्भट ने पुनः दस और पीयूषबर्ष 
ने आठ । इसके अतिरिक्त प्रत्येक आचाये ने इनके लक्षणों मे 





ओजस्तथाअन्यदौजित्यं प्रेयानथ सुशब्ूता । 

तद्वत्‌ समाधिः सैक्ष्म्यंच गास्भीयसथ विस्तरः ॥| 

संक्षपः संमितत्व॑ च भाविकत्व' गतिखथा । 

शीतिरुक्तिस्तथा श्रोढिः .. ...., ...-- -«»- ॥ 
--सरस्वतीरकदाभरण । 


[ 5४६ | 

भी इच्छाउुसार फेर-फार कर दिया है। इससे यह निष्कर्ष 
निकलता है कि प्राचोनों ने अपने पूर्ववर्तो आचायों के विचारों 
पर यथोचित विमशे नही किया और जिस समय जिसे जो 
कुछ सूफ पड़ा, तदनुसार बे गुशो मे अधिकता, न्‍्यूनता अथवा 
लक्षय-भेद करते चले गए। पर इन सबने अधिकांश में गुग्ों 
का नामकरण भरत के अनुसार ही रखा है; अत: इन्हे दश- 
गुणवादी अथवा भरत के श्रन्मयायी कद्दा जा सकता है । 


मतभेदो की निववत्ति 


बारहवी शताब्दी मे काव्यप्रकाशकार महामति मम्मट 
का यह भ्रराजकता खटकी । उन्होंने खूब विमशे करके भामह 
का पक्ष लिया, और उन्हीं तीन शुणयों मे, उस' समय मे सर्वा- 
घिकरूपेण प्रचलित, वामन के गुणों में से अधिकांश का समा- 
वेश कर दिया और शेष को काट-छॉटकर ठीक-ठाक कर 
दिया । यह काट-छॉट प्रस्तुत पुस्तक मे आा चुकी है, सो आप 
उसे देख ही लेगे । परिणाम यह हुआ कि भ्रग्निपुराण का 
सत ते पहले से ही प्रचलित नहीं था, और भरत से क्षेकर 
भेज तक के सब गुण प्राय: वासन के मत मे संग्ृहीत हो 
चुके थे, सो सबके सब उड़ गए श्र उन्हीं तीन गुयों का 
प्रचार रह गया । इसके बाद भी वाग्भट ने दंडी के मत से 
और पीयूषवर्ष ने भरत के मत से गुणों के लक्षणादि लिखे; 
पर वे काव्यप्रकाशकार की युक्तिपूर विवेचना के सामने न टिक 


[ <७ ] 
सके और साहित्यदर्पणकार एवं रसगगंगाधघरकार ने इसी पक्ष 
को विस्ृष्ट करके स्थिर कर दिया। 


४ गुणों का स्थान 


यह ते हुईं मत-भेद की बात । अ्रव यह सोचिए कि 
साहित्य-शाञ्र मे शु्ों का स्थान क्‍या है ? इस विषय मे 
वासन और भेजदेव दोनों कहते हैं-- 

युवतेरिव रूपमञ्ञ ! काव्य स्वदते शद्धगु्ण तदप्यतीव । 

विद्वितप्रणयं॑ निरन्‍्तरासिः सदलद्डारविकल्पक्ल्पनामिः ॥ 

यदि भवति वचर्च्युद गुणेम्यो वपुरिव यै।वनवन्ध्यमड् नायाः। 

अपि जनदयिताबि टुसंगत्द नियतमछक्कुरणानि सपश्रयस्ते ॥ 

अर्थात्‌ काव्य युवती के रूप के समान है; क्योंकि वह 
भी प्रच्छे गुणों ( ज्ञावण्य श्रादि माधुये आदि ) से युक्त 
झऔर एक के बाद एक भाए हुए अनेक अलंकारों की कल्प- 
नाओं से संबद्ध देकर भानंद देता है। इसका तात्पये 
यह है कि जिस तरह स्रो के रूप के लिये ल्ञावण्यादि की 
ग्लौर आभूषणों की प्रावश्यकता है, उसी प्रकार काव्य मे भी 
गुणों भ्रार अलंकारों की भ्रावश्यकता है। पर यदि कवि की 
उक्ति गुर्णा से रहित द्वो तो कामिनी के यैवन-रहित शरीर 
की तरह होती है; प्तः गुर्णा का होना काव्य के त्िये 
अत्यावश्यक है! इसके अतिरिक्त भाजदेव ने ते यह भी 
लिखा है कि-- 

छ 


[ ८ ] 
झअल्कृतमपि अ्रन्य' न काब्य' गुणवजितम | 
गुणये।गस्तयेसुख्ये। गुणालुछारयेगयेः ॥ 

अर्थात्‌ श्रत्कारों से युक्त भी गुणों से रहित काव्य सुनने 
के योग्य नहों होता; अतः काव्य के गुणों और अल॑कारों से 
थुक्त होने की अपेक्षा गुणों से युक्त होना मुख्य है। 

काव्यप्रकाशकारादिकों का भी यही मत है कि गुण 
सीधे रसें को उत्कृष्ट बनाते हैं और अल्तंकार शब्दों और पअर्थों 
के द्वारा, अतः गुण अल्लंकारों से अ्रधिक अपेक्षित हैं । 

इस तरह यह सिद्ध हुआ कि साहित्यशास्त्र में गुणों का 
स्थान अलंकार से ऊँचा और रसादि व्यंग्यों से नीचा है, 
और वे अलंकारो की अपेक्षा अधिक आवश्यक हैं | 

गुण क्‍या वस्तु है 

झब हस इस बात का विचार करेंगे कि शुण हैं क्‍या वस्तु; 
उन्‍्द्दे लोग अब तक किस किस रूप मे समभते शआ्राए हैं । 

महामुनि भरत देषो का वर्णन करने के अनंतर कहते 
हैं कि “गुणा विपयेयादेषाम!?”। अर्थात्‌ दोषों के विप- 
रीत जो कुछ वस्तु है, वे गुण हैं । 

शग्निपृराण मे लिखा है कि “जा' काव्य मे बड़ी 
भारी शोभा को अनुग्ृहीत करता है, अर्थात्‌ पदावली को शोभा 


१--थ काब्ये महतीं छायामनुय्रहत्यसो गुण” । 


[ *डई ] 

प्रदान करता है, वह शब्दगुश द्वोता है; जो शब्द से प्रति- 
पादित की जानेवाल्ली वस्तु को उत्कृष्ट बनाता है, वह अधे-गुण 
होता है; और जे।' शब्द और प्रथ दोनों को उपकृत करता है, 
वह उम्यगुण द्वोता है । 

दंडी ने इन्हें “विशिष्ट' रचना के प्राण” भाना है; श्रौर 
घासन का कहना है कि-- काव्य मे जो शोभा होती 
है--जिसके कारण कान्य को काव्य कहा जाता है, उस शोभा 
के उत्पादक धर्मों का नाम गुण है” 

इस सबका तथा इन सब भ्रंथों में विवेचित गुणों फे लक्ष- 
णादि का निष्कर्ष यह है कि जे! वत्तु शब्द को, अथे को 
अथवा उन दोनों फो उत्कृष्ट बनाती है, उसका नाम गुण है । 

अब इस बात का विवेचन आरम्भ हुआ कि--जब गुण 
भी शब्द और अर्थ को उत्कृष्ट बनाते हैं श्रे।र अलंकार भी, तब 
इन देनों में भेद क्या है ? क्‍यों न गुणों को भी अलंकार 
ही समझ लिया जाय ९ इसका उत्तर दंडी ने यों दिया 
कि गुण रचना के प्राण हैं और अलंकार काव्य में शोभा को 
उत्पन्न करनेवाले; अर्थात्‌ गुशों से काव्य मे काव्यत्व भाता है; 


अब. न 


१--उच्यमानस्य शब्देन यस्य कस्यापि वस्तुनः । 
उत्कषमावहलर्थों गुण इत्यमिधीयते ।? 

२--+श्रद्धार्थावु पकुवांणो नाज्नोभयगुणः स्मृतः । 

३---एते वैदममागंस्य प्राणा दृश गुणा: स्खताः (--काब्यादर्श । 

४--काव्यशेभायाः कर्तारो धर्मा गुणा/--अलंकारसूत्र । 


[ १०० ] 

और अलंकार उसे शोमित' करते हैं---उसे उत्कृष्ट बनाते हैं। 
इसी बात को वामन ने स्पष्ट शब्दों मे यों लिखा है कि “काव्य- 
शेभायाः कर्त्तारो धर्मा गुणा; तदतिशयहेतवस्ववल्न्टारा:”; 
अर्थात्‌ फाव्य की शोभा फे जनक -- काव्य में काव्यत्व लाने- 
वाल्े--धर्मों का नाम गुण है, और उस शे।भा फो--उस 
काव्यत्व को--उत्छृष्ट बनानेवाज्ञे धर्मों का नाम है अलंफार | 

पर, जब ध्वनिकार! ने काव्य के झात्मा' ध्वनि (व्यंग्यों) 
का और उनमे से भी प्रधान रस का प्रन्वेषण करके उसका 
स्वरूप स्पष्ट कर दिया, तब लगे के विचारों में परिवत्तेन हुआ । 


१--काव्यशेभाकरान्‌ धर्मानखट्डारान्‌ ग्रचक्षते ।!--काव्यादुर्श । 

२--काव्यप्रकाश के अनुसार इस सूत्र की यही व्याख्या है। 

३--काव्य की आत्मा के विषय मे यद्यपि हमें द्वितीय भाग में विचे- 
चन करना है; तथापि यहाँ कुछ मनों का जरलेखमान्न किया जाता है। 
अग्निपुराण में लिखा है कि “कान्य की आत्मा रस है।” पघामंव 
कहते हैं कि “पढ़ो की विशिष्ट रचना काच्य की भआात्मा है।” 
झआानंदवर्धेन का सिद्धांत है कि “काम्य की आत्मा ध्वनि (व्यंग्य) 
है” यही बात विद्यानाथ ने भो मानी है और 'व्यक्तिविवेक'- 
कार भी इसी से सहमत है। कुंतक ( वक्रोक्तिजीवितकार ) ने 
'बड़ी चतुराई से बात के भ्रतिपादन कर देने! के कान्य की आत्मा कहा 
है। खाहिलद्द्प॑णकार “असंलक्ष्यक्रम-ब्यंग्योे को काब्य की 
आत्मा मानते है। चोमेद्र का कथन है कि “काव्य का जीवन 
ओऔचित्य है।' इनमें से कुछ कथन आक्ंकारिक भी हैं, वे वासव से 
फक्राव्यात्मा? के अन्वेषण में चहीं लिखे गए हैं। पर इस एचायत को 
हम इस समय नहीं छेड़ना चाहते । 


[ १०१ |] 
काव्यप्रकाशकार भम्मट ने प्राचीनें के विचारों पर विप्रतिपत्ति 
की और कहा कि यदि शआप गुणों को ही काव्य मे काव्यत्त 
लानेघाले मानते हैं, ते! जिन काव्यों में ओज आदि गुण ते 
हों और रसादिक न दे, उन्हें भी काव्य कद्दा जा सकेगा। 
उदाहरण के लिये कस्पना कीजिए कि कोई मनुष्य 'इस पहाड़ 
पर घड़ो राग जल्ल रद्दी है, यह बहुतेरा धुआ निकत् रहा है? 
इस बात को ज्लोक बनाकर यों वेले कि-- 
अद्रावन्र प्रज्वकत्यग्निरुचेः प्राज्यः ग्राथन्नुछसत्पेष घूमः ।! 

ते इस वाक्य में आपके हिसाब से श्रेज गुण ते हुआ हो; 
क्योंकि भाप रस के साथ तो गुणों का कोई संबंध मानते 
नहीं, फेवल् रचना के साथ मानते हैं, से। यहाँ गाढ़ रचना है 
ही। अतः यह भी काव्य हे।ना चाहिए; क्योंकि जे वध्ततु 
काव्य में काव्यब लाती है, वह ( ओज गुण ) यहाँ भी विय- 
मान है। पर, बताइए, कौन सहृदय ऐसा हैया जो केबल 
रचना के कारण ही इसे काव्य मानने लगे ? अतः यों मानना 
चाहिए कि काव्य में काव्यत्व लानेवाब्ी चोज्ें ते! रपादिक 
व्यग्य हैं, भर उन्हें उत्कृष्ट बनानेवाज्े जो धर्म हैं, उनका नाम 
है गुण; जैसे कि मलुध्य को जीवित बनानेवाला प्रात्मा है, 
प्रौर उसे उत्कृष्ट बनानेवाले हैं शुरवीरता आदि गुण' | 


१--े रसस्थाद्लिने धर्माः शैर्यांदय इवात्मनः । उत्कष देतबस्ते स्थुर- 
चल्लस्थितयो गुणा: ।! (काव्यप्रकाशः:); ( रसरपेति--प्रलक्षपक्रोप- 
जचणम, इत्युयोते नागेशः ) । 


[ १०२ ] 

ध्वनिकार के अनुयायिये। ने काव्य के आत्मादिक का 
विवरण आह्लंकारिक भाषा से यों किया है--'शब्द और 
भ्रथे काव्य फे शरीर हैं, रस आदि आत्मा हैं, गुण शूर-बीरता 
आदि की तरह हैं, देष कानेपन झादि की तरह हैं और अल्त- 
कार आभूपणों की तरह ।”' इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि 
रसें के साथ गुणों का अंतरंग संबंध है श्रौर अल्कारों का 
बाह्य; एवं गुण काव्य की आत्मा रस को उत्कृष्ट करते हैं, और 
अलंकार उसके शरीर रूप शब्द और भ्रथे को । 

साथ ही गुणों की वास्तविकता का पता लगाने के लिये 
इस बात का भी अन्वेषण हुआ कि प्राचीन लोग जिन्हे गुण 
शब्द से व्यवह्ृव करते आए हैं, उन बीसों मे से, यदि नवीन 
प्रणाल्षी से जिन दोषों का विवेचन किया गया है, उनके अभाव 
रूप गुणों का प्रथक्‌ कर दिया जाय, ते कया बच रहता है। 
सेचने पर विदित हुआ कि शेष सब गुण कोमल, कठोर 
ओऔर स्पष्टाथेक तीन प्रकार की रचनाओं में विभक्त किए जा 
सकते हैं। इस तरह वे बीस के तीन हुए और उनके नाम 
भामह की प्रणाली से माधुय, श्रेज और प्रसाद रखे गए | 

इसके अनेतर यह भी सोचा गया कि कान सी रचना 
किस रस के अनुरूप है ? विमश करने पर विदित हुआ कि 
आँगार, करुण और शांत रसें फ॑ लिये कामक्त रचना की; वीर 

१---काच्यस्थ शब्दायों शरीरस, रत्यादिश्चात्मा, ग्रुणाः शोयां 
दिचत्‌, अलड्टारा कटककुण्डलादिवत्‌” इति। 


[ १०३ | 
शैद्र और बीभत्स रसेों के लिये कठार रचना की श्रावश्यकता 
है; और स्पष्टाथेक रचना का द्वाना ते सभी रसें मे अपेक्षित 
है। जब यह निणेय हो गण, तत्र यह खोज हुई कि इन 
रचनाओं से युक्त उन उन रसों के आास्वादन से श्रत:करण पर 
क्या प्रभाव होता है ? अनुभव से ज्ञात हुआ कि कोमल 
रचना से युक्त रसें के आस्वादन से चित्त पिघलता है, कठोर 
रचना से युक्त रसों के आररवादन से चित्त उह्योप्त होता है-- 
उसमें जोेश आ जाता है, और स्पष्टाथेंक रचना से युक्त रसें 
के आरवादन से चित्त विकसित होता है। थोडा भर सोचने 
पर यह्द भी पता क्षगा कि यह काम वास्तव में रसे| से दाता 
है, रचनाओं से नहीं; क्योंकि यदि मधुर रचना से ही चित्त 
हुत द्वोता हो, ते बैसी रचना से वीर आदि रसें मे चित्त की 
द्रुति क्‍यों नहीं दवाती। अतः यह निणेय हुआ कि गुण 
रचना से विल्क्षण वस्तु हैं श्रौर उनका रसें के साथ संबंध है, 
रचनाओं के साथ नहीं। झंतते गत्वा काव्यप्रकाशकार 
से यह निर्णय किया कि झूंगार, करुण और शात रखें 
में जे एक प्रकार की आह्यादकता रहती है, जिसके कारण 
चित्त दुत दो जाता है, उसका नाम माधुय है; वीर, रद भर 
बीभत्स रसें मे जे उद्दीपकता रहती है, जिसके कारण चित्त 
जल्ल उठता है, उसका नाम श्रोज है; और जे सूखे' घन 


न न-++>-..., 





१--चह दृष्टांत ओजस्वी रखें के किये है । 


[ १०४ ] । 

मे आग की तरह श्रौर खच्छ शकेरा भ्रथवा वल्तादि में 
जल की तरह चित को रस से व्याप्त कर देवा है, उत्त विका- 
सकत्व का नाम प्रसाद है। प्रत: यों समकना चाहिए कि 
शुण सुख्यतया रस के धर्म हैं, और इन्हें जे रचना आदि के 
धर्स कद्दा ज.ता है, से श्रौपच।रिक है। 

पर, साहिलद्दपंणकार ने काव्यप्रकाशकार के आशय को 
विना समझे ही उसका खंडन कर दिया। उन्होंने पहले ते काव्य- 
प्रकाशकार की इसी बात को लिख दिया कि गुण ' शै्यादिक 
की तरह रस के धर्म हैं; पर आगे जाकर यद्द निश्चित किया 
कि द्वुति, दीप्ति श्रार विकासरूपी चित्तवृत्तियों का नाम ही 
भाषुय, ग्रेज और प्रसाद है, तथा अपने इस सिद्धांव के 
अनुसार काव्यप्रकाशक्ार के विषय में यह कह डाल्ला कि 
माघुर्य ' को जो हरुति का कारण बताया जाता है, वह ठोक नहीं; 
क्योकि द्ुुति स्वय रसरूप भ्राह्मद से अभिन्न है, इस कारण, 
जैसे रस कार्य नहीं हे सकता, वैसे वह भी कार्य नहीं हो 
सकती । पर उन्होने यह सोचने का कष्ट नही उठाया कि 
काव्यप्रकाशकार ने द्रुति को माधुय माना कब है ? वे ते 
आंगारादि से जे। दुति-जनकता ( प्रयोजकता ) रहती है, उसे 





१--थद्द रृष्टात सधुर रसों के लिये है । 
२--रसस्वाद्वित्वमाप्तस्य धर्मा' शौयांदये! यथा । ग्रुणाः... ...! । 
३--यत्त केनचिदुक्तम--'माधुये द्वुतिकारणम! इति तज्ञ। हूची- 
भावस्यास्वादस्वरूपाह्वादा भिन्नत्वेन का््येत्वाभावाद्‌ [?? - 


[१०४ ] 

माधुय कहते हैं। आपने पहले ते गुणों को रस का 
धर्म बताया झौर अब उन्हें चित्ततृत्तिऱप कद रहे हैं। ज़रा 
सेचिए ते सही कि रति ( जे एक प्रकार की चित्तवृत्ति है ) 
रूप रस का धर्म द्ुतिरूप चित्तवृत्ति कैसे हे सकती है! 
क्या एक चित्तवृत्ति का दूसरी चित्तवृत्ति धर्म होती है ? भतः 
यह सब अविचारितामिधान है। 

इसके बाद पंडितराज ने गुणों के खरूप का प्रामाणिक 
रूप से निर्णय करके यह स्थिर कर दिया कि वास्तव मे द्रुति, 
दीप्ति प्रैर विकास नामक चित्तवृत्तियों के नाम ही माधुये, 
प्रोज भौर प्रसाद हैं; भार रूंगारादिक रस उनके प्रयोजक हैं, 
भ्रतः उन्हे मधुर आदि क्षह्ा जाता है। से यह मानना 
चाहिए कि गुण रसे| के धर्म नहीं कितु खतंत्र चित्तवृत्तियाँ 
हैं, भार वे उन उन शब्दों, भ्रथों, रखों श्लौर रचनाओं से 
प्रयुक्त होकर रस को उत्कृष्ट बनाती हैं । 


भाव 
प्रस्तुत पुस्तक के इस भाग मे केवल्न व्यभिचारी भाव रह 
नाते हैं; पर उनके विषय में इस समय कुछ बिशेष वक्तव्य 
नहीं है; क्योंकि उनके विषय मे विशेष मत-म्ेद नहीं है; 
वे भरत के समय से प्लाज-दिन तक तेंतीस के तेंतीस 
ही हैं, न किसी ने उन्हें घटाया, न बढ़ाया | प्रक्तुत 
पत्तक में लचण, खरूप तथा कार्य-कारण भादि सब बातों 


[ १०६ ] 
का स्पष्टरूपेण विवरण कर दियां गया है। हाँ, इतना कह 
देना आवश्यक है कि इस वरह से प्रत्येक भाव को प्रथकू-पृथक्‌ 
समभने के लिये उनके भेदक धर्म प्र कार्य-कारण अन्यत्र 
नहीं समभाए गई हैं। 


इति शुभम्‌ । 


संचत्‌ १६८९ 
जयपुर 


बे थ्पू 
शाख शक्ला ८ शुक्रवार पुरुषात्तसशर्मा चतुचंदी 
ता० २७ श्रप्नेल सन्‌ १8२८ 


विषय-सूची 


विषय पृष्ठाडू | विषय पृश्ठाडू 
मडुलाचरण ३' में समझना चाहिए? ४४ 
गुरुवन्दना ४ , भ्रधम काव्य ४< 
प्रबन्ध-प्रशंसा भू. अ्रधमाधम भेद क्‍्यें नहीं 
झतन्य निबन्धों से विशेषता ७ भाना जाता पू० 
निर्माता श्रौर निबन्ध का प्राचीनें के मत का खण्डन ४० 
परिचय ८ | शब्द अथे दाने चमत्कारी 
शुभाशंसा ८. हों ते किस भेद मे 


' काव्य का लक्षण. ८, समावेश करना चाहिए! ४२ 
काष्य का कारण. ९४ | वनिकाव्य के भेद १४ 
काथ्ये के भेद २५ ' रस का स्वरूप और 
उत्तमोत्तम फाव्य १६ | उसके विषय भें 


उत्तम फाव्य ४२ , ग्यारह मत १४३ 
उत्तमेत्तम पौर उत्तम | गघान लक्य ५५ 
में में क्या भ्रन्तर है? ४५. १-अमिनव गुप्ताचाय और 
चित्र-मीमासा के उदा- '.. सम्मट भट्ट का मंतत २४ 
हरण का खंड ४५, (कक) ५४ 
सध्यम काव्य धप | (ख) भू 


बाच्यचित्रों को किस भेद | (ग) ६१ 


५ कक 5) 


विषय पृर्ठॉक , विषय पृष्ठांक 
२-भट्टनायक का सत_ ६३ | स्थायी भाव ८४ 
३-नवीन विद्वानों का मत ६७ | रसें झर स्थायी भावों 

४-अन्य मत ७३... का भेद प्‌ 


२-एक दल (भट्ट लोक्ट... ये स्थायी क्‍यों कहलाते हैं ? ८५ 
इयादि ) का मत ७६ | स्थायी भाषें। के 


६-कुछ दिद्वानों (श्रो.| लक्षण ष्ट 
शंझुझछ प्रश्नति ) का १ रति प्प्प 
मत है ७७ २ शोक ष्प 
७-किदने दी कहते हैं ७७ “ ३ निर्वेद प्स्ड 
८-चतहुतेरों का कथन है ७७ । ४ क्रोध पड 
<“इनके अतिरिक्त कुछ | ५ उत्साह न 
लग कहते हैं ७७ | ६ विस्मय ० 
१०-दूसरे कहते ह. ७८ | ७ हास 5? 
११-तीसरे कहते हैं. छ८द | ८ भय ० 
पृर्वोक्त मतों के अनुसार... «& जुगुप्सा हे 


भरतसूत्र की व्याख्याएँ ७८ | विभाव, अनुभाव और 
विभावादिकों मे से प्रत्येक | ज्यमिचारी भाव ्र्‌ 
का रस-व्यखरू क्‍यों विभावादि के कुछ उदाहरण <१₹ 

नहीं माना जाता ८० रखें के अवांतर भेद 

: रस कौन-कौन और सौर उदाहरण 
कितने हैं परे श्रादि ढ॑ ३ 


( 
विषय पूष्ठांक 
खबर रख न्ड्रे 
फरुणरस ््छ 
शान्तरस द्छ 
रौद्॒स्स १०० 
वीर-रस १०४ 
अद्भुत रस ११७ 
हांसरस ११८ 
हास्य के भेद १५२० 
भयानक रस १९२ 
बीभत्स रस १२३ 
“हास्य” और '“जुगुप्खा? का 


आश्रय कौन दवोता है! १२४ 
रसाक्षट्टार १२५ 
ये 'पअ्रसंलक्ष्यक्रमव्य॑ग्यः 

क्यों कहलाते हैं ? १२६ 
रस नी ही क्यों हैं! १२६ 
रसे का परस्पर अ्रवि- 

रोध भार विरोध. १९८ 
विरुद्ध रसें का समावेश १२७ 
अन्य प्रकार से विरोध 

दूर करने की युक्ति १३४ 


डे) 

विषय पृर्ठाक 
विरोधी रस के वर्णन 

की झ्रावश्यकता. १४७ 
रस-बणन सें देय १३८ 
ग्रनाचिय १४२ 
अ्रनैचिय से रस की 

पुष्टि १४६ 
गुण १४७ 
घत्यन्त प्राचोन आचायं 

का मत १५३ 
शब्द-गुण १५३ 
शेष १४३ 
असाद्‌ १५४ 
समता श्प््प्‌ 
साधुये १५५ 
घुकुमारता श्ध्र्द्ू 
अधेव्यक्ति १५६ 
उदारता १५७ 
भ्रेज श्प्द 
कान्ति १५८ 
समाधि १पू८ 
अधगुण १६० 


( ४) 


विषय पृष्ठांक ' विषय पृष्ठांक 
श्लेष १६० | कांव २०२ 
प्रसाद १६१ | भाव का लक्षण २०२ 
समता १६२ | भाव किस तरह ध्वनित 
साघुये १६३ | दोते हैं ९ २०६ 
सुक्ुमारता १६४ भावो के व्यंजक कौन हैं? २०७ 
भ्रधव्यक्ति १६४ | भावों की गणना श्ण्८ 
डदारता १६६ | (वात्सल्यः रस नहीं है २०८ 
श्रेतज १६६ | ९--हर्ष २०४ 
कान्ति १७१ २--हम्ृति २१० 
समाधि १७१ ' ३--ब्रोडा ( कछष्जा ) २१४ 
अन्य आचायों ४--मेह २१६ 
का भत १७२ | ५--ध्ृृति ९१८ 
शुण २० न सानकर ३ ६--शह्ढग २१७ 
ही मानने चाहिए १७२ | ७-लानि २२० 
माधुये-व्यजक रचना १७६ ' ८--दैन्य २२२ 
ओजे[-व्यखक रचना १७८ --चिन्ता श्२४े 
प्रसाद-व्यज्षक रचना १७६ १०--मद श्र 
रचना के दोष श्एर ११--श्रम २२-८६ 
साधारण देष १८रे १२--गर्ष २३१ 
विशेष दोष १८८४ (१३--निद्रा श्शेर 


संग्रह १६४ (१४--मति हे २३३ 


विषय 
१५--व्यांधि 
१६--.त्रास 
१७--सुप्त 
१८-विबोध 
१<--अ्रमर्ष 
२० “--प्रवहित्य 
२१--उम्रता 
२२०-उन्मसाद 
२१३--मरश 
२४--वितके 
२५---विषाद 
२६--आ त्सुक्य 
२७--आवेग 
श्ए--जड़वा 
२४--भ्रा्नस्य 
३००--असूया 
३१--श्रपस्मार 
३२--चपत्षता 
३३--निर्वेद 


३४--देवता श्रादि फे रस भाव आदि अलत्य 


विषय मे रति 


( १२ ) 


पृष्ठांक | विषय पृष्ठाक 
२३४ ' भाव ३४ ही क्यों हैं? २६५ 
२१५ | रसासभास १२६४ 
२३७ | रसाभास रस ही है 

२३८ | अ्रथवा उससे मिन्न ! २७० 


२४२ । विप्रत़्स्भाभास श्७द 
२४३ | भावाभास श्७्८ 
२४५ , भावशान्ति र्‌ए० 
२४७ | भावादय २८१ 
२८ | भाषसन्धि श्पर 
२४० , भावशबल्षता रेए३ 
२५१ , शबह्ञता के विषय में 

२५३ | विचार श्पछ 


२५४ | भावशान्ति भ्रादि की 
२५४५ | ध्यनियों मे भाव अधान 
२५७ | होते हैं, भ्रथवा शान्ति 
२१४७ | आदि ९ श्पद 
२६२ | रसेों की शान्ति श्रादि 
२६३ | की ध्यनियां क्‍यों नहीं 
२६१ | होतीं! , २४१ 


२६६ | क्रम ही हैं अथवा लक्ष्य 


(हु 3 


विषय पृष्ठांक ' विषय पृष्ठांक 
क्रम भी २४८१ | प्रबंधध्वनि २-5 

ध्वनियों के व्यंजकक २८६ | पदैकदेशध्वनि २<€< 

पदध्वनि २<६ | रागादिकों की भी 

वर्ण, रचना ध्वनि. २४७ | व्यंजकता ३०० 


वाक्यध्वनि २४८४ । एक विचार ३०० 


श्रीहरिः 
हिंदी-रसगंगाधर 
प्रथम भाग 


( प्रथम आनन ) 


निमग्नेन वलेशैमेननजलधेरन्तरुदरं 
मयोज्नीते। ठोके ललितरसगल्ञाधरमणि; । 


हरत्नन्तथ्वोन्तं हृदयमधिरूदे गुणवता- 
मलझ्टारान्‌ सर्वानपि गलितगर्वान्‌ रचयतु ॥ 
कै है ् पर 


अति-कलेस ते' मनन-जरूधि के उदर-माँस दे गोत घनी । 
मैं जग में कीन्ही प्रकटित यह “'रसगंगावर”” छूित-मनी ॥ 
से हरि अधकार अतर के हिय शोमित है शुनि-गन के। 
सकल भअलंकारन के, करि दे गढित, गरब्र॒ उत्तमपन के || 


पुरुषोत्तम शर्मा चतुर्वेदी 


* श्रीहरिः 
हिंदी-रसगंगाधर 
प्रथम भाग 


तरनि-तनूजा-तटन्तरुन तरुनीवुन्द समार । 
जे विहरत, ते करहु सुद-मन्नछ चन्दुकुमार ॥ 
अंगलाचरण 
स्मृताईपि तरुणातपं करुएया हरन्ती वणा- 
मजरतनुत्विषां वरूय्रिता श्तैविद्यताय्‌ । 
कलिन्दगिरिनन्दिनीतटसुरुमालम्बिनी 
मदीयमतिचुम्बिनी भवतु काडपि कादम्बिनी ॥ 
० ध्‌ ४ ध्क 
सुमिरत हू जो हरत नरन को तरुनातप करुना करिके। 
घेरी शत-शत बिजुरिन ते' जो मदन रद्दित तन-दुति धरिकें ॥ 
कल कलिन्द्तनया के तट के सुरतरु जाके हैं आश्रय । 
से मेघन की साल अलैकिक सम मति चुम्बन करहु सदय ॥ 
जो केबल स्मरण करते ही मनुष्यों के तीत्र आतप ( संसार 
के ताप ) को, दया करके दर॒ण कर लेती ह, जो, जिनकी शरीर- 


( ४) 
कांति मे भप्त होने का खभाव ही नही है, उन सैकड़ों बिज- 
लियों ( गोषपागनाओं ) से परिव्रुत है और जिसका श्रीकालिदी 
के तट के सुरतरु ( कदंब ) आलंबन हैं, बह अनिर्वेचनीय मेघ- 
माला ( श्रीकृष्णचंद्र की मूत्ति ) मेरी बुद्धि का चुंबन करनेवाली 
बने--मेरी बुद्धि मे विराजमान रहे । 
गुरु वन्दना 
श्रीमज्ज्ञानेन्द्रभिक्षोरधिगतसकलब्रह्म विद्यापपश्च: 
काणादीराक्षपादीरपि गहनगिरो ये! महेन्द्रादवेदीत्‌। 
देवादेवाध्ध्यगीष्ट स्मरहरनगरे शासन जैमिनीयस्‌ 
शेषाइप्राप्तशेषामलभणितिरभूस्सव॑विद्यापरो यः ॥ 
पाषाणादपि पीयूष॑ स्थन्दते यस्य छीलया । 
त॑ वन्दे पेरुभट्टार्यं लक्ष्मीकान्तं महागुरुम ॥ 
ध्छ कक ध् ध्ः 
जिन ज्ञानेन्द्र भिद्ठ ते सीखी सविधि बअहा-विद्या सगरी । 
गुरु महेन्द्र ते कणझुज-गौतम-गहन-गिरा अध्ययन करी ॥ 
शास्बर जैमिनी को जिन सीख्ये खण्डदेव ते' शिवनगरी । 
पाह शेष ते महाभाष्य जिन हृदय सकल विद्यान घरी ॥ 
जिनकी ढीढछा ते भरत शुचि पियूष पाषान । 
लक्ष्मीपति ते पेरुमंट वन्‍्दी गुरु सु-महान ॥ 
जिन्होंने संपूर्ण ब्रह्मविद्या का विस्तार ( वेदांत शास्त्र ) 
श्रीमान ज्ञानेद्र मिज्षु से श्राप्त किया, कयाद और गौतम की 


( ५१ ) 
गंभीर वाणियों ( वैशेषिक और न्याय शास्त्र ) महंद्रशास्त्री से 
समझकी--न कि रट लो, काशीजी में रहकर परम प्रसिद्ध खेड- 
ढेव पंडित से जैमिनीय शास्त्र (पृ्वंभीमासा) का अध्ययन किया 
और शेप कृष्णोपनामक वीरेश्वर पंडित से पतंजलि की निर्मल 
उक्तियाँ ( महाभाष्य ) प्राप्त की, इस तरह जा सब विद्याओ 
के निधान थे, जिनकी लीला से पापाण ( मेरे जेसे जड़ ) 
से भी अमृत ( सरस कविता ) भर रहा है, उन लक्ष्मी-( मेरी 
माता ) पति अथवा विष्णुरूप पेरुमट्ट नानक पूज्य पितृदेव 
को मैं अमिवादन करता हैँ । 
प्रबंध-अशंसा 
निमगनेन क्लेशैमननजलपेरन्वरुद्रं 
मयान्नोता छेके छलितरसगह्मावरमणिः । 
हरन्नन्तथ्वान्तं हृदयमधिरूों गुणवता- 
पलझ्भारान्‌ सर्वानपि गलितार्वान्‌ रचयतु ॥ 
ध्ड ध्क छठ ध् 

अति-कलेंस ते मनन-जलूधि के उदर-माम्त  गोत घनी । 

मैं जग से कीन्दी अकटित यह “रसगेगाघर” छलित-मनी ॥ 

से हरि अधकार अंतर को हिय शोभित द्वै गरुनि-गन के। 

सकल अक्ंकारन के, करि # गढित, गरव उचमपन के ॥ 

मैंने सननरूपी जल्धि के उदर के अंदर न कि वाहर ही 


ह% 


बाहर, वड़े क्लेशो के लाघथ--न कि मनमैजीपन से, गोता 


( ६ ) 


लगाकर---अथात्त्‌ पूणेतया सोच समझकर, यह “'रसगगाघर”? 
रूपी सुंदर मणि निकाली है। से। यह ( रसगंगाघर मणि ) 
( साहित्य शास्त्र विषयक ) भीतरी अंधकार को हरण करती 
हुईं और गुणवानों के हृटय पर आरूढ़ होती हुई सभी अलंकारोा 
(अलंकार शास्त्रो + आभूषणों ) को, (इसके प्रभाव के कारण ) 
अपने आप ही दूर हो गया है गवे जिनका: ऐसे बना दे | अर्थात्‌ « 
इसमे अन्य सब अलंकार शास्त्रो से उत्कृष्ट होने की योग्यता है । 

परिप्कुवन्वथान्‌ सहृदयघुरीणाः कतिपये 

तथापि क्लेशो मे कथमपि गताथे न भविता | 
तिमीन्द्राः संक्षोम॑ विदधतु पयाधे! पुनरिमे 
किमेतेनायासे! मधति विफल मन्दरगिरे! ॥ 
ध्‌ड ध्े धः ध् 

करे परिप्कृत गहरे, अथैनि, सहृदयतम बुघजन केते ! 

किन्तु कलेस न सस यह कैसेहु होय व्यर्थ ये। करिवे ते ॥ 

करत छुमित्त जलनिधि को सब दिन मगर मच्छु भारी भारी। 

पैसे मन्‍्दर गिरि के श्रम के है न सके निष्फलकारी ॥ 

सहृदय पुरुषों के अग्रणी कुछ विद्वाद लोग अर्थों का 
परिष्कार करते रहे, उन्हे गंभीर विचारों से भूषित करते रहे, 
पर ऐसा करने से मेरा यह क्लेश--यह अत्यधिक अ्रम, किसी 
प्रकार भी, गताथे नहीं हो। सकता । भल्लें ह्वी बड़े बड़े मगर- 
मच्छ समुद्र को अच्छी तरह क्ुव्ध करते रहे; पर क्या इससे, 


( ७ ) 
अलौकिक रक्नों का उत्पादन करनेवाला, मंदराचल का परिश्रम 
व्यर्थ हो। सकता है ? भ्रर्थात्‌ इन पंडितों का परिष्कार करना 
शास्त्र को निरा क्षब्ध करना है; पर मैंने उसे मथकर, उसमे 
से, यह मणि निकाली है; अत. उनका परिश्रम निष्फल है 
और मेरा सफल | 
झन्य निबंधों से विशेषता 


निर्माय नूतनमुदाहरणालुरूप॑ 
काव्य' मयाउत्र निहितं न परस्य किश्ित्‌ । 


कस्तूरिकाजननशक्तिभृता मगेण 
कि सेव्यते सुमनसां मनसाऊपि गनन्‍्धः ॥ 
क् क क कक 


घरी बनाह नवीन उदाहरनन की कविता | 
परकी कह हु छुई न, दृहा मै, पाह सुकवि-ता ॥ 
सग कस्तूरी-जननशक्ति राखत जो निज तन। 
कहा करत वह सुमन-गन्ध-सेवन हित सुजतन।॥ 
मैंने, इस अंथ मे, उदाहरणो के अनुरूप--जिस' उदाहरण 
मे जैसा चाहिए वैसा--काव्य बनाकर रक्खा है, दूसरे से कुछ 
भी नही लिया, क्योकि कस्तूरी उत्पन्न करने की शक्ति रखने 
वाला म्ृग क्‍या पुष्पों की सुगंध की तरफ मन भी लाता है ? 
अपनी सुगंध से मस्त उसे क्‍या परवा दै कि वह पुष्पों के गंध 
की याद करे । 


( ८) 
निर्माता और निबंध का परिचय 


मननतरितोर्ण विद्याएवे। जगन्नाथपण्डितनरेन्द्र) । 
रसगड़ाधरनास्नीं करोति कुतुकेन काव्यमीमांसाम ॥ 
,3] कि (० पक 
सनन तरी तरि विध्वा-जलनिधि जगन्नाथ पण्डित-नरनाथ । 
“रसगड्भाघर”? नाप्रक काष्या नाचल करत कुबृहल-साथ |! 
जिसने मनन-हूपी नौका से विद्यारूपी समुद्र को पार कर 
लिया है, वह पंडितराज जगन्नाथ, झुतूहल के साथ काव्यों की 
वह भ्राल्लोचना कर रहा है, जिसका नाम है “रसगंगाधर?? | 


शुभाशसा 
रसगड्डाधरनामा सन्दर्भोज्यं चिरज्ञयतु | 
किश्व कुलानि कवीनां निसगंसम्यश्वि रक्नयतु ॥ 
छः कः धड डा 
रसगब्ााघर नाम यह ग्रथ सरबदा जय छ्ह्ड्ु । 
सहज सुमगश कविराज-कुल याहि पाइ प्रमुदित रह | 
यह “'रसगंगाधर”” नामक अथ वहुत समय के--सदा के 

लिये विजय प्राप्त करे और स्वभाव से ही उत्तम--जिनको 
उत्तम बनाने के लिये यत् की आवश्यकता नहीं, उन कविवरो के 
समाजो को सुखी करता रहे | 


अथारभ 
काव्य का लक्षण 


जिस काव्य के, यश, परम-आनंद, शुरु, राजा और 
देवताओ की प्रसन्नता आदि अनेक फल्ष हैं, उस काव्य की व्युत्पत्ति 
दे! व्यक्तियां के लिये आवश्यक है। उनमें से एक है कवि-- 
अर्थान्‌ काव्य वनानेवाला और दूसरा है, उससे आनंद प्राप्त 
करनेवाला--उसके मर्तों को समभ्तनेवाला, सहृदय। सच 
पूछिए ता, काव्य से आनंद उठाने के लिये, सहृदयता ही मुख्य 
साधन है। कवि भी यदि सहृदय हुआ / यद्यपि अच्छे 
कवियों की सहृदयता अनिवाय है ), ते उसे कविता-गत आनंद 
की प्राप्ति है सकती है, अन्यथा नहीं। इस कारण, गुण, 
अलंकार आदि से जिसका निरूपण किया जाता है, वह काव्य 
क्या वस्तु है--किसे काव्य कहना चाहिए ओ्रोर किसे नहीं-- 
इस वात का, पूर्वोक्त दोनों व्यक्तियां को, समझाने के लिये 
पहले उसका लक्षण निरूपण करते है। 

रमणीय अथे के प्रतिपादन करनेवाल्ले--अर्थान्‌ जिससे 
रमणीय अथे का वोध हो, उस शब्द को काव्य कहते हैं । 

रमणीय अथे वह है, जिसके ज्ञान से--जिसके बार वार 
अनुसंधान करने से--अलैकिक आनंद की प्राप्ति हा । यद्यपि 


( १०9 ) 

हमसे कोई आकर कहे कि “आप के लड़का पैदा हुआ है" 
“आपका इतने रुपए दिए जायेंगे” ( अधवा यों समक्तिए 
कि “आपको लाटरी में इतने रुपए प्राप्त हुए हैं” ) ते! उन 
वाक्‍्यां के ज्ञान से --उनके बार बार अन्नुसंधान से--भी हमें 
आनंद प्राप्त होता है; पर वह आनंद अलौकिक नही, लैकिक 
है, इस कारण, उन वाक्यों को हम काव्य नहीं कह सकते । 
( तब नव्य-नैयायिका की रीति से जे! बाल की खाल खीचो गई 
है, उसे छोड़कर, यादें इस लक्षण का सार समझते तो यह 
हुआ कि ) “जिस शब्द अथवा जिन शब्दों के अधे के बार 
वार अनुसंधान करने से किसी अलौकिक आतंद की प्राप्ति 
हा, उसका अघवा उनका नास काव्य है? । 

यह तो है पंडितराज का काव्य-लक्षण। अब साहित्य- 
शाब्ष के प्राचीन आचायों के साथ उनकी जो दलोले हैं, उन्हे 
भी सुनिए । काव्य-प्रकाशकार आदि साहिंत्य-शास्त्र के 
प्राचोन आचायाँ ने लिखा है कि “दिाष-रहित, गुण एवं 
अलंकार सहित शब्द और अधथे का नाम काव्य है?” | अब इस 
विषय में सबसे पहले वे। यह विचार करना है कि--काव्य 
शब्द का प्रयोग केवल शब्द के लिये किया जाता है अथवा 
शब्द और अधथ दोनों के लिये। अच्छा, इस विषय में पंडित- 
राज के विचारो को ध्यान से लीजिए । वे कहते है-- 

“शब्द और अर्थ”? देनों काव्य नही कहे जा सकते; क्योंकि 
इसमे कोई प्रमाण नहीं! प्रत्युत यदि विचारकर देखे ते 


( ११ ) 

“काव्य जार से पढ़ा जा रहा है?! “काव्य से अथे समझा 
जाता है”? “काव्य सुना, पर अथे समझ में न आया?! इत्यादि 
साव॑जनिक व्यवहार से एक प्रकार का शब्द ही काव्य सिद्ध 
होता है, अर्थ नही । आप कहेगे कि ऐसे व्यवहार के लिय, 
जिसमे कि काव्य शब्द का प्रयाग “केवल शब्द?” के विषय से 
किया गया हो, लक्षणा वृत्ति से काम चला लो । हम कहते 
हैं-..हॉँ, ऐसा हे। सकता है; पर तव, जब कि आप किसी दृढ़ 
प्रमाण से यह सिद्ध कर दें कि काव्य शब्द का मुख्य प्रयोग 'शब्द 
और अथे”” दाने के लिये ही होता है। वहीं ते हमे दिखाई 
नही देता। आप कहेगे--शब्द प्रमाण से यह वात सिद्ध है; 
क्योकि काव्यप्रकाशकारादिकों ने इस वात को लिखा है । हो, 
ठीक, पर महाराज, जिस पर अभियाग चलाया जाय उसी के 
कथन के अनुसार निर्णय नही किया जा सकता। उन्हीं से ता 
हमारा मत-भेद है, अ्रत: उनका कथन प्रमाण रूप से उपस्थित 
करना उचित नहीं । इस तरह यह सिद्ध हुआ कि शब्द और 
अथे दोनों का नाम काज्य है, इस वात मे कोई प्रमाण नहीं; 

तव हमारे उपस्थित किए हुए पृर्वोक्त व्यवहार के अनुसार “एक 
प्रकार के शब्द का नाम ही काव्य है?” इस वात को कौन मना 
कर सकता है। इसी से, “शब्दमात्र के काव्य मानने मे कोई 
साधक युक्ति नहीं है, इस कारण दोनों को काव्य मानना 
चाहिए?” इस दल्लील का भी जवाब हो जाता है; क्योंकि उससे 
किक व्यवहार को हम अमाण रूप मे उपस्थित कर चुके हैं। 


| 


( १२ ) 

से। इस तरह एक प्रकार के शब्द का नाम ही काव्य सिद्ध हुआ, 
अत; उसी का लक्षण बनाने की आवश्यकता है, न कि अ्रपनी 
तरफ से कल्पित किए हुए शब्द और अथे के लक्षण बनाने 
की। यही वात वेद, पुराण आदि के ज्क्षणा मे भी समभनी 
चाहिए, अर्थात्‌ उनका भी शव्दरूप समभककर ही उनका लक्षण 
वनाना चाहिए, नहीं ते यही दुदंशा उनमे भी होगी । 

कुछ लोग एक और दलील पेश करते हैं। वे कहते हैं 
कि--क्वाव्य शब्द का प्रयोग उसके लिये होना चाहिए, जिससे 
रस का उद्बोध होता हो---जिससे हमारे झंतरात्मा मे एक प्रकार 
का श्रानंदास्वाद जग उठे । यह बांत शब्द और भ्रथ देनो 
में समान है, इस कारण दोनों को काव्य कहना थुक्ति-सगत 
है। पंडितराज कहते हैं--यह आपकी दल्लील ठीक नही । 
यदि आनंदास्वाद को जगा देनेवाली वस्तु का नाम ही काव्य 
हो, तो आप राग को भी काव्य कहिए; क्योंकि ध्वनिकार 
प्रभूति सभी साहित्य-मर्मज्ञो ने राग को रसव्यंजक ( आनंदा- 
स्वाद का जगानेवाला ) माना है। बहुत कहने की आवश्य- 
कता नहीं, यदि आप रसन्यजक को ही काव्य मानने लगे ते। 
जितने नाख्य के अंग हैं---नृत्य-बाय आदि, सबको आप काव्य 
मान लीजिए। ऐसी दशा में आपको यह झगड़ा हटाना 
कठिन हो जायगा । इस कारण, जो रसेद्वोघन में समर्थ 
हा---जिससे आलंदास्वाद जग उठे--उसे ही काव्य मानना 
चाहिए, यह दलील पाच सिद्ध हुई। 


( १३ ) 


इस विषय मे हम आपसे एक वात और पूछते है--शब्द 
और अर्थ दानां मिलकर कान्य कहलाते हैं, अथवा प्रत्यंक 
पृथक्‌ पृथक ? यदि आप कहेगे कि देनों सम्मिलित रूप में 
काव्य के नाम से व्यवहृत किए जाते हैं, तव ते जिस तरह 
एक और एक मिलकर ( अथात्‌ दो एको का यागफल्ञ ) ढा 
होता है--दे। सम्मिलित एको का नाम ही दो हैं; दो के 
अवयव प्रत्यक एक को दे। नहीं कह सकते उसी प्रकार 
श्लेक के वाक्य के आप काव्य नहीं कह सकते; क्‍्यांकि वह 
उसका एक अवयव कंवल शब्द हैं। से इस तरह पूर्वोक्त 
व्यवहार -सर्वेथा उच्छिन्न हो जायगा । अब यदि आप कहेगे 
कि प्रत्येक को प्रथक्‌ प्रथक काव्य शब्द से व्यवहार करना 
चाहिए, ता “एक पद्म मे दे काव्य रहते हैं?” यह व्यवहार 
होने छगेगा। सा है नही। 

इस कारण, वेद, शास्त्र और पुराणों के लक्षणों की तरह 
काव्य का क्षण भो शब्द का ही होना चाहिए। अर्ांत्‌ 
शब्द का ही काव्य मानना चाहिए, शब्द-अथ देनें का नहीं «»« 

* इन दुलीलें का खडन नागेश भट्ट ने, इसकी टीका मे, बहुत थाड़े 
मे, बहुत अच्छे ढंग से किया है । अच्छा, आप वह भी सुन लीजिए-- 

नागेश कहते है--जिस तरह “काव्य सुना”? इत्यादि व्यवहार 
है, उसी प्रकार “काव्य समझा” यह भी न्यव॒हार है, ओर सममना 
अर्थ का होता है, शब्द का नहीं; अत काब्य शब्द का प्रयोग शब्द और 
अधे दोनों के सम्मिक्षित रूप के ढिये ही होता है, यह मानना चाहिए। 
वेदादिक भी केचह शब्द का नाम नहीं है, कितु शब्द-अर्थ दोनों के 





( १४ ) 

यह ते हुआ ' शब्द!” को काव्य मानना चाहिए, अथवा 
“शब्द-अथ”? दाला का, इस वात का विचार । अब दूसरी 
बात लीजिए। प्राचोन आचारयों ने काज्य के खज्ञशष से, 
शब्द ओर अर्थ के साथ एक विशेषण लगाया है 'गुण एवम्‌ 
अलकार सहित”? | सा यह भी ठोक नहीं। क्योंकि 
“डुद्त' मण्डल विधेष:” इस संरकृत वाक्य अथवा 
“चन्द्र उग्ये। नल सांहि?? इस हिंदी वाक्य का, काई नायक 
के सकेत स्थान पर जाने क॑ लिये इस अमिप्राय से कहे-- 
प्रकाश हो गया अब कहा कॉटा खील्ला लगने का डर नहीं; 
अथवा काई अमिसारिका दृती से, यह समभककर क्रि--अ्रव 
प्रकाश हा गया, कोई ठेख लेगा, निषेध करने के लिए कहे, 
यद्ठा काई विरहिएी अपने सुड़द्र्ग को चह सुभाने के लिये कहे 
कि अब मैंन्जी सक्गी तो भी आपके हिसाव से वह 
काव्य न होगा, क्‍्याकि न उसमे कोई गुण है, न अल्कार | 
संस्मिछत रूप का हा वास हूँ, अत एच जा सहाभाप्यकार भगवात्र्‌ 
पर्तेज्षक्ति ने 'सदधीनते तद्ोदः इस पाणिनीय सूत्र की व्याज्या करते हुमु 
णजद्ध-अर्थ ? दे।ना को वेदादि रूप माना हैं व्रद संगत हो समता है। 
रही आपकी दूसरी दखोढ--जिस तरह हस एक का डे। नहीं 
ऋह सकते, उसी तरह दानां का नाम यदि काव्य हो तो अत्यक के लिये 
इस शब्द का च्यवहार नहीं हो सकता ) सा कुछ नहीं ह। एल स्थल 
पर हम रूट छक्तणा से काम चत्ठा सकते है---ठसके हारा अत्येक के लिये 
भी काच्य शक्त का प्रयोग हो सकता हैं। इस कारण “ शक्द-अर्थ” 
दानां को काव्य-शब्य से व्यवदन करने में काई दोप नहा । 





( १४ ) 

पर आप यह नहीं कह सकते कि वह काव्य नही है; क्यांकि 
यदि उसे आप काव्य न साने तो जिसे आप काव्य कह रहे 
हैं, उसे भी काव्य मानने क॑ लिये कोई उद्यत न हागा | कारण 
यह है कि जिस ““चमत्कारीपन” को काव्य का जीवन माना 
जाता है, वह इन दोनों मे समान ही है। दूसर, गुणत्व ओर 
अलंकारत का अनुगम नही हे--अथोॉन्‌ आज दिन तक चह 
सिद्ध न हो सका कि गुणत्व और अलेकारत्व जिनमे रहते हैं, 
वे गुण और अलंकार अमुक अमुक ही हैं। उनकी संख्या 
अभी तक नियत ही न हो सकी; जिस आहल्लक्रारिक का जब 
जैसा विचार हुआ उसने, उसके अनुसार, उन्हे घटा दिया 
अश्चवा वढ़ा दिया। श्रतः गुणां और अलंकारों का क्षण ने 
समावेश करना उचित नही: क्योंकि जो खर्यं ही निश्चित त्तही 

हैँ, उनके द्वारा लक्षण क्‍या निम्।ित है। सकेगा ! 
एर यदि आप कहे कि काज्य अधघवा रस के धर्मों का नान 
गुण है और काव्य में शासा उत्तन्न करनेवाले अथवा काव्य के 
धर्मो' का नाम अलंकार है, इस तरह युशलर आर अलंकारत्व 
का अबनुगम हो जाता है--अर्थात्‌ जिनमे थे ज्लख दिखाई दें 
उन्हे गुण आर अलंकार समझ लीजिए, उनकी संख्या नियत 
न दो सकी ते क्या हुआ। तथापि हम कहेगे कि लक्षण से 
“दाप रहितः कहना ता अ्रयाग्य ही है; क्योकि लाक में “अनुक 
काव्य देषयुक्त है?” यह व्यवहार देखने से आता है। अर्थात्‌ 
काव्य-पद का दोष रहित के लिये ही नही- दाष सहित के लिये 


८ 


| 


नी 
5 


बच 


(्‌ ) 
भी प्रयाग किय जाता है | आप कहे कि वहाँ आप 
लत्षणा रू क्राम चला तीजिए--समभझ लीजिए कि काञज्य-- 
जैसा पदग्रथन उस ( दापयुक्त ) में भो है, इस कारण गाणी 
लक्षण के द्वारा उसे भी काव्य समझ लेना चाहिए; ते 
यह भी अनुचित है क््याकि जब तऊ कोई सुख्याथ का वाधक 
कारण उपन्धित न हा, तव तक ल्ाजणिक कहना ही नही 
वन सकता , लजत्जणा तभी हाती है, जब कि सुख्यार्थ का 
बाघ, भुख्याय से संवध और रूदि अधवा प्रयाजन ये तीनों 
निमित्त हाँ ,> 

हाँ, एक दूसरी युक्ति आर हैं। आप कह सकते हैं कि 

जैंसे एक पेड की जड पर पन्नी वैठा है, पर डाली पर नहीं, 
वन उस पेड़ में एक स्थान पर ( जड़ में ) पक्षी का संयोग हैं 
ओर दूसरे स्थान पर ( शाखा में ) संचाग का अभाव | तथापि 
सर्वत्र संचाग रहित हाने पर भी, एक स्थान पर संयाग होते 
के कारण, उस वृज् का संचोगी कह सकते हैं। ठीक इसी 
तरह अन्य सव स्थाना पर दाष रहित होने क॑ कारण वह काव्य 
कहला सकता हे आर एक स्थान पर दोष युक्त हाने क॑ कारण 
दोषी भी । से यह भी ठीक नहीं; क्योंकि जेंसे जड़ पर पत्नी 
का चैठा देखकर, सब मनुष्यां का, यह प्रवीति हाठी है--कि 
इस वृक्ष की जड़ से पत्नी का संयाग हैं: पर शार्घा में नहीं, 
छत्षणा का विशेष विवरण द्वितीय भाग में होगा अत्त' दमन 

यहां विशण प्रण्च नहीं क्या हैं । 


( १७ ) 

उस तरह किसी को भी इस बात का ठीक ठीक श्रनुभव नहीं 
होता कि यह पद्म पूर्वाधे मे काव्य है और उत्तराध मे नहीं । 
अतः यह दृष्टांव यहा नही लग सकता | दृष्टात के द्वारा अनु- 
भव का अपलाप असंभव है---जे बात हमे प्रत्यक्ष दिखाई दे रही 
है, वह दृष्टाव से नहीं हटाई जा सकती | 

एक और भो वात है कि जिसके कारण गुण एवं अत्तंकार 
काव्य लक्षण मे प्रविष्ट नही किए जा सकते। वह यह 
है कि जिस तरह शूर-वीरता आदि आत्मा के धर्म हैं, वैसे ही 
गुण भो काव्य के आत्मा रस के धर्म हैं, और जिस तरह 
हारादिक शरीर को शोमित करनेवाज्ञी वस्तुएँ हैं, उसी तरह 
अलंकार भी काव्य को अलंकृत करनेवाले हैं । श्रतः जिस 
तरह वीरता अथवा हारादिक शरीर के निर्माण मे उपयोगी 
नही है, इसी तरह ये भी काव्य के शरीर को सिद्ध करने--- 
उसके स्वरूप का लक्षण बनाने--मे उपयुक्त नही दा सकते | 

यह ते हुई प्राचीनों की बात। अब नवीनों मे से 
“साहित्य-दर्पशकार”” बहुत अ्सिद्ध हैं। अच्छा, 'आइए, उनके 
“ काव्यल्षण”” की भी परीक्षा कर डाले। उन्होने वाक्य 
रसात्मक काव्यम?ः यह लक्षण बनाकर सिद्ध किया है कि 
“जिसमे रस दे वही काव्य है?? । पर यह बन नहीं सकता; 
क्योंकि यदि ऐसा माने ते जिन काव्यों मे वस्तु-ब्णन अथवा 
अलंकार-वर्णन ही प्रधान हैं, वे सब काव्य काव्य ही न रहेगे । 
« आप कहेगे कि हमका यह खीकार है---हम उनको कांव्य 
२००२ 


( १८ ) 

मानना दी नहीं चाहते । से यह उचित नहीं, क्योकि महा- 
कवियों का जितना संप्रदाय है, उनकी जो प्राचीन परिपाटी 
चली आई है, वह बिलकुल गड़बड़ा जायगी। एन्हेने स्थान-स्थान 
पर जल के प्रवाह, वेग, गिरने, उछलने और भ्रमण, एव बंदरों 
और बालकों की क्रोड़ाओें का वर्णन किया है। क्‍या वे सब 
काव्य नही हैं? आप कहेगे कि उन बशेनों मे भी किसी न 
किसी तरह रस का रपशे है ही, क्योंकि ऐसे वर्शन भी उद्दोपन 
आदि कर सकने के कारण रस से संबंध रख सकते हैं। पर 
यदि याँ मानने जगा ते “बैल चलता है” “हरिण दौड़ता है? 
आदि वाक्य भी काव्य होने लगें; क्योंकि जगत्‌ की जितनी 
वस्तुएं हैं, बे सब विभाव, अनुभाव अ्रथवा व्यमिचारी भाव कुछ 
न कुछ हो सकती है। इस कारण प्राचीने एवं नवीने के-- 
देनों के-- काव्य लक्षण”? ठीक नही है ।# 





“- थर्दहा हमे छुछ लिखना है । यद्यपि पंडितराज ने “काव्य छक्षण” 
के विषय मे उतना सूक्ष्म विचार किया, तथापि वे इसके बनाने मे सफल 
न हुए। इसका कारण हम पहले नागेशभट्ट की आलेचना, टिप्पणी 
मे, देकर सममा चुके है। उसका सारांश यह है कि केवछ शब्द को 
काब्य मानना ठीक नही, “शब्द और अथे” दोनो को काध्य मानना 
चाहिए। पर तु प्राचीन आचायों के रूच्षण मे भी “दोषरद्ित” कहना 
ते खंडित है, और यदि “गुण एवं अलंकार सहित शब्द और झअथ” 
को काव्य माने , तथापि वह उत्कृष्ट काव्य का छक्षण हो सकता है, 
साधारण काव्य का नही, क्योकि सभी काव्यों से गुण और अढूंकार 
नही रहते । इस कारण मेरे विचाराजुसार “ऐसे शब्दों और अर्थो" को 


( १ ) 
काष्य का कारण 


भ्च्छा, अब यह भी सोचिए कि काव्य का कारण--जिसके 
होने पर ही काव्य बन सकता है, अन्यथा नहीं--क्या वस्तु 
है? इस विषय मे भी पंडितराज का प्राचोनों से मतभेद है; 
आप उनके इस विषय के विचार भी सुनिए । वे कहते हैं-. 

काव्य का कारण केवल प्रतिभा है, और प्रतिमा शब्द का 
अ्रथे है---काव्य बनाने के लिये जे शब्द एवं अथे अनुकूल 
हों, जिनसे काव्य बन जाय, उनकी उपस्थिति; अर्थात्‌ काव्य 
बनाने के लिये जहाँ जिस शब्द की श्रौर जिस अथे की आब- 
श्यकता हो, वहाँ उसका तत्काल उपस्थित हो जाना, ऐसा 
नहीं कि कविजी काव्य बनाने के लिये अक्लुज्ञा रहे हैं; परंतु न 
ते उसमे जोड़ने के लिये कोई सुंदर पद ही मिलते हैं और न 
कोई ऐसी वात ही याद आती है कि जिससे उनका कारये सिद्ध हो 


काव्य मानना चाहिए, जिनके सुनने एवं समझने से अलैकिक आनंद 
की आप्ति हो” । तभी इश्य काव्य कहना भी साथ्थंक हो सकता है; 
क्योकि देखने में अर्थ आा सकते है, शद्ध नही। यह्दी बाद श्र्थाढकार 
आदि के विषय से भी समझे । यद्यपि नाटक के पान्नादिकों का बनाने- 
वाढा कवि नहीं है, तथापि उस सव सामग्री को उस रूप में उपस्थित 
करनेवाला उसे मानने मे कोई संदेह नहीं । इस कारण उस अर्थ का 
निर्माता भी वह हे सकता है। “केवछ शब्द” को ही काव्य मानने के 
कारण “साहिल्द्पेणकार” का भी रूचण हमे सम्मत नहीं, वे “रखात्मक 
वाक्य” को काव्य कहते है, और वाक्य भी शब्द का ही नाम है। 
--अनुवादक 


( २० ) 

जाय । उस प्रतिभा के दे! कारण है--एक ते, किसी देवता 
अथवा किसी महापुरुष की प्रसन्नता होने के कारण, किसी 
ऐसे भाग्य का उत्पन्न है! जाना कि जिससे काव्यधारा अविरत 
चलती रहे, श्रार दूसरा--विज्क्षण व्युत्पत्ति और काव्य 
बनाने के अभ्यास का होना। कितु ये तीनों सम्मिलित 
रूप मे कारण नही हैं; क्योंकि कई बालकों तथा अबोाधें को 
भी केवल महापुरुष की कृपा से ही प्रतिभा उत्पन्न हो गई है 
( जैसे कि कवि करणपूर के विषय से किंवदंती है )। आप 
कहेंगे कि वहाँ हम उस कवि फे, पूर्वजन्म के, विलक्षण 
( जैसे दूसरों मे नहीं होते ) व्युत्पत्ति और काव्य करने का 
श्रभ्यास मान लेंगे । भ्र्थात्‌ उसने पूर्वजन्म से इन बातों को 
सिद्ध कर लिया है, अब किसी महापुरुष की कपा होते ही वे 
शक्तियाँ जग उठी । पर यों मानने मे तीन देष हैं-- 

१--गैरब अर्थात्‌ जब उन दोनों के कारण न मानने पर 
भी कंवल अदृष्ट (भाग्य) से काम चल्न सकता है, ते 
क्यों उन दोनों को उसके साथ लगाकर कारणों की संख्या 
बढ़ाई जाय । 

२--मानाभाव अर्थात्‌ इसमे कोई प्रमाण नहीं कि, ऐसे 
स्थान पर भी, इन तीनों को सम्मिलित रूप मे ही प्रतिभा का 
कारण मानना चाहिए | 

३--कार्य का बिना तीनों के कारण मानने पर भी 
सिद्ध हो जाना । 


5, 

जब कि वेदादिक किसी प्रबल प्रमाण से यह सिद्ध किया 
गया हो! कि अमुक वस्तु असुक वस्तु का कारण है; पर हम 
संसार में कुछ स्थानों पर ऐसा देखते हों--उस वस्तु 
( कारण ) के रहते हुए भी वह वस्तु ( काये ) उत्पन्न न हो, 
अथवा उसके न रहने पर भी वह उत्पन्न हे जाय, तब हमको, 
विवश होकर ( क्योंकि वेदादिक भ्ूूठे तो हो। नहीं सकते ), 
यह मानना पड़ता है--इसका कारण, उस व्यक्ति का-- 
जिसको कारण के बिना भी कार्य की प्राप्ति हे! रही है अथवा 
कारण के होने पर भी काये की प्राप्ति नही हो रही ऐ--पूर्व-' 
जन्म में किए हुए, घर्म-अधर्म आदि हैं। पर यदि वेदादिक 
प्रबल प्रमाण के द्वारा कारण न घताए जाने पर, हमारे निश्चित 
किए हुए कारणो मे भी, हम किसी वस्तु को किसी वस्तु का 
कारण बताकर जहाँ गड़बड़ आने लगे, कह दे कि--इस बात 
को उसने पूर्बजन्म मे कर लिया है, अतः ऐसा हो गया, ते 
अम होने लगे---ज्लोग किसी को भी किसी वस्तु का कारण बताने 
लगे । अतः पूर्वोक्त स्थल मे पूर्व जन्म के व्युत्पत्ति और अभ्यास 
को कारण मानना उचित नही; क्योंकि व्युत्पत्ति और अभ्यास 
के बिना कविता हो ही न सके यह बात कुछ वेद मे थोड़े ही 
लिखी हुई है कि जिसके लिये यह पंचायत करनी पड़े । 

'अब यदि आप कहें कि हम इस गड़बड़ मे पड़ना नहीं 
चाहते, हम ते केवल अदृष्ट को ही कारण मान लेगे। से 
भी ठीक नही; क्योंकि बहुतेरे मनुष्य ऐसे देखने मे आते हैं कि 


( २२ ) 


वे बहुत समय तक काव्य करना जानते ही नहीं, पर कुछ 
दिनो के अनतर जब उनको किसी प्रकार व्युत्पत्ति और अभ्यास 
हो जाता है, तब उनके, प्रतिभा उत्पन्न है| जाती है--वे काज्य 
बनाने शगते है। यदि वहाँ भी अद्ृष्ट को कारण मानने लगो 
वे व्युत्पत्ति और अभ्यास के पहले ही उनमे प्रतिभा क्‍यों न 
उत्पन्न हे गई ? आप कहेगे--थोड़े दिन के लिये उनका कोई 
बुरा अदृष्ट मान लीजिए, जिसने प्रतिभा की उत्पत्ति को रोक 
दिया; ते हम कहेगे कि प्राय: व्युत्पत्ति और भ्रभ्यास होने पर 
ही कविता बनानेवाले अधिक देखने मे आते हैं, इस कारण 
अनेक स्थानों पर दे दे। ( भ्रच्छे और बुरे ) अद्ृष्ट मानने की 
अपेक्षा, कविता के रोक देनेबाले अदृष्ट के नाश करने के लिये, 
आपको, जिन व्युत्पत्ति और अभ्यास की कल्पना करनी पड़ती 
है-- जिनके उत्पन्न होने से प्रतिबंधक अ्रदृष्ट नष्ट हो जाता है, 
उन्ही को कारण मान लेना उचित है। इस कारण हम जो 
पहले वता आ्राए है कि इन तीनो को ( अर्थात्‌ अद्ृष्ट को प्रथक्‌ 
और व्युत्पत्ति-अस्यास को प्रथयक्‌ ) कारण मानना ही 
सीधा रास्ता है । 
अब एक और शंका होती है--यदि अ्रद््ट से भी 
प्रतिभा उत्पन्न होती है और व्युत्पत्ति तथा अभ्यास से मी, और 
काव्य दोनों से बन सकता है, ते दे भिन्न मिन्न कारणों से 
एक ही प्रकार का काम (प्रतिभा ) उत्पन्न होने के कारण दोनों 
के कामे। मे गोटाला हो जायगा। और यह उचित नही, 


( २३ ) 


क्योकि प्रकृति का नियम है कि भिन्न सिन्न कारणों से कार्य भी 
मिन्न सिन्न ही उत्पन्न हे । इसका उत्तर यह है--यद्यपि 
प्रतिमा देनो का नाम है, तथापि अदृष्ट से उत्पन्न होनेवाली 
प्रतिभा दूसरी है और व्युत्पत्ति तथा अभ्यास से उत्पन्न होने- 
वाली दूसरी, अतः अद्ृष्ट और व्युत्पत्ति--अभ्यास के कामे मे 
गाटाल्ा नहीं हो सकता । (इस बात को हम उदाहरण देकर 
स्पष्ट कर देतें हैं--जैसे गन्ने से भी शक्षर बनती है और चुकंदर 
से भी, और लड्डू देनों से वन सकते हैं, पर दोनों शक्कर 
भिन्न भिन्न प्रकार की होती हैं। इसी प्रकार पूर्वोक्त दे मिन्न 
भिन्न कारणों से उतपन्न होनेवाली देनों प्रतिभाएँ मिन्न सिन्न हैं 
और उन देनो से काव्य वन सकता है। ) बस, काव्य बनने 
के लिये किसी प्रकार की प्रतिभा होने की आवश्यकता: है। 
तात्पय यह कि दोनो प्रकार की प्रतिभाओं से एक ही प्रकार 
का काव्य बनता है, काव्य मे कोई भेद नहीं होता । दूसरा 
पक्ष यह है--देनें प्रतिभाओं से काव्य भी भिन्न भिन्न प्रकार 
के होते हैं--अर्थात्‌ अद्ृष्ट से जे प्रतिभा उत्पन्न होती है, उससे 
बना काव्य दूसरे प्रकार का द्ोता है और व्युत्पत्ति तथा अभ्यास 
से उत्पन्न हुई प्रतिभा से बना दूसरे प्रकार का। अतः उन 
दोनों कारणों के कार्यों का कही भी मिलान नहीं होता, वे 
दोनों ठेठ तक भिन्‍न ही भिन्न रहती हैं । 

इसके अनंतर एक वात और रह जाती है। वह यह कि-. 
जिन भलुष्यो मे व्युत्पत्ति और अभ्यास दोनो होते हैं, उनमे भी 


( २४ ) 


प्रतिभा क्‍यों नही उत्पन्न होती ? इसके विषय में हम पहले 
हो कह चुके हैं कि वे व्युत्पत्ति और अभ्यास विज्कक्षण ( विशेष 
प्रकार के ) होते हैं। उन लोगो मे वे वैसे नहीं होते; अतः 
उनसे काव्य नहीं वनाया जा सकता। अथवा, किसी बिशेप 
प्रकार के पाप को उनकी प्रतिभा का प्रतिबंधक मान लेना 
चाहिए। आप कहेगे कि आपको यह भूगड़ा नया उठाना 
पड़ा, ते हम कहते है--यह नया नहीं है, यह ते तीनो 
को इकट्ठे कारण माननेवाले श्र केवल प्रतिभा अथवा शक्ति 
को कारण माननेवाले--देने के लिये समान ही आवश्यक है, 
क्योंकि प्रतिवादी जब मत्रादिका से, कुछ दिनों के लिये किसी 
अनेक काव्य वनानेवाल कवि की भी वाशी को रोक देता है, 
तो उससे काव्य नहीं वनाया जाता, यह देखा गया है ।+ 

» यहाँ महौमद्ापाध्याय श्रीगगाघर शास्त्रीजी की टिप्पणी है, 
जिसका सारांश थह हे-प्रतिभा, व्युत्पत्ति ओर अभ्यासत--वीनें को 
सम्मिलित रूप में ही विशिष्ट कान्य का कारण मानना उचित है । विशिष्ट 
काव्य का अर्थ है अक्ौकिक वर्णन श्री निषुणता से युक्त कवि का कार्य । 
अब देखिए, शक्ति दो प्रकार की देती है--एक काज्य को उत्पक्ष करने- 
चाढी और दूसरी ( कवि को ) च्युत्पज्ञ करनेवाली । उनमें से दूसरी-- 
ब्युत्पादिका-शक्ति का नाम ही निषुणता है। और अभ्यास से 
काव्य में अलेकिकता आती है । पहली शक्ति से पद जोड़ देने पर 
भी दूसरी शक्ति के न होने पर विछक्षण वाक्यार्थ का ज्ञान न होते के 
कारण कवि मे श्रक्ोकिक वर्णन की निषुणता न हो। सकेगी । अत यही 
उचित है कि प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अम्यास तीनो के--सम्मिलित रूप 

--काब्य का कारण साना जाथ । 


( २४ ) 
काव्यों के भेद 


जिस काव्य के विषय में इतना विवेचन किया गया है, 
चह काव्य चार प्रकार का होता है। १--उत्तमोत्तम, २--- 
उत्तम, ३--मम्यम और ४--अघम । 


इस पर हमे कुछ छिखना है । सुनिए आचीन और नवीन सभी 
आचायों के मत से काव्य उसी रा नाम है, जो चमत्कारी हो, केवल 
तुकबदी-मात्र के किसी ने भी काच्य नहीं माना । अर्घातू जिसे आप 
विशिष्ट काव्य कहते है, उसी का नाम तो काव्य है। तब यह सिद्ध 
होता है--जिप्ते आप उत्पादिका शक्ति मानते है, वह काव्य की 
उत्पादिका तभी ह। सकती है, जब कि उसमें पूर्वोक्त कवि कर्म को 
उत्पन्न करने की योग्यता है, न कि केवल तुकबंदी करवा ढेने की । अत- 
एव काव्यप्रकाशकार का “शक्तिनिषुणता' ” इस हछोक की व्याख्या 
करते हुए, शक्ति के विषय मे यह लिखना सगत द्वोता है कि “शक्तिः 
कवित्ववीजरूप: संध्कारविशेषः, याँ बिना कान्य न श्रप्तरेत्‌, प्रसव वो- 
पहसनीय' स्थात्‌ ।” ( अथांत्‌ शक्ति एक प्रकार का सह्कार है, जो कि 
कविता का घीजरूप है, जिसके विना काव्य फेल नही सकता अथवा यों 
कहिए कि फेढने पर भी उण्हसनीय होता है। अन्यथा विना शक्ति 
के बनाए हुए काव्य के उपहसनीय लिखना कुछ भी तात्पय नरख 
सकेगा, क्योकि बिना शक्ति के काव्य उत्पन्न ही नही दाता, तब उपहास 
किसका होगा ? अतः यह सानना चाहिए कि काच्यप्रकाशकार के 
हिसाब से अनुपहसनीय अथवा आपके हिसाव से विशिष्ट काव्य के उत्पन्ष 
करनेवालो शक्ति का नाम ही, शक्ति है और उसे ही कहते है प्रतिभा । 
अतएूव जब किसी की रचना चमत्कारी नहीं होती तो हम कहते है 
कि कवि में अतिभा नहीं है। साधारण पढयेजना की शक्ति को प्रतिभा 





( २६ ) 
उत्तमोत्तम काव्य 

“/उत्तमोत्तम?” काव्य उसे कहते है, जिसमें शब्द और 
अथ्थ दोनो अपने को गाण ( अप्रधान ) बनाकर किसी चमत्कार- 
जनक अथ को अ्रभिव्यक्त करे--व्यजनाबत्ति से समझ्कावे | 

इस लक्षण मे 'किसी चमत्कार-जनक अथे को व्यक्त 
करे?” इस कथन से यह सिद्ध हुआ--जिसमे व्यग्य अत्यंत 
गूढ़ है| अथवा गत्य॑त स्पष्ट हो, वह काव्य उत्तमेत्तम नही हो 
सकता, क्योकि ऐसे व्यंग्यो की चमत्कारजनकता नष्ट हो जाती 
है। यही वात जिसमे व्यग्य सुंदर न हो, उसके विपय में भी 
समझे । अपरांग ( अर्थात्‌ किसी दूसरे अथे का अंग ) और 
वाच्यसिद्धय ग (अर्थात्‌ जिसके बिना वाच्य अथे सिद्ध ही न हो) 
व्यंग्य भी चमत्कारी होते है; अतः इस लक्षण से उन्तका भी 
प्रहण न हा जाय, इस कारण, लक्षण मे “अपने को गैश वना- 
कर”? कहद्दा गया है; जिसका यह अश्रमिप्राय है कि शब्द 
ओर अथे ( वाच्य ) देनों से व्यंग्य की प्रधानता होनी चाहिए, 
से। उन देनें मे नही होती, अत. वे भी उत्तमात्तम काव्य 
नहीं हो सकते | 





के रूप मे परिशत करना च्युत्पत्ति और अभ्यास का काम है। अत' 
उनको प्रतिमा का कारण सानना ही युक्तिसगत है, सहकारी मानना 
नहीं । सो तीनों के सम्मिलित रूप में कारण मानने की अपेक्षा अतिम 
दोनें के अ्रतिसभा का कारण सानना और केवल प्रतिभा को काज्य का 
कारण मानना, जैसा कि पंडितराज का मत है, उचित जेंचता है । 


( २७ ) 
उद्ाहरण-- 
शयिता सविधेज्प्यनीश्व॒रा सफलोकत्तमहे मनारथान्‌ | 
दयिता दयिताननाम्बुज॑ दरमीलन्नयना निरीक्षते ॥ 
कै |] ध्े क् 
साई सविध, सकी न करि सफल सनेग्थ मश्ल्‌ । 
निरखति कछु सीचे नयन प्यारी पिय-सुखकज्ञ ॥ 

प्रियवमा अपने प्रियतम के समीप साइ है; पर आश्चये है 
कि वह अपने मनारथे को सफल करने मे असमथ्थे है--- 
उसकी शक्ति नहीं है कि वह अपनी अभिल्लाषाओ के पूर्ण कर 
सके, अतः नेत्रो को कुछ कुछ सुकुलित करती हुई प्रियतम के 
मुख-कमल को देख रही है। 

इस श्लोक मे नायिका की रति के आलंवन नाण्क कं, 
पति-पत्नो के समीप सोने के कारण प्राप्त हुए एकांव-स्थान आठि 
उहीपन के, कुछ कुछ सुकुलित नेत्रो से देखने रूपी अनुभाव 
के, और देखने के कुछ कुछ होने के कारण व्यक्त हानेवाली 
लज्जा तथा देखने के कारण व्यक्त हानेवाले औत्सुक्य रूप 
व्यमिचारी भावो के संयोग से रति ( स्थायी भाव ) की अभि- 
व्यक्ति होती है--अथवा यों कहिए कि पति-पत्नी का पार- 
स्परिक प्रेम प्रतीत होता है। आलंवन आदि पदार्थों का स्वरूप 
( अर्थात्‌ वे क्‍या वस्तु हैं, यह ) आगे वर्णन किया जायगा | 

अब यहाँ एक शका उत्पन्न होती है--इस पद्य मे “रति की 
अभिव्यक्ति होती है?” यह न मानकर “ यदि यह से गया हो, 


( २८ ) 


ते मैं इसका मुँह चूम लूँ?” इस नायिका की इच्छा की ही अमि- 
व्यक्ति क्यों न सान ली जाय । इसका समाधान यह है---पद 
में लिखा है कि “बह अपने मनोारथों को सफल करने में 
असमर्थ है?” , जिससे यह सिद्ध होता है कि उसके हृदय मे सब 
मनेरथ विद्यमान हैं, और चुंबन की इच्छा भी एक प्रकार का 
सनारथ ही है---मने।रत्र शब्द से ही सामान्य रूप से उसका भी 
वर्णन हो जाता है; इस कारण वह वाच्य है, व्यंग्य नही । पर 
आप कहेगे कि सनोरथ शब्द से सामान्य इच्छा के वाच्य होने 
पर भो “चुंबन करूँ?” इस विशेष विषय से युक्त इच्छा के व्यंग्य 
होने मे क्या वाधा है? इसका उत्तर यह है कि--चमत्कार नहीं 
रहेगा, वस यहीं बाधक है; क्योंकि जे पदार्थ विशेष रूप से 
व्यंग्य हो, वह भी यदि सामान्य रूप से वाच्य हो जाय, ते 
उसकी सहृदयों के हृदय से चसत्कार उत्पन्न करने की, शक्ति 
नष्ट हो जाती है। अलंकार शास्त्र के ज्ञाताओं ने उसी व्यंग्य को 
चमत्कारी स्वीकार किया है, जे किसी तरह भी अमिधादृत्ति 
का स्पशे न करे। दूसरे, चुबन की इच्छा को जब रति का 
अनुभाव माने तभी वह सुंदर हे। सकती है; अन्यथा जिस प्रकार 
“चुंबन करता हूँ?” यह कहने मे कोई चमत्कार प्रतीत नहीं होता, 
उसी प्रकार उसमे भी कोई चमत्कार न हो सकेगा , अतः वह 
रति की अपेक्षा गौण ही है, प्रधान नहीं | 

इसी तरह इस श्लोक मे ल्जा सी (यद्यपि व्यग्य है, तथापि) 
मुख्यतया व्यंग्य नही हे! सकती । इसका कारण यह है कि 


( २८ ) 

“्ेत्रो को कुछ छुछ मुकुलित करती हुई” इस नायिका के 
विशेषश से लज्ञा भ्रमिव्यक्त होती है। श्लोक मे उस विशे- 
पण का सिद्ध वात क॑ झअनुवादरूप से बर्णन किया गया है, 
विधेयरूप मे नहीं--अर्थात्‌ उसका विधान नहीं है। तब उस 
विशेषण से पूर्णतया संवंध रखनेवालों जज ही इस श्लोक का 
प्रधान अथ है, यह नहीं कहा जा सकता । आप कहेंगे कि-- 
नही, श्लोक मे लिखा है कि ''नित्रो को कुछ कुछ सुकलित 
करती हुई'''“**देख रही है?”, इस कारण यह ते आपको 
भी मानना पड़ेगा कि श्लोक मे इस प्रकार देखने का विधान 
है, अत. वह अनुबाद्य अथे से ही पूर्णतया संवंध रखती है यह 
नहीं कहा जा सकता । हम कहते है कि ठोक; पर इस तरह 
भी लजा का कार्य आँखां का मीचना हे! सकता है, देखना 
नहीं। श्लोक मे आँखें के कुछ कुछ मीचने के साथ ही देखने 
का वर्णन किया गया है झौर देखना विना रति (आंतरिक प्रेम) 
के हे। नहीं सकता । यदि इस श्लोक से लजा को ही व्यक्त 
करना होता, ते “आँखे' मुकुलित कर रही है?” यही लिख 
देत, देखने की बात उठाने का कोई विशेष प्रयाजन नही रह 
जाता । श्रव सोचे! कि जिस प्रकार, अभिधादृत्ति के द्वारा, र॒ति 
के अनुभाव ( कार्य ) “देखने?” की अपेक्षा लब्गा का अनुभाव 
“आँखें का मीचना?” गौण हे रहा है, वह देखने का विशे- 
पण वन रहा है, उसी प्रकार, व्यजनावृत्ति के द्वारा, लज्जा 
का भी रति की अपेक्षा गौण होना ही उचित है । 


( ३० ) 

यह ते है रस ( सभोग खगार ) का उदाहरण--अर्थात्‌ 
इस पद्म के शब्द और अथे गौण होकर रति को व्यक्त करते 
हैं। इसी प्रकार भाव ( हर्ष आदि व्यमिचारी भाव ) भी 
अभिव्यक्त होते है। अच्छा, इसका भी उदाहरण लीजिए--- 

गुरुमध्यगता मया नताज्ञी निहता नीरजकेरकेण मन्दस्‌ | 
दरकुण्डलताण्डव॑ नतश्न लतिक मामवलोक्य धृर्णिता5ब्सीव्‌॥ 
ध् ध्‌ ड्ः ध् 
हनी ग़ुरूुन बिच नतम्ुखी कमलू-मुकुछ ते कूमि। 
कुण्डल कछुक नचाइ, सै नाइ, निरखि गइ घूमि॥ 

नायक अपने मित्र से कह रहा है--सास-ननद आदि 
गुरुजनों के वीच मे बैठो हुई अतएव ल्ज्जा के सारे नम्न प्रिय- 
तमा को, मैंने, हलके हाथ से, कमल की डोडी से मार दिया। 
उसने कुंडलो को कुछ नचाकर एवं सांहे नीची करके सुझे 
देखा और फिर (दूसरी तरफ) घूम गई--सुँह फेर लिया । 

इस पद्म मे “घूम गई” इस वाक्य से “ऐ। बिना 
सेचे समझे कर गुजरनेवाले | तेंने यह अलुचित कार्य क्‍यों 
कर डाला?! इस श्रथ से युक्त “अमष”? भाव प्रधानतया ध्वनित 
होता है; और उसकी अपेक्षा श्लोक के शब्द और अर्थ गौण 
हे। गए है--अर्थात्‌ उनमे वह मजा नहीं है, जो श्रमप॑ भाव 
की अभिव्यक्ति मे है । 

अब एक दूसरे विचार से उत्तमोत्तम काव्य का एक उदा- 
हरण और देते हैं। वह विचार यह ऐ--अवब तक जितने 


( ३१ ) 


अलंकार शास्त्र के आचाये हुए हैं, उन सबने रस भाव भआदि 
को असंलक्ष्यक्रमव्यंग्य माना है--प्र्थात्‌ इनके प्रतीत 
होने के पूरे विभावादिकों की उपस्थिति आवश्यक है और 
उनकी अभिव्यक्ति के अ्रनंतर ही रस भाव आदि की अमि- 
व्यक्ति द्वोती है; पर बीच के समय के भ्रति सूक्ष्म होने के 
कारण उनका क्रम ( पूर्वांपरभाव ) हमे ल्क्षित नहीं होता। 
यह एक नियत बात है, इससे विरुद्ध कभी नहीं होता | पंडित- 
राज का सिद्धात है कि रस भाव आदि संलक्ष्यक्रमव्यंग्य भी 
होते हैं--अ्र्थात्‌ उनके पूर्व विभाव आदि की प्रथक्‌ प्रतीति 
होकर, उसके अनंतर भी उनकी प्रतीति होती है। उदा- 
हरण लीजिए--- 


तल्पगता5पि च सुतनु। र्वास[सद्भ न या सेहे। 
सम्प्ति सा हृदयगरत प्रियपाएं मन्दमाक्षिपति ॥ 
भर ३ १ 
सेज सुद्दे हु सुतनु जो सांस परसि अकुछाय । 
वह अब पिय-कर हिय घर-थो हरुए रद्दी उठाय ॥ 
जे! सुकुमारी नववधू , पलंग पर सोई हुईं भी, श्वास के 
लगने मात्र से अद्ों का सिकाड़ने लगती थी--बही इस समय 
( पति के परदेश जाने की पहली रात्रि मे ) हृदय पर धरे 
हुए शंकायुक्त पति के हाथ को हटा रही है, पीछे अपनी 
जगह पहुँचा रही है; पर धीरे-धीरे । 


( ३२ ) 


यहाँ “धोरे घीरे हटा रही है?” इस कथन से रति नामक 
स्थायी भाव संलक्ष्यक्रम होकर व्यक्त हो रहा है। स्थायि- 
भावादिक भी संलक्ष्यक्रम व्य'ग्य होते है, यह भ्रागे सिद्ध 
किया जायगा | काव्य फे इसी (उत्तमात्तम) भेद को “'ध्वनि- 
काव्य”? कहा जाता है , 
अप्पय दीक्षित के विवेचन का खंडन 
यहाँ पर, अप्पय दीक्षित ( जो अलंकारशास्त्र के सुम्सिद्ध 
विद्वाब थे ) ने “चित्रमीमासा?” नामक ग्रंथ मे जे। एक ध्वनि- 
काव्य के उदाहरण का विवेचन किया है, उसका खेडन पंडित- 
राज ने, लिखा है। भ्रच्छा, आप वह भो सुन लीजिए-- - 
वह उदाहरण यों है । किसी नायिका ने एक दूती को श्रपने 
नायक के पास भेजा कि वह उसे बुल्ला त्वावे; पर वह स्वयं ही 
उससे रमण करके लैटी, और लगी इधर उधर की बाते बनाने । 
विदग्ध नायिका को यह बाव बहुत खटकी, पर बह इस बात की 
स्पष्ट कैसे कह सकती थी, अतः उसने उससे यों कहा-- 
निःशेषच्युतचदनं स्तनतर्ट निम हरागोज्यरो 
नेत्रे दूरमनखने पुछकिता तन्वी तवेय॑ तनु! । 
मिथ्यावादिनि दूति | वान्धवजनस्याज्ञावपीडागमे 
बापीं स्नातुमिते! गताउसे न पुनस्तस्याउधमस्या5न्तिकम्‌॥ 
है मूठ वालनेवाली दूती |! तू अपने बाँधव ( नायिका ) 
के ऊपर जो वीत रही है--उसे जो दुःख हो रहा है--उसे 


( ३३ ) 


नहीं जानती अतएव तू यहाँ से बाबवड़ी नहाने गई थी, उस 
अधम ( नायक ) के पास नहीं। यह तेरी दशा से सूचित 
हो रहा है। देख तेरे स्तनों के ऊपर के भाग का चंदन हट 
गया है, नीचे के होठ का रंग ( तांबूल का ) बिलकुल साफ 
हो गय है, नेत्र पूर्णतया ( पर आंतरिक भ्रमिप्राय यह है कि 
प्रांत भागो मे ) अंजन-रहित हो गए हैं और यह तेरा दुबला- 
पतला शरीर रोमांचित ही रहा है। 
इस पर शभ्रप्पय दीक्षित यों विवेचन करते हैं। वे कहते 
हैं कि “स्तनों का चंदन साड़ी की रगड़ से भी हट सकता है, 
इस कारण नायिका ने “सब” कहा; जिससे यह सिद्ध 
होता है कि सब चंदन ( बिना मर्दन के ) साड़ी की रगढ़ से 
नहीं हट सकता। पर नहाने से भी सब चंदन हट सकता है, 
इस कारण “ऊपर के भाग का? कहा; जिससे यह सिद्ध होता 
है कि तूने स्नान नही किया; क्योंकि यदि तू स्नान करती ते 
सब स्थान का चंदन उड़ जाता; पर तेरे ते केवल ऊपर के भाग 
का ही छड़ा है, ऐसा आलिगन से ही हे। सकता है। इसी प्रकार 
तांबूल लेने मे यदि देरी हे जाय ते द्वोठ का रंग फीका हो 
' सकता है; से नही है, यह समझाने के लिये उसने “बिलकुल 
साफ हो गया है? कहा; क्योंकि ऊपर के होठ के रौँगे हुए 
रहने पर नीचे का होठ बिना चुंबन के श्रेर किस तरह साफ 
हो सकता है ९” यहाँ से लेकर यह भी ध्वनि का उदाहरण 
है?” यहाँ तक के अंथ से यह सिद्ध किया गया है कि जो 


ब 0 ण्---जे 


( ३४ ) 


“ऊपरी भाग?”--आदि शब्दों से बने हुए वाक्‍्यों के अर्थ हैं, 
वे संभाग के अंग--आलिगन, चुंबन आदि के प्रतिपादन के 
द्वारा प्रधान व्यंग्य (संभाग ) के व्यक्त करने में सहायता करते 
हैं। भ्र्थात्‌ इस प्रकार के कथन से यह प्रकट होता है कि दूती 
की यद्द दशा संभोग से ही हुई है, अ्रन्य किसी भ्रकार नहीं । 

पंडितराज कहते हैं कि अप्पय दीक्षित का यह विवेचन 
अलंकारशास्त्र के तत्व को न समभने के कारण है; क्योंकि 
ऐसा करना--इन बातें का अन्य सब वस्तुओं से हटाकर 
केवल संभेग मे ही लगाना--सब पुराने अ्ंथों से एवं युक्ति से 
विरुद्ध है । देखिए--- 

काव्यप्रकाशकार! ने पंचम छल्बलास के अंत मे इसी उदा- 
हस्ण का विवेचन करते हुए कहा है-- पूर्वोक्त उदाहरण 
मे जे “चंदन का हटना? आदि लिखे हैं, वे दूसरे कारणों से 
भी हो सकते हैं, कंबल संभाग के द्वारा ही नहीं; क्योंकि 
इसी श्लोक में उनका स्नान का कार्य बताया गया है; इस 
कारण वे कार्य एक ही वस्तु से संबंध रखते हों ऐसे नही हैं, 
दूसरी वस्तुओं से भी हो सकते हैं?” और वहीं उन्हींने व्यक्ति- 
विधेक!”-कार का जे। यह मत है कि-- 
भम# धम्मिअ ! वी सत्थे से सुणओ अज्न मालिदे देश | 
गोलाणईकच्छकुड्ड्वासिणा दरी असीहेण ॥ 


८ किसी नायिका ने गोदावरी नदी के तीर-वर्च्ती एक कुज को अपना 
संकेतस्थान बना रखा था, पर वहाँ एक महात्माजी नित्य पुष्प लेने के 


( ३५ ) 


इत्यादिक स्थलों मे हेतु से कार्य-ज्ञान होता है, और “हेतु से 
कार्य के ज्ञान होने का नाम अनुमान है, और व्यंजना से भी 
यही वात होती है, अतः व्यंजन और अनुमान मे कोई भेद 
नहीं !? इसका खंडन करते हुए, “व्यभिचारी (अन्यगासी) 
और असिद्ध होने का जिन देतुओं मे सन्देह है, उनसे 
भी अथे ध्वनित हो सकता है, पर अनुसान नहीं हो सकता” 
यह खीकार किया है। इसी प्रकार “ध्वनि? ( व्यंजनावृत्ति 
और व्यंग्यों के प्रतिपादन के मूलअंथ ) के कर्चा ( राजानक 
आनंदवर्धनाचार्य) ने भी माना है । तव यह सिद्ध हुआ कि “जिन 
शब्दों भ्रथवा अर्थों से अन्य अथे ध्वनित होते है, वे ज्यंजक अर्थ 
साधारण ही होते हैं,--अर्धात्‌ वे व्यंग्य से भी संबंध रखते हैं, 
और अन्‍्यां से भी अनुमान की तरह असाधारण नहीं?” इस 
बात को प्रतिपादन करनेवाले प्रामाणिक विद्वानों के अंघों के 
साथ, उन व्यंजकों को अ्रसाधारण--किसी विशेष बस्तु से ही 
संबंध रखनेवाले---बतानेवाले तुम्हारे अंध का, विरोध स्पष्ट है | 
' लिये जाया करते थे; इस कारण संकेत का भंग होते देखकर उससे. 
उससे कहा-- 
हे धर्मचारिन्‌ ! अब आप विश्वस्त द्वोकर फिरते रहिए, क्योंकि 
जिस कुत्ते से आप डरा करते थे, उस कुत्त को, आज, गेदावरी नदी 
के जलूप्राय प्रदेश के कुंज मे रहनेवाले मत्त सिंह ने मार दिया। 
तातय थह है कि घर मे कुत्त से ढरनेवाले पंडितजी |! थदि आप 
कुंज भे पहुँचे तो फिर प्रायों का कुशछू नहीं है--उन्हें विदाई देनी ही 
पड़ेगी ) इस से यह अभिव्यक्त द्वाता है कि “आप वहाँ न जाइपएया [?? 


( हेई ) 


यह तो हुई पुराने अंथो से विशाध की बात। अब हम 
आपसे पूछते हैं--आप जो “सब चंदन हट गया है? 
इत्यादि वाक्या्थों' को बाबड़ी मे नहाने से हटाकर केवल 
संभोग के ही सिद्ध करने से क्वगा रहे हैं, से! क्‍यों लगा रहे 
हैं ? इससे व्यंग्य अथे निकल सके इसलिये १ सो ते है नही; 
क्योंकि व्यग्य अथे निकल्लने के लिये “उसको व्यक्त करनेवालों 
वस्तुएं उसी से संबंध रखनेवाली होनी चाहिएँ, वे और किसी 
से संबंध न रखे?” इस बात का होना आवश्यक नहीं है। 
देखिए, दूती नायक से संभोग करके नायिका के पास आई 
है। उसकी दशा देखकर नायिका उससे कहती है-- 
ओण्णिद दोब्बक्न' चिन्ता अलसत्तण स्णीससिअम्‌ । 
मह मन्द भाइणीए केरं सहि | तुद वि अहह ! परिहव३ ॥ 
है सखि ! हाय | मुझ मंदभागिनी के लिये तुझे भी जागरण, 
दुबेलता, चिंता, आलस्य और दम भरजाने ने दवा रखा है, 
तू भी इनसे दुःखित हो! रही है। यहाँ जागरण आदि बाते" 
जैसी संयेगिनी (दूती) मे हैं, वैसी ही वियेशगिनी ( नायिका ) 
मे भी हैं, एव ये ही बाते" रोगादि से भो हो सकती है; अतः 
ये सर्वथा साधारण बाते' हैं। पर इन्हीं बातों पर जब यह 
विचार करते है--इनकी कहनेवाली कान है और वह इन 
बातें को किससे किस अवसर पर कह रही है तो स्पष्ट हो 
जाता है कि वह उसके संभाग को लक्ष्य करके कद्द रही है। 
अतः यह सिद्ध हुआ कि किसी बात का साधारण अथवा झसा- 


( डे७ ) 

धारण होना उस बात से कोइ व्यंग्य नहीं निकाल सकता, किंतु 
उसका कहनेवाला कौन है, वह बात किससे कही जा रही है 
इत्यादि के साथ उसको समभने पर, व्यंजक साधारण हो अथवा 
असाधारण, व्यंग्य समझ मे आ सकता है । प्रत्युत यदि वह 
बात ऐसी हो। कि जे! किसी विशेष वस्तु से ही संबंध रखती हो, 
ते! बह अनुमान के अनुकूल देगी और व्यंजना के प्रतिकूल--- 
अर्थात्‌ उससे व्यजना नहीं, अपितु अनुमान होगा। अब 
यदि आप कहे कि ऊपरी भाग?” आदि शब्दों से रचित 
होने पर भी “सब चंदन उड़ गया है?” इत्यादि वाक्याथे असा- 
धारण न हुए; क्योंकि गीले कपड़े से पुँछ जाने आदि से भी 
वे बाते" हो सकती हैं; तो हम आपसे पूछते हैं कि बावड़ी 
के स्नान के हटा देने से क्‍या फंत्ञ हुआ, उसके लिये क्‍यों इतना 
परिश्रम किया गया ? क्योंकि जिस तरह एक स्थान पर व्यसि- 
चरित हेोना--संभोग के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु से संबंध 
रखना--अलुमान के प्रतिकूल है प्रौर व्यंजना के नहीं, उसी 
प्रकार अनेक स्थानों पर व्यभिचरित होना भी। शअ्रत: यह 
सब प्रयास व्यथ है। 

यह ते। हुई एक बात | भ्रब एक दूसरी बात और लीजिए। 
नायिका के इस कथन से यह व्यंग्य निकलता है कि “तू 
उसके पास' ही रमण करने गई थी” । विचारकर देखने से 
ज्ञात होगा कि यह व्यंग्य दे बातों से वता हुआ है। उनमे 
से एक बात है “उसके पास हीं गई थी” यह, और दूसरी है 


( रै८ ) 


वहाँ जाने का फल्ल रमण”? । इनसे से “उसके पास ही 
गई थी”? इस अंश को व्यंग्य सिद्ध करना, तुम्हारे हिसाब से, 
कठिन है। तुमने जो रीति बताई है, उसके अनुसार “सब 
चंदन हट गया?” इत्यादि विशेषण वाक्यों के भ्रथ बाबड़ी के 
स्नान मे तो लग नही सकते; क्योंकि तुमने वैसा करने मे बाधा 
उपस्थित कर दी है; समझता दिया है कि वे वापी-स्नान मे नही 
लग सकते, अतः वाच्याथ में सब वाक्य के जे! प्रधान अथे हैं 
कि “बावड़ी नहाने गई थी, उसके पास नहीं ग३”? इन शब्दों 
मे विपरीत लक्षणा करनी पड़ेगी, तब उनका यह प्रथ होगा 
कि “बावड़ी नहाने नही गई?”?, “उसके पास ही गई थी” । 
अर्थात्‌ वाच्य अर्थ मे जहाँ “गई थी?” कहा है, वहाँ “नहीं 
गई थी”? अथे करना पड़ेगा और जहाँ “नहीं गई थी”? कहा 
है, वहाँ “गई थी?” अथे करना पड़ेगा, भ्रन्यथा बात हीन 
बनेगो । और वाच्यार्थ के बाधित दोने पर जो अथे प्रकट 
होता है, वह व्यंजना से बेधित द्वोता है अथवा व्यंग्य होता 
है, यह कहना उचित नहीं; क्योंकि वह लक्षणा का ही विषय 
है व्यंजना का नही । जैसे “अटे पूर्ण” सरो यत्र ह्ुठन्तः स्नांति 
मानवा:---अर्थात्‌ झ्राश्चर्य है कि यह सरोचर पूरा भरा हुआ है, 
जिसमे मनुष्य लेटते हुए नहा रहे हैं?! इस वाक्य मे नहानेवाले 
मनुष्यों का विशेषण जो “'लेटते हुए”? है, उससे प्रकट होता 
है कि “ताल्ाव भरा हुआ नहीं है?! इस अथ को कोई भी 
व्यंग्य नहीं बदा सकता, यह लक्ष्य ही है। वव सिद्ध हुआ 


( रेड ) 

कि पूर्वोक्त व्यंग्य का एक अंश “उसके पास गई थो””? यह तो, 
आपके हिसाब से, व्यंग्य है नहीं, लक्ष्य है। 

अब यदि आप कहे कि “उसके पास ही गई थी”? इस 
झअश के लक्ष्य होने पर भी जे! जाने का फल है “रमण”, वह ते 
व्यंग्य ही रहा; क्योंकि वह ते लक्षणा से ज्ञात हे! नही सकता। 
से भी नही, क्योंकि आपने ही ““चित्रमीमांसा” मे लिखा है-- 
/“अधम शब्द का भ्रथ हीन है, और हीन दे प्रकार से हो! सकता 
है--एक जाति से, दूसरे कर्म से। से उत्तम नायिका भ्रपने 
नायक को जाति से हीन ते बता नहीं सकती......... हे 
इत्यादि | तब यह सिद्ध हुआ कि “रमण” भी अर्थापत्ति प्रमाण 
से स्पष्ट प्रतीत होता है; क्योंकि जे। बात किसी दूसरी रीति 
से उपस्थित हे। जाय, उसे शब्द का अथे नहीं माना जाता। 
पर यदि समझ लो कि “अर्थापत्ति?? कोई प्रथक्‌ प्रमाण नहीं 
है, जैसा कि कई एक दशेनकारों ने माना है, ते! वहों जाने का 
फल “रमण”? व्यंग्य हो सकता है, पर तथापि जो बात तुम 
चाहते हो, वह सिद्ध नहीं हो सकती। क्योंकि ' स्तनों के 
ऊपरी भाग का चंदन हटना” आदि एवं नायक की ''अ्रधमता”, 
ये जो वाच्य हैं, वे, तुम्हारे हिसाव से, केवल दूती के संभोग 
से ही सिद्ध हे सकते हैं, अन्य किसी प्रकार--अर्थान्‌ वावड़ी 
मे नहाने आदि--से नही; इस कारण यह काव्य गुणीभूत व्यग्य 
है| जायगा; क्योंकि बेचारे व्यंग्य को ही उन वाच्य अर्थों को 
सिद्ध करना पड़ेगा, से वह वाच्यों की अ्रपेत्षा गौण हो जायगा। 


( ४० ) 

तब तुमने जे! इसे '“ध्वनि-काव्य?”? माना है से न हे। सकेगा। 
इस तरह युक्ति के द्वारा भी तुम्हारा सव आड्डंबर व्यथे ही 
सिद्ध होता है। से अत्यंत चतुर नाणिका के कहे हुए इन 
विशेषणो का वाच्य अ्रथे (वापीस्नान) और व्यंग्य अथे (संभोग) 
देनों मे साधारण होना--दोनों मे बराबर क्ृग जाना--हीं 
उचित है, न कि एक ( संभोग ) ही मे लगना। 

तब उनको या लगाना चाहिए----''हे बांधव जन के ( मेरे ) 
ऊपर आई हुई पीड़ा को न जाननेवाली खाथ मे तत्पर दूती ! 
तू स्नान का समय न चूक जाय इसलिये, नदी और मेरे प्रिय 
देनें के पास न जाकर, मेरे पास से स्नान करने के लिये सीधी 
बावड़ी चली गई, उस, दूसरे की पीड़ा को ( जानते हुए भी ) 
न जानकर दुःख देनेवाले, अतएव अ्रधम के पास नहीं। यह 
तेरी दशा से सूचित होता है। देख, बाबडी मे बहुतेरे थुवा 
ज्ञोग नहाने के लिये भ्राया करते है, उनसे लज्ित होने के 
कारण, तूने अपने हाथों को कंधे पर धरकर और उनमे आऑटी 
लगाकर स्तनों को मला है; अतः ऊँचा होने के कारण स्तनों 
का ऊपरी भाग ही मल्ा जा सका और छाती का चंदन लगा 
ही रह गया । इसी वरह, जल्दी मे, अ्रच्छो तरह न धोने के 
कारण ऊपर के होठ का रंग पूरा न उड़ सका, पर नीचे के 
होठ मे कुछो के जल, दाँत साफ करने की अंगुली आदि की 
रगड़ अधिक लगती है, इस कारण वह बिल्कुल साफ है 
गया। नेत्रों मे जल केबल लग ही पाया, अतः ऊपर ऊपर 


( ४१ ) 


से ही काजल हट सका। इसी प्रकार तू दुब॒ली है और ठंड पड़ 
रही है, से शरीर रोमांचित हो गया है ।?” इस तरह चतुर 
नायिका की वक्ति के अभिप्राय का छिपा हुआ होना हो उचित 
है, नही ते! उसकी सब चतुराई मिट्टी में मिल जायगी । 

इस प्रकार जव इन वाक््यों के अथ साधारण होंगे, वे। 
मुख्य भ्रथे मे कोई वाधा न अवबेगी; अतः यहाँ लक्षणा के छिये 
स्थान ही न रहेगा। वाच्याथे समझते के अनंतर जब यह 
सोचेंगे कि यह बात कान किससे कह रहो है, वात नायक फे 
विषय की है; तब यह प्रतीत होगा--दुःख देने के कारण नायक 
को “अ्रधम” कहा जा रहा है। और देखिए, वह अधम शब्द 
वाच्य और व्यंग्य दोनों अथथों मे समान रूप से अन्वित हो जाता 
है। फिर, “नायक ने, पहले, जे किसी प्रकार की बुराइयाॉँ 
की थी, उसके हिसाव से, नायिका ने उसे दुःखदायी वताया है?” , 
वाच्य अथे मे इस प्रकार समझता हुआ अधम शब्द व्यंजना-शक्ति 
के द्वारा “दूती से संभाग करने के कारण जो उसका दुःखदायित्व 
हुआ है” उस रूप में परिणत हो जाता है---उस शब्द से यह 
सिद्ध हो जाता है कि “नायक ने दूती से संभोग किया है|?” 
यह है अलंकारशास्त्र के ज्ञाताओं के सिद्धांत का सार | 

इससे “अधम-शब्द का अथे हीन है, और हीन दे। प्रकार 
से हो सकता है--एक जाति से, दूसरे कमें से। से उत्तम 
नायिका अपने नायक को जाति से हीन ते वत। नहीं सकती | 
अब रही कर्म से हीनता, से। उसे भी, दूती के संभोग आदि, 


( ४२ ) 
जे अपने ( नायिका के ) अपराध बन सकते हैं, ऐसे कर्म के 
अतिरिक्त अन्य ते बता नहीं सकती । और वैसे कम भी जो 
दृती के भेजने के पहले हुए थे, वे ते! सब सह ही लिए गए 
हैं, सो उनका उघाड़ने की आवश्यकता नहीं। तब अंतसे- 
गला, सब बखेड़े के हटने के बाद, दूती का संभाग ही सिद्ध 
हवा है।? यह जो आप ( अप्पय दीक्षित ) ने लिखा है, 
वह भी खंडित हो। जाता है | क्योंकि चतुर और उत्तम नायिका 
सखियों के सामने, उसी ( दूती ) से संभाग करना जो अपने 
नायक का अपराध है, उसे स्पष्ट प्रकट करे, यह सर्वेधा अलु- 
चित है; अतः जिन पुराने अपराधों को धह सह चुकी है, वे 
बड़े असह्य थे, इस कारण उसे दूती के सामने उन्ही का भ्रति- 
पादन करना अभीष्ट था । बस, इतने मे सब समझ लीजिए | 
उत्तम काव्य ह 

जिस काढय सें व्यग्य चसत्कार-जनक ते है। 
पर प्रधान न हो, वह “उत्तम काव्य होता है ।' 

जो व्यंग्य वाच्य-अ्थ की अपेक्षा प्रधान हो! भ्ौर दूसरे 
किसी व्यंग्य की अपेक्षा गौण हो, उस व्यंग्य मे अतिव्याप्ति न 
हे। जाय, इसके लिये “प्रधान न हो?” लिखा है, और जिन 
वाच्य-चित्र-काव्यों मे व्यंग्य लीन हो जाता है--उसका कुछ 
भी चमत्कार नहीं रहता--कितु केवल अर्थालंकारों--उपमा- 
दिकां--की ही प्रधानता रहती है, उनमे अतिव्याप्ति न हो 
जाय, इसलिये लिखा है कि ““चमत्कार-जनक हो” । 


( ४३ ) 
यहाँ एक विचार श्रार है। काव्यप्रकाश के टीकाकारों 
ने “अतादइशि गुणीभूतव्य॑ग्य॑ व्यंग्ये तु सध्यमम?” इस गुणी- 
भूत व्यंग्य के लक्षण की व्याख्या करते हुए लिखा है कि “'गुणी- 
भूत च्यंग्य उसी का नाम है, जो “चित्र ( अलंकारप्रधान ) 
काव्य”? न हे। पर यह उनका कथन ठोक नहीं; क्योंकि 
पर्यायोक्ति, समासाक्ति आदि अलंकार जिनमे प्रधान हों, उन 
काव्यों मे अव्याप्ति हे जायगी--अर्थात्‌ उनका यह लक्षण न हो 
सकेगा । और होना चाहिए अवश्य, क्योंकि सभी अल्लंकार- 
शास्त्र के ज्ञाताओं ने उनको गुणीभूत व्यंग्य और चित्र दोनों 
माना है। प्तः जो चित्र-काव्य हो, वह गुणीभूत व्यंग्य न 
हो सके यह कोई बात नहीं। 
अच्छा, अब उत्तम काव्य का उदाहरण लीजिए-- 
राघवविरहज्वालासंतापितसह्यशैलशिखरेषु | 
शिक्षिरे सुख शयाना। कपयः कुप्यंति पदनतनयाय ॥ 
ध्‌ड कै कक छ 
रघुवर-विरद्दानल तपे सहा-शेल के श्रत । 
सुख सों साए, शिशिर से कपि कलोपे हनुम॑त ॥ 
भगवान्‌ रामचंद्र के विरहानल की ज्वालाओं से संतप्त 
सद्याचल के शिखरों पर, ठंड के दिनों मे, सुख से साए हुए 
बंदर हनुमान पर क्रोध कर रहे हैं । 
इस श्लोक का व्यंग्य भ्रथे यह है कि “जानकीजी की 
कुशलता सुनाकर हलुमान्‌ ने रामचंद्र को शीतल कर दिया, 


( ४४ ) 
उनका विरह-ताप शांत हो गया” और वाच्य-अथे है 'हनु- 
मान्‌ पर बंदरों का अकस्मात्‌ उत्पन्न होनेवाला क्रोध” | से 
यह वाच्य-अथे व्यंग्य के द्वारा ही सिद्ध होता है, क्‍योंकि 
पहले जब व्यंग्य के द्वारा यह समझ ज्लेते हैं--रामचंद्र का 
विरह शांत होने से सल्याचल के शिखर ठंडे हो गए, तब 
यह सिद्ध होता है कि--इसी कारण, ठंड के मारे, बंदरों ने 
हनुमान पर क्रोध किया ! अतः यह व्यग्य गौण हो गया, 
प्रधान नहीं रहा; क्योंकि वाच्य-अथे को सिद्ध करनेवाला 
व्यंग्य गौण हो। जाता है, यह नियम है। पर इस दशा मे 
भी, जिस तरह दुर्भाग्य के कारण कोई राजांगना किसी की 
दासी बनकर रहे, तथापि उसका अलुपम सौंदय मल्तकता ही 
है, ठीक उसी प्रकार इस व्यंग्य मे भी अनिरवेचनीय सुंदरता 
दृष्टिगोचर हो रही है। 

यहाँ एक शंका होती है--इसी तरह “तत्पगता($पि 
च सुतनुः... .. !? इस पूर्वोक्त ध्वनि-काव्य के उदाहरण से “हाथ 
का धोरे घीरे हटाना” भी नह दुलहिन के खभाव के विरुद्ध 
है; क्योंकि नवोढा के खभाव के अलुसार ते उसे कट हटा 
लेना चाहिए था; इस कारण वह वाच्य भी व्यंग्य ( प्रेम ) 
से ही सिद्ध किया जा सकता है--अर्धाव धीरे धीरे उठाना 
तभो सिद्ध है सकता है, जब हम यह समझ ले कि उसे पति 
से प्रेम होने लगा है, सो उसे उत्तमोत्तम काव्य कहना ठीक 


०. 


नहीं। इसका उत्तर यह है--प्रतिदिन के सखियों के 


( ४५ ) 
उपदेश आदि, जे कि विशेष चमत्कारी नहीं हैं, उनसे भी 
“धीरे घीरे उठाना?” सिद्ध हा सकता है, अतः उसके सिद्ध 
करने के लिये प्रेम ही की विशेष आवश्यकता हो, सो वात नही 
है। पर सहृदयों के हृदय मे जे पहले ही से यह वात उठ 
खड़ी होती है कि “यह वियाग के समय का प्रेम है”? उसे 
ध्वनित किए विना “धीरे धीरे उठाना??, खतंत्रता से, परम 
आनंद के आस्वाद का विषय बनने का सामथ्य॑ नही रखता | 
इसी तरह '“निःशेषच्युतचंदनम्‌. . .... .. ” आदि पद्चों मे भी 
“अधमता?? आदि वाच्य, व्यंग्य ( दूती-संभाग आदि ) के 
अतिरिक्त अर्थ के द्वारा तैयार किए गए है, और व्यंग्य अधथ 
को खय॑ प्रकट करते हैं, से वहाँ भी व्यंग्य के गाण होने की 
शंका न करनी चाहिए । 
उत्तमोत्तम और उत्तम सेदें मे कया अत्तर है ९ 

यद्यपि इन दोनों ( उत्तमोत्तम और उत्तम ) भेदों मे व्य॑ग्य 
का चमत्कार प्रकट ही रहता है, छिपा हुआ नहीं, तथापि 
एक मे व्यंग्य की प्रधानता रहती है और दूसरे मे अग्रधानता, 
इस कारण इनमे एक दूसरे की अपेक्षा विशेषता है, जिसे सह- 
दय पुरुष समझ सकते हैं । 

चित्र-मी्मांसा के उदाहरण का खंडन 

अच्छा, अब एक ““चित्रमीमांसा?? के उदाहरण का खंडन 
भी सुन लीजिए; क्योंकि इसके विना पंडितराज को कल्न नहीं. 
पड़ती । वह उदाहरण यह है-- 


( ४६ ) 


प्रहरविरतोा मध्ये बाहहृस्ततेडपि परेण था 

किम्रुत सकले याते वाउह्नि प्रिय त्वमिहेष्यसि ! 
इति दिनशतमप्राप्यं देश प्रियस्थ यियासते 

हरति गमन॑ वालाउंलापै! सवाष्पगलज्जले) ॥ 


“प्यारे | क्या आप एक पहर के बाद लौट आावेगे, या 
भध्याह् मे, अथवा उसके भो बाद ९ किंवा पूरा दिन बीत जाने 
पर ही लौटेगे ??, अश्रुधारा सहित, इस तरह की बातों से 
चालिका ( नवोढा ), जहाँ सैकड़ों दिनों मे पहुँचनेवाले हैं, 
उस देश मे जाना चाहते हुए प्रेमी के जाने का निपेध कर रही 
है-..उसे जाने से रोक रही है । 

इस पद्य मे “सारा दिन पूरी अ्रवधि है, उसके बाद मैं न 
जी सकूंगी” यह व्यंग्य है, और वाच्य है “प्यारे के जाने 
का निवारण” । अ्रव सोचिए कि “प्यारे का न जाना?” 
तभी हे! सकता है, जब कि वह यह समझ ले कि “यह एक 
दिन के वाद न जी सकेगी”; से। यह वाच्य-अशे पूर्वोक्त व्यंग्य 
से सिद्ध होता है, इस कारण यह काव्य “गुणीभूत व्यंग्य! 
( मध्यम ) है। यह है चित्रमीमांसाकार का कथन | 

अब पंडितराज के विचार सुनिए। वे कहते हैं--गुणी- 
भूत व्यंग्य का यह उदाहरण ठीक नही ; क्योंकि अश्रुधारा सहित 
“क्या आप एक पहर के वाद लौट आवेगे ??” इत्यादि कथन 
ही से “प्यारे का न जाना” रूपी वाच्य सिद्ध हो जाता है, 


( ४७ ) 

इस कारण ,व्य॑ग्य के गौण होकर उसे सिद्ध करने की कोई झाव- 
श्यकता नहीं । “बातो से. .,जाने का निवारण कर रही है”? 
इस कथन मे “बातों से?? यह ठतीया करय-अ्रथे मे है; अतः 
स्पष्ट है कि वे ( बाते' ) जाने के निवारण की साधक हैं। पर 
यदि आप कहें कि--व्यंग्य भी तो वाच्य को सिद्ध कर सकता 
है, इस कारण हमने उसे गुणीभूत लिखा है, तो यह भी ठीक 
नहीं, क्योकि यदि ऐसा करोगे तो ““निःशेषच्युतचंदनमू.,.”? 
आदिकों में भी दृती-संभाग?” आदि व्यंग्य भी नायक की 
अ्रधमता को सिद्ध करते हैं, इस कारण थे भी गुणीभूत हो 
जायेंगे। हाँ, यदि आप कहें कि “अश्रुधारा सहित ..बातो”” 
की तो “जाने के बाद बहुत समय तक न ठहरना”” यह सिद्ध 
कर देने से भी चरिता्थता हो सकती है; अतः व्य॑ग्य-सह्दित 
होने पर दही उनसे “जाने का निवारण” सिद्ध है सकता है; 
तो पंडितराज कहते हँ--अच्छा, “उसके बाद न जी सकूं गी”? 
इस व्यंग्य को वाच्यसिद्धि का अंग मानकर गौश समझ लीजिए; 
पर नायक-आदि विभाव, अश्रु-आदि अनुभाव एवं चित्त के 
आवेग भ्रादि संचारी भावों के संयोग से ध्वनित होनेवाले विप्र- 
लंभ-( गार के कारण इस काव्य को थध्विनि-काव्य” कहा 
जाय दो कौन मना कर सकता है# । 


«- इस बहस में पंडितराज भ्रप्पय दीक्षित को परास्त न कर सके; 
क्योंकि मध्य में प्रतीत होनेवाल्ले व्यंग्य के द्वारा भी ध्वनि एवं गुणीभूत 
व्यंग्य का व्यवहार होना काव्यप्रकाशकारादि साहिल के प्राचीन 


( ४८ ) 
मध्यम काव्य 
, जिस काव्य सें वाच्य-सथ का चमत्कार व्य ग्य 
अथ के चमत्कार के साथ न रहता हे।--उससे 
उत्कृष्ट हे।, अर्थात्‌ व्यग्य का चमत्कार स्पष्ठ न है। 
आर वाच्य का चमत्कार स्पष्ट श्रतौद्ठ होता हे। 
वह मध्यम काव्य हाता है। 
जेसे यमुना के वर्णन मे लिखा है कि--- 
तनयमैनाकगवेषणलर्म्च,कतजलघिजटरप्रविष्ट हिमगि 
रिशुजायमानाथा भागीरथ्या। सखी... .. । 
( यह यमुना ) उस भागीरथी की सखी है, जे, माना, अपने 
पुत्र मैनाक को हूंढ़ने के लिये लंबी की हुई एवं समुद्र के 
उदर में घुसी हुई हिमालय पव॑त की भुजा है । 
यहाँ संस्क्ृत से 'क्यडः ? प्रत्यय से और हिदी मे मानो? 
शब्द से वाच्य उत्प्रे्ञा ही चमत्कार का कारण है। यद्यपि 
यहाँ पर, गंगाजी में हिमालय परत की भुजा की उत््रेज्ञा की 
गई है, इस कारण “श्वेतता?” और “पुत्र मैनाक को हूं ढ़ने के 
लिये. . ,समुद्र के उद्र मे घुसी हुई!” इस कथन से “पाताज्ञ की 
तह तक पहुँचना?! व्यंग्य है, और उनका किसी अंश मे चमत्कार 
आधचार्यों को सम्मत है, अतः अत में विप्ररुृंभ-शगार के ध्वनित होने से 
इस काव्य को गुणीमूत व्य'ग्य न मानना कुछ भी अमभिग्राय नही रखता, 


अन्यथा काव्यप्रकाशकारादि के दिए हुए “आ्रामतरुण तरुण्या ” 
थ्रादि उदाहरण भी श्रसंगत हो जारूंगे, क्योकि थ्ेततोगत्वा विप्रद्॑ंभ 


की ध्वनि तो वे भी है ही । 


( ४४६ ) 

भी है ही; तथापि वह चमत्कार उत्प्रेत्ञा के चमत्कार के अंदर 
घुसा हुआ सा प्रतीत होता है, जैसे किसी ग्रामीण नायिका 
का गोरापन केसर-रस के ल्ेप के अंदर छिपा हुआ दिखाई देता 
हो। हॉ, इस बात मे कोई संदेह नही कि कोई भी वाच्य-अ्रथे 
ऐसा नही है, जो व्यंग्य अथे से थोड़ा वहुत संबंध रखे विना 
खत: रमणीयता उत्पन्न कर सके--अ्र्थांव्‌ वाच्य-अथे मे रम- 
णीयता उत्पन्न करने के लिये व्यंग्य का संवंध आवश्यक है ! 

वाच्य चित्रों को किस भेद मे समझना चाहिए ९ 

इन्हीं दूसरे और तीसरे ( उत्तम और मध्यम )भेदो 
मे, जिनमे से एक मे व्यंग्य जगमगाता हुआ होता है और 
दूसरे मे टिमटिमाता, सव अलंकारप्रधान काव्य भ्रविष्ट हो 
जाते हैं अर्थात्‌ वाच्यचित्र” काव्यों का इन्हीं दोनों भेदों 
में समाबेश है। 

अधम काव्य 

जिस काव्य में शब्द का चमत्कार प्रधान है। और 
झय्य का चमत्कार शब्द के चमत्कार के शोमित 
करने के लिये हा, वह “अधम काव्य?” कहलाता है; 

मित्रातिपुत्रनेत्राय त्रयीशात्रवशत्रवे । 
गोत्रारिगोत्रजत्राय गात्रात्रे ते नमो नमः | 

भक्त कहता है--सूये और चंद्र जिनके नेत्र हैं, जो बेदो 
के शत्रुओं ( असुरों ) के शत्रु हैं और इंद्र के वंशजो ( देव- 

२०-०४ 


( ५० ) 

ताओं ) के रक्षक हैं, उन---गोपाल् अथवा बृषभवाहन ( शिव )-- 
आपको बार-बार नमस्कार है। 

इसमे स्पष्ट दिखाई देता है कि अथे का चमत्कार शब्द मे 
लीन हे! गया है--हछोक सुनने से शब्द के चमत्कार की ही 
प्रधानता प्रतीत होती है, अथे का चमत्कार कोई वस्तु नहीं। 

अधमाधम भेद क्‍यों नहीं माना जाता । 

यद्यपि जिसमे अथे के चमत्कार से सवेधा रहित शब्द का 
चमत्कार हो, वह काव्य का पॉचवॉ भेद “अधसाधम?? भी इस 
गणना में आना चाहिए; जैसे--एकाक्षर पद्य, अर्धाइत्ति यमक 
और पद्मबंध प्रश्नति। परंतु आनंदजनक अथे के प्रतिपादन 
करनेवाले शब्द का नाम ही काव्य है, और उनमे आनंद- 
जनक अथे होता नहीं, इस कारण “काव्यलक्षण”? के हिसाब 
से वे वास्तव मे काव्य ही नही हैं। यत्ञपि महाकवियों ने 
पुरानी परंपरा के अनुरोध से, स्थान स्थान पर, उन्हे लिख 
डाला है, तधापि हमने उस भेद को काव्यों मे इसलिये नहीं 
गिना कि वास्तव मे जो बाव हो उसी का अलुरोध होना उचित 
है, आँखें मींचकर प्राचीनों के पीछे चलना ठीक नहीं । 

प्राचीनों के मत का खंडन 

कुछ लोग काव्यों के ये चार भेद भी नहीं मानते; वे-- 
उत्तम, मध्यम एवं अधम--तीन “प्रकार के ही काव्य मानते 
हैं। उनके विषय मे हमे यह कहना है कि अथथे-चित्र और 
शब्द-चित्र दोनों को एक सा--अधम--ही बताना उचित नहीं 


( ५१ ) 
क्योंकि उनका तारतम्य स्पष्ट दिखाई देता है। कान ऐसा 
सहृदय पुरुष होगा कि जे-- 
बविनिगेत॑ मानदमात्ममन्दिरा- 
द्रवत्युपश्रुत्य यदच्छया5पि यम । 
ससंभ्रमेन्द्रहुतपातितार्ग छा 
निरमीलिताक्षीव भिया5्परावती ||# 
एवस्‌ 


सच्छिन्नमूलः प़तजेन रेगु- 
स्वस्पे।परिष्टात्पवनावधूत; । 
अड्डारशेषस्य हुताशनस्य 
पूर्वोत्यितों धूम इवाउप्यभासे ॥ 





“- यह हथग्रीव राक्स का वर्णन है। इसका श्र्थ यों है--मित्रो 
के सम्मानदाता अथवा शत्रुओं के दपेनाशक जिस हयग्रीव का, स्वेच्छा- 
पूथेंक भी ( न कि किसी चढ़ाई आदि के लिये ), घर से निकछ॒ना सुन- 
कर, धबड़ाए हुए इंद्र के द्वारा शीघ्रता से डलछ॒वाई गई हैं अगले 
जिसमे ऐसी अ्रमरावती ( देवताओं की पुरी ), माना, दर के मारे 
आँखे भीच लेती है। 

यह रण-वर्णन है | इसका अधे यो है--वैड़ों की ठापों आदि से 
जो रज उडी थी, उसकी जड़ ( पृथ्वी से सदा हुआ भाग ) रुघिर ने काट 
दी, भार वह उस रुघिर के ऊपर डी ऊपर उड़ने छगी । वह ( रज ) ऐसे 
शोभित होती थी, माने।, आग के केवल शैँगारे शेष रह गए हैं और 
उससे जो पहले निकल चुका था, वह छुर्म्रा ( ऊपर उड़ रहा ) है । 


( भर ) 
इत्यादि काव्यों के साथ 


खच्छन्दोच्छलद॒च्छकच्छकुदर च्छातेतरा म्बुच्छटा- 

मूच्छेन्मोहमहपिं हषेविहितस्नानाहिकाज्हाय व! । 

भिन्‍्यादुच्य दुदारददुरदरी दीघांदरिद्रहुम- 

द्रोहों कमहेर्मिमेदुरमदा मंदाकिनी मंद्तास्‌ ॥# 
इत्यादि काव्यों की, जिनका केवल साधारण श्रेणी के 
मनुष्य सराहा करते हैं, समानता बता सकता है। और 
यदि तारतम्य के रहते हुए भी दोनो को एक भेद 
बताया जाता है, ते! जिनमे बहुत ही कम (व्यंग्य की 
प्रधानवा और अप्रधानता का ही ) अंतर है, उन “ध्वनि” 
और “गुणीभूतव्यंग्य”ः को प्रथक्‌ प्रथक भेद मानने के 
लिये क्‍यों दुराप्रह है ? अतः काव्य के चार भेद मानना 
ही युक्तियुक्त है। 

शब्द-अर्थ दोनों चमत्कारी हों, तो किस भेद मे समावेश 
करना चाहिए ? 


* बह गन्जा आपके अज्ञान को शीघ्र नष्ट करे, जिसके स्वतंत्र उछ- 
छते हुए और स्वच्छ जलम्राय प्रदेश के खट्डों के प्रबल जक की परंपरा 
महपियों के अ्रश्ञान का नाश करनेवाली है और जिस जलूपरम्परा मे थे 
छोग स्नान एवं नित्यनियम किया करते हैं, जिघ्तकी कंदराओं में, तरंगो 
की चोट से ऊपर का भाग गिर जाने के कारण, बडे बढ़े मेढठक दिखाई 
देते है और विस्तृत एव' सघन बृक्षो के गिराने के कारण अधिकता से 
युक्त लहरे ही जिसका गहरा मद है । 


( ४३ ) 


जिस काव्य में शब्द और अथे दोनों का चमत्कार 
एक ही साथ हो, वहाँ यदि शब्द-चमत्कार की प्रधानता हो, 
ते अधम और अ्रधे-चमत्कार की प्रधानतां हो, ते मध्यम 
कहना चाहिए। पर यदि शब्द-चमत्कार और अधे-चम- 
त्कार दोनों समान हों, ते! उस काव्य को मध्यम ही कहना 


चाहिए। जेसे-- 


उल्लास; फुल्पड्न रुहपटलपतन्मत्तपुष्पन्धयानां 

निस्‍्तारः शेकदाबानलबिकलहदां केकसीमन्तिनीनाम्‌ । 

उत्पातस्तामसानामुपहतमहसां चश्षुषां पष्पातः 

संपातः काउपि धाम्नामयमुद्यगिरिप्रांततः प्रादुरासीत्‌ ॥ 

खिले हुए कमलो के मध्य से निकलते हुए (राव भर मधघु- 

पान करके ).मत्त श्रमरों का उल्लास ( आनंददाता ), शोकरूपी 
दावानल से जिनका हृदय विकल हो रहा था, उन चक्रवाकियों 
का निस्तार ( दुःख मिटानेवाला ), जिन्होने तेज को नष्ट कर 
दिया था, उन अंधकार के समूहों का उत्पात (नष्ट करनेवाल्ञा) 
आर नेत्रो का पक्षपात (सहायक) एक तेज का पुज उदयाचल 
के प्रांत से प्रकट हुआ | 


इस छछ्ोक में शब्दों से वृत्त्यनुप्रास की अधिकता और 
झ्रेजगुण के प्रकाशित होने के कारण शब्द का चमत्कार है, 
और प्रसाद-गुण-युक्त होने के कारण शब्द सुनते दी ज्ञात हुए 
“हूपक?? अथवा “हेतु”? अल्टार रूपी अर्थ का चमत्कार है। 


( २४ ) 
से क्ोक मे देनों--शब्द और अथे के चमत्कारों--के समान 
होने के कारण दोनों की प्रधानता समान ही है; इस कारण 
इसे मध्यम काव्य कहना ही उचित है। हिंदी मे,«इस श्रेणी 
मे, पद्माकर के कितने ही पच्च आ सकते हैं । 


धवनि-काव्य के भेद 


काव्य का उत्तमोत्तम भेद जे। “ध्वनि” है, उसके ययपि 
असंख्य भेद हैं, तथापि साधारणतया झुछ भेद यहाँ लिखे जाते 
हैं। ध्यनि-काज्य दे प्रकार का होता है---एक अमिघधामूलक 
और दूसरा लक्षणामूलक । उनसे से पहला भर्थात्‌ अमिधा- 
मूलक ध्वनि-काव्य तीन प्रकार का है--रसध्वनि, वस्तुप्वनि 
और अलट्टारध्वनि । “रसध्वनि?? यह शब्द यहाँ असंलक्ष्य- 
क्रम-ध्वनि ( जिसमे ध्वनित करनेवाले और ध्वनित होने के मध्य 
का क्रम प्रतीत नहीं होता ) के लिये लाया गया है, अतः 
“/रस-ध्वनि?? शब्द से रस, भाव, रसाभास, भावाभास, 
भावशांति, भाषोदय, भावसंधि और भावशबल्॒ता सबका 
प्रहण समझना चाहिए। दूसरा ( लक्षणामूलक ध्वनि-काव्य ) 
दे! प्रकार का है--अ्थोतरसंक्रमित वाच्य और अत्यंत- 
तिरस्कृत वाच्य। इस तरह ध्वनिकाव्य के पाँच भेद हैं। 
उनमे से “रस-ध्वनिःः सबसे अधिक रमणीय है, इस 
कारण पहले रस-ध्वनि का आत्मा जे “रस” है, उसका 
वर्णन किया जाता है! 


रस का स्वरूप और उसके विषय में ग्यारह मत 


प्रधान चत्तषण 


(१) 
अमिनवशुप्ताचाये और मम्मट भट्ट का सत 
(क) - 
सहृदय पुरुष, संसार मे, जिन रति-शोक आदि भावों का 
अनुभव करता है, वह कभी किसी से प्रेम करता है और कभी 
किसी का साच इत्यादि, उनका उसके हृदय पर संस्कार जम 
जावा है--वे भाव वासनारूप से उसके हृदय में रहने लगते है। 
वे ही वासनारूप रति आदि स्थायी भाव, जो एक प्रकार की 
चित्तवृत्तियोँ हैं और जिनका वर्णन आगे स्पष्ट रूप से किया 
जायगा, जब खत: प्रकाशमान और वास्तव में विधमान 
आत्मानंद के साथ अनुभव किए जाते हैं, ते। “रस” कहलाने 
लगते हैं| पर उस आलनंदरूप आत्मा के ऊपर अज्ञान का आव- 
रुण आया हुआ है--वह अज्ञान से ढेंक रहा है; और जब 
तक उस आत्मालंद का साथ न हो, वब तक वासनारूप रतति 
आदि का अनुभव किया नहीं जा सकता। अ्रतः उसके उस 
आवरण को दूर करने के लिये एक अलौकिक क्रिया उत्पन्न की 
जाती है। जब उस क्रिया के द्वारा अज्ञान, जे उस आनंद 
का आच्छादक है, दूर हे! जावा है, ते! भ्रतुभवकर्ता मे जो 
अर्पज्ञता रहती है, उसे जे कुछ पदार्थों का बोध होता है और 


( ५६ ) 


कुछ का नही, वह लुप्त हे जाती है; और सांसारिक मेद-भाव 
निन्वत्त होकर उसे आत्मानंद सहित रति आदि स्थायी भावों का 
अनुभव होने लगता है। पूर्वोक्त अज्नौकिक क्रिया को विभाव 
अलुभाव और संचारी भाव उत्पन्न करते हैं--अर्थात्‌ वह उन 
तीनों के संयोग से उत्पन्न होती है। 

अब यह भी समम्चिए कि विभाव, अनुभाव और संचारी 
भाव क्या पस्तु हैं। जो रति आदि चित्तवृत्तियों आत्मानंद के 
साथ अनुभव करने पर रसरूप मे परिणत होती हैं, वे जिन 
कारणों से उत्पन्न होती हैं, वे दो प्रकार के होते हैं। एक 
वे जिनसे वे उत्पन्न होती हैं और दूसरे वे जिनसे वे उद्दीप्त की 
जाती हैं, उन्हे जोश दिया जाता है। जिन कारणों से उत्रन्न 
होती हैं, उन्हें आलंबन कारण कहते हैं श्रौर जिनसे वे उद्दीप् 
की जाती हैं, उन्हे उद्दोपप । इसी वरह पूर्वोक्त चित्तबृत्तियों 
के उत्पन्न होने पर, शरीर आदि मे कुछ भाव उत्तन्न होते हैं, 
जो उनके कार्य होते हैं। और इसी प्रकार जब वे चित्तवृत्तियाँ 
उत्पन्न होती हैं ते उनके साथ अन्यान्य चित्तवृत्तियाँ भी उत्तन्न 
दोती हैं, जो सहकारी होती हैं श्रौर उन चित्तवृत्तियों की सहा- 
यता करती हैं | इस बात को हम उदाहरण देकर समझा देते 
हैं। भान लीजिए कि शकऊुंतला के विषय मे दुष्यंत की अत- 
रात्मा मे रति अर्थात्‌ प्रेम उत्पन्न हुआ, ऐसी दशा मे रति का 
उत्पादन करनेवाली शकुंतला हुई; अतः वह प्रेम का आलंबन 
कारण हुई। चॉदनी चटक रही थी, वनलताएँ कुसुमित हो 


( ४७ ) 
रही थों; अतः वे और वैसी ही अन्य वस्तुएँ उद्दोपन कारण 
हुईं। श्रव दुष्यंत का प्रेम दृढ़ हे! गया और शक्कु॑तला के प्राप्त 
न होने के कारण, उसके वियाग मे, उसकी आँखें से लगे अश्रु 
गिरने । यह अश्रुपात उस प्रेम का कार्य हुआ। श्र इसी 
तरह उस प्रेम के साथ साथ, उसका सहकारी भाव, चिता 
उत्पन्न हुईं। वह सोचने लगा कि मुस्ते उसकी प्राप्ति कैसे हो ! 
इसी तरह शोक आदि से भी समकोा। पूर्वोक्त सभी वातें 
को हम संसार मे देखा करते हैं। अब पूर्वोक्त प्रक्रिया के अनु- 
सार, संसार मे, रति आदि के जा शकूंतला आदि आलंवन 
कारण होते हैं, चॉदनीआदि उद्दीपन कारण होते हैं, उनसे 
अश्रुपातादि काये उत्पन्न होते हैं और चिता आदि उनके सह- 
कारी भाव हेते हैं, वे ही जव, जहाँ जिस रस का वर्णन हो, 
उसके उचित एवं ललित शब्दों की रचना के कारण मनेाहर 
काव्य के द्वारा उपस्थित होकर सहृदय पुरुषों के हृदय मे प्रविष्ट 
होते हैं, तब सहृदयता और एक प्रकार की भावना--अर्थात्‌ 
काव्य के वार बार अनुसंधान के प्रभाव से, उनमे से “शकूंतला 
दुष्यंत की स्री है?” इत्यादि भाव निकल जाते हैं, और अलौकिक 
बनकर- संसार की वस्तुएँ न रहकर---जे कारण हैं वे विभाव, 
जे काये है बे अनुभाव और जो सहकारी हैं वे व्यभिचारी भाव 
कहलाने छ्गते हैं। बस, इन्ही के द्वारा पूर्वोक्त अक्ञौंकिक 
क्रिया के द्वारा रसें की अभिव्यक्ति होती है। 
इसी वात को भम्मटाचार्य काव्यप्रकाश मे कहते हैं-- 


( ५८ ) 


व्यक्त; स तेवि भावाद्येः स्थायी भावों रसः स्पृतः । 

अर्थात्‌ स्थायी भाव ( रति आदि ) जब पूर्वोक्त विभावा- 
दिकों से व्यक्त द्वोता है तो “रस”? कहलाता है | कौर “व्यक्त 
होने?” का अ्रथ यह है कि जिसका अज्ञान रूप आवरण नष्ट हो गया 
है, उस चैतन्य का विषय होना--उसके द्वारा प्रकाशित होना । 
जैसे किसी बेरा आदि से ढेंका हुआ दीपक, उस ढककन के हटा 
देने पर, पदार्थों को प्रकाशित करता है और स्वय भी प्रका- 
शित द्वोता है, इसी प्रकार आत्मा का चैतन्य विभावादि से 
मिश्रित रति आदि को प्रकाशित करता और स्वयं प्रकाशित 
होता है। रति भादि अंतःकरण के धर्म हैं और जितने अंतः- 
करण के धर्म हैं, उन सबको “साज्षिसात्य”” माना गया है। 
“साक्तिभास्य”” किसे कहते हैं से भी समक लीजिए। संसार 
के जितने पदार्थ है, उनका आत्मा अंतःकरण से संयुक्त होकर 
भासित करवा है और अंतःकरण के धमें--प्रेम आदि--उस 
साक्षात्‌ देखनेवाल्ले आत्मा के ही द्वारा प्रकाशित द्वोते हैं। अब 
यह शंका होती है कि रति आदि, जो वासनारूप से अतःकरण 
मे रहते हैं, उनका फेवल आत्मचैतन्य के द्वारा बोध हे! सकता 
है: पर विभाव आदि पदा्थों--अर्थात्‌ शकुंचला आदि--का 
उसके द्वारा, कैसे भान होगा ? इसका उत्तर यह है कि जैसे 
सपने मे थेड़े आदि और जागते मे ( भ्रम होने पर ) रॉगे मे 
चॉदी आदि साक्तिभास्य ही होती हैं, केवल आत्मा के द्वारा हो 
उनका भान होता है; क्योंकि वे कोई पदार्थ वे हैं नही, केवल 


( ८ ) 


कल्पना है; उसी प्रकार इन ( विभावादि ) को भो साक्षिभास्य 
मानने मे कोई विराध नहीं। अब रही यह शंका कि रस 
नित्य नही कहा जाता; क्योंकि वह भी उत्पन्न हेनेवाली और 
नष्ट होनेवाली वस्तु के समान है, उसकी सदा ते स्फूर्ति होती 
नहीं; अतः व्यवहार से विरोध हो जायगा। से इसका समाधान 
यह है कि--रस को ध्वनित करनेवाले विभावादिका के 
( क्योंकि ये कल्पित है ) अ्रथवा उनके संयोग से उत्पन्न किए 
हुए अज्ञानरूप आवरण के भंग की उत्पत्ति और विनाश के 
कारण रस की उत्पत्ति और विनाश मान लिए जाते हैं। जैसे 
कि वैयाकरण लोग भ्क्षरों को नित्य मानते हैं, तथापि बर्णों को 
व्यक्त करनेवाले ताह्लु श्रादि स्थानों की क्रियाओं की उत्पत्ति और 
विनाश को अकार प्रादि अ्र्षरो की उत्पत्ति और विनाश मान 
लेते है। तब यह सिद्ध हुआ कि जब तक विभावादिकों की 
चर्वणा होती है--उनका अनुभव होता रहता है, तव तक 
आत्मानंद का आवरण भंग होता है और आवरण भंग होने 
पर ही रति आदि प्रकाशित होते हैं; अतः जब विभावादिकों 
की चर्बणा निद्ृत्त हो जाती है, तब प्रकाश ढेंक जाता है, 
इस कारण स्थायी भाव यद्यपि विद्यमान रहता है, तथापि 
हमे उसका अनुभव नहीं होता । 
(ख़) ब 

पहले पक्ष मे यह बतल्ाया गया है कि विभावादिकों के 

संयोग से एक अलौकिक क्रिया उत्पन्न होती है और उसके द्वारा 


( ६० ) 

पूर्वोक्त रीति से रस का आत्वादन होता है, पर इस अलौकिक 
क्रिया के न सानने पर भी काम चत्न सकता है, इस अमिप्राय 

से कहते हैं---अथवा यों समभना चाहिए--- 
सहदय पुरुष जो विभावादिकों का आस्वादन करता है, 
उसका सहृदयता के कारण, उसके ऊपर गहरा प्रभाव पड़ता है 
और 5स प्रभाव के द्वारा, काव्य की व्यंजना से उत्पन्न की हुई 
उसकी चित्तवृत्ति, जिस रस के विभावादिकों का उसने आत्वादन 
किया है, उसके स्थायी,भाव से युक्त अपने स्वरुपान॑द का, जिसका 
वर्णन पहले हो चुका है, अपना विषय बना लेती है--अर्थात्‌ 
तन्‍्मय हो जाती है, जैसी कि सविकल्पक+# समाधि मे योगी की 
चित्तवृत्ति हो जाती है। तात्पये यह कि उसकी चित्तत्ृत्ति को 
उस समय स्थायी भाव से युक्त आत्मानंद के अतिरिक्त अन्य 
किसी पदार्थ का बेध नही रहता । भश्रर्थात्‌ पूर्वोक्त व्यापार के 
बिना, विभावादिकों के आस्वादन के प्रभाव से ही, चित्तवृत्ति 
रति आदि सहित आत्मानंद का अनुभव करने लगती है। यह 
आनंद अन्य सांसारिक सुखें के समान नहीं है, क्योंकि वे सब 
सुख अंतःकरण की बृत्तियों से युक्त चैतन्यरूप होते हैं, उनके 
अनुभव के समय चैतन्य का और झंतःकरण की इत्तियों का 
+ समाधिया दो प्रकार की है--एक सप्रज्ञात और दूसरी असंप्र- 
ज्ञात; इन्हो का नाम सविकल्पक और निधि कल्पक भी है। सचिक- 


ल्‍्पक समाधि में ज्ञाता और श्य का एथक्‌ एथक्‌ भजुर्सधान रहता है; पर 
निवि कर्पक मे कुछ नहीं रहता, येगी ब्रक्मानंद मे लीन हो जाता है 


( ६१ ) 
योग रहता है; पर यह आनंद अंतःकरण की वृत्तियों से युक्त 
चैतन्यरूप नही, कितु शुद्ध चैतन्यरूप है; क्योंकि इस अनुभव 
के समय चित्तवृत्ति आनंदमय हो जाती है और आनंद अनव- 
चिछज्न रहता है, उसका अंतःकरण की वृत्तियों के द्वारा 
अचच्छेद नही रहता । 
इस तरह, अभिनवगुप्ताचाये ( “ध्वनि”? के टीकाकार ) 
झौर मम्मट भट्ट ( काव्यप्रकाशकार ) आदि के अंथों के 
वास्तविक तात्पयं के अनुसार “अज्ञानरूप आवरण से 
रहित जो चेतन्य है, उससे युक्त रति आदि स्थायी भाव ही 
'रसः हैं? यह स्थिर हुआ | 
(ग) 
वास्तव मे तो आगे जो श्रुति हम लिखनेवाले हैं, उसके 
अनुसार, रति आदि से युक्त और आवरण-रहित चैतन्य का 
ही नाम 'रसः है। 
अस्तु, कुछ भी हो, चाहे ज्ञानरूप आत्मा के द्वारा प्रका- 
शित होनेवाले रति आदि को रस माने! अथवा रति आदि के 
विषय मे होनेवाले ज्ञान को; देनों ही तरह यह अवश्य सिद्ध 
है कि रस के खरूप मे रति और चेतन्य दोनों का साथ है। 
हा, इतना भेद अवश्य है कि एक पत्त में चैतन्य विशेषण है 
और रति आदि विशेष्य और दूसरे पतक्त मे रति आदि विशेषण 
हैं पैर चेतन्य विशेष्य । पर दोनों ही पत्तो मे, विशेषण 
अथवा विशेष्य किसी रूप मे रहनेवाले चैतन्यांश का लेकर 


( ६२ ) 

रस की नित्यता और खतःप्रकाशमानता सिद्ध है और 
रति आदि के ओश को लेकर अनित्यता और दूसरे के 
द्वारा प्रकाशित होना । 

चैतन्य के आवरण का निवृत्त हो जाता--उसका अज्ञान- 
रहित हो जाना--ही इस रस की चर्बशा (आखादन) कहलाती 
है, जैसा कि पहले कह आए हैं; अथवा अंतःकरण की 
बृत्ति के आलंदमय हे! जाने को ( जैसा कि दूसरा पक्त है ) 
रस की चर्वेणा समक्तिए। यह चववेशा परत्रह्म के आखाद-रूप 
समाधि से विलक्षण है, क्योंकि इसका आलंबन विभावादि 
विषयों ( सांसारिक पदार्थों ) से युक्त आत्मानंद है और समाधि 
के आनंद मे विधय साथ रह नहीं सकते । यह चर्वणा केवल 
काव्य की व्यापार-व्यंजना से उत्पन्न की जाती है! 

अब यह शंका है। सकती है कि इस आखादन में सुख 
का अंश प्रतीत होता है, इसमे क्‍या प्रमाण है ? हम पूछते हैं 
कि समाधि मे भी सुख का भान होता है, इसमे क्‍या प्रमाण 
है? प्रश्न दोनों मे बराबर ही है। आप कहेंगे-- 

“सुखभात्यन्तिक॑ यत्तद बुद्धिभाह्ममतीन्द्रियम्‌? (भगवद्वीवा) 
“अर्थात्‌ समाधि मे जो अत्यंत सुख है, उसे बुद्धि जान सकती 
है, इन्द्रियाँ नही |” इत्यादि शब्द प्रमाणरूप मे विद्यमान हैं; 
ते। हम कहेगे कि हमारे पास भी दे प्रमाण विद्यमान हैं। 
एक ते “रसे बै सः?? ( अर्थात्‌ वह आत्मा रसंरूप है ) और 
“रस हामचाएये लब्ध्वाएएनेदीमवतिः?ः ( रस को प्राप्त होकर ही 


( ६३ ) 


यह आनंदरूप होता है ) ये श्रुतियों और दूसरा सव सहृदयों 
का प्रत्यक्ष। आप सहृदयों से पूछ देखिए कि इस चर्वणा में 
कुछ आनंद है अथवा नहीं।  खर्य अमिनवशुप्ताचाय लिखते 
हैं-जे यह दूसरे ( ख ) पक्ष मे 'बित्तवृत्ति के आनंदमय हो 
जाने? को रस की चर्वणा वताई गई है, वह शब्द की व्यापार- 
व्यंजना से उत्पन्न होती है, इस कारण शब्द-प्रमाण के द्वारा 
ज्ञात होनेवाली है और प्रत्यक्ष सुख का भ्रालंवन है--इसके 
द्वारा सुख का प्रत्यक्ष अनुभव होता है, इस कारण प्रत्यक्ष 
रूप है; जैसे कि “तत्वमसि?”ः आदि वाक्यों से उत्पन्न 

होनेवाला नह्मज्ञान । 

(२) 
थट्टननायक का मत 

साहित्य शास्त्र के एक पुराने आचाये भट्टनायक का कथन 
है कि--तटस्थ रहने पर--रस से कुछ संवंध न होने पर---यदि 
रस की प्रतीति मान ली जाय ते रस का आखादन नही हो 
सकता , ओऔर “रस हमारे साथ संवंध रखता है? यह प्रतीत 
होना वन नहीं सकता, क्ष्योंकि शक्कंतलादिक सामाजिकों 
( नाटक देखनेवाले आदि ) के तो विभाष हैं नहीं--वे उनके 
प्रेम आदि का ते आलंवत हो नही सकती; क्योंकि सामा- 
जिकों से शकुंतता आदि का लेना देना क्या ? और विना 
विभाव के आल्लंबनरहित रस की श्रतीति हो नहीं सकती; 
क्योंकि जिसे हम अपना प्रेमपात्र समझना चाहते हैं, उससे 


( ६४ ) 


हमारा कुछ संबंध तो अवश्य होना चाहिए--उसमे वह 
योग्यता होनी चाहिए कि वह हमारा प्रेमपात्र बन सके | आप 
कहदेगे कि स्त्री होने! के कारण वे साधारश रूप से विभाव 
बनने की योग्यता रख सकती हैं। से यह ठीक नहीं । 
जिसे हम विभाव ( प्रेमपात्र ) मानते हैं, उसके विषय मे हमे 
यह ज्ञान अ्रवश्य होना चाहिए कि वह हमारे लिये अगस्य नहीं 
है---उसके साथ हमारा प्रेम हो सकता है?, और वह ज्ञान भी 
ऐसा होना चाहिए कि जिसकी अप्रामाणिकता ( गैरसबूती ) 
न हो--अर्थात्‌ कम से कम, हम यह न समभते हों कि यह 
बात बिलकुल गल्तत है। अन्यथा स्त्री तो हमारी बहिन आदि 
भी होती हैं, वे भी विभाव होने लगेगी। इसी तरह करुण- 
रसादिक मे जिसके विषय मे हम “शोक” कर रहे हैं, वह 
अशोच्य ( अर्थात्‌ जिसका सोच करना भ्रज्ुचित है, जेसे अरह्म- 
ज्ञानी ) भ्रथवा निदित पुरुष ( जिसके मरने से किसी को कष्ट 
न हो ) न होना चाहिए । अब जिसे हम विभाव मानते है, 
उसके विषय मे वैसे ( अगम्य होने आदि के ) ज्ञान की उत्पत्ति 
का म्न होना किसी प्रतिबंधक ( उस ज्ञान को रोकनेवाले ) के 
सिद्ध हुए बिना बन नहीं सकता । यदि आप कहे कि दुष्य॑- 
तादिक ( जिनकी शकुंवल्लादिक प्रेमपात्र थी ) के साथ हमारा 
अपने को भ्रमिन्न समझ लेना? ही उस ज्ञान का प्रतिबंधक है; 
से ठोक नही; क्योंकि शक्कुंतता का नायक दुष्यंत प्धिवीपति 
और धीर पुरुष था और हम इस जमाने के कुद्र महुष्य हैं, इस 


( ६५ ) 


विराध के स्पष्ट प्रतीव होने के कारण उसके साथ अपना अमेद्‌ 
सममभना ढुल्म है | 

यह ते हुई एक बात । श्रव हम आपसे एक दूसरी बात 
पूछव हैं--.यह जे हमे रस की प्रतीति होती है सो है क्‍या! 
दूसरा काई प्रमाण ते इस वात को सिद्ध करनेवाल्ा है नहीं; 
अतः (काव्य सुनने से उत्पन्न होने के कारण ) इसे शब्द-प्रमाण 
से उत्पन्न हुई समक्रिए। सो हो नहीं सकता। क्योंकि 
ऐसा मानने पर, रात दिन व्यवहार मे आनेवाले अन्य शब्दों के 
द्वारा ज्ञात हुए, स्री पुरुषो के बत्तांतो के ज्ञान मे जेसे कोई 
विच्ताकर्पकता नही होती, वह्दी दशा इस प्रतीति की भी होगी । 
यदि इसे मानस ज्ञान समर्में, तो यह भी नहीं बन सकता; 
क्योंकि सोच साचकर लाए हुए पदार्थों का मन मे, जो बोध 
होता है, उससे इसमे विल्क्षणता दिखाई देती है। न इसे 
स्वरृति ही कह सकते हैं; क्योंकि उन पदार्थों का वैसा अनुभव 
पहले कभी नही हुआ है, श्रौर जिस वस्तु का अनुभव नही 
हुआ हो, उसकी स्पति हो नहीं सकवी। अतः यह मानना 
चाहिए कि अमिधा शक्ति के द्वारा जो पदाथे सममाए जाते हैं, 
उन पर “भावकत्व”? अथवा “भावना?? नामक एक क्रिया की 
कार्रवाई होती है। उसका काम यह है---रस के विरोधी 
जो 'झगम्या होना आदि? के ज्ञान हैं, वे हटा दिए जाते हैं, 
और रस के अनुकूल 'कामिनीपन” आदि धर्म ही हमारे सामने 
आते हैं। इस तरह वह क्रिया दुष्यंत, शक्कुंतला, देश, काल, 

र०--४ 


( ६६ ) 


चय और स्थिति आदि सब पदार्थों को साधारण बना देती है, 
उनमे किसी प्रकार की विशेषता नहीं रहने देती कि जिससे 
हमारी रस-चर्वणा मे गड़बड़ पड़े । बस, यह सब कार्रवाई करके 
वह ( भावना ) ठंडो पड़ जाती है। उसके अनंतर एक तीसरी 
क्रिया उत्पन्न होती है, जिसका नाम है “सोगझृत्त्व?, अर्थात्‌ 
आखादन करना । उस क्रिया के प्रभाव से हमारे रजेगुश 
और तमेगुणश का लय हो जाता है और सच्त्गगुण की दृकद्धि 
होती है; जिससे हम अपने चेतन्यरूपी आनंद को प्राप्त होकर 
( सांसारिक झेगड़ों से ) विश्राम पाने लगते है, उस समय इसमे 
इन भंगड़ों का कुछ भी बोध नहों रहता, केवल आनंद ही 
आनंद का अनुभव होता है। बस, यह विश्राम ही रस का 
साक्षात्कार (अनुभव) है, भर “रस”? है इसके द्वारा अनुभव 
किए जानेवाले रति आदि स्थायी भाव, जिनको कि पृर्वोक्त 
भावना नामक क्रिया साधारण रूप मे---अर्थात्‌ किसी व्यक्ति- 
विशेष से संबंध न रखनेवाले बनाकर--उपस्थित करती है। 
यहाँ यह भी समझ लेना चाहिए कि सत्त्वगुण को वृद्धि के 
कारण जे आनंद प्रकाशित होता है, उससे अभिन्न ज्ञान 
( चैतन्य ) का नाम ही भोग! है श्लौर उसके विषय 
( अनुभव में आनेवाले ) होते हैं रति आदि स्थायी भाव | 
अत: इस पद्च मे भी ( प्रथम पक्ष की तरह ही ) भोग किए 
जाते हुए (अर्थात्‌ चैतन्य से युक्त ) रति आदि अथवा रति 
आदि का भोग ( अर्थात्‌ रति आदि से युक्त चैतन्य ) इन देने 


( ६७ ) 

का नाम रस है। यह आखाद जह्यानंद के आाखाद का 
समीपवर्ची या सह्दोदर कहलाता है, अ्मानंद रूप नद्दी, क्योंकि 
यह विषयों ( रति आदि ) से मिश्रित रहता है और उस 
( अक्षानंद ) में विप्यानंद सर्वथा नहीं रहता। इस तरह यह 
सिद्ध हुआ कि पूर्वोक्त रीति से काव्य के वीन अंश हैं--एक 
असिधा, जिससे काव्यगत पदार्थों को समझा जाता है; दूसरा 
भावना, जिससे उनमे से व्यक्तिगतता हटा दी जाती है और 
तीसरा भोगीकृति, जिससे उनका आखादन किया जाता है | 

इस मत, मे पहल्ते मत से, केवल, भावकत्व अ्रथवा भावना 
नामक अतिरिक्त क्रिया का खोकार करना ही विशेषता है; भोग 
आवरण से रहित चैतन्य रूप है श्रौर आवरण भंग करनेवाली 
भोगी कृति नामक क्रिया तो (पहले मत की) व्यंजना ही है, इसमे 
और उसमे कुछ अंतर नहीं । एवं भोगकत्व तथा ध्वनित करना 
इन दोनों में भो कोई भेद नहीं । शेष सब पद्धति बही है । 

(३) 
नवीन विद्वानों का मत 

साहित्यशासत्र के नवीन विद्वानों का मत है--काव्य में 
कवि के द्वारा और नाटक मे नट के द्वारा, जब विभाव आदि 
प्रकाशित कर दिए जाते है, वे उन्हें सहृदयों के सामने उप- 
स्थित कर चुकते हैं, तब हमे, व्यजना वृत्ति के द्वारा, दुष्यंत 
आदि की जे। शक्कुंतला आदि फे विषय मे रति थी,,उसका ज्ञान 
होता है--हमारी समझ मे यह आता है कि दुष्यंत आदि का 


( ६८ ) 
शकुंतला आदि के साथ प्रेम था। तदनंतर सहृदयता के 
कारण एक प्रकार की भावना उत्पन्न होती है जे कि एक 
प्रकार का दोष है। इस देष के प्रभाव से हमारा अंतरात्मा 
कल्पित दुष्यंतत्व से आच्छादित हो जाता है--अर्थात्‌ हम उस 
दोष के कारण अपने को, मन ही मन, दुष्यंत समभने लगते हैं । 
तब जैसे ( हमारे ) अज्ञान से ढेंके हुए सीप के दुकड़े मे चॉदी 
का टुकड़ा उत्पन्न हो जाता है--हमे सीप के स्थान मे 'चॉदी 
की ग्रतीति होने लगती है; ठीक इसी तरह पूर्वोक्त देष के कारण 
करिपत दुष्यंतत्व से आच्छादित अपने प्रात्मा मे, शक्रंतता आदि 
के विषय मे, भ्रनिवेचनीय सत्‌ असत्‌ से विज्नक्षण ( श्रतएव 
जिनके खरूप का ठीक निर्णय नहीं किया जा सकता ऐसी ) 
रति आदि चित्त-बृत्तियाँ उत्तन्न हे जाती हैं--अर्थात्‌ हमे 
शकुतला आदि के साथ व्यवहारतः बिलकुल झूठे प्रेम आदि 
उत्पन्न दो जाते हैं, और वे ( चित्तवृत्तियाँ ) आत्मचैतन्य के 
द्वारा प्रकाशित होती हैं । बस, उन्ही विलक्षण चित्तवृत्तियों 
का नाम “रस” है। यह रस एक प्रकार के ( पूर्वोक्त ) 
देष का कार्य है और उसका नाश होने पर नष्ट हो जाता है- 
अर्थात्‌ जब तक हमारे ऊपर उस दोष का प्रभाव रहता है, 
तभी तक हमे उसकी प्रतीति होती है। यद्यपि यह नते! सुख 
रूप है, न व्यंग्य है और न इसका वर्णन हो सकता है; तथापि 
इसकी प्रतीति के अनंतर उत्पन्न होनेवाल्े सुख के साथ जो 
इसका भेद है, वह हमे प्रतीत नहीं होता; इस कारण हम इसका 


( ६< ) 


०० कै 


सुख शब्द से व्यवहार करते हैं। कह देते, हें कि 'रस” सुखरूप 
है। इसी तरह इसके पूर्व, व्यंजनावृत्ति के द्वारा, शक्ल॑वला 
भ्रादि के विषय मे जो दुष्यंत आदि की रति आदि का जान 
होता है, उसका और इस---झूठे प्रेम आदि--का भेद विदिंत 
नही होता, अत: हम इसे व्यंग्य और वर्णन करने योग्य कद्द 
देवे हैं--अर्थान्‌ हम यह कहने लगते हैं कि यह व्यंजना ज्ृत्ति 
से प्रकाशित हुआ है और कवि ने इसका वर्णन किया है । इसी 
प्रकार सहृदर्या की आत्मा को आच्छादित करनेवाला दुष्यंतत्व 
भी अनिर्वचनीय ही है, इसके भी स्वहप का यथाथें निरूपण 

नहीं हो सकता। वह हमारे आत्मा का आच्छादन कैसे करता 
है सो भी समझ लेना चाहिए | वह यों हैं कि जब हम अपने 
आपकी दुष्यंत समर लेते हैं, तव यह समभते हैं कि यह रति 
आदि हमारे ही हैं, किसी अन्य व्यक्ति के नहीं; वस, इसी का 
अर्थ यह है कि हमको दुष्यंवत्व ने आच्छादित कर दिया। 
इस तरह मानने से, अट्टनायक की जो ये शंकाएँ हैं कि-- 
“दुष्यंत आदि के जे! रति आदि हैं, उत्तका तो हमे आस्वादन 
नही है| सकता; भरत: वे रस नही कहता सकते; और अपने 
रति आदि व्यक्त नहीं हो सकते, क्योंकि उनका शकुंतता आदि 
से कोई संवंध नहीं। यदि दुष्य॑ंत के साथ अपना अमेद माने 
तो बह है| नही सकता; क्योंकि हमको वह राजा हम साधा- 
रख पुरुष! इत्यादि वाधक ज्ञान है -इत्यादि ।” से सब उड़ 
गई; इस पक्ष में उनको अवकाश ही नहीं है। और जो कि 


' ६ ७० ) 
प्राचंचन आचायों ने विभावादिकों का साधारण होना ( किसी 
विशेष व्यक्ति से संबंध न रखना ) लिखा है, उसका भी 
विना किसी देष की कल्पना किए सिद्ध दाना कठिन है, क्योकि 
काव्य मे जो शर्कृतला आदि का वर्णन है, उसका बोध हमे 
शकुंतत्ञा ( दुष्यंत की क्ली ) आदि के रूप मे ही होता है, 
कंवल म्त्रो के रूप मे नही | तव यह ते सिद्ध हो ही गया कि 
शकुंतल्ता आदि मे जो विशेषता है, उसे निशृत्त करने के लिये 
किसी दाप की कल्पना करना आवश्यक है; और उसी देप के 
द्वारा अपने आत्मा मे दुष्यंत आदि के साथ असेद समझ लेना 
भी सहज ही सिद्ध हो सकता है, फिर यों ही क्यों नसमझ 
लिया जाय कि किसी प्रकार की गड़बड़ ही न रहे । 
अब यहाँ एक शंका होती है कि आपने 'अनिर्वंचनीय 
रति आदि के अनंतर जो सुख उत्पन्न होता है, उसका श्रौर 
रति का भेद ज्ञान न है।ने के कारण हम उसे सुखरूप कहते है??। 
इस घन के द्वारा जो रति आदि के अनंतर केवल सुख का 
उत्पन्न होना? खीकार किया है, से ठोक नही; क्योंकि रति के 
अनुभव से एक प्रकार का सुख उत्पन्न होता है, यह वाव वन 
सकती हैं; पर करुण रसादिकों के स्थायी भाव जो शोक आदि 
हैं, वे दुख उत्पन्न करनेवाले है, यह प्रसिद्ध है; अतः उनका 
सहृद्य पुरुषों के आनंद का कारण कैसे कहा जा सकता है-- 
यह कैसे माना जा सकता है कि उनसे भी सहृदयों को श्रानेद 
ही मिल्तता है। प्रत्युत यह सिद्ध हो सकता है कि जिस तरह 


( ७१ ) 


नायर को दुःख उत्पन्न हेता है, उसी प्रकार सहृदय मनुष्य को 
भी होना चाहिए। यदि आप कहे कि सच्चे शोक आदि से 
दुःख उत्पन्न दाता है, कल्पित से नही; अतः नायकों का दुःख 
होता है और ( करिपत शोक आदि के अनुभवकर्तता ) सहृदय 
का नही । ते हम कह सकते है कि जब हमको रस्सी में 
सर्प का भ्रम होता है, वब भी हमे भय और कंप उत्पन्न नही 
होने चाहिए । दूसरे, यदि आप यह मानते हैं कि कल्पित 
शोकादिक से दुःख नहीं दाता, ते हम कहेगे कि आपके 
हिसाव से रति भी कल्पित है, अ्रतः उससे भी सुख उत्पन्न 
नहीं दाना चाहिए। इसका समाधान यह है कि यदि सह- 
दयां के हृदय के द्वारा यह प्रमाणित हो चुका है कि जिस वरह 
आंगार-रस-प्रधान काज्यों से आनंद उत्पन्न होता है, उसी प्रकार 
करुणरसअधान काव्यों से भी केवल आनंद ही उत्न्न होता है, 
ते यह नियम है कि “कार्य के अनुरोध से कारण की कल्पना 
कर लेनी चाहिए--अर्थात्‌ जैसे जैसे कार्य देखे जाते है, तद- 
नुरूप ही उनके कारण समझ लिए जाते हैं?”; से जिस वरह 
काव्य के व्यापार का आनेद का उत्पन्न करनेवाला मानते हो, 
उसी प्रकार उसे दु:ख का रोकनेवाला भी मानना चाहिए । 
पर यदि आनंद की वरह दुःख भी प्रमाणसिद्ध है, उसका भी 
सहदयां का अनुभव होता है, ते! काव्य की क्रिया को दुःख 
को राकनंवात्ञी न मानना चाहिए। काव्य की अलौकिक 
क्रिया से भानेद और शोक श्रादि से दुःख, इस तरह अपने 


( ७२ ) 
अपने कारण से सुख और दु:ख दोनों उत्पन्न है| जायेंगे। अब 
यह प्रश्न हे सकता है कि यदि करुण रसादिक मे ढुःख की 
भी भ्रतीति दोवी है, वे! ऐसे क्वाव्यों के बनाने के लिये कवि, 
और सुनने के लिये सहदय क्यों प्रवृत्त हेगगे ? क्योंकि जब 
ऐसे काव्य अनिष्ट का साधन है, ते उनसे निशृत्त होना ही 
उचित है। इसका उत्तर यह है कि जिस तरह चंदनका लेप 
करने से शीतल्ञवा-जन्य सुख अधिक होता है भर उसके सूख 
जाने पर पपड़ियों के उखड़ने का कष्ट उसकी अपेक्ता कम; 
इसी प्रकार करुण रसादिक मे भी वाछननीय वस्तु अधिक है 
और अवांछनीय कम, इस कारण सहृदय लोग उनमे पृत्त हो 
सकते है। और जो लोग काव्यों मे शोक भादि से भी केव 
आनंद की ही उत्पत्ति मानते हैं, उनकी प्रद्ृत्ति मे तो कोई 
सगडा है ही नहीं। हा, उनसे आपका यह प्रश्न हे सकता 
है कि यदि करुण रसादिक भे केवल आनंद हो उतन्न 
होता है, तो फिर उनके अठुभव से अ्श्रपातादिक क्यों हाते 
हैं? इसका उत्तर यह है कि उन'झआनंदो का यही स्वभाव है, 
अत. जो अश्रुपात होता है, वह दु:ख के कारण नहीं। अवएव 
भगवद्धक्त लोग जब भगवान्‌ का वर्णन सुनते हैं, तव उनको 
अश्रुपातादि होने लगते है; पर उस अवस्था मे किचिन्मात्र भी 
दुःख का अनुभव नहीं होता । आप कहेगे कि करुण रसा- 
दिक मे शोक आदि से युक्त दशरथ आदि से अभेद मान लेने 
पर यदि आनंद आता है, ते स्वप्न आदि मे अथवा लज्निपात 


( ७३ ) 
आदि मे, अपने आत्मा मे, शोक आदि से युक्त दशरथ आदि 
के भ्रभेद का आरोप कर लेने पर भी आनंद ही होना चाहिए; 
पर अनुभव यह है कि उन अवस्थाओं मे केवल दुःख ही होता 
है; इस कारण यहा भी केवल ढुःख होता है यही मानना उचित 
है। इसके उत्तर मे हम कहते हैं कि यह काव्य के अलौकिक 
व्यापार ( व्यंजना ) का प्रभाव है कि जिसके प्रयोग से आए 
हुए शोक आदि सुंदरतारद्दित पदार्थ भी अलौकिक आनंद को 
उत्पन्न करने लगते हैं; क्‍योंकि काव्य के व्यापार से उत्पन्न होने- 
वाला रुचिर आस्वाद, अन्य प्रमाणों से उत्पन्न होनेवाले अनुभव 
की अपेक्षा विलक्षण है। यहाँ यह भी समझ लेना चाहिए कि 
पूर्वोक्त वाक्य के “काव्य के व्यापार से उत्पन्न होनेवाल्ा?” इस 
अंश का अथे है, काव्य के व्यापार से उत्पन्न देनेवाली भावना 
से उत्पन्न हुए रति आदि का आखाद, अतः रस का आजाद 
यद्यपि काव्य के व्यापार से उत्पन्न नही होता है, क्ितु काव्य 
के बार बार अनुसंधान से उत्पन्न होता है, तथापि कोई हानि 
नहीं। अब रही, शकुंतल्ला आदि मे अगम्या होने का ज्ञान * 
हमे क्‍यों नही उत्पन्न होता है, यह बात, से इसका उत्तर यह 
है कि अपने आत्मा मे दुष्यंत से अमेद समक लेने के कारण 

हमे उस ( अगम्या होने ) की प्रतीति नहीं होती । 

(४) 

अन्य मत 
इसके अतिरिक्त अन्य विद्वानों का मत है कि व्यंजना 


( ७४ ) 

नामक क्रिया के ( जिसे प्राचीन विद्वान भी मानते हैं ) और 
अनिरव॑चर्नीय ख्याति के ( जिसे नवीन विद्वान मानते हैं ) मानने 
की कोई आवश्यकता नहीं, अर्थात्‌ रस न ते व्यंग्य है न अनि- 
बैचनीय; कितु शकुंतला आदि के विषय मे रति भ्रादि से युक्त 
व्यक्ति के साथ अभेद का मनःकल्पित ज्ञान ही रस! है; अर्थात्‌ 
रस एक प्रकार का श्रम है, जो पूर्वोक्त व्यक्ति से हमे भूठे ही 
असिन्‍न कर डालता है। उसके द्वारा, पूर्वोक्त दोष के प्रभाव 
से, हमका अपने आत्मा मे दुष्यंत आदि की तद्ू पता समझ 
पड़ने ज्गती है, और उसका उत्पन्न करनेवाला है काव्यगत 
पदार्थों का वार बार अनुसंधान अ्रथांत्‌ काव्य के पदार्थो' को 
बार वार सोचने विचारने से इस प्रकार का श्रम उत्पन्न हो 
जाया करता है। जो दुष्यंत-शकुुंचला आदि इस ज्ञान के 
विपय होते हैं, अर्थात्‌ जिनके व्षिय मे यह श्रम होता है, वे 
वि्षक्षण हैं, उनका संसार की व्यावहारिक वस्तुओं से 
कोई संबंध नहीं । 

आप कहेगे कि यदि आप इस तरह के मनःकल्पित ज्ञान 
को ही रस मानते हैं, ते खप्नआदि मे जो इसी प्रकार का 
मान ज्ञान होता है, आपके हिसाब से, वह भी रस ही हुआ | 
“बे कहते हैं, नही; इसी लिये ते हमने लिखा है कि वह काव्य 
के बार बार अनुसंधान से उत्पन्न होता है। स्वप्न के बोध 
में वह बात नही है, अतः वह रस नहीं हो सकता | इस तरह 
मानने पर भी एक आपत्ति रहती है कि जे रति आदि हमारे 


( ७४ ) 


अंदर हैं ही महों--सर्वथा मन:ःकल्पित है, उनका अनुभव ही 
केसे हागा ? पर यह आपत्ति नहीं हे सकती; क्योंकि यह 
रति आदि का अनुभव लौकिक तो है नहीं, कि इसमे जिन 
वस्तुओं का अनुभव द्वोता है, उनका विद्यमान रहना आवश्यक 
है, कितु श्रम है। आप कहेगे कि जब रस अ्रमरूप है, ते। 
“रस का आरबादन होता है” यह व्यवहार कैसे सिद्ध हो 
सकता है; क्योंकि भ्रम तो खय॑ ज्ञान रूप है उसका आखादन 
क्या ९ इसका उत्तर यह है कि भ्रम रति आदि के विषय मे 
होता है, और रति आदि का आरवादन हुआ करता है ( यह 
अनुभवसिद्ध है ); बस', इसी आधार पर यह व्यवहार हो! गया 
है कि 'रसों का आरवादन होता है! । वास्तव में 'रस” का 
आरवादन नही होता। वे लोग यह भी कहते हैं । 
जिसे इस मत के अ्रठुसार रस कहते है, यह ज्ञान तीन 
प्रकार से हो। सकता है। एक यह कि शकुंतला आदि के 
विपय मे जो रति है, उससे युक्त में दुष्यंत हूँ; दूसरा यह कि 
शकुंतला आदि के विपय मे जो रति है, उससे युक्त दुष्यंत में 
हूँ और तीसरा यह कि मैं शक्कुंतता आदि के विपय मे जो 
रति है, उससे और दुष्यंतत्व से युक्त हैँ। श्रतः इन लोगों 
को तीनों प्रकार के ज्ञान को रस मानना पड़ेगा । 
अब एफ बात और सुनिए | इन तीनों ज्ञानो मे जे रति 
विशेषणरूप से प्रविष्ट हो रही है, उसकी प्रतीति काव्य के 
शब्दां से ते होती नहीं, क्योकि उसमे रति आदि के 


( ७६ ) 
वाचक शब्द लिखे नहीं रहते, और उसका बोध कराने- 
वाली व्यंजना को थे स्वीकार नहों करते, अ्रतः इन्हे रति 
झादि के ज्ञान के लिये, पहले, ( नट आदि की ) चेषटा 
आद कारणों से सिद्ध अनुमान स्वीकार करना पड़ेगा। 
अर्थात्‌ इनके मन मे रति आदि का, चेष्टा आदि का द्वारा, 
अनुमान कर लिया जाता है। 


(५) 
एक दल ( भट्टलोल्नट इत्यादि ) का मत 


बिद्वानों के एक दल का मत है कि दुष्यंत आदि मे रहने- 
चाले जे। रति आदि है, प्रधानतया, वे ही रस हैं; उन्ही को, 
नाटक मे, सुंदर विभाव आ्रादि का अभिनय दिखाने मे निषुण 
दुष्यंत आदि का पार्ट लेनेवाल्ने नट पर और काव्य में काव्य 
पढ़नेवाले व्यक्ति के ऊपर आरोपित करके हम उसका अनुभव 
कर लेते हैं । इस मत मे भी रस का श्रुभव, पूर्व मत की 
तरह, ( तीनें प्रकार से ) 'शकुंतल्ा के विषय मे जो रवि है, 
उससे युक्त यह ( नट ) दुष्यंत है? इत्यादि समकना चाहिए। 
इस मत के अनुसार “शक्कंतल्ञा के विषय मे जा रति है उससे 
युक्त यह ( नट ) दुष्यंत है इस बोध मे दे। अंश हैं:-“एक नट 
विषयक, दूसरा दुष्यंत विषयक आदिं। इसमे नट जो 
विशेष्य है उसके सामने रहने से उसका बोध लैकिक और 
चाकी का अलौकिक है । 


( ७७ ) 
(६) 
कुछ विद्वानों ( श्रीशंकुक प्रश्नति ) का मत है 
कि दुष्यंत आदि में जो रति आदि रहते हैं, वे ही जब नट 
अथवा काव्यपाठक मे, उसे दुष्यंत समभकर, अ्रनुमान कर लिए 
जाते हैं, ते उनका नाम 'रस? हो! जाता है। नाटक आदि मे जो 
शक्कृतल्ला आदि विभाव परिज्ञात होते हैं, वे यद्यपि अत्रिम होते हैं, 
तथापि उनको स्वाभाविक मानकर और नट को दुष्यंत मानकर 
पूर्वोक्त विभावादिकों से नट आदि मे रति आदि का अनुमान कर 
लिया जाता है । यद्यपि दुष्यंत झ्रादि के चरित्रों का उससे मिन्न 
नट आदि के विषय मे अनुमित होना नियम-विरुद्ध है, वथापि अनु- 
मान की सामग्री के बलवान होने के कारण, वह वन जाता है | 
(७) 
कितने द्वी कहते है 
विभाव, भ्रनुभाव और संचारी भाव ये तीनों ही सम्मिलित 
रूप मे रस कहलाते हैं । 
(८) 
बहुतेरों का कथन है 
कि तीनो मे जो चमत्कारी दो, वही रस है, और यदि 
चमत्कारी न हो ते तीनो ही रस नही कहला सकते । 
(<) 
इनके अतिरिक्त कुछ लोग कहते हैं 
कि बार बार चिंतन किया हुआ विभाव ही रस है.। 


( «८ ) 
(१० ) 
दूसरे कहते हैं 
वार वार चिंतन किया हुआ अलनुभाव ही रस है | 
(११) 
तीसरे कहते हैं 
कि बार वार चितन किया हुआ व्यभिचारी भाव ही रस 
रूप से परिणत हो जाता है 
पूर्वोक्त मतों के अनुस।र भरतसूत्र की व्याख्याएँ 
यह ते हुआ रसे के विषय मे मतभेद | अब इन सबका 
मूल जो भरत-मुनि का यह सूत्र है कि-- 


/“पव्िभाषानुभावव्यमिचारिसंयेगाद्रसनिष्पत्ति! ।!? 


इसकी पूर्वोक्त मतो के अलुसार व्याख्याएं भी सुनिए । 
प्रथम सत के अनुसार--विभाव, अनुमाव और व्यमिचारी 
भावो के द्वारा, स येग अर्थात्‌ ध्वनित होने से, आत्मानंद से 
युक्त स्थायी भाव रूप अथवा स्थायी भाव से उपहित आत्मानंद- 
रूप रस की, निष्पत्ति होती है अर्थात्‌ वह अपने वास्तव रूप 
में प्रकाशित होता है” यह अर्थ है। 

द्वितीय सत के अनुसार--  विभाव, अ्रनुभाव भर व्यमि- 
चारी भावा के (सं + योग ) श्स्यक अर्थात्‌ साधारण रूप से 
ये।ग अर्थात्‌ मावकत्व व्यापार के द्वारा भावना करने से 
स्थायी भाव रूप उपाधि से युक्त सत्वगुण की वृद्धि से प्रका- 


( ७६ ) 
शिव, अपने आत्मानंद-रूप रस की, निष्पत्ति अर्थात्‌ भोग 
£ नामक साक्षात्कार के द्वारा अनुभव होता है” अर्थ है | 

तृतीय मत के अलुसार--- विभाव, अतुभाव और व्यमि- 
चारी भावो के, संये।ग अर्थात्‌ एक प्रकार की भावनाहूपी देष 
से, दुष्यंत आदि के अनिर्बचनीय रति आदि रूप रस की, 
निष्पत्ति अर्थात्‌ उत्पत्ति होती है” अ्रथे है। 

चतुर्थ मत के अलुसार--विभावादिकों के, संयेतग 
अर्थात्‌ ज्ञान से, एक प्रकार के ज्ञानरुप रस की, निष्पत्ति 
अर्थात्‌ उत्पत्ति होती है?” अथ है । 

पंचम सत के अतुसार--“विभावादिकों के, संये!ग 
अर्थात्‌ संबंध से, रस अर्थात्‌ रति आदि की, निष्पतत्ति होती है 
अर्थात्‌ वे (नट आदि पर) आरोपित किए जाते हैं?” अर्थ है । 

घद्चु मत के अनुसार--“ऋत्रिस हे।ने पर भी स्वाभाविक 
रूप मे समझे हुए विभावादिकों के द्वारा, संयोग अर्थात्‌ अनुमान 
के द्वारा, रस अर्थात्‌ रति आदि की, निष्पत्ति होती है 
अर्थात्‌ अनुमान कर लिया जाता है” अथ है। 

सप्रम सत के अ्नुसार--. विभावादिक तीनो के संयेतग 
अर्थात्‌ सम्मिलित होने से, रस की निष्पत्ति होती है अर्थात्‌ 
रस कहलाने लगता है” अर्थ है। 

अष्टूस सत के अनुसार-- विभावादिकों मे से, संयेग 
अर्थात्‌ चमत्कारी होने से रस कहलाता है” अथ्थ है । 


( ८० ) 

अब जे! तीन मत शेष रहे, उनमे सूत्र का अर्थ संगत नहीं 
होता, अतः उनका सूत्र से विरोध पयेवसित होता है--अर्थात्‌ 
वे खर्तत्र मत हैं, सूत्नानुसारी नही । 

विभावादिकों मे से प्रत्येक को रसव्यंजक 
क्यों नहीं माना जाता 

विभाव, अनुभाव और व्यमिचारी भाव इनमे से केबल 
एक--अर्थात्‌ केवल विभाव, केवल अलुभाव अथवा केवल 
व्यमिचारी भाव--का किसी नियत रस को ध्वनित करना नहीं 
बन सकता; क्योंकि वे जिस तरह एक रस के विभाव आदि 
होते हैं, उसी तरह दूसरे रस के भी दा सकते हैं। उदाहरण 
के लिये देखिए, व्याप्र आदि जिस तरह भयानक रस के विभाव 
हो सकते हैं, उसी प्रकार वीर, अद्भुत भर रौद्र-एस के भी 
हे। सकते है; अश्रपातादिक जिस तरह हंगार के अजुभाव हो 
सकते हैं, उसी प्रकार करुण और भयानक के भी है सकते हैं; 
चितादिक जिस तरह # गार के व्यभिचारी हे| सकते हैं, उसी 
प्रकार करुण , वीर और भयानक के भी दो सकते हैं। अतः 
सूत्र में तीनों को सम्मिलित रूप मे ही अहण किया गया है, 
प्रत्येक का पृथक प्रथक्‌ नही। जब इस प्रकार यह प्रमाणित 
है| चुका कि तीनों के सम्मिलित होने पर ही रस ध्वनित हवाता 
है, तब, जहाँ कही, किसी असाधारण रूप मे वर्णित विभाव, 
अलुभाव अघवा ज्यमिचारी भाव से से किसी एक से ही रस 
का उद्घोध हो जाता है, जैसे कि निम्नलिखित पद्म मे-- 


(5१ ) 


परिशद्तिमृणालीम्लानमड्ज' प्रहत्तिः 
कथमपि परिवासत्रार्थनामिः क्रियासु । 
कलयति च हिमांशोनिप्कलह्स्य रक्ष्मी- 
मभिनवकरिदन्तच्छेदपाण्डः कपोलः ॥ 

मालतीमाघव प्रकरण के प्रथम अड्डू का यह श्लोक है 
माधव मकरंद से मालती का वर्णन कर रहे है--(मालतो के) 
अंग अत्यंत रोंदी हुई कमल की जड़ के समान हे गए हैं, 
शरीरस्थितिमात्रोपयोगी क्रियाओं मे---परिवार के प्रार्थना करने 
पर, बड़ी कठिनता से प्रवृत्ति होती है, अर्थात्‌ एक वार उपक्रम- 
मात्र होकर रद जाता है, चेष्टा नही देती और नए हाथी-दॉत 
के ढुकड़ के समान श्वेत कपोल कलंकरहित चंद्रमा की शोभा 
को धारण करने लगे हैं--उनमे लाई का लेश भी नही रहा 
है। यहां केवल अनुभाव के वन मात्र से ही विप्रलंभ-श् गार 
का आ्रासखवादन होने लगता है। ऐसे स्थलों मे अन्य दोनों (जैसे 
यहाँ विभाव और व्यमिचारी भाव ) का आजक्षेप कर लिया 
जाता है। से यह धाव नहीं हे कि रस कही सम्मिलितों 
से उत्पन्न होता है श्रार कही एक ही से, कितु वीनों के सम्मेलन 
के बिना रस' उत्पन्न होता ही नही, यह सिद्ध है । 

से। इस बरद विद्वानों ने, यद्यपि अनेक प्रकार की बुद्धियों 
के द्वारा, रस को, अनेक रूपो से समझता है, आज दिन तक भी 
इस विषय मे विचार स्थिर नहीं हो पाए हैं; तथापि इसमे 
किसी प्रकार का विवाद नहीं कि, इस संसार में, रस एक 

२०--६ 


( ८छर ) 
सौंदयमय वस्तु है और उसमे परमानंद की प्रतीति हुए 
बिना नहीं रहती । 
रस कान-कैान और कितने हैं ९ 

पूर्वोक्त रस-->€ गार, करुण, शांत, रोड, वीर, अदभुत, 
हास्य, भयानक्र और बीभत्स इस तरह नौ प्रकार का है; 
और इसमे प्रमाण है भरत मुनि का वाक्‍्य। पर कुछ 
लोग कहते है--- 

शान्तस्य शमसाध्यत्वान्ने च_ तदसम्भवात्‌ | 

अष्टावेव रसा लाव्ये न शान्तस्तत्र युज्यते ॥ 

अर्थात्‌ शांतवरस के सिद्ध करने के लिये शांति की आव- 
श्यकता है, और ( सांसारिक भगड़ों मे व्याप्रव ) नट मे उसका 
होना असंभव है, अतः नाट्य मे आठ ही रस होते हैं, उसमे 
शातरस का होना नहीं बन सकता। इस बात की दूसरे विद्वान 
मानना नहीं चाहते | वे कहते हैं--आपने जो यह हेतु दिया है 
कि 'नट से शांति का होना असंभव है”, से! असंगत है--इस 
बात का यहाँ मेल नही मिलता, क्योंकि हम ज्ञोग नट मे रस का 
अभिव्यक्त होना स्वीकार ही नहीं करते । वह शांत रहे अधवा 
अशात, यदि सामाजिक लोग शांवियुक्त होगे, वे उन्हे रस का 
आस्वादन होने मे कोई बाधा लही। आप कहेगे--यदि 
नट मे शांति न होगी ते वह शांवरस' का भ्रमिनय ही भ्रका- 
शित नही कर सकेगा, ते हम आपसे कहेगे---नट जब 
भयानक श्रथवा रौद्ररस की अभिव्यक्ति के लिये अभिनय करता 


( एडे ) 
है, तव भी उससे सय और क्रोध ते रहते नहीं; फिर बह 
उन रखें का भ्रभिनय भी कैसे कर सकता है ? यदि आप 
कहे कि नट मे क्रोध आदि के न होने के कारण, क्रोधादिक 
के वास्तविक काये वध-वंधन आदि के उत्पन्न न होने पर भी 
शिक्षा और अभ्यास आदि से बनचावरी वध-बंधन भआादि के 
उत्पन्न होने में कोई बाधा नहीं होती--यह देखा ही जाता है, 
ते इस कहेगे कि इस विषय से भी वैसा ही क्यों नहीं समर 
लेते ? देनों स्थानों पर वहीं तो वात है। हा, आप यह कह 
सकते हैं कि सामाजिको मे भी, नाटकादि के द्वारा, शांतरस 
का उदय कैसे हो सकता है ? क्योंकि विषयों से विमुख होना 
ही शांतरस का स्वरूप है, और नाटक में उसके विराधी पदार्थ-- 
गीत, वाद्य आदि--विद्यमान रहते हैं; अतः विरोधियों के द्वारा 
रस का आविभांव सिद्ध होना असंभव है। इसका उत्तर यह है 
कि जो लोग नाटक मे शांतरस को स्वीकार करते हैं, वे गीत- 
वाद्य आदि का उसका विरोधी नही मानते; क्योंकि यदि ऐसा 
हो ते उनका फल--शांतरस का उदय---ही न वन पावे। दूसरे, 
यदि आप यावन्मात्र विषयों के चितन को शांतरस के विरुद्ध 
माने, ते! शांतरस का आलंवन--संसार का अनित्य होना एवं 
उसकी उद्दीपन पुराणों का सुनना, सत्संग, पवित्र चन और तीथों 
के दर्शन--आदि भी विषय ही हैं, अतः वे भी उसके विरोधी हो 
जायेंगे। इस कारण, यह मानना चाहिए कि जिनमे शांतरस 
के अनुकूल--संसार से विरक्त होने के उपयोगी बर्णन होता 


( ८४ ) 
है---वे भजन-कीर्तन आदि शांवरस के अभिव्यंजक हो सकते 
हैं। इसी कारण, संगीतरत्ाकर” के अंतिम अध्याय मे-- 
अष्ठादेव रसा नाव्येष्वति केचिदचूचुदन्‌ | 
तदचारु यतः कख्िन्न रस॑ रबदते नट! ॥ 
अर्थात्‌ नाटकों में आठ ही रस है? यह जो -कुछ लोगो 
की शंका है, से। ठीक नहीं; क्योंकि नट किसी रस का आस्वा- 
दन नहीं करता--इत्यादि लिखकर यह सिद्ध कर दिया है कि 
नाटकों मे भी शांत-एस है। परंतु जो ल्ञोग 'नाटकों मे शांत- 
रस नही है? यह मानते है, उन्हे भी, किसी प्रकार की बाघा न 
होने के कारण, एवं “महाभारतादि अंथो से शांतरस ही प्रधान है? 
यह बाव सब लोगों के अनुभव से सिद्ध होने के कारण, उसे 
( शांतरस को ) काव्यों में अवश्य स्वीकार करना पड़ेगा। इसी 
कारण, मम्सट भट्ट ने भी “अषप्टो नाव्यों रसा: स्व॒वा: ( नाटक 
में आठ रंस माने गए हैं)” इस तरह प्रारंभ करके “शांति५पि 
नवमे। रस: ( शांत भी नौबों रस है )?” इस तरह उपसंहयार 
किया है। अर्थात्‌ उनके हिसाब से भो काव्यों में शांतरस 
सिद्ध है। तब रस नौ हैं, इस वात मे कोई संदेह नहीं | 
स्थायी भाव 
पूर्वोक्त रसें के, क्रम से, रति, शोक, निर्वेद, क्रोध, 
उत्साह, विस्मय, हास, भय और जुगुप्सा ये स्थायी भाव होते 
हैं। अर्थात्‌ शव'गार का रति, करण का शोक, शांत का निर्वेद, 
रोड का क्रोध, वीर का उत्साह, अद्भुत का विस्मय, हास्य 


च्छ 


( ८५५ ) 


का हास, भयानक का भय और वोभसस का जुगुप्सा स्थायी 
भाव होता है । 
रसे और स्थायी भाषों का भेट 

अच्छा, अब, रसों से स्थायी भावों मे क्‍या मेद है, से भी 
समझ लीजिए। पहले और दूसरे सते( सें--जिस तरह 
घड़े आदि का घड़े आदि के अंदर आए हुए आकाश से भेद है, 
उस तरह, ती खरे सत में---जिस तरह सच्ची चॉदी से मन:--- 
कल्पित चांदी मे भेद है, उस तरह: और चैये सत में-- 
जिस तरह विषय ( ज्ञानगम्य पदार्थ ) का ज्ञान से भेद है, उस 
तरह स्थायी भावो का रसें से सेद समझना चाहिए | 


ये स्थायी क्‍यों कहलाते हैं ! 


ये रति आदि भाव किसी भी काव्यादिक मे उसकी समाप्ति 
पर्यत स्थिर रहते हैं, अतः इनको स्थायी भाव कहते हैं। आप 
कहेगे कि ये ता चित्तवृत्तिरूप हैं, अतएवं तत्काल नष्ट हो जाने- 
वाल्ने पदाथ हैं, इस कारण इनका ख्िर होना दुलंभ है, फिर 
इन्हे स्थायी केसे कहा जा सकता है ? और यदि वासनारूप 
से इनके स्थिर माना जाय ते! व्यभिचारी भाव भी हमारे अतः- 
करण में वासनारूप से विद्यमान रहते हैं, अतः वे भी स्थायी 
भाव हो जायेंगे। इसका उत्तर यह है कि यहाँ इन बासना- 
रूप भावों का वार-वार अभिव्यक्त दोना ही स्थिर-पद का अअथे 
है। व्यमिचारी भावों मे यह वात नहो होती, क्यांकि उनकी 


( पद ) 


चमक बिजली की चमक की तरह अस्थिर होती है; अत वे 
स्थायी भाव नहीं कहला सकते॥ | जैसा कि लिखा है- 
विरुद्धेरविरुद्धेनां भावैविच्छियते न यः। 
आत्मभाव॑नयत्याशु स स्थायी लव॒णाकर!॥ 
चिर॑ चित्तेश्वतिषन्ते संबध्यन्तेज्नुबन्धिमि!। 
रसत्व॑ ये प्रपच्नन्ते प्रसिद्धाः स्थायिनेज्ज ते ॥ 
तथा-- 
सजातीयविजातीयेरतिरस्कृतमूतिमान्‌ । 
यावद्र्स वत्तमान! स्थायिभाव उदाहतः ॥ 
अर्थात्‌ जे भाव विरोधी एवं अविरोधी भावों से विच्छिन्न 
नहीं होता; कितु विरुद्ध भावों को भी शीघ्र अ्रपने रूप मे 
परिशत कर लेता है, उसका नाम स्थायी है और वह लवणा- 


# यहाँ स० स० श्रीगगाघर शास्त्री जी की टिप्पणी है, जिसका 
अभिप्राय यह है---यदि वेदांतियो के मत के अनुसार यह माना जाय कि 
कोई भी चित्ततृत्ति उसके विरुद्ध चित्तश्नत्ति उत्पन्न होने तक स्थिर रहती 
है, तो स्थिर-पद्‌ का बार बार अभिव्यक्त होना अर्थ करने की आवश्यकता 
नहीं। और जो 'विरुद्दे ..... ? इस कारिका मे विरुद्ध भावों से भी 
स्थायी भाव का विच्छेद्‌ न होना खिखा है, सो छौकिक दृष्टि से जो 
भाव विरुद्ध दिखाई देते है, उनके विपय मे लिखा गया है। काव्य 
में तो 'अय॑ स रशनोत्कर्षी ,. !इत्यादि स्थलों में लोकध््टया विदद्ध 
साव---प्रेम आदि--भी शोक अदि के पोषक ही होते है--यह अलुभव- 
सिद्ध है। अन्यथा ऐसे स्थलों में भ्रतिकुलविभावादि अह! रूपी रस- 
दोष होगा, जो कि किसी के सी सम्मत नहीं | 








( ८७ ) 

कर के समान है। जिस तरह क्वणाकर समुद्र मे गिरने 
से सब बस्तुएँ लोन बन जाती हैं, उसी प्रकार स्थायी भाव से 
मिलकर सब भाव दद्ूूप हे जाते हैं। 

जे भाव बहुत समय तक चित्त से रहते हैं, विभावादिकों 
से सबंध करते हैं और रस-रूप बन जाते हैं, वे यहाँ ( साहित्य- 
शास्त्र मे ) स्थायी नाम से प्रसिद्ध हैं। तथा-- 

जिस भाव का खरूप सजातीय और विजातीय भावों से 
तिरस्कृत न किया जा सके, और जब तक रस का आख़ादन 
हो। तब तक वर्तमान रहे उसे स्थायी भाव कहते हैं । 

कुछ लोग कहते हैं---पूर्वोक्त रतिं आदि नो भावों मे से 
अन्यतम ( कोई एक ) होना ही स्थायी भाव का परिचायक 
है। सो नहीं हो सकता; क्योंकि रति आदिकों मे से किसी- 
एक के षढ़े चढ़े हुए होने पर ( उन्ही मे से ) यदि अन्य कोई 
भाव बढ़ा चढ़ा न हो, ते उसको व्यमिचारी भाव माना जाता 
है। बढ़े चढ़े हुए का क्या अर्थ है से। भी समझ लीजिए | 
अधिक विभावादिकों से उत्पन्न हुए का नाम बढ़ा चढ़ा हुआ? 
है और थेड़े विभावादिकों से उत्पन्न हुए का नाम है “नहीं 
बढ़ा चढ़ा हुआ? । अतएव 'रल्लाकर” मे लिखा है--- 

रत्यादयः स्थायिभावाः स्थुभयिष्ठविभावजा! 
स्तेकैवि भावेरत्पन्नास्त एवं व्यभिचारिणः ॥ 

अर्थात्‌ अधिक विभावादिकों से उत्पन्न हुए रति आदि स्थायी 

भाव होते हैं, भर वे ही जब थेड़े विभावादिकों से उत्पन्न होते 


( ८८ ) 


हैं ते व्यभिचारी कहलाते है। इस तरह मान लेने पर वीर- 
रस के प्रधान होने पर क्रोध, राद्र-रस के प्रधान होने पर उत्साह 
और आंगार-रस के प्रधान होने पर हास व्यमिचारी होता है 
और बिना उनके वे रस रहते ही नहीं, यह भी सिद्ध है। जब 
प्रधान रस को पुष्ट करने के लिये उस ( अंगभूत भाव क्रोध- 
आदि ) को भी अधिक विभावादिकों से अमिव्यक्त किया 
जाता है, तो वह 'रसालंकार! कहलाने लगता है--हत्यादि 
समभ लेना चाहिए । 
स्थायी भाषों के लक्षण 
' -रति 
स्री-पुरुष की, एक दूसरे के. विषय मे, प्रेम नामक जो 
चित्तवृत्ति होती है, उसे 'शति” स्थायी भाव कहते हैं । वही 
प्रेम यदि गुरु, देवता भ्रथवा पुत्र आदि के विषय में हो, ते 
व्यभिचारी भाव कहलाता है । 
>--शोक 
पृत्र-आदि के वियाग अथवा मरण भ्ादि से उत्पन्न होने- 
वाज्ञी व्याकुलता नामक जो एक चित्तवृत्ति होती है, उसे 'शे।क? 
कहते हैं। परंतु स्ली-पुरुष के वियोग मे, जब तक प्रेमपात्र 
के जीवित होने का ज्ञान हो, तब तक व्याझक्षता से पृष्ट किए 
हुए प्रेम की ही अ्रधानता रहती है, भ्रतः “विप्रतृभ” नामक 
खंगार-रस होता है। उस समय जो! व्याकुलता रहती है, 
' बह व्यमिचारी भाव मात्र है। पर यदि प्रेमपात्र के मरने का 


( ८ ) 


पता लग जाय ता व्याकुल्नता प्रधान रहती है, और प्रेम उसे 
पुष्ट करता है, इस कारण वहाँ करुण-रस ही होता है। श्र 
जब कि मर जाने का ज्ञान होने पर भो देवता की प्रसन्नता 
आदि से, किसी प्रकार, उसके पुनः जीवित होने का ज्ञान हो 
सके, ते आलवन ( प्रेमपात्र ) के सर्वथा नष्ट न हे जाने के 
कारण, लंबे परदेशवास की वरह, “विप्रल्ंभ” ही होता है; 
'करुण” नही, जैसा कि (कादंबरी मे) चन्द्रापीड़ से महाश्वेता 
ने जो वाते' को हैं, उनमे । कुछ लोगों की इच्छा है--ऐसी 
जगह एक दूसरा ही रस सानधता चाद्दविए, जिसका नाम 
'करुण-विप्रल्लंभः है | 
३--निर्वेद 

जिसकी ( वेदांत आदि के द्वारा ) नित्य और अनित्य 
वस्तुओं के विचार से उत्पत्ति होती है, और जिसका नाम 
विषयों से विरक्ति है उसे 'निर्वेद'ं कहते हैं। वही निर्वेद 
यदि घर के भगड़े आदि से उत्पन्न हुआ हो, ते व्यसिचारी 
भाव होता है । 

४--क्रोध 

जिसकी, गुरु अथवा बंघु के मरने आदि--किसी प्रबत् 
अपराध--के कारण, उत्पत्ति होती है, श्रार जिसका नाम जल्लन 
है, उसे क्रोध! कहते है। यह शत्न-विनाश आदि का कारण 
होता है। यही जलन यदि किसी छोटे मोटे अपराध से 
उत्पन्न हुई हा, ते! कठोर वचन और मौन-आदि का कारण 


( *<० ) 
होती है, तब वह अमर्ष नामक व्यमिचारी कहलाती है | अमर्ष! 
और “क्रोध” मे यही भेद है । 
४--उत्साह 
जिसकी, शत्रु के पराक्रम तथा किसी के दान आदि के 
स्मरण से, उत्पत्ति द्वाती है, और जिसका नाम उन्नतता है, उसे 
“उत्साह” कहते हैं । 
६--विस्मय 
जिसकी, अलौकिक वस्तु के देखने आदि से, उत्पत्ति होती 
है, और जिसका नाम आश्चर्य है, उसे 'विस्मय' कहते हैं । 
७--हास 
जिसकी, वाणी एवं अगें के विकारे के देखने आदि से, 
उत्पत्ति होती है, और जिसका नाम खिल जाना है, उसे 'हास! 
कहते हैं । 
८--भय 
जिसको, व्याप्त आदि के देखने आदि से उत्पत्ति, हावी दै, 
और जो प्रबल अनर्थ के विषय मे हुआ करती है, एवं जिसका 
नाम व्याकुछता है, उसे 'भ्रय' कहते हैं। यदि वही व्याइु- 
लता किसी प्रबल अनर्थ के विषय मे न हुई हो, ते उसे त्रास” 
नामक व्यमिचारी भाव कहते हैं। पर दूसरे विद्वानों का 
यह भो कथन है कि उत्पातकारी वस्तुओं के द्वारा उत्तन्न हुई 
व्याकुलता का नाम 'त्रासः है, और अपने अपराध के द्वारा 
उत्पन्न होनेवाली का नाम सयः | भय भ्रौर त्रास मे यह भेद है। 


( <5₹ ) 


<--जुगुप्सा 

किसी घृणित वस्तु के देखने से जे। घृणा नामक एक प्रकार 

की चित्तवृत्ति उत्पन्न होती है, उसे 'जुगुण्सा' कहते हैं | 
विभाव, अलुभाव और व्यभिचारी भाव 

इन्हीं स्थायी भावों का हम लोग, संसार मे, उन उन 
नायकों मे देखा करते हैं। ऐसे स्थानों पर जे! बस्तुएँ उन 
चित्तवृत्तियों के आल्ंवन--अर्थात्‌ विषय--अथवा उद्दीपन--- 
अर्थात्‌ जोश देनेवालो--होने के कारण, 'कारण” रूप से प्रसिद्ध 
हैं, वे ही काव्य अथवा नाटक मे इन ( स्थायो भावों ) के 
अभिव्यक्त होने पर विभाव' कहलाने लगती हैं, क्योंकि 
व्युत्पत्ति के अनुसार विभाव-- शब्द का अथे ( रति आदि के ) 
“उत्पन्न करनेवाले? अथवा 'समृद्ध करनेवाले? हैं । 

उन स्थायी भावों से जे कार्य उत्पन्न होते हैं--जैसे रोमा- 
चादिक; उन्हे अनुभाष' कहते हैं; क्योंकि व्युत्पत्ति के अचु- 
सार अनुभाव शब्द का अथे जो ( स्थायी भावों के ) अनंतर 
उत्पन्न है! अथवा जो उनका अनुभव करावे” यह है | 

जो स्थायी भावों के साथ मे रहनेवाली चित्तवृत्तियों होती 
हैं--जैसे चिता आदि, उन्हे व्यभिचारी भाव! कहते हैं | 

विभावादि के कुछ उदाहरण 

शा गार-रस के ल्ली पुरुष आलंवन विभाव, चॉदनी, वर्संत 
ऋतु, अनेक प्रकार के बाग बगीचे, सुखभ्रद पवन और एकांत 
स्थान आदि उद्दीपन विभाव; प्रेमपात्र के मुख का दशेन, उसके 


( अरे ) 


गुणों का श्रवण और कीर्तेन आदि एवं कंप, रोमांच आदि 
'सात्विक भाव” अनुभाव; और स्मरण, चिता आदि व्यमिचारी 
भाव होते हैं। 

करुश-रस के बृंधु का नष्ट हो जाना आदि अ्रात्ंबन विभाव; 
उसके घर, घोड़े, गहने आदि का देखना आदि तथा उसकी बातें 
सुनना आदि उद्दोपन विभाष; शरीर का पछाड़ना ( छटपटाना ) 
और अश्रुपात आदि अन्ुभाव और ग्लानि, श्रम, भय, मोह, 
विषाद, चिता, औत्सुक्य, दीनता और जड़ता आदि व्यमिचारी 
भाव द्वोते हैं । 

शांत-रस के अनित्य रूप से समझता हुआ जगत्‌ आालंबन 
विभाव, वेदांत का सुनना, तपोवन एवं तपरिवयों का दशनादि 
उद्दोपन विभाव, विषयों से अरुचि, शत्रु-मित्रादिकों से उदासीनता, 
निश्चेष्टता, नासिका के अमप्रभाग पर दृष्टि श्रादि अनुभाव और 
हर्ष, उन्‍्माद, स्थृति, मति आदि व्यमिचारी भाव होते हैं। 

रोद्र-रस के अपराध करनेवाला पुरुष आदि भ्रालंबन विभाव; 
उसका किया हुआ अपराध भादि उद्दीपन विभाव; लाल नेत्र करना, 
दाँत चबाना, कठोर भाषण करना, शल्न उठाना इत्यादि, जिनका 
फल्ल- वध अथवा बंधन आदि हैं, अ्रनुभाव, और अमर, वेग, 
उम्रता, चपलता आदि व्यमिचारी भाव होते हैं । इत्यादि । 

इस तरह जो चित्तवृत्ति जिसके विषय मे होती है, वह 
उसका आलंबन और जो निमित्त हैं, वे उद्दीपन होते हैं-- 
यह समक्त लेना अहिए। 


( ४३ ) 
रसे के अवांतर भेद और उदाहरण आदि 
शआंगार-रस 

शंगार-रस दे प्रकार का है--संयोग और विग्रल्॑भ | 
यदि ञ्ली पुरुषों फे संयोग के समय मे प्रेम दो, वे। 'सियोग- 
शंगार! कहलाता है, और यदि वियोग के समय मे हो, वे 
“विप्रलंभ-शृंगारः । पर संयोग का अथे 'स्रो-पुरुभो का एक 
स्थान पर रहना? नहीं है; क्योंकि एक पल्ेंग पर सोते रहने 
पर भी, यदि ईर्ष्या आदि हों, ते। 'विप्रल्लंभ-रस? का ही वर्णन 
किया जाता है। इसी तरह वियोग का अथे भी अलग 
अल्लग रहना' नहीं है; क्योंकि वही दोष यहाँ भी कहा जा 
सकता है। अतः यह मानना चाहिए कि 'संयोग” और 
(बियोग? ये दोनों एक प्रकार की चित्तवृत्तियाँ हैं, और वे हैं 
'मिला हुआ हैँ” और “बिछुड़ा हुआ हैँ? यह ज्ञान। उनमे 
से 'संयाग-हऋंगार! का उदाहरण 'शयिता सविधेप्यनीश्वरा . ? 
एवं 'सोई सविध सकी न करि ...! इत्यादि पहले वर्णन 
कर चुके हैं। जो कि 'चित्र-मीर्मांसा? मे लिखा है---““वागर्था 
विव स॒ पृक्तो वाग्प्रतिपत्तये। जगतः पितरी वन्दे 
यावती परसेश्व रे ॥ ( अर्थात्‌ वाणी और अ्रथ की तरह 
, मिल्ले हुए, जगत्‌ के जननी-जनक पारव॑ती और परमेश्वर (शिव) 
को, वाणी और अथे के ज्ञान के लिये, अभिवादन करता हैँ ) 
इस पद्य मे हंगार-रस की ध्वनि है; क्योंकि इससे शिव-पार्वती 
का सर्वाधिक प्रेमयुक्त होना ध्वनित होता है” से यह 


( ४ ) 


ध्वनि के सार्ग को न समझने के कारण लिखा गया है। इस 
श्लोक मे पावेती और परमेश्वर के विषय में कवि का प्रेम 
प्रधान है, और उन दोनों ( शिव-पार्वती ) का पारस्परिक प्रेम 
उसकी अ्रपेक्षा गौय हो गया है; और गौण रति आदि के 
कारण काव्य का “रस-ध्वनि! कहना उचित नही; क्योंकि 
यह सिद्धांव है-- 
भिन्नो रसायलड्डारादलड्ढलायंतया स्थितः | 
अर्थात्‌ जिसका अल्लंकारादिकों से शोमित किया जाता है, 
वह ( रसादिक ) रस-भाव आदि को शोभित करनेवाल्ले प्रल- 
ड्रार रूप रस आदि से भिन्न है। वात्पये यह कि जिनके कारण 
काव्य को 'ध्वनिरूप” कद्दा जाता है, थे रसादिक किसी की 
अपेक्ता गौण नही होते, उन्हे अन्य अलंकारादिक शोमित करते 
हैं, बे किसी को नही । दूसरे रसादिकों को अलड्डूत करने- 
वाले रसादिक उनसे मिन्न हैं। यह ते हुई 'संयोग-श्वगार! 
की षात, अब 'विप्रलंभ-श्र गार! का उदाहरण सुनिए; जैसे-- 
वाचो माज्नलिकीः प्रयाणसमये जल्पत्यनलपं जने 
केलीमन्द्रिमास्तायनमुखे.. विन्यस्तवक्त्राम्बुजा | 


!एवासरलपिताधरोपरिपतद्ा ष्पाद्रंवक्षोरुहा 
वाला लेलविलेचना शिव ! शिव ! प्राणेशमालोकते॥ “* 
भ ५ ५८ भर 
पिय-गौन-समे सब ल्लेग करें बहु भाँति उचारन संगल-वानी । 
मुख-कंज दिए रति-मंदिर के सुठि गोख के द्वार महा-अकुछानी | 


( 3४ ) 


अति-सास ते सूखे भए अधरा पर ते कुच डारती क्ाचन-पानी । 

वह बालिका चंचल नेनन ने निज-नाथ निहारत हाथ! अयानी ॥ 

एक सखी दूसरी सखी से कहती है--पतिदेव के पर- 
देश जाने का समय है, लोग अत्यधिक मांगलिक वचन बोल 
रहे हैं, पर वह च॑चलनयनी बालिका ( नवोढ़ा ) रति-भवन के 
भरोखे मे मुख-कमल डाले हुए बैठी है, अत्यंत श्वासों के कारण 
कुम्हलाए हुए अघरों पर अश्र गिर रहे हैं और उनसे कुच 
भीग गए हैं। शिव | शिव !! ऐसी दशा को प्राप्त हुई बह 
अपने प्राशनाथ को देख रही है। उस बेचारी को न यह 
बोध है कि अश्रु गिरने से अशक्ुन होगा और न यही शंका है 
कि लोग क्या कहेंगे । 


इस पद्य में ( नायिका के प्रेमपात्र ) नायकरूपी आल्ंबन 
के, निःश्वास, अश्रु-पातादिरूप अभाव के और विधाद, चिंता, 
आवेग आदि व्यभिचारी भावों के संयोग से ध्यनित हुई नायिका 
की रति, वियोग-काल में होने के कारण “विप्रल्ंभ रस” के 
निर्देश का कारण है। अथवा; जैसे-- 


आविभृता यदवधि मधुस्यन्दिनी नन्दसूनेः 

कान्तिः काचित्रिेखिलनयनाकपणे कामंणज्ञा। 
शवासे| दीघ॑स्तदवधि मुखे पाण्ठिमा गण्डकुम्मे 

शून्या दृत्तिः कुलप्रगरशां चेतसि प्रादुरासीत ॥ 


3९ २८ २५ हर 


( <#६ ) 
जनसी जब ते जग मे सजनी, मधु-धारन की बरसावचहारी। 
प्रजराजकिशोर की कान्ति कछू जन-नेन-विमेहिनी कामनगारी ॥ 
तबते सगरी कुल-नारिन की सब हालत हाय ! भई कहु न्यारी। 
सुख दीरघ सांस, कपेलन पे सितता, हिय में मह शूल्यता भारी ॥ 


जब से मधु बरसानेवाली और सब मनुष्यों के नेत्नो को 
आकर्षण करने का जादू जाननेवाली नंद-नंदन की अनिर्बंचनीय 
काँति उत्पन्न हुई है तब से कुल्लांगनाओं के मुख मे दीधे श्वास, 
दोनों कपोलों पर सफेदी एवं चित्त मे शून्यब्त्ति ( विचार- 
रहितता ) उत्पन्न दो गई है। अथवा, जैसे-- 


नयनाअआलावमश या न कदाचित्‌ पुरा सेहे। 
आलिड्लिताअप जोष तस्थों सा गन्तुकेन दयितेन ॥ 


प्‌ 44 ३ 


नैन-कोन के मिलन जो सहन किये। कबहूँ न । 
आलिड्वित हू पिय्-गवन वहे करति है चूँ न ॥ 
जिस नायिका ने, पहले कभी, नेत्र के प्रांत का मिल् जाना 
भी सहन न किया था, .वही (वियेग के समय) परदेश जाने- 
वाले पति से आलिगन की हुई भी चुप खड़ी थी, थूँ भी न 
करती थी । इस पद्य में भी स्वाभाविक च॑चलता की निर्शेत्ति 
अनुभाव और जड़ता व्यभिचारी भाष है । 
प्राचीन आचायों ने इस--विप्रलंभ रस--को प्रवास 
आदि उपाधियों से पॉच प्रकार का माना है, पर 


( 5७ ) 


प्रवास», अभिल्ाष, विरह, इष्या और शाप के कारण जो वियेग 
होते हैं, उनमें कोई विशेषता न समझ पड़ने के कारण हमने 
बनका विस्तार नहीं किया | 
करुण-रस, जैसे-- 
अपहाय सकलवान्धवचिन्तामुद्वास्य गुरुकुलप्रणयम । 
हा | तनय !! विनयशञालिन!!! कथमिव परकोकपथिकोज्यू!॥ 
टू 


सब आते के सोच तजि तजि गुस्कुछ को नेद्द | 

हा | सुशील सुत !! किमि कियो अनत लेक ते गेह ॥ 

हाय ! अत्यंत सुशील वेटे | तू सव वंघुओं की चिता को 

त्यागकर और गुरुकुल्न के प्रेम को भी हटाकर किस तरह पर- 
लोक का पशथ्चिक हो गया !! 

यहाँ मरा हुआ पुत्र आलंवन है, उस समय से आए हुए 

वाँधवों का दशन आदि उहीपन हैं, रोना अनुभाव है और दैन्य 

आदि व्यमिचारी भाव हैं। 
शांत-रस; जेसे-- 

मलयानिरकालकूटये। रमणीकुन्तलभेगिभेगयेः 
इवपचात्मअुवोनिर (ः 

न्तरा मम जाता परमात्मनि स्थिति: 

या र -- न 


ह# भय के परदेश जाने की हाढतत मे अवासरूप, समागस से पूर्व 
ही गुणअवण आदि से अभिदापरूप, गुरुजनां की रूज़ादि के कारण 
रुकने पर विरहरूप, सान से हैंप्यारूप आर जिस तरह शकुंतढा को 
हुरवासा के शाप से वियोग हुआ उस तरह होने पर शापरूप उपाधियाँ 
हुआ करती हैं जिनके कारण वियेग को पाचि अक्ार का कद्दा जाता है-- 
यह है आचीन आचायों का अभिप्राय ! 


बार 


( #८ ) 
मल्य-अनिलछ अरु गुरु मरलू, तिय-कुल्तल भ्रहि-ढेह 
सुपच रु विधि को भेद तजि मम थिति भहे अछेह ।॥ 


सलयाचल के वायु और विष मे, ख्रियों के सिंदूर-पूरित 
केश और सप्प के शरीर में एवं चण्डाल तथा ब्रह्मा मे सेद-भाव- 
रहित मेरी स्थिति, परमात्मा मे, हो गई है। 


यहां सव जगत्‌ आलंबन है, सब व्यक्तियों पलौर वस्तुओं 
से समानता अनुभाव है और मति आदि संचारो भाव हैं। 
यद्यपि पूर्वार्ध में पहले उत्तम ( मलय-पवन आदि ) का वर्णन 
और पीछे अधम ( विष आदि ) का वर्णन है; पर उत्तराध में 
पहल्ले अ्रधम ( श्वपच ) का और पीछे उत्तम (ब्रह्मा ) का 
वर्शन है, भरत: 'प्रक्रम-भंगः दोष है--अथांत्‌ जिस क्रम से 
प्रारंस किया गया, उसी क्रम का समाप्तिपयत निर्वाह नहीं हे। 
सका; तथापि “कहनेवाला, जद्धरूप होने के कारण, उत्तम- 
अधम के ज्ञान से रहित हो! गया है?” यह वात प्रकाशित 
करने के लिये क्रमभंग” शुण ही है--अर्थात्‌ इससे वक्ता 
की उत्तमाधम-ज्ञान-शुन्यता प्रकाशित द्ोतो है, जे कि नह्व- 
ज्ञानी के लिये आवश्यक है। से। यह दोष नही, गुय है। 
यह ते हुआ शांतरस का उदाहरण; अब उसका श्रत्युदाहरण 
भी सुनिए-- 

सुरखोतसखिन्या। पुलिनमधितिष्ठमयनया- 

विंधायान्तमुद्रामथ सपदि विद्वाव्य विषयान्‌ | 


( ड॑ई॑ ) 


विधूतान्तध्वान्ता मधुर-मधुरायां चिति कदा 
निमग्र। स्यां कस्याश्वन नव-नभस्याम्बुदरुचि ) 


कक रु हे है 


श्रीगेगा के पुलिन बैठि करि नयन-निमीकृन। 
तजिके मदहा-उपाधिरुप ये सकछ विषय-गन॥ 
अन्त करण मल्लीन करि दिया जाने इकढदस। 


करिके दूर समग्र वहै अज्ञानडप तस | 
दे 


भादी के नव-बन-सरिप्त परस मनोहर कान्तिसय। 
मधुर मधुर चेतन्य में होवेगो कर नम विलय] 
श्रीगंगाजी के वाह्ुकामय तट पर बैठा हुआ में, आँखें मीच- 
कर, सब सांसारिक विषयों का, उसी समय, दूर हटाकर एवं 
अंतःकरण के अंधकार ( अज्ञान ) से रहित हाकर, भाद्गरपद के 
नवीन मेघ के समान कांतियुक्त किसी ( अनिरवेचनीय ) परम- 
मधुर चैतन्य में कव निमम्न हे! जाऊँगा--उसकी तन्मयता 
मुझे कव प्राप्त होगी ! 
यद्यपि इस पद्च में भी विषयों का निरादर आलंवन है, 
गंगा के वट आदि उदीपन हैं, आँखों का मॉचना आदि अलु- 
भाव हैं और उनके संयेग से स्थायी भाव नि्बेद की प्रतीति 
होती है; तथापि भगवान्‌ वासुदेव को प्रेमपात्र मानकर जो 
कबि का ग्रेम है, उसकी अपेक्षा निर्बेद गाण हे। गया है; इस 
कारण निवेद के रहते हुए भी यह पद्म 'शांव-रस” की ध्वनि 
नहीं कह्दा जा सकवा। यह पद्म मेरी (पंडितराज की ) 


( १०० ) 
बनाई हुई 'करुणा-लहरी” नामक पुस्तक मे लिखा गया है और 
उसमे भाव ( भगवस्मेम ) ही प्रधान है, अतः इस पद्म मे भी 
उसी की प्रधानता उचित है। दूसरे, इस पद्य की ओ्ेजस्विनी 
रचना भी शांत-रस के प्रतिकूल है, इस कारण भी इसे उसके 
उदाहरण रूप मे उपस्थित करना उचित नहीं । यदि कहे कि 
'मलयानिलकालकूटयो:. . . ? इस पूर्वोक्त पद्म मे भी पर- 
मात्मा मे स्थिति! का वर्णन है, अतः वहाँ भी भाव प्रधान होना 
चाहिए, उसे शांत-रस का उदाहरण कैसे कह दिया, ते उसका 
उत्तर यह है कि वहाँ परमात्मा मे स्थिति हो गई है? यह 
लिखा है, से। उसे अपने आत्मा मे भगवद्रपता का बोध होने 
के कारण प्रेम की प्रतीति नही होती; क्योंकि प्रेम प्रथक्‌ सम- 
भने पर ही हे| सकता है, ऐक्यज्ञान होने पर नही | 
शैद्-रस, जैसे-- 
नवेच्छलितयौवनस्फुरदखव॑ गव॑ज्बरे 
मदीयशुरुकामंक॑ गलितसाध्व्स हथ्वति । 


अय॑ पततु निदयं दल्तिदप्तभूभृदूगल- 
स्खलद्ग॒ुधिरघस्मरों मम परश्वधों भेरवः ॥| 
कट कै कट कक 


नव-जावन की बाढ़ ते बड़े गरब ते फ़ाटि। 
मेरे गुरु को धनुष यह निरस़ै द्वे दिय काटि ॥ 
निरसे हे दिय काटि अबे यह अतिसय भीषण । 
तृप्त दप्त भूपाक-कंड-शोणित करि भक्तण ॥ 


( १०१ ) 


मेरी फरला पड़े तासु ऊपर निदुय-मन । 
हो जावे परतच्छ वच्छ कहो सच नव-जावन | 

सीता-स्वयंवर मे, परशुराम ने, जब धनुष के टुकड़े हुए 
देखे ते उनसे न रहा गया । वे वोले--किसी को, नवयैवन 
की उमंग के कारण, अभिमानरूपी ज्वर तेज हो गया है, तभी 
ते उसने निर्भय होकर मेरे गुरु--भगवान्‌ शिव--का धनुष तोड़ 
डाला। अच्छा, अब ( मेरी इच्छा है कि ) उसके ऊपर यह 
मेरा भयंकर फरसा निर्देयता के साथ गिरे, जिसने काठे हुए 
अभिमानी भूमिपतियों के गले से करते हुए रुधिर का पान 
किया है। मैं चाइता हूँ कि उस उन्मत्त की निर्देयतापूर्वक 
खबर ली जाय | 

यहाँ जिसका परशुराम ने, उस समय, यह नहीं जाना 
था कि यह भगवान्‌ राम हैं?, वह गुरु ( शिवजी ) के घलुष 
को तोड़ देनेवाला आत्वन है। गुरुद्रोही का नाम न लेना 
चाहिए इस कारण, अथवा क्रोध उत्पन्न हे जाने के कारण, 
'ताड़नेवाल्ा! यह विशेषण मात्र ही कहा गया है, विशेष्य 
(ताड़्नेवाले का नाम) नहीं कहा गया । एक प्रकार की भुवन 
वउ्यापी ध्वनि से अनुमान किया हुआ “निर्भय होकर धनुष तेड़ 
देना? उद्दीपत है, कठोर वचन अलनुभाव है और गये, उम्रता आदि 
संचारी भाव हैं। यह धनुष के भग की ध्वनि से समाधि टूट 
जाने पर परशुरामजी की उक्ति है। इस पद्म की अत्यंत उद्धत 
रचना भी रौद्रस्स की परम ओजखिता को पुष्ट करती है। 


( १०२ ) 


यद्यपि अन्यत्र गुरु का स्मण्ण होने पर अहंकार का निशृत्त हो 
जाना आवश्यक है, पर इस प्रसंग मे, ऐसे अवसर पर भी, 
गये का उत्कर्ष प्रकाशित होने से परशुरामजी की विवेकरहितता 
स्पष्ट प्रतीत होती है, और उसके द्वारा उनके क्रोध की अधि- 
कता ज्ञात होती है। यहाँ गब॑ का एउत्कर्ष श्रकाशित करनेवाल्षा, 
गुरु के साथ लगा हुआ 'मेरे” शब्द है; उससे 'अजहत्खार्था 
लक्षणा” के द्वारा यह ध्वनित होता है कि “मैं पृथ्वी को 
इकीस बार निःक्षत्रिय करनेवाला हैँ ( फिर मेरे गुरु के 
धनुष को कौन छू सकता है)” । वह ते है उदाहरण, 
भ्रव॒ प्रत्युदाहरण सुनिए-- 
धलुविदलनध्वनिश्रवणवत्क्षणाविर्भव- 
न्महागुरुवधस्मृति! खसनवेगधूवाधरः । 
विलेचनविनिःसरदूबहलविस्फुलिब्नत्रजो 
रघुप्रवरमाक्षिपज्ञयति जामदग्त्यो मुनि ॥ 
ध्छ ध् 2 फ् 
घनु-विद्छन को शब्द सुनि सरण भये तत्काल | 
परम-गुरू जमद्भि के वध के सब अहवालढू ॥ 
वध का सब अदवाहू साँस कंपे दृशनच्छद ! 
नैननि निकसत उम्र आग के कनिका बेहद ॥ 
जयति परशुधर राम राम पै हे निवेय मन। 
करत प्रवछ आह्षेप किये क्यें ते धल्नु-विदढ॒न ॥ 
जिनको धनुष टूटने का शब्द सुनते ही, वत्काल, महाशुरू 
जमदभमि के वध का स्मरण हो आया, अतएव श्वास-वाडु के वेग 


( १०३ ) 
से नीचे का होठ फड़कने ज्ञगा और नेज्नों से आग की चिन- 
गारियों का भारी समूह निकलने लगा, ऐसी दशा मे रामचंद्र 
पर आक्षेप करते हुए मुनि परशुराम सबसे उत्कृष्ट हैं। 
यहाँ भी, यद्यपि अपराधपात्र भगवान्‌ रामचंद्र आह्ल॑बन हैं, 
धनुष टूटने के शब्द का सुनना उद्दोपन है, श्वास तथा नेत्रों का 
जलना आदि अनुभाव है, पिता के वध का स्मरण, गरब और 
उग्रता आदि संचारी भाव है और इनके द्वारा क्रोध अभिव्यक्त 
होता है; तथापि जिसके कारण कवि ने परशुरामजी का वर्णन 
किया है, उस कवि के प्रेम की अपेक्षा क्रोध गौण हो गया 
है, अतः उसके कारण इस पद्म को रौद्र-रस की ध्वनि नहीं 
कहा जा सकता | 
अच्छा, अब यहाँ एक प्रसंगप्राप्त वात भी सुन लीजिए | 
'काव्य-प्रकाश” मे रौद्र-एस का यह उदाहरण दिया गया है-- 
'कृतमनुमत॑ दृईं वा यरिददं गुरुपातकम्‌ 
मनुजपशुभिनिमेयादिभंवद्धिस्दायुध: । 
नरकरिएुणा साद्धे तेषां समीमकिरीटिना-- 
मयमहमस मेदे|मांसे: करोमि दिशां वलिग || 
“'वेणीसंह्ाारः नाटक के ठ॒तीय अंक में द्रोण-बघ से क्ृपित 
अश्वत्थामा की, अज्जुन आदि के प्रति, यह उक्ति है-- 
शस््॒ उठानेवाले जिन मर्यादारहित, नरपशुओ ने गुरु 
(द्रोणाचाय) का वधरूपी पावक किया है य। उसमे अनुमति दी 


( १०४ ) 

है अथवा उसे ऑँखो देखा है,---कष्ण, भोम और अजुन के साथ 
साथ--उन सभी लोगो के रुघिर, मज्जा तथा मांस से अकेला 
ही मैं दिग्देवताओ की बलि करता हैँ । 

इस पद्म की रचना रौद्र-रस को व्यक्त नहीं कर सकती--- 
इस रचना में वह शक्ति नहीं कि जिसके सुनते ही यह पता 
क्वग जाय कि यह रौद्र-रस के वर्णन का पद्म है; से! यह उस 
पद्म के निर्माता को अशक्ति ही है । 


वीर-रस 
वीर-रस चार प्रकार का है; क्योंकि वीर-रस का स्थायी 
भाव जो “उत्साह” है, वह दान, दया, युद्ध और धर्म इन चार 


फारणों से चार प्रकार का है। उनमे से पहला--अर्थात्‌ 
दानवीर; जैसे 


कियद्द्मिधिक मे यद्‌ द्विजायाथ्थयित्रे 
फवचमरमणीयं कुंडले चारपयामि । 

अकरुणमवकृत्य द्वाक्‌ कृपाणेन निये- 
हृहलरुघिरधार' मौलिमावेदयामि ॥ 


है. 8 छ ् 


अरपे याचत दुजहि' कवच कुंडल साधारण ! 
कहहु कहा यह अधिक भये मम हे सदृध्य-गण ॥ 
निदेयवता से कादि कठ झट पट्ट खज्ल सन। 
भूरि रक्त की धार सरत शिर करे निवेदन ॥ 


(१०५) 


मेरे लिये यह क्‍या अधिक बात है कि मैं माँगने आए हुए 
ब्राह्मण को, साधारण से, कबच और कुंडल अपैण कर रहा 
हूँ। लीजिए, यदि वह चाहे ते।, निदेयता के साथ, तलवार 
से तत्काल काटकर गहरी रुधिर-धारा भरते हुए ( अपने ) 
शिर को भी निवेदन कर रहा हूँ। यह, ब्राह्मण का वेष 
धारण करके आए हुए ईंद्र को कबच और कुण्डल देने के लिये, 
उद्यत देखकर, उस दान से आश्चयंयुक्त सभासदे के प्रति, 
करण का कथन है। 

यहाँ मॉगनेवाला आलंबन है, उसकी वर्णन की हुई 
स्तुति उद्दीपन है, कवचादिक का दान करना श्र उनका साधा- 
रण समझना अनुभाव है और "मेरे लिये? इस शब्द से अथों- 
तरसंक्रमितवाच्य ध्वनि? से सूचित किया हुआ गवे एवं अलौ- 
किक पिता भगवान्‌ भुवन-भास्कर से अपने उत्पन्न होने आदि 
का स्मरण संचारी भाव है। इस पद्म की रचना भी उन उन 
अर्थों के अनुकूल ओज और मदुता दोनों से युक्त होने के 
कारण सहृदयों के हृदय (अन्तःकरण) मे चमत्कार उत्पन्न कर 
देनेवाली है। देखिए--पूर्वांध मे कवच और कुण्डल के अपेश 
को साधारण बताना उत्साह का पोषक है इसलिये उसके 
अलुकूल सदुरचना है, और उत्तराध मे “......मैौलि” के 
पहले, वक्ता के गव॑ और उत्साह को पुष्ट करने के लिये, उद्धव 
है; पर उसके बाद त्राह्मण के विषय मे विनययुक्तता प्रकाशित 
करने के लिये फिर म्दु है। इसी कारण निवेदन कर रहा हूँ? 


( १०६ ) 
कहा, देता हूँ” अथवा वितरण करता हैँ? नहीं। निम्न- 
लिखित पद्म 'दान-वीर! का उदाहरण नही हा सकता-- 
यरयेदामदिवानिशार्थिविलसदानप्रवाह्मथा- 
: माक््यावनिमण्डछागतवियद्बन्दीन्द्रहन्दाननातू । 
रैष्या निर्भरफुछरोमनिकर व्यावरगद्ध/ सप- 
त्यीयूषमकरेः सुरेन्द्रसुरभिः प्राहट्प्योदायते ॥ 
ध् ध्छ द् छः 
जाचक-जन-हित निल्य सुभग निरवधि वितरन ते । 
उ्पजी कीरति जासु, फिरे जे मचुज-सुत्रन ते ॥ 
तिन बँंदिन मुख जानि होत दैषप्यां अति भारी । 
ताते इकद्म फूल्षि उठत रोमावल्लि खारी॥ 
से चल्नुल-गादी ग्रित नव-पय-चय-आरासार सन। 
ह्वोत सुरेश्वर की सुरभि ज्यो पावल को सघन घन ॥ 
भूमंडल से लौटकर आए हुए स्वर्गीयं बंदीजना के समूह 
के मुख से, जिसकी, याचक लोगों मे सुशामित होनेवाली 
रात-दिन दान के प्रवाह की ख्याति को सुनकर ईर्ष्या के कारण 
अत्यंत पुलकित कामपेसु फड़कती हुई गादी में से मरते 
हुए नवीन दुग्ध के समूद्दों के काशश वर्षा ऋतु के मेघ सी 
बन जाती है---उसके खनों से दूध की अविरल धारा आरभ 
हा जाती है। 
यहाँ इंद्र-सभा मे बैठे हुए सब दशक लौंग आलंवन दें, 
भूमंडल से आए हुए स्वर्गीय बदीजनो के मुख से किए हुए राजा 


( १०७ ) 

के दान का वर्णन उद्दीपन है, गादी से करते हुए नवीन दूध 
का समूह अनुभाव है और ईर्ष्या के द्वारा ध्वनित हुई राजा के 
दान-वर्णन को साधारण दिखाने की बुद्धि, जिसे असूया? 
कहना चाहिए, वह और अन्य ऐसी ही चित्तवृत्तियों संचारी 
भाव हैं। इनके संयोग से यद्यपि कामधेनु का उत्साह अमि- 
व्यक्त होता है; तथापि वह राजा की स्तुति की अपेक्षा गौ 
हो गया है, अत: उसको लेकर यहाँ वीर-रस नहीं कहा जा 
सकता । इसी कारण यह उदाहरण भी नहीं वन सकता--- 


साब्धिद्वीपकुलाचलां वसुमतीमाक्रम्य सप्तान्तरां 
सो द्यामपि सस्मितेन हरिणा मन्‍्द॑ समालछोकितः । 


प्रादुभंतपरममेदविदलद्रोमाशितस्तत्क्षएं 
व्यानम्रीकृतकन्धरो5छुरवरों मोलिं पुरो न्यस्तवान्‌ | 
क कक पक ध् 


उदधि, दीप, कुछ-अचछ सहित सब भ्रुवद्दि खबश के। 

सब सुरगहु को, छगे देखिवे हरि सस्मित हें॥ 

उपज्यों परम प्रमोद, भये! पुछक्तित, अरु सत्वर। 

शिर आगे घरि दीन्ह असुर, करि नम्न शिरोधर ॥ 
समुद्रो, द्वीपो एवं कुलपर्बतों के सहित प्रथ्वी को और सात 
कोटवाले समग्र खर्ग को भी आक्रमण करने के अनन्तर भग- 
बान्‌ बामन ने जव कुछ हँसकर राजा वल्ि की तरफ ( तीसरे 
पैंड के लिये ) थोड़ा सा देखा, तो उस असुरश्रे्ठ ने अत्यन्त 


( १८८ ) 


आनन्द की उत्पत्ति के कारण पुलकित होकर, तत्काल गरदन 
नीचों करके सिर सामने रख दिया, कहा--लो, एक पैर इस 
पर भो धरकर इसे भी स्वीकार कर लो । 

यहाँ सगवान्‌ वामन आलंबन है, उनका थोड़ा सा 
देखना उद्दोपन है, रोमांचादिक अनुभाव हैं और हर्षादिक 
संचारी भाव हैं। यद्यपि इनके संयोग से उत्साह” अ्रमिव्यक्त 
होता है, तथापि वह गैण हो गया है; क्येकि जिस तरह पहले 
पद्म मे दूसरे ( कामधेनु ) का उत्साह राजा की स्तुति को उत्कृष्ट 
फरनेवाला था, उसी तरह यहाँ राजा ( बलि ) का उत्साह 
भी राजा की स्तुति को उत्कृष्ट करता है; से स्तुति प्रधान हुई 
और उत्साह गौण । 

इससे यह भी सिद्ध हुआ कि काव्यपरीक्षा-कर्ता श्रीवत्सला- 
छन भट्टाचार्य ने जो वीर-रस का यह उदाहरण दिया ऐ-- 


“उत्पत्तिजमदभितः स भगवान्‌ देवः पिनाकी गुरु 

शेर यत्तु न तद गिरां पथि नलु व्यक्त हि तत्‌ कर्ममिः । 

त्यागः सप्तसम्ुद्रम॒द्वितमहीनिव्यांजदानावधिः 

भत्त्रत्रह्मतपेनिधेगंगवतः किंवा न लोकेत्तरम्‌ |! 

'महावीरचरित! नाटक के द्वितीय अंक मे धनुष तोड़ने से 
कुपित परशुराम के प्रति यह रामचन्द्र की उक्ति ह-- 

भगवन्‌ ! आपकी महिमा ल्ोकात्तर है, आपके पिता 
महर्षि जमदत्मि हैं, आपने सात्षात्‌ शिवजी से धनुवेंद का अध्य- 


( १०७ ) 


यन किया है, आपकी वीरता तो आपके कत्तंव्यों से ही स्पष्ट 
है। उसके वर्णन के लिये शब्द नहीं मिलते । आपके त्याग 
का ते कहना ही क्या ? सप्त समुद्र सुद्रित पृथ्वी का, बिना 
किसी लगाव या स्वार्थ के, दे डालना हँसी खेल नहीं है। 
आप ब्राह्मण और, क्षत्रिय दोनो की तपस्या के निधान हैं। 
आपकी सभी बातें निरात्षी है ।--वह उदाहरण ठीक नहीं; 
क्योंकि वह भी दूसरे का अग होने से गुणीभूत व्यंग दो गया 
है। 'रसध्वनि? में वह उदाहरण उचित नहीं । 

यहाँ एक शंका हो! सकती है कि--आपने जो 'दान-बीरः 
का उदाहरण दिया है अकरुणमवक्ठत्य “'*''इत्यादि!; उसमें 
प्रतीत दवेनेवाला 'दान-बीर (रस)! भी कर्ण की स्तुति का अंग है--. 
उससे भी करण की प्रशंसा सूचित होती है, अतः उसे आपने 
ध्वनि-काव्य कैसे बताया? हा, यह सच है; पर, थोड़ा ध्यान 
देकर देखिए, उस पद्य मे कवि का तात्पय ते कर्ण के वचन 
का केवल अनुवाद करने मात्र मे है, कर्ण की स्तुति करना ते। 
उसका प्रतिपाद्य है नही, और कर्ण है महाशय, इस कारण 
उसका भी अपनी स्तुति में तात्पये हो नहीं सकता, क्योंकि 
अपनी बढ़ाई करना चुद्राशयों का काम है। से उस वाक्य 
का अर्थ ( तात्पयये ) ता कर्ण की स्तुति है नहों, किंतु बीर-रस 
की प्रतीति के अनंतर, वैसे उत्साह के कारण, रसज्ञो के हृदय 
में वह ( स्तुति ) अनुमित द्वाती है। पर जहाँ राजा का वर्णन 
है।, वहाँ ते। राजा की स्तुति मे ही पद्य का वात्पर्य रहता है; 


(६ ११० ) 


अतः वह स्तुति वाक्यार्थ रूप होती है, सो उसे प्रधान माने 
बिना गुजारा नही। दूसरा दयावीर; जैसे-- 


न कपोत | भवंतमण्वपि स्पृशतु रयेनसमुद्धवं भय | 
इृदमय मया तृणीकृत भवदायु/कुशरू कलेवरम्‌ ॥ 
2, 2] ध् ध्‌ 
जनि कपोत, तुद्दि तनिक हूँ छुवे बाज-भय, भआाज। 
यह तन तिनका मैं किये तेरे जीवन-काज ॥ 
है कबूतर, ( मैं चाहता हूँ कि ) बाज का भय तेरा 
किचिन्मात्र भी स्पश न करे। आज, मैंने, तेरे जीवन को 
ऊुशलता प्रदान करनेवाले इस शरीर को तिनका बना दिया 
है-.मैं इस शरीर को तिनके की तरह समझकर नष्ट कर रहा 
हूँ और चाहता हूँ कि बाज के द्वारा तुझे किसी प्रकार का 
भय न हा । अथवा इस पद्म की रचना यों सममक्तिएं--- 


न कपोतकपोतर्क तव स्पृशतु श्येन मनागपि स्पृह्य । 
इदमद्य मया समपित भवते चारुतरं कलेवरस्‌ ॥ 
ध्‌ड धड ष्छ के 

जनि कपेत-पे।तहि छुचे तनिक हु ठुव सन वाज ! 
यह तुव हित अ्ररपन किये सुघर कलेवर आज ॥ 
है बाज | ( मैं चाहता हूँ कि ) तेरी इच्छा ( इस ) कबू- 
तर के बच्चे का किचिन्मात्र भी स्पश न करे । मैंने, आज, तेरे 


लिये इस परम रमणीय शरीर का समपर्ण कर दिया है-- 


( १११ ) 


निर्मेम हेकर, इसे, तिनके की तरह तुझे सॉप दिया है। यह 
राजा शिबि की, पहले पद्य मे कबूतर के प्रति और दूसरे पद 
मे बाज के प्रति, उक्ति है| 

यहाँ कबूतर आलंबन है, उसका व्याकुल होना उद्दीपन है 
और उसके लिये अपने शरीर का अ्रपैण करना अलुभाव है। 

पर यह कद्दना कि इस पद्य मे शरीर के दान की प्रतीति 
होती है, इस कारण यह दानवीर की 'ध्वनि? हो जायगा, 
उचित नहीं; क्योंकि बाज का कबूतर खाद्य पदार्थ है, अतः वह 
कबूतर का याचक हे! सकता है, राजा के शरीर का नहीं। 
बाज को जो शरीर दान किया गया है, से! ते कपोत के शरीर 
की रक्षा के लिये बदले मे दिया गया है, वह दान नही, कितु 
लेन-देन! है। तीसरा युद्धवीर, जैसे-- 


रणे दीनान्‌ देवान्‌ दशवदन ! विद्वाव्य बहति 
प्रभावप्रागरम्यं त्वयि तु मम के।5यं परिकर । 
ललाटायज्ज्वालाकबलितजगज्जाल विभवो 
भवे। मे कोदण्डच्युतविशिखवेगं कजयतु ॥ 
न्धः क कक ड 
दीन-बेवतनि दशवदुन, रन छुड़ाइ तू आज । 
है प्रभाव-शाढी, कहा तोपे साज-समाज ॥ 


तोपै साज-समाज भाछल की धधकत मारन 
जारि दिये जिन विश्व वह शिव बूऊे इढि रन ॥ 


( ११२ ) 
देखे मम कोद ड-सुक्त-शर-वेगहिं तू जनि। 
समझे सगरे ठामु बाघुरे दीन-देवतनि ॥ 

है दशानन | बेचारे देवताओं को रण में भगाकर भारी 
सामथ्य रखनेवाले तेरे विषय मे ते मेरी यह तैयारी क्या हो 
सकती है--तू ते चीज ही क्या है; पर जिनके त्लाट से 
निकली हुई ज्वालाओं से सारे संसार का वैभव भस्म हो! जाता 
है, वे महादेव, मेरे धनुष से निकले हुए बाणो के वेग को भेले। 
तात्पये यह कि तुझे तो मैं समझता ही क्या हूँ, पर यदि समग्र 
संसार के संहारक भगवान शिव भी आवें ते वे भी भेरे बायों 
के वेग का देखकर चकित द्वो सकते हैं। यह रावण के प्रति 
भगवान्‌ राम की वक्ति है | 

यहाँ महादेव आलंबन है, रण का देखना उद्दीपन है, रावण 
की अवज्ञा अनुभाव है और गये संचारी भाव है | . रचना 
देवताओं के प्रस्ताव मे उद्धत नही है, जिसके द्वारा उनकी 
कायरता प्रकट होती है, और उससे यह सिद्ध होता है कि 
भगवान्‌ रामचद्र उनको वीर-रस का आलंबन नहीं समझते । 
हा, रावण के प्रस्ताव मे देवताओं के दर्प को दमन करनेवाली 
वीरता का प्रतिपादन करना है, अतः उद्धत है, पर उसकी 
अवज्ञा की गई है, राम उसे अपनी बराबरी का नही समभते, 
अतणएव वह उनके उत्साह का आलंबन नही है से उसे आलबन 
मानकर रस की प्रतीति नही द्वो सकती; इस कारण उस रचना 
मे उद्धतता का आधिक्य नहीं है। पर, भगवान्‌ शिव परम 


( ११३ ) 


उत्तम आलंबन विभाव हैं, और उनका आलंबन मान कर ही 
ओेज़र्वी बीर-रस संपन्न होता है, अतः उनके प्रस्ताव में पूर्ण 
तया उद्धत रचना है । 

चैथा धर्मवीर; जैसे-- 


सपदि विलयमेतु राज्यलक्ष्मीरुपरि पतन्त्वथवा कृपाणधाराः। 
अपहरतुतरां शिरः कृतांता मम तु मतिन मनागपैति धर्माते ॥ 
के ध्क फ् ड़ 

विलय हेहु ततकाल राज्य-छृक्ष्मी मम्र सारी। 

अथवा ऊपर परहु खरग-घारा भयकारी ॥ 

हरहु कालहू' सीस सहँगो अविचछ सब यह । 

मेरी मति तो डिये घरम ते तबिक न अब यह )। 
चाहे, राज्य-लक्ष्मी तत्काल विलीन हो जाय, अथवा तल- 
बारों की धाराएं_ सिर पर पड़ें, यद्वा खय॑ काल शिर उतार ले; 
पर मेरी बुद्धि तो धर्म से किचिन्मात्र भी नहीं हटती। यह 
'अ्रधर्म से भी शत्रु को जीवना चाहिए! यों कहनेवाले के प्रति 
महाराज यथुधिप्ठिर का कथन है | 

यहाँ धर्म भालंबन है, “न जातु कामान्न भयात्न 
लेशभाद्धम ल्यजेज्जी वितस्यापि हेते।:(महाभारत उ० पे) 
( अर्थात्‌ धर्म को काम, भय अथवा लोभ के लिये, किबहुना 
जीवन के लिये भी कभी न छोड़ना चाहिए)?” इत्यादि शास्रीय 
वाक्यों की आलोचना उद्दीपन है, सिर के कटने आदि का 
अगीकार करना अनुभाव है शौर धृति संचारी भाव है ! 

र०नप 


( ११४ ) 
वीर-रस के, चार ही नहीं, अनेक भेद हो सकते हैं। 
इस तरह प्राचीन आचायों के अनुरोध से वीर-रस का 
चार प्रकार से वर्णन किया गया है, पर वास्तव मे विचार किया 
जाय तो, हगार॑ की तरह, वीर-रस के भी बहुतेरे भेद्‌ निरूपण 
किए जा सकते हैं। देखिए, यदि पूर्वोक्त 'सपदि विलयमेतु'** 
***? इत्यादि अथवा विलय ह्दोहु वतकाल्" ' '*** ? इत्यादि पय मे 
“सम तु मतिन मनागपैति सत्यात्‌” अथवा 'मेरी मति ते डिगे 
सत्य ते तनिक न अब यह? इस तरह अंतिम चरण बदल दिया 
जाय ते 'सत्य-बीर' भी एक भेद हो सकता है। आप कहेगे 
कि खत्य भी धर्म के अन्तर्गत है, इस कारण 'धर्मवीर-रस” में 
ही सत्य-वीर! का भी समावेश हो जाता है। ते हम कहते 
हैं कि दान और दया भी धर्म के अंतर्गत ही हैं, फिर 'दान- 
वीरः और '“दया-वीर” को भी अल्लग गिनना अलुचित है ! 
इसी तरह 'पांढित्य-वीर? भी प्रतीत होता है; जैसे-- 
अपि वक्ति गिरां पति! खय॑ यदिं तासामधिदेवताअंपि वा। 
अयमस्मि पुरा हयाननस्मरणोंकृ'घितवाब्मयाम्बुधिः ॥ 
कै ध्छ ध्ड डे 
यदि' बोलें वाक्पति खय॑ के सारद हू आइ। 
हूँ तथार, हयसुख सुमिरि, सब-विधि विद्या पाह॥ 
सभा मे बैठकर एक पंडिवजी कह रहे ऐ--यदि खर्य॑ इह- 
स्पति अथवा वान्देवी भी बोलें, तो भी भगवाद्‌ हयप्रीव के 
स्मरण से समप्र साहित्य-समुद्र को पार करनेवाल्ा यह मैं 


( ११५ ) 
सामने उपस्थित हँ---आप लोगों का झुझे कुछ भी भय नहीं 
है, जिसकी इच्छा भावे, वह बात करले । 
यहाँ बुहस्पति और सरस्वती आदि आलंबन हैं, सभा आदि 
का दर्शन उद्दीपन है, सब विद्वानों का तिरस्कार अनुभाव है, 
गये संचारी भाव परिपोषक है और इनसे पुष्ट किया हुआ वक्ता 
का उत्साह प्रतीत दोता है। आप कहेगे--यह ते थुद्ध-बीर! 
दी है; क्‍योंकि युद्ध-शब्द से वाद-विवाद का भी संग्रह हो। 
जाता है; क्योंकि वह भी एक प्रकार का फगड़ा ही है। ते 
हम कहते हैं--यों ही सही; पर 'क्षमा-वीरः के विषय मे आप 
क्या समाधान करेंगे ? जैसे - 
अपि बहलदहनजालहं मूहिनि रिपुर्मे निरंतर॑ धमतु। 
पातयतु वा5्सिधारामहमणुप्तात्न॑न किख्िदाभाषे ॥ 

कक कक ध्ड ५ 

भरें अदित जन दृहन-गन मम सिर सतत जराहि' | 

के पटकहि' 'असि-धार, पै है। कछु वोढो नाहि' ॥ 

भत्ते हो शत्रु मेरे सिर पर निरंतर गहरी आग जताते रहें, 

अथवा तल्ववार की धार पटकते रहें, पर मैं कुछ भी बोलने का 
नहीं। अथवा बल्ल-बीर! मे कया समाधान करेंगे ? जैसे-- 
परिहरतु परां फणिम्रवीर;, सुखमयतां कमठोअपि ता विह्यय । 
अहमिह पुरुहत ! पक्षकोणे निखिलमिद जगदक्लमं वहामि || 

कक कक. कक कक 


( ११६ ) 


फनि-पति घरनिहि परिहरै, कमठ हु करे अराम ! 
सुरपति, हैं। निज-पंख पै राखों जगत तसास ॥ 


सर्पवीर शेषजी अपने ऊपर से पृथ्वी को हटा दें और 
कच्छप महाशय भी उसे छाड़कर आाराम करे । हे इन्द्र ! 
लो, मैं-- एक ही, अपने पंख के एक कोने पर इस सब जगत्‌ 
को विना घबराहट के धारण कर लेता हूँ । यह इंद्र के प्रति 
गरुड का कथन है। 


आप कहेगे कि अपि वक्ति'* '? और “परिहरतु धराम्‌ ' 
इन दोनों पद्मों मे ते गर्व ही ध्वनित होता है, उत्साह नहीं; 
प,्रौर बीच फे पद्म 'अपि वहल्त'**? में ध्ृृति-भाव ध्वनित द्वोता 
है, अत: ये भाव की ध्वनियों हैं, रस की नहीं; ते फिर आप 
युद्ध-वीरादिकों मे भी गये आदि की ध्वनियो को ही क्यों नहीं बता 
देते, अथवा यावन्मात्र रस ध्वनियों को, उनमे जो व्यभिचारी 
भाव ध्यनित होते हैं, उनकी ध्वनियों हैं, यह कहकर क्यों नहीं 
गताथ कर देते ? यदि आप कहद्टे कि उनमे जो स्थायी 
भाव की प्रतीति होती है, वह छिपाई नही जा सकवी--उसे 
स्वीकार करना हो पड़ता है, ते! सोच देखिए, वही वात यहाँ 
भी है। पाछ के पद्यों में ता उत्साह अतीत नहीं होता है 
और “दया-वीर”-आरादि में प्रतीत होता हैः--यह कहना ते। 
केवल राजाज्ञा है--अर्थात्‌ जबरदस्ती का लट्ट है। भ्तः यह 
सिद्ध है कि पूर्वोक्त गणना अपर्याप्त ही है| 


( १९७ ) 
अदुभुत-रस; जैसे-- 
चराचरजगज्जालसदनं॑ बदन तब । 
गलहरगनगांभीये वीक्ष्यापस्मि हृतचेतना ॥ 


हर >( अं है 


थावर-जंगम-जगत-गन-सवुन चदुन तुच जोह । 
गई गगन की गहनता रही चेतना खोड ॥ 


जिसमे सव स्थावर और जंगम जगतू निवास करता है, 
और जिसके देखने पर आकाश की भी गंभीरता गिर जाती है, 
उस तेरे मुख को देखकर मेरी बुद्धि नष्ट हो गई है--मेरी अकल्न 
काम नहीं करती कि यह है क्या गजब ! यह, किसी 
समय, भगवान श्रीकृष्ण के सुखारविंद को देखने के पअनंतर, 
यशोदाजी की उक्ति है| 

यहाँ मुख आलंबन है, उसके भीतर समग्र स्थावर-जंगम 
जगत्‌ का देखना उद्दीपन है, बुद्धि का नष्ट हो जाना एवम्‌ उसके 
द्वारा प्रतीत होनेबाले रोमांच, नेत्रों का विकसित हा जाना आदि 
अनुभाष हैं और त्रास-आदि व्यमिचारी भाव हैं। यहां पुत्र का 
प्रेम यद्यपि विद्यमान है, तथापि प्रतीत नहीं हवा; क्योंकि 
उसका कोई व्यंजक शब्द नहीं है--इस पद्म के किसी शब्द 
से उसकी प्रतीति नहीं होती । यदि ग्रकरणादिक की पर्या- 
लोचना करने पर वह प्रतीत भी हे। जाय, तथापि आश्चये 
उसकी अपेक्षा गाौण नहीं हे सकता। क्योंकि समझने की 
शक्ति ही जाती रही ऐसा कहने से आश्चय की ही प्रघानता 


( ११८ ) 


प्रकट होती है । इसी तरह “यह कोई महापुरुष है? यह समझ- 
कर भक्ति भी उत्पन्न ही नहीं हो सकती; क्योंकि उसमे यशोदा 
का यह निश्चय रुकावट डालता है कि यह बालक मेरा पुत्र 
है! | सो भक्ति की अपेक्षा भी आश्चर्य गौण नहीं हो सकता । 

सहृदय-शिरोमणि प्राचीन आचायों ( काव्यप्रकाशकार ) 
ने जे उदाहरण दिया है--- 


“चित्र” महानेष तवाध्वतारः 
क्व कान्तिरेषाउभिनवैव भद्नि। । 
लेकोत्तरं पैयेमहे प्रभावः 
काथ्प्याकृतिनू तन एप सगे ॥ 
भगवान्‌ वामन को देखकर बलि कहते हैं--यह आपका 
महान्‌ अवतार लोकोत्तर है, ऐसी कांति कहाँ प्राप्त हे सकती 
है ? यह चलने, बैठने, देखने आदि का ढग सर्वथा नवीन ही 
है; अलौकिक पैर्य है, विजक्षण प्रभाव है, अनिरवेचनीय ' 
आकार है; यह एक नई सृष्टि है--अब तक ऐसा कोई उत्पन्न 
ही नही हुआ | 
उसके विषय मे हमे यह कहना है कि--इस पद्य मे 
“विस्मय? स्थायीभाव की प्रवीति भले ही हो, उसके विषय मे 
हमे कुछ नही कहना है; पर उस' विस्मय के कारण इस पद 
को अदुभुत-रस की ध्वनि कैसे कहा जा सकता है? क्योंकि 
इस पद्म मे जिस महापुरुष का वर्णन किया गया है, उसके विषय 


( ११८७ ) 


में स्तुति करनेवाले की जे। भक्ति है, वही यहाँ प्रधान है; और 
विस्मय उसे उत्कृष्ट बनाता है, अतः उसकी भपेक्षा गौय हे! गया 
है। जैसा कि महाभारत मे भगवदगीता के अंदर,--जव अजुन 
ने विश्वल॒प ( विराट रूप ) के दशेन किए ते! उसने कहा-- 

“पश्यामि देवांस्तव देव ! देहे स्वास्तया.भ्त- 
विशेष संघानू--हे देव | मैं आपके शरीर मे सब देवताओं 
को तथा मिन्न-मिन्न प्रकार के प्राणियों के समूहों को देख रहा 
हूँ” | इत्यादि वाक्यों के संदसे मे आश्चये प्रतीत होता है, 
परन्तु वहाँ, अजुन की, भगवान्‌ के विषय मे उत्पन्न हुई, भक्ति 
प्रधान है श्लौर आश्चये गौथ । इस तरह यह सिद्ध हुआ कि 
इस आश्चये को यहाँ रसाल्ंकार कहना उचित है, रस-ध्वनि 
कहना नहीं। पर यदि आप फिर भी कहें कि इसमे भक्ति 
क्री प्रतीति होती द्वी नही? तो हम सहृदयों से प्राथेना करेगे 
कि श्राप लोग थोड़ा, आँखे मीचकर, सेचिए-- देखिए कि 
इसमे भक्ति की ग्रतीति होती है, अथवा नहीं । 

हास्य-रस; जैसे--- 


श्रीतातपादेबिंहिते निवंधे 
निरूपिता नूतनयुक्तिरेषा - 
अंग॑ गयां पूवमहो पवित्र 
न वा कर्थ रासमघमेपत्या: 
अर + >( ््‌ 4 


( १२० ) 


दादाजी किय दंग बुधन, लेख लिखि यह जुगति-- 
सुचि गौ-पूरब-अंग रासभ-रानी को न्॒क्यों? 
श्रीमान्‌ पिताजी ने जो निबंध लिखा है, उसमे यह एक नई 
युक्ति वर्णन की गई है । वह युक्ति यद्द है--आश्चये है कि 
यदि गायों का पूर्व अंग पवित्र है तो ग्दभ महाशय की धम्मे- 
पत्नोजी का वह अंग क्‍यों न पवित्र माना जाय १ अर्थात्‌ गौ 
ओऔर गदभो एक समान हैं। 
यहाँ तार्किक ( युक्ति सोचनेवाले ) का पुत्र आलंवन है, 
उसका शंकारहित कथन उद्दीपन है, दाँत निकलना आदि 
अनुभाव है और उद्वेग आदि व्यभिचारी भाव हैं। 


हास्य के भेद 
हास्य-रस के विषय मे प्राचीन आचार्यो का कथन है कि--- 


आत्मस्थः परसंस्थरचेत्यस्य भेदद्॒य मतम्‌ | 
आत्मस्थो द्रष्टुरुत्पन्नो विभावेक्षणमात्रतः ॥ 
इसंतमपरं दृष्ठा विभावश्चोपजायते । 

येघ्सो हास्यरसस्तज्ज़े: परस्थः परिकीत्ति तः ॥ 
उत्तमानां मध्यमानां नीचानामप्यसों भवेत्‌ । 
ज्यवस्थः कथितस्तरप पड़ भेदा। सन्ति चाध्पर ॥ 
स्मित' च हसित॑ प्ोक्तमुत्तमे पुरुषे बुधेः | 
भवेद्विसितः चेपहसित॑ मध्यमे नरे | 


( १२१ ) 
नौचेवपहसितं चातिहसितं परिकीत्ति तम््‌ ! 
ईपत्फुछकपोलाभ्यां कटाक्षेरप्यनुखणेः ॥ 
अदृश्यदशने हासे| मधुर! स्मितमुच्यते । 
बक्‍्त्रनेत्रकपोलेइ्चेटुत्फुछे रुपलक्तितः ॥ 
किशिल्लश्तितदन्तरच तदा हसितमिष्यते | 
सबब्दं मधघुरं कायगतं वदनरागवद | 
आकुश्विताश्ति मन्द्रं च विदुवि हसितं बुधाः 
निकुश्चितांसशीषशच जिह्मदृष्टिविलोकनः ॥ 
उत्फुछना|सिका हासे! नाम्नापहर्सितं मतस्‌ । 
अस्थानजः साश्रुदृष्टिराकम्पस्कंपमृधजः | 
शा्देवेन गदिति हासेज्यहसिताहयः 
स्थृलकणकट॒ध्वानों वाष्पप्रप्छुतेश्रणः ॥ 
करोपगूठपारवंथ हासाउतिहसितं मरतम्‌ | 
हास्य-रस दे प्रकार का है--एक आत्मस्थ, दूसरा परत्थ । 
आपत्मस्थ उसे कहते हैं, जो देखनेवाले को विभाव ( द्वात्य 
के विषय ) के देखने मात्र से उत्न्न हो जाता है; और जो 
हास्य-रस दूसरे के। सता हुआ देखकर उत्पन्न होता है एवं, 
जिसका विभाव भी हास्य ही होता है---अर्थात्‌ जो दूसरे के 
हँसने के कारण ही होता है, उसे रसज्ञ पुरुष परस्य कहते 
हैं। यह उत्तम, मध्यम और अधम तीनों प्रकार के व्यक्तियों 
में उत्पन्न दावा है; अत: इसकी वीन अवस्थाएं कहलाती हैं। 
णव उसके और भी छः भेद हैं---उत्तम पुरुष में स्मित 


( १२२ ) 


और हसित, मध्यम पुरुष मे विहृसित और उपहसित 
तथा नीच पुरुष में ्रपहसित और शतिहसित होते हैं। 
जिसमे कपोल्ल थोड़े विकसित हों, नेत्रों के प्रान्त अधिक प्रका- 
शित न हें, दाँत दिखाई न दे" और जो मघुर हो, वह हँसना 
स्मित कहलाता है। जिस हँसने मे मुख, नेत्र और कपोत्न 
विकसित हो जाये और कुछ कुछ दॉत भा दिखाई दें, उसे 
हसित माना जाता है। जिस हँसने मे शब्द होता हा, जो 
मधुर हो, जिसकी पहुँच शरीर के अन्य अवयवों मे भो हो, 
जिसमे मुंह लाल हो जाये, आँखे कुछ कुछ मिंच जाये और 
ध्वनि गंभोर हो, उसे विद्वाद लोग विहसित कहते हैं। 
जिसमे कन्धे और सिर सिकुड़ जाये, टेढ़ी नजर से देखना पड़े 
कर नाक फ़ूल जाय उस हँसने का नाम उपहसित है। जो 
हँसना बे-मौके हो, जिसमें आँखों मे ऑसू झा जाय और कंधे 
एवं केश खुब हिलने लगे", उस हंसने का शाह देव आचार ने 
अपहसित नाम रखा है। जिससे बहुत भारी और कानों 
को अप्रिय ल्गनेवाला शब्द द्वो, नेत्र ऑसुओं के मारे भर 
ज़ायँ और पसलियों को हाथें से पकड़ना पड़े, वह हँसना 
अतिहसित कहलाता है | 
भयानक-रस; जैसे-- 
इ्येनमम्बरतलादुपागत शुष्यदाननबिलो विलेकयन । 
कम्पमानतनुराकुलेक्षण: स्पन्दितु न हि शशाक लावकः ॥ 
९ मं » ९ 


( १२३ ) 


नभ ते ऋकपटत बाज छूखि भूल्यो सकल प्रपंच । 
कंपित-तन ब्याकुर-नयन रावक हिल्‍यो न रंच |। 
ऐक दशक कहता है--बेचारे ज्वा ( एक प्रकार का 
पत्ती ) ने ज्योह्दी आकाश से ऋपटते हुए बाज को देखा, त्योंद्दी 
मुँह सूख गया, देह थरथराने त्वगी, नेत्र व्याकुल हो 
गए और हिल भी न सका | 
यहाँ बाज आलंबन है, उसका वेग-सहित रपटना 
उद्दीपन है, मुँह सूखना आदि अलनुभाव हैं और देन्‍्य आदि 
व्यमिचारी भाव हैं । 
बीभत्स-रस; जैसे-..- 
नखैवि दारितान्त्राणां शवानां पूयशोणितम्‌। 
आननेष्वनुलिम्पन्ति हृष्टा वेतालयेपितः॥ 
८ 4 है / 
फाड़ि नखन शव-आतद़ित, रुधिर-सवादु बिकारि । 
लेपति अपने सुखन पे हरसि प्रेत-गन-सारि ॥ 
एक मनुष्य किसी से रणांगयथ अथवा श्मशान का दृश्य कह 
रहा है--इर्षयुक्त वेतालों की स्त्रियों नखें से मुरदों की अँत- 
ड़ियों को फाड़कर मवाद भौर रुधिर को मुँह पर लेप रही, हैं । 
यहाँ सुरदे आलंबन हैं, औतड़ियों का चीरना आदि उद्दी- 
पन हैं, ऊपर से आाक्षिप्त किए हुए रोमांच, नेत्र मींचना आदि 
अधुभाव हैं और आवेग आदि संचारी भाव हैं । 


, ६ १९४ ) 


“हास” और '“जुगुप्साः का आश्रय कौन दोता है ९ 

झब एक शंका दवा सकती है कि रति, क्रोध, उत्साह, 
भय, शोक, विस्मय और निर्वेद इन स्थायो-भावों में जिस 
तरह आलंबन और आश्रय दोनों की प्रतीति होती है; जैसे 
कि--यदि शकुंतला के विषय मे दुष्यंत का प्रेम है ते शकूं- 
सत्ता प्रेम का आलंबन है और दुष्यंत आश्रय, और वहाँ इन 
देनों की प्रतीति होती है; उस तरह हास और जुगुप्सा में 
नहीं होती, क्योंकि इन दोनों में केवल आालंवन को ही 
प्रतीति होती है, उनमें आश्रय का बर्णेन होता ही नही | और 
यदि पद्म सुननेवाले का हो उनका आश्रय माना जाय ते यह 
रचित नहीं; क्योंकि वह ते। रस के आस्वाद का आधार है-- 
उसे ते अलौकिक रस की चर्बणा होती है, से बह लौकिक 
हास और जुगुप्सा का आश्रय नही हे सकता । हम कहते 
हैं कि हाँ, यह सच है; पर वहाँ उन देनों भावों के आश्रय-- 
किसी देखनेवाल्े पुरुष का आज्षेप कर लेना चाहिए, उसे 
ऊपर से समझ लेना चाहिए। और, यदि ऐसा न करें, ते 
भी जिस तरह सुननेबाले को अपनी स्त्री के वर्धन में लिखे 
हुए पद्यों से रस का उद्बोध दो जाता है--अर्थात्‌ वहाँ जो 
लाकिक रति का आश्रय है, वही रस का भो अलुभवकर्ता हो 
जाता है; उसी तरद्द यहाँ भी लौकिक भाव और रस के भ्राश्रय 
को एक ही मान लेने में कोई बाघा नहीं | 

इस तरह संक्षेप से रसों का निरूपण किया गया है । 


( १२४ ) 


रसालंकार 

इन रसों के प्रधान होने पर, इनके कारण, काव्य को 
“रस-ध्वनि? कद्दा जाता है भौर दूसरों की अपेक्षा गौथ होने पर 
इन्हे 'रसालंकार” कद्दा जाता है, और ऐसी दशा मे वह काव्य, 
जिसमे ये आए हैं।, 'रसध्वनि? नहीं कहता सकता । कुछ 
लोगों का कथन है कि--जब ये प्रधान है, तभी इनको रस 
कहा जाना चाहिए, अन्यथा ये अल्ंकार-मात्र ही ह्वोते हैं, 
उनमे रस कहलाने की योग्यता ही नहीं होती। तथापि 
लोग जो उन्हें रसालंकार कहते हैं, उसी प्रकार से जैसे 'अर्त॑- 
कार-ध्वनिः#कहते हैं। इस बात का एक उदाहरण देकर समझा 
देते हैं। जिस तरह कोई त्राद्मण बौद्धमत की दीक्षा लेकर 
'अमण” ( बौद्ध-मिक्षुक ) बन जाय, तब वह अआक्षण ते! रहता 
नहीं, तथापि लोग उसे पहले ब्राक्षण रहने के कारण ब्राद्मण- 
अमण” कहा करते हैं, बस, वही हिसाब यहाँ समम्िए । 
अर्थात्‌ जे। किसी भी अवस्था मे रस या श्रल्लंकार शब्द से 


» इसका अभिप्राय यह है कि---अलंकार उसका नाम है,जो किसी 
को शोभित करे, जिसे शोमित किया जाय उसका नही, और जो अथ 
ध्वनित ह्वोता है, वह किसी को शोमित नहीं करता, कि तु उसे अन्य 
उपकरण शेामित करते हैं। तब ध्ववित होवेवाले अथे को अलंकार 
रूप मानकर उसके कारण काव्य के अर्वकारध्वनि कहना ठीक नहीं । 
किन्तु अलूंकाय ध्वनि कहना चाहिये, तथापि उसे 'अल्लंकारध्वनि' 
कहा जाता है । 


( १२६ ) 


व्यवहार मे प्रयुक्त हो चुके हैं उनका अन्य अवस्था में भो उसी 
प्रकार व्यवहार होता है, और ये रस तभो कहे जाते हैं जब 
ये असंलक्ष्यक्रमव्यड्ग्य के रूप में रहते हैं। संज्नच्यक्रम होने 
से ते! इनका वस्तु शब्द से ही व्यवहार होता है । 
ये “असंलक्ष्यक्रमव्यंग्य' क्यों कहलाते हैं 
ये रस असंलक्ष्यक्रमव्यंग्य” कहलाते हैं, क्योंकि सहृदय 
पुरुष को जब सहसा रस का आखादन होता है, उस समय, 
यद्यपि विभाव, भ्रठुभाव और व्यमिचारी«भावे के . विमश का 
क्रम रहता है, वथापि जिस तरह शतपत्न कमल्ष के सौ-के-सौ 
पत्रों को सूई से बेधन किया जाता है, उस समय, यह ते 
जान पड़ता है कि सौ-कं-सै ही पत्र बिध गए; पर उनमे से 
कान पहले बिधा और कान पीछे--इतना सेचने का अवसर 
ही नहीं मिल्षता, इसी प्रकार यहाँ भी, शीघ्रता के कारण, वह 
क्रम विदित नहीं हो पावा। परन्तु यह समभकना उचित नहीं 
कि थे विना क्रम के ही व्यंग्य हैं--“-इनका और व्यंजक विभा- 
वादिकों का कोई क्रम है ही नही, क्‍योंकि यदि ऐसा हो, तो रस 
की अभिव्यक्ति का और अभिव्यक्ति के कारणों का कायकारणभाष 
ही न बन सके--अर्थात्‌ विभावादिकों का रस के कारण रूप 
होना ही निर्मूल हे जाय, जे! कि अ्रतीति से सरासर विरद्ध दे। 
रस नौ ही क्यें हैं ! 
अब यह प्रश्न दाता है कि रस इतने ही क्‍यों हैं, यदि 
इनसे भ्रधिक रस माने जायें ते क्‍या बुराई है ? उदाहस्थ 


( १२७ ) 


के लिये देखिए कि---जब भगवद्भक्त लोग भागवत आदि 
पुराणों का श्रवण करते हैं, उस समय वे जिस भक्ति-रसः 
का अनुभव करते हैं, उसे आप किसी तरह नही छिपा सकते । 
उस रस के भगवान्‌ आल्वंबन हैं, भागवतश्रवण आदि उद्दीपन 
हैं, रोमांच, अश्रुपात झादि झलुभाव हैं और हर्ष-प्रादि संचारी 
भाव हैं। तथा इसका स्थायी भाव है भगवान्‌ से प्रेम-रूप 
भक्ति! । इसका शान्त-रस मे भी पझंतर्भाव नहीं हे सकता; 
क्योंकि अनुराग ( भ्रेम ) वैराग्य से विरुद्ध है और शान्त-रस 
का स्थायी भाव है वैराग्य | अच्छा, इसका उत्तर भी सुनिए | 
भक्ति भी देवता आदि के बिषय में जो रति ( प्रेम ) द्वोती है, 
उसी का नाम है, और देववा ध्रादि के विषय मे जो रति 
होती है, उसकी भावों मे गणना की गई है, से वद रस नहीं, 
कितु भाव है; क्योंकि-- 
रतिदेवादिविषया व्यभिचारी तथाउज्लितः 
भावः प्रोक्तस्तदाभासा हयनोचित्यप्रवत्तिताः ॥ 
अर्थात्‌ देवता-आादि के विषय में दोनेवाज्ञा प्रेम शेर व्यंजना 
वृत्ति से ध्वनित हुआ व्यमिचारी भाव »भाव! कहक्षाता है 
और यदि रस तथा भाव अनुचित रीति से प्रवृत्त हों, ते 'रसा- 
सास! कऔर भावाभास” कहलाते हैं--यह प्राचीन आचायाँ 
'का सिद्धांत है। झाप कहेंगे--यदि ऐसा ही है तो कामिनी 
के विषय मे जा प्रेम द्वोता है, उसे भी भाव? कहिए; क्योंकि 
जैसा यह प्रेम बैसा ही वह भी प्रेम--इसमे उसमे भेद ही 


( १२८ ) 


क्या है? अथवा भगवद्धक्ति को ही स्थायी भाव मान लीजिए 
और कामिनी आदि के विषय में जो प्रेम द्वेता है, उसे (संचारी) 
भाव; क्योंकि उसमें कोई युक्ति ते है नहीं कि इन दोनों मे से 
अमुक को ही स्थायी मानना चाहिए | इसके उत्तर में हम 
कहते हैं कि साहित्य शाक्ष मे रस-भाव-आदि की व्यवस्था 
भरत-आदि भुनियों के बचनों के अनुसार की गई है, अतः 
इस' विषय मे खतंत्रता नहीं चल सकती। अन्यथा पुत्र 
आदि के विषय मे जो प्रेम होता है, उसे स्थायि भाव! क्‍यों न . 
माना जाय और >नुग॒ुप्साः और 'शोक! आदि को भाव 
ही क्‍यों न मान लिया जाय । यदि ऐसा करने लगें ते सारे 
शास्त्र मे ही बखेड़ा पड़ जाय श्रौर भरत-मुनि के वचन के 
अनुसार नियत की हुई जो रसों की नौ संख्या है, वह दृट जाय 
और वे कभो अधिक शऔर कभी कम मान लिए जाया करें | 
इस कारण शास्त्र के अलुसार मानना ही उत्तम है । 
रसे का परस्पर अविरोध और विरोध 

इन रसेों का आपस में किसी के साथ अविरोघ है और 
किसी के साथ विरोाध। उनमे से वीर और श्गार का, 
श्गार और हास्य का, धौर और अरूुत का, वीर और रोद्र 
का एवं झूंगार और अद्भुत का परस्पर विरोध नहीं दे । टहँगार 
श्रौर वोभत्स का, रू“ंगार और करुण का, वीर प्र भयानक 
का, शांव और रौद् का एवं शांत और झंगार का विरोध 
है। यदि कबि प्रस्तुत रस को अच्छो तरद्द पुष्ट करना चाददे-- 


( १२5 ) 


यदि उसकी इच्छा हो कि मेरे काव्य में रस का अच्छा परि- 
पाक हा, ते उसे उचित है कि उस रस के अभिव्यक्त करने- 
वाज्ने काव्य में उससे विरुद्ध रस के अंगों का वर्णन न करे; 
क्योंकि यदि विरुद्ध रस के अंगों का वर्णन किया जायगा, 
ते उसकी अभिव्यक्ति होने पर वह पग्रक्तुत रस का बाधित 
करेगा अथवा सुंदोपसुंद-न्याय?# से दोनों नष्ट हो जायँंगे--न 
इसका ही मजा रहेगा, न उसका ही । 
विरुद्ध-रसां का समावेश 

पर, यदि कवि को विरुद्ध रसों का एक स्थान पर समा- 
वेश करना ही हा, तो विरोध का परिद्दार करके करना 
चाहिए। विरोध का परिहार कैसे करना चाहिए सो भो 
सुनिए। विरोध दे प्रकार का है--एक स्थितिविराध और 
दूसरा ज्ञानविराध। स्थितिविराध का अथे है--एक ही 
आधार (पात्र) मे देनों का न रह सकना, भौर ज्ञानविरोध का 
अथे है---एक के ज्ञान से दूसरे के ज्ञान का बाधित हो जाना 
अर्थात्‌ जिन दो रसों का ज्ञान एक दूसरे का प्रतिद्वन्द्ी हो, 

*» सु'द और उपसु'द की कथा यों है। सु'द और उपसु द्‌ वाम 
के दो दैत्य थे | उन्होने बड़ी मारी तपस्या करके भगवान्‌ ब्रह्मा को प्रसन्न 
किया ! ब्रह्मा जी के वरदान से वे सब के भ्रवध्य रहे, केवछ परस्पर की 
लड़ाई से वे मर सकते थे । विश्वविजयी दोनों भाइयों की तिलेतत्तमा नाम 
की अप्सरा की प्राप्ति के लिये लड़ाई हुईं और वे मर मिटे। दे०महाभा० 
आ० झअ० २२८--३२ । इस तरह दोनें के समबहू होने के कारण 
नष्ट हो जाने के ढंग को 'संंदोपसंदन्याय” कहते हैं। 

र०---< 


( १३० ) 
उनमें ज्ञानविरोाध होता है। उनमें से पहला विरोध विरोधी 
रस को दूसरे आधार में स्थापित कर देने से निश्ृत्त हो जाता 
है। जैसे कि यदि नायक मे वीर-रस का वर्णन करना हो, ते 
प्रतिनायक (उसके शत्रु) में भयानक का वर्णन करना चाहिए। 
इस प्रकरण मे रस-पद से रसें के उपाधिरूप स्थायी भावों 
का अहण किया गया है; क्‍योंकि रस तो दशेक-समाज की 
व्यक्तियों मे रहता है, नायक भआादि में नहों। एवं रस 
झद्वितीय आनंद-मय है, भ्र्थात्‌ जब उसकी प्रवीति द्वोती है, 
तब अन्य किसी की भ्रवीति होती ही नहीं, तब उसके विरोध की 
बात दी चलाना अनुचित है। 
विरुद्ध-रसों का स्थिति-विराध कैसे मिटाया जा सकता है, 
इसका उदाहरण लीजिए-- 
कुण्डलीकृतकादण्टदेदंण्डस्य पुरघ्तव | 
मगारातेरिय मृगाः परे नेवाध्यतरिथरें ॥| 
२ > ५. ४ 
कु'डढ-सम घर" कर लिए तुव आगे रन-माहि । 
केइरि-समुद्ै रूग-सरिस ठहरि सके अरि नाहि' ॥ 
कवि कहता है--हे राजन! जब आपने खैंचकर 
कुंडक्ष के समान गोल किए हुए घलुष को द्वाथ मे लिया, ते 
आपके सामने सिंह के सामने सृर्गों के समान, शत्रु नहीं 
ठहर सके! ( यहाँ नायक मे 'वीरः और प्रतिनायक मे 
भयानक? का वर्शन स्पष्ट ही है। ) 


(१३१ ) 


यह ते हुई पहले प्रकार के विरोध का निवृत्त करने की बात ! 
अब दूसरे प्रकार के विरोध को निृत्त करने की विधि भी सुनिए | 
वद्द (ज्ञान) विरोध भी, जो रस देनों रसे| का विरोधी न हो, 
उसे संधि (सुल्ञह) करवानेवाज्ने की तरह, विरुद्ध-एखों के बीच 
मे स्थापित कर देने से निबत्त हो जाता है। जैसे कि मेरी 
( पंडितराज की ) बनाई हुई आश्यायिका में--कण्वाश्रम मे 
स्थित महर्षि श्वेतकेतु के शाँव-रस-प्रधान वर्णन के प्रस्तुत 
होने पर “यह कैसा रूप है, जिसका कमो अनुभव नहों किया 
गया; यह वचन-माल्या की कैसी मधुरता है, जिसका वर्णन नहीं 
हा सकता?” इस तरह झड्ट त-रस को मध्य में स्थापित करके 
वरवर्णिनी नामक नायिका के प्रति प्रेम का वर्णन किया गया 
है। वहां शान्त भर श्र के मध्य में अ्रद्भुत आ जाने से 
विरोध हट गया अथवा जैसे-- 

सुराद़्नाभिराड्िए्ा व्योग्नि वीरा विमानगा! । 
विलेकन्ते निमान्‌ देहान्‌ फेस्नारीभिराहतान ॥ 
७४... ४ ४ ४ 
सुर-नारिन सँग गगन में वीर विराजि विमान । 
निरखत स्थारिन सों घिरे अपुने देह महान ॥ 

देवांगनाओं से आलिंगन किए हुए, आकाश मे, विमानों 
मे बैठे हुए वीर, मादा-सियारों से घिरे हुए, अपने देहों को 
देख रहे हैं 


( १३२ ) 


यहाँ देवांगनाओं का आलंबन मानकर ऊंगार-रस प्रौर 
बीरों के मस्तक शरीरों का आलंबन मानकर बीभत्स-रस की 
प्रतीति ह्वोती है। ये देने परस्पर विरुद्ध हैं, अतः इन दोनों के 
मध्य में वीरों की खर्गप्राप्ति का वर्णन करके उसके द्वारा 
आज्षिप्त वीर-रस ग्रविष्ट कर दिया गया है। बीच में प्रवेश 
करने का अथे यह है कि परस्पर विरोधी रसें के आखादन 
का जो समय है उसके मध्य के समय से उसका भ्राखादन 
होना। से देखिए, यहाँ स्पष्ट ही है कि पूर्वोक्त पद 
के पूर्वांध में शआंगार-रस का आखादन द्वोने के अनंतर 
वोर-रस का आस्वादन द्वोता है मर उसके अनंतर दूसरे 
अर्द्ध मे बीभत्स का । 
भूरेणुदिग्धान्‌ नवपारिजात- 
मालारजावासितबाहुमध्या: । 
गा ज्िवाभिः परिरभ्यमाणान्‌ 
सुराज्ननाश्लिष्रयुजान्तरालाः ॥ 
सशेणितेः क्रव्यञ्ुजां स्फुरद्वि! 
पक्षे: खगानामुपवीज्यमानान | 
संवी जिताअन्द नवारिसेकेः 
सुगन्धिभिः करपलतादुकूले! ॥ 
विमानपयेडूतले निषण्णा! 
कुतृहलाबिष्टतया तदानीम्‌ । 


( १३३ ) 


निर्दिश्यमानाँहछलनाजुलीमि- 
वॉराः खदेहान्‌ पतितानपश्यन्‌ || 

रणांगणथ का वर्णन है। कबि कहता है--उस समय 
पृथिवी की रज से भरे हुए, श्गालिंयों से पूर्णतया आलिंगन 
किए हुए, मांसाहारी पक्षियों के चमचमाते हुए रुधिर-लिप्त 
पंखें से कन्ने जा रहे, रणांगण में गिरे हुए श्रौर लल्नाओं की 
अँगुलियों से दिखाए जाते हुए अपने देहों का, जिनके वच्त:स्थल्ल 
नवीन पारिजात पुष्पो की माज्ाओं से सुगन्धित हो रहे हैं और 
देवांगनाओं से आलिंगित हैं, एवं जिनका, कल्पवच्तियों से प्राप्त 
झतएव चंदन के जलु से छिड़के जाने के कारण सुगंधित 
दुशाज्ञों (के बने हुए पंखें ) से कला जा रहा है ऐसे विमानों 
के पलँगों पर बैठे हुए ( युद्ध मे लड़कर खर्ग गए हुए ) वीरों 
ने कातुकयुक्त होकर देखा । 

इत्यादि काव्य-प्रकाश के पथ्च-समूह में तो पहले बीभत्स- 
रस की सामग्री का श्रवंण होने के कारण उसका आखादन 
होता दै शऔ,औऔर उसके अनंतर, बीभत्स-रस की सामग्रो से 
“निर्मय देकर प्राण त्याग देने आदि! वीर-रस की सामग्री 
का आक्षेप होता है, से उसके द्वारा जब वीर-रस' का आखा- 
दन हो चुकता है, तब हंगार-रस का आखादन होता है-- 
यह भेद है। अर्थात्‌ हमारे पद्य मे क्रमशः ४ गार, वीर और 
बीभत्स का आस्वादन द्ोता है और काव्य-प्रकाश के पद्ों में 
बीभत्स, वीर और रंगार का । । 


( १३४ ) 


अस्तु | इस तरह इस सब कथन का तात्पय॑ यह होता है 
कि मध्य में उदासीन रस' का आरवादन होने से रुकावट डालने- 
वाले ज्ञान की निवृत्ति हो जाती है, कौर इस कारण जिसको 
रोक दिया जा सकता था, उस रस का आस्वादन निर्विन्नता 
से हो जाता है--उसके आखादन मे किसी प्रकार की 
रुकावट नहीं रहती । 
अब अन्य प्रकार से विरोध दूर करने की युक्ति करते हैं:-- 
एक रस दूसरे रस-भाव आदि का अंग हो गया हो, 
अथवा देनों रस किसी अन्य रस-भाव श्रादि के अंग हो गए 
हैं, ते उनमे विरोध नहीं रहता; क्योंकि, यदि वे विरुद्ध रहें 
ते अंग ही नहीं बन सकते । जैसे कि--- 
प्रत्युदूगता सविनय' सहसा सखीभिः 
स्मेरेः स्मरस्प सचिवे! सरसावलेकेः । 
मामद मंजुरचनेवचनेश्व बाले ! 
हा! लेशते5पि न कथं वद सत्करोषि ॥ 
भर भर > ५ 
समर के सचिव समान सरस चितवन सुखकारी 
अरु अति-म॑ जुरू-रचन वचन गन सो हा प्यारी ! 
विनय सहित रूट सखिन संग ले समुहे आई 
करति क्यो न सम आज कछु हु आदर हरपाई । 
हाय | बाले ! तुम, सखियों सहित विनयपूर्वक फट से 
सामने आकर, कामदेव की कामदार-उसकी सिफारिश करने- 


( १३५ ) 


वाली, विकसित और सरस चितवनों से तथा सुंदर 
रचनावाले वचनों से, आज, मेरा कुछ भी सत्कार क्‍यों 
नहीं कर रही हो। यह आगे पड़ो हुई शतक नायिका के 
प्रति नायक की दक्ति है | 

यहाँ, नायिका-रूपी आलंबन, अश्रुपातादिक अलनुभाक 
और आवेग, विषाद आदि संचारी भाषों से अमिव्यक्त हुआ 
नायक का ( नायिका-विषयक ) प्रेम, इन्हीं आलंबनादिकों से 
अभिव्यक्त हुए, परंतु प्रस्तुत होने के कारण प्रधान, नायक के 
शोक? का, उसे बढ़ानेवाला होने के कारण, अंग है। यदि 
यह आग्रह किया जाय कि--यहाँ नायक के प्रेम की प्रतीति 
नहीं होती, किंतु पूर्वोक्त सामग्री के द्वारा उसका शोक ही 
प्रतीव होता है, क्‍योंकि वही प्रस्तुत है---उस बेचारे को प्रेम 
कहां से आवेगा, उसे ते रोना पड़ रहा है; तो, जिसका 
नायक आल्ंबन है, सामने आना आदि अलुभाव हैं, हर्षादिक 
संचारी भाव हैं--उस नायिका के प्रेम को ही शोक का अंग 
सममिए; क्योंकि नायिका का प्रेम नायक के शोक का बढ़ाने- 
वाला होता है--यह बात सब लोगों की मानी हुई है। झाप 
कहेंगे कि जब नायिका नष्ट दो गई, तब उसका प्रेम विद्यमान 
ते है नहीं, फिर वह शोक का अलग कैसे हो सकता है ? इसका 
उत्तर यह है कि अंग होने मे विद्यमान होना आवश्यक नहीं 
है, अत: स्मरण किया हुआ प्रेम भी अंग हो सकता है| 

अन्य का अंग होने पर विरुद्ध रसें का अ्रविरोाध; जैसे-> 


( १३६ ) 


उत्स्षिप्ताः कबरीभरं विवलिताः पाहवंद॒यं, न्‍्यकृताः 
पादाम्भोजयुगं, रुषा परिहृता द्रेण चेलाज्चलम्‌ | 
जुहनन्ति त्वरया भवत्मतिभदक्ष्मापालवामभ्र वां 
याज्तीनाँ गहनेषु कण्टकचिता; के के न भूमीरुद्दाः १ 
ह ५ भ )९ 
ऊँचे कबरिन, किए बक दोऊ बगढनि कों। 
बल सो नीचे किए भूमि सु-चरन-कमलनि को ॥ 
किए रोस सो दूर तुरत पद-आचिक् पकरत । 
सब जतनबि को हाय ! सहज्ञ ही मे है निद्रत ॥ 
इहि भाति विपिन में विचरतीं तुव रिपु-नुप-नारिन विकछ |? 
हे भूमिनाथ ! कहु कौन नहि' करत केंटीले तरुन दल ॥ 
हे राजन ! कौन ऐसे कंटीले पेड़ हैं, जो, जंगल में जावी 
हुईं, आपके शात्र राजाओं की स्त्रियों के करने पर केश- 
पाश को, टेढ़े करने पर देलनों बगज्ञों को, नीचे करने पर दोनों 
चरण-कमले[ के और रोष से दूर हटा देने पर कट से कपड़े 
का प्रांत न पकड़ लेते हों । 
इस पद्य में समासाक्ति अलंकार है और उसके अंग हैं दो 
प्रकार के व्यवह्दार --एक प्रस्तुत और दूसरा अप्रस्तुत | उनमे 
से यहाँ प्रस्तुत व्यवहार है--पेड़ों के द्वारा लियों को 
चोटी-आदि का पकड़ना, और अप्रस्तुत ऐ---किसी फामी 
पुरुष के द्वारा उन्तका पकड़ना । इन दोनो व्यवहारों मे से 


( १३७ ) 


पहले के द्वारा करुण-एस की और दूसरे के द्वारा रंगार-रस 
की असिव्यक्ति होती है, और वे दोनों रस ( परस्पर विरोधी 
होने पर भी ) राजा के विषय मे जे। कवि का प्रेम है, उसके 
अंग हो गए हैं, अ्रतः उनमे कुछ भी विरोध नहीं रहा | 
विरोधी रस के वर्णन की आवश्यकता 

सच पूछिए ते प्रकरण-प्राप्त रत को भ्रच्छी तरह पुष्ट 
करने के लिये विरोधी रस का बाधित करना उचित है, अतः 
उसका वर्णन अवश्य करना चाहिए; क्योंकि ऐसा करने से, 
जिस रस का वर्णन किया जा रहा है, उसकी शोभा, वैरी का 
विजय कर लेने के कारण, अनिर्वेचनीय हो जाती है। रस के 
बाधित किए जाने का झथे यह है कि विरोधी रस के अंगों के 
प्रबक्ष होने के कारण, अपने अंगों के विद्यमान होने पर भी 
रस की अभिव्यक्ति का रुक जाना । अर्थात्‌ किसी रस के 
अभिव्यक्त होने की सामग्रो के होने पर भी, दूसरे रस की 
स्ामभी के प्रवल्ल होने के कारण, उसके अभिव्यक्त न होने का 
नाम है रस का बाध्य होना । पर व्यमिचारी भावों का वाध्य 
होना ते। इसी का नाम है कि उनके द्वारा जिस रस की 
अभिव्यक्ति होनी चाहिए थो, उसका न होना, न कि व्यम्ि- 
चारी भावों की द्वी अभिव्यक्ति का न होना; क्योंकि व्यम्रि- 
चारी भावों की अभिव्यक्ति मे बाघा उत्पन्न करनेवाला कोई 
नहीं है। भ्राप कह्देगे कि क्यों नहीं, विरोधी रस के अग- 
रूप भावों की अभिव्यक्ति होने से रुकावट हे जायगी और 


( १३८ ) 


इस, कारण प्रम्तुत भावों की अभिव्यक्ति न हो सकेगो; पर यह 
ठीक नहीं; क्योंकि जिस समय प्रस्तुत भावों को अभिव्यक्त 
करनेवाले शब्दों और अर्थों का ज्ञान द्वागा, उस समय विरोधी 
रस के अंगरूप भावों को अभिव्यक्त करनेवाले शब्दों और अ्रथों 
का ज्ञान नहीं रह सकता; इस कारण एक दूसरे को प्रतिबध्य 
( रुफनेवाला ) और प्रतिबंधक ( रोकनेवाला ) मानने मे कोई 
प्रमाण नहीं । दूसरे, यदि ऐसा मान लिया जाय ते, विरोधी 
भावों का एक पद्म मे एकन्न होना, जिसे भाव-शबलता कहते हैं, 
सर्वथा उच्छिन्न हो जाय, जो कि सर्ब-संमत है । रस की अमि- 
व्यक्ति का रुक जाना ते अनुभव-सिद्ध है, इस कारण विरोधी 
रस के प्रबल अंगों के अभिव्यक्त होने को रस की अभिव्यक्ति 
का ही प्रतिबंधक मानना उचित है, व्यभिचारी भावों का नहीं 

जहाँ एक से विशेषणों के प्रभाव से दे विरुद्ध-सस अमि- 
व्यक्त हो जाते हैं, बहॉँ भी उनका विरोध निवृत्त हो जाया 
करता है; जेसे-- 

नितान्त' यौवनोन्मत्ता गादरक्ताः सदा5ःऋवे । 
बसुंधरां समालिज्ञय शेरते वीर ! तेज्रयः ॥ 

है वीर ! जवानी से अत्व॑त उन्‍्मच हुए घोर रख मे सर्वदा 
गहरे रक्तवाले--खूब चोट खाए हुए अथवा अत्यंत अलजुरक्त 
तेरे शन्न लोग पृथ्वी से चिपटकर सो रहे हैं। यहाँ समान 
विशेषयों के द्वारा वीर के साथ साथ उसके विरोधी ःगाण 
की भी प्रतीति होती है। 


( १३८७ ) 
रस-वणन में दोष 

इस तरह विरोध मिटा देने पर भी जिस रस का वर्णन 
किया जाय, उसको “रस” शब्द अथवा “€ गार-आदि? शब्दों 
से बोल देना अलुचित है; क्योंकि ऐसा करने से रस आस्वा- 
दन करने योग्य नहीं रहता--प्रकट हो जाने के कारण उसका 
मज़ा जाता रहता है; इसी लिये पहले कह चुके हैं कि रस का 
आस्वादन केवल व्यंजना वृत्ति से ही सिद्ध होता है। आप 
पूछ सकते हैं कि जहाँ विभावादिकों से अभिव्यक्त हुए रस को 
उसका नाम लेकर वर्णन कर दिया जाय, वहाँ कौन दोष द्वोता 
है? तो उत्तर यह है कि व्यंग्य का वाच्य बना देने से सभी 
व्यंग्यों मे 'बमन! नामक दोष होता है, जिसका वर्णन आगे 
किया ज्ञायगा। यह तो हुई सामान्य देष की बात। पर 
रसें का जिस रूप मे झ्राखादन किया जाता है, बह प्रतीति, 
वाच्य-वृत्ति ( अमिधा ) के द्वारा, अर्थात्‌ उन रसें का नाम 
लेने से उत्पन्न नहीं दवा सकती, झतः जहाँ रसें का वर्णन हो, 
उस स्थल पर ऐसा करना बंदर की सी चेष्टा है--अर्थात्‌: 
जिस तरह बंदर अपने घाव को, ठोक करने के लिये, खेदकर 
और बिगाड़ डालता है उसी प्रकार इस चेष्टा से भो रस-वर्णगन 
उत्तम होने के स्थान पर और भो बिगड़ जाता है। सो रसों 
के बिषय में तो यह विशेष देष भी है। इसी तरह स्थायी 
भावों और व्यमिचारी भावों को भो अमिधा शक्ति के द्वारा- 
वर्णन करना--उनके नाम ले लेकर लिखना--देष है। इसी 


( १४० ) 


तरह विभावों श्र अनुभावों का अच्छी तरह प्रतीत न होना 
अथवा विलंब से प्रतीत होना दोष है; क्योंकि ऐसा होने से 
रस का आखादन नहीं हे पाता। विरोधी रसों के ( प्रस्तुत 
रसों के झड़ की अपेक्षा ) समवत्ञ अथवा प्रवल्ल अंगों का वर्णन 
करना भी दोष है; क्योंकि यह वर्णन जिस रस का वर्णन किया 
जा रहा है, उसके प्रतिकूल है । किसी भो निबंध मे जिस' रस 
का वर्णन चल रहा हो।, वह यदि किसी दूसरे प्रधग के कारण 
विच्छिन्न हे! जाय, ते उसको फिर से दीपन करने से -गए 
किस्से को दुबारा उठाने से - विच्छिन्न-दीपन'ः नामक दोष 
होता है । कारण कि मध्य मे उच्छिन्न हो जाने से सहृदयों को 
पूणरूप से रसाखाद नहीं होता इसी तरह ज़होँ जिस रस के 
प्रस्तुत करने का अवसर न हो।, वहाँ उसका प्रस्तुत करना और 
जहाँ उसे विच्छिन्न न करना चाहिए, वहाँ विच्छिन्न कर देना 
दोष है। जेसे--संध्यावंदन, देव-यजन-आदि धर्म का वर्णन 
प्रस्तुत है, उस समय किसी कामिनी के साथ किसी कामी का 
प्रेमव्णन करने मे । श्रथवा, जैसे--महायुद्ध मे मदमत्त शत्रु- 
वीर उपस्थित हों और मर्ममेदी वचन बोल रहे हों, ऐसे समय 
नायक के संध्या-बंदन आदि का वर्णन करने मे। थे दोनों 
ही बातें अनुचित हैं । 

इसी प्रकार जिसका प्रधानतया वर्णन न हो, उस प्रति- 
नायक आदि के नाना प्रकार के चरित्र और अनेक प्रकार की 
संपदाओं की, नायक के चरित और संपदाओं से, अधिकता 


( १४१ ) 


का वर्णन करना उचित नहीं; क्योंकि ऐसा करने से नायक 
के उत्कर्ष का वर्शन, जिसका करना अभीष्ट है, सिद्ध न होगा 
और उसके कारण होनेवाली रस की पुष्टि भी न होगी | 
झाप कहेगे--प्रतिनायक के उत्कर्ष का वर्णन ते। उसको 
परास्त करनेबाले नायक के उत्कर्ष का अग है--उस वर्णन 
से ते नायक का और भी अ्रधिक उत्कर्ष सिद्ध होता है; 
फिर आप उसका वर्णन क्यों अल्ठुचित मानते हैं ? हम कहेगे 
कि--जैसा प्रतिनायक का उत्कर्ष, उसे परारत करनेवाले 
नायक के उत्कर्ष का अंग हो सके, वैसे उत्कष का वर्णन हमे 
स्वीकृत है--दम ते! उसी उत्कष वर्णन का निर्षध कर रहे हैं, 
जो नायक के उत्कर्ष के विरुद्ध हो । पर यदि आप कहे कि 
प्रकृ्त नायक की अपेक्षा प्रतिपक्ष का उत्कर्ष वर्णन किया 
जायगा, तथापि, नायक ते जिसका उत्कष वर्णन किया गया 
है, उसका भार देनेवात्ा न है, वस, इतना होने से ही यह 
वर्शान नायक के उत्करष को बढ़ा देगा; अतः ऐसे वर्णन मे कोई 
देष नहीं। ते हम कहेंगे कि--यदि यों मानने लगोगे, वे 
जिस तरह किसी बड़े राजा को किसी कंगाज्ञ भील ने केवल 
ज्हरीला बाण फेंक देने आदि के कारण मार डालना हो, 
ऐसी दशा मे उस महाराज की अपेक्षा उसः भील का कुछ 
भी उत्कर्ष नहीं हो सकता; उसी तरह जिसका वर्णन किया. 
जा रहा है, उस नायक का भी कुछ उत्कर्ष नहीं होगा-) 
बस, झगड़ा निवृत्त ! 


( १४२ ) 


इसी तरह यदि रस के झालंबन और आश्रय का बीच 
बीच मे अनुसंधान न हो, ते दोष है; क्यांकि रस के अनुभव 
की धारा आत्म्बन और आश्रय के अनुसंधान के ही अधीन 
है; अत: यदि उनका अनुसंधान न हो ते वह निवृत्त हो जाती 
है। इसी प्रकार जिस वस्तु का वर्णन करने से वर्णन किए 
जानेवाले रस को कोई ज्ञाम न हो, उसका वर्णन प्रस्तुत रस को 
समाप्त कर डालता है, अतः ऐसा वर्णन भी दोष ही है । 
अनौचित्य 
जो बाते' अनुचित हैं, उनका वर्णन रस के भंग का कारण 
है, अतः उसे ते स्वेथा नहीं आने देना चाहिए | भंग किसे 
कहते हैं से भो समक लीजिए। जिप तरह शरबत आदि 
किसी तरल बस्तु मे करकर ( कंकड़ ) गिर जाने के कारण, 
बह खटकने लगवा है, इसी प्रकार रस के अनुभव मे खटकने 
को रस का भंग कहते हैं। पर अनुचित होने का अधथ यह 
है कि जिन जिन जाति, देश, काल, वर्ण, आश्रम, अवस्था, 
स्थिति और व्यवहार आदि सांसारिक पदार्थों के विषय मे 
जो जो लोक और शास््र से सिद्ध एव उचित द्वव्य, गुथ 
अथवा क्रिया आदि हैं, उनसे मिन्न द्वेना | अच्छा, अब जाति 
आदि के अज्ुचित जो बाते' हैं, उनके छुछ उदाहरण भी 
सुनिए | - जाति के विरुद्ध; जैसे--बैल भर गाय आदि 
के तेज और बल्ल के कार्य पराक्रम आदि और सिद्द आदि का 
सीधापन आदि | देश के विरुद्ध; जैसे--छतर्ग मे बुढ़ापा, 


( १४३ ) 


रेग आदि और पृथ्वी मे अद्ृत-पान आदि । काल के 
विदद्ध; जेसे--ठंड के दिनों मे जल्वविह्दार आदि कौर गरमी 
के दिनों मे अप्नि-सेवन भादि। वर्ण के विरुद्ध; जैसे-- 
ब्राह्मण का शिकार खेलना, क्षत्रिय का दान लेना और शुद्ध का 
बेद पढ़ना। श्ाश्रम के विरुद्ध; जैसे--अ्रह्मचारी और 
संन्‍्यासी का तांबूल चवाना श्रार स्ली को खीकार करना | 
अवस्था के विरुद्ध; जेसे--त्रालक और बूढ़े का स्री-सेवन 
और युवा पुरुष का वैराग्य | स्थिति के विरुद्ध; जेसे-- 
दरिद्वियों का भाग्यत्रानों जैसा भ्राचरय और भाग्यवानों का 
दरिद्वियों जैसा आचरण । 

अब प्रकृतियां की बात सुनिए। साहित्य-शास््र के 
अनुसार तीन प्रकार की प्रकृतियों (नायक की) होती हैं--ऋछ 
दिव्य (देवतारूप इन्द्र आदि), कुछ अदिव्य (मनुष्यरूप दुष्यन्त 
झादि) और कुछ दिव्यादिव्य (जे स्वर्गीय होने पर भो अब- 
तार रूप द्वोने से मनुष्य हैं राम, ऋण आदि ) होते हैं | इसी 
तरह उन भ्रकृृतियो के दूसरे भेद--नायक धीरोदात्त जिनमे 
उत्साह प्रधान होता है, धीरोद्धौ--जिनमे क्रोध प्रधान होता 
है, धीर-ललित--जिनमे स्जी-विषयक प्रेम प्रधान दाता है और 
धीर-शांत--जिनमे बैराग्य प्रधान द्वोता है, होते हैं | पूर्व मेदों 
से बारह प्रकार के नायक उत्तम, मध्यम शौर अधम के भेद 
से छत्तीस प्रकार के होते हैं। इन नायकों में यद्यपि मय 
के अतिरिक्त अन्य खब रति आदि स्थायी भाव सर्वत्र 


( १४४ ) 


समान ही होते हैं, तथापि संभेग-हूप रति का, जिस 
तरह्द मनुष्यों मे वन किया जाता है, उसी तरह सब अलु- 
भावों (आलिंगन-चुंबन आदि) को स्पष्ट करके उत्तम देवताओं 
के विषय मे वर्णन करना अनुचित है, और संसार को भस्म 
कर देने मे समर्थ एवं रात्रि और दिन'को बदल देने आदि 
अनेक आश्चयों के उत्पन्न कर देनेवाले क्रोध का जिस तरह 
दिव्य नायकों मे चशेन किया जाता है, उसी तरह अदिव्य 
नायकों मे वर्शन करना अनुचित है। क्योंकि दिव्य आहल॑- 
बनें मे हम लोगों को पूज्यता की बुद्धि रहने के कारण और 
अदिव्य आलंबनों मे पूर्वोक्त अनुभावों के भ्ूठेपन की प्रतीति 
दोने के कारण रस विकसित नहीं हो सकेगा | आप कहेंगे कि 
रख-प्रतीति के पइले नायक-नायिका आदि के साधारण 
हो जाने के कारण, उनमे हमारी पृज्यता बुद्धि उत्पन्न ही नहीं 
होगी, पर यह ठोक नहीं, क्‍योंकि जिस स्थान पर सहृदय 
पुरुषों को रस की जागृति प्रमाण-सिद्ध है, उन्हीं नायक- 
नायिका आदि मे साधारण कर लेने की कल्पना की जाती है; 
अन्यथा अपनी माता के विषय मे अपने पिता का प्रेम वर्णन 
करने पर भी रस की प्रतीति दवोने लगेगी । पर, जयदेव 
आदि कवियों ने गीतगाविद आदि अंधथों में, सब सहृद्यों के 
माने हुए इस संकेत को, मर्देन्मत्त हाथियों की तरह, 
ताड़ डाला है, से उनका दृष्टांत देकर आधुनिक कवियों के 
इस तरह के वर्णन न करने चाहिए। 


- ( १४४ ) 


इसी तरह जो लोग विद्या, अवस्था, वर्ण, आश्रम और तप 
आदि के कारण उत्टृष्ट हैं, उन्हे अपने से छोटे लोगों के साथ 
अत्यंत सम्मानयुक्त वचनों से व्यवह।र नहीं करना चाहिए, 
और, छोटों को बड़ों के साथ ऐसा व्यवहार फरना चाहिए | 
उनमे भी 'तन्र भवन! ,भगवन? इत्यादि संबोधनों से भुनि, गुरु 
और देवता आदि का ही संबेधन किया जाना चाहिए, राजा- 
दिकों का नहीं ) से भी जे। ज्ञोग जाति से उत्तम--अर्थात्‌ 
ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य--हों, बे ही ऐसे संबोधनों का 
प्रयोग करे, शूद्रादिक नहदी। इसी तरह 'परमेश्वए-आदि 
संबोधनों से चक्रवर्तियों का ही संबोधन किया जाना चाहिए, 
मुनि आदि का नही । यही सब सोचकर आनन्‍्दवर््धन ने 
लिखा है कि-- 


अनौचित्याहते नाउन्यद्रसभज्ञर्य कारणम्‌ | 
प्रसिद्धोचित्यवन्धस्तु रसस्येपनिषत्‌ परा।॥ 


भ्र्थात्‌ रस के भंग का, अलनुचितता के अतिरिक्त, 
अन्य कोई भी कारण नहीं है, और प्रसिद्ध उचितता का 
वर्णन करना ही रस की सबसे बढ़ी उपनिषत्‌ है। तात्पय्य 
यह कि जिस तरह उपनिषत्‌ से ही ब्रह्म का प्रतिपादन 
होता है, उस तरह प्रसिद्ध उचितवा के वर्णन से ही 
इसका प्रतिपादन होता है, अन्यथा नहीं । बस, इतने में 
सब समझ लीजिए । 

र५०-७२० 


( १४६ ) - 


अनोचित्य से रस को पुष्टि 
हाँ, जितने अनौचित्य से रस की पुष्टि होती हो, उतने 
अनौचित्य का वर्णन निषिद्ध नहों है, क्योंकि जे अनुचितता 
रस के प्रतिकूल हो, वही निषेध करने के योग है। 
इसी कारण-- 


व्रह्मत्रध्ययनस्य नेष समयस्तृष्णीं वहिं। स्थोयताम्‌ 
खत्पं जल्प बृहस्पते ! जहमते नेषा सभा वज्िणः । 
वीणां संदर नारद ! स्तुतिकथालापैररूं तुम्बुरों ! 
सीतारहक्नकभल्लभप्रहृदय! खस्थों न लझ्के्वरः || 
ज़ह्मग ! यह वेदपाठ का सम्रय नहीं है, चुप-चाप बाहर 
वैठा; इहस्पते ! जो कुछ कहना है थोड़े मे कहो | मूढ़ ! यह 
इंट्र की सभा नहीं है कि घंटों वक-बक करते रहो; नारद ! 
अपनी बोणा समेट लो; हे ठुंबुरो |! इस समय स्तुतिकथाएँ--- 
.ख़ुशासद की वार्ते--न करो, क्योंकि सीता की विरौनियो के 
भालों से लंकरेश्वर--महाराज रावणश--का हृदय घायल हो 
गया है, वे खत्थ नहीं हैं। इस किसी नाटक के पद्म में, 
जह्यादिकों के तिरस्कार के लिये बोले गए द्वार-पाल के वचन 
की अलुचितता दोष नहीं है; क्योंकि उससे रावण के परम- 
ऐश्वय की पुष्टि होती है और उसके द्वारा वीर-रप्त का 
आच्षेप होता है, जे कि विपग्रलंभ-स्ट|गार ( रसाभास ) का 
अंग दो गया है| 


( १४७ ) 


इसी तरह “अले ले! सद्ृस्समुण्पाडित्रहरिश्रकुस- 
ग्गंथितयाचड्सालापइवित्तिविस्सस्नि स्बा सबिहच- 
न्दः अअणा बह्मणा--त्ररे ओ | तत्काल उखाड़े हुए हरित 
कुशों की गॉठों से वनी हुई प्रक्षमाताओं (जपमाज्ञाओ) के फिराने 
से वालबिबवाओं के अन्त:करणों का विश्वत्त करनेवाले आाह्म- 
णो !'*' * **” इत्यादि विदूषक्ष के ववन मे भी अनौचित्य 
देष नही है; क्योंकि वह द्वास्य-रप के प्ातुकूत है। से। इस 
तरह यह अनेैचित्य समभने की रीति दिखा दी गई है, सुबुद्धि 
पुरुषों को इसी प्रकार और भी सेच लेना चाहिए | 


गुण 

इन पूर्वोक्त रसें में माधुये, ओज धर प्रसाद नामक तीन 
गुण वर्णन किए जाते हैं। उनके विध्रय मे--कुछ बिद्भानों का 
कहना है कि--पसंयेग-शंगार मे जितना माधुये होता है, 
उससे अधिक करुण-रस मे होता है और उन देनें से अधिक 
देता है विप्रलंभ-श्रृंगार मे; एवमू इन सबसे अधिक शांत- 
रस मे होता है, क्योंकि पूर्व पूर्व रक्त की अपेक्षा उत्तर उत्तर 
रस मे चित्त का द्रव विशेष होता जाता है। दूसरे विद्वानों 
का कथन है कि--प्रेयोग-श्ज्ञार से करुण और शांत-रसों 
मे अधिक माधुये द्ोता है, और इन देनें से प्रधिकू होता 
है बिप्रत्ंभ-शरंगार मे। अन्य विद्वानों का यह कथन है 
कि--संयोग-#ंगार से करुण, विप्रतंभ-'गार और शांत 
इन तीनों रसें मे अधिक द्ोता है, फिर इन तीनों मे कुछ 


( १४८ ) 


भी तारतम्य ( कमी-बेशी ) नहीं होता--थये सब समान ही 
मधुर हैं। इनमे से पहल्ले और तीसरे मत मे “करुणे 
विश्वलस्मे ठच्छांते चाउतिशयान्वितस्‌!” यह प्राचीन 
आ्राचायों का सूत्र अनुकूल है; क्योंकि उसफ्े आगे के सूत्र 
में जे 'क्रमेश' पद है, उसको पहले सूत्र मे खींचने और 
न खींचने से उसकी दो व्याख्याएँ हो! सकती हैं। रहा 
बीच का मत, से। उसके विषय मे यह कहा जा सकता है कि 
करुण और शांतरसेों की अपेक्षा विप्रलंभ शंगार के माघुये 
की अधिकता का यदि सहृदय पुरुषों को अनुभव होता हो, 
ते उसे भी प्रमाण मान लेना चाहिए। वीर, बीभत्स और 
शैद्र-रसों मे पहले की अपेक्षा पिछले मे अधिक ओज रहता है; 
क्योंकि इनमे से प्रत्येक पिछला रस चित्त को अधिक दीप्त 
करनेवात्ञा--अर्थात्‌ दिल्ली जोश बढानेवाला--है। अदुभुत, 
इास्थ और भयानक रसों के विषय मे कुछ विद्वानों का मत 
है कि इनमे माधुये और ओज देने गुण रहते हैं और दूसरे 
कहते हैं कि इनमे केवल प्रसाद गुण ही रहता है। हा, 
यह बात सिद्ध है कि प्रसाद-गुण सब रसें और सब 
रुचनाओं मे रहता है--वह किसी विशेष रस से ही संबंध 
रखनेवाला नहीं है-। | 

इन गुणो के द्वारा, क्रम से, द्वुति ( पिघल्ना ), दीछि 
( जोश ) और विकास ( खिल जाना ) ये चित्त की इत्तियाँ 
जभारी जाती हैं, अर्थात्‌ उन-उन गुयणों से युक्त रसों के आस्वा- 


( १४८ ) 

दन से ये वत्तियाँ उत्पन्न होती हैं! तात्पर्य यह है कि माधुये- 
गुण से युक्त रस का आस्वादन करने से चित्त पिवल जाता है, 
ओज-गुण से युक्त रस के आस्तादन से चित्त में जोश आता 
है और प्रसाद-गुण से युक्त रस के आरवादन से चित्त विक- 
सित हो जाता है--खिल्न उठवा है। इस तरह इन गुणों के 
केवल रस-धर्म ( उन्हों मे रहनेवाले ) सिद्ध होने पर, लोगों 
का जो “(( पद्म की ) रचना मधुर है” “बंध ओेजत्वी है' इत्यादि 
कथन है, वह कतिपत है, जैसे कि किसी मनुष्य के विषय में 
कहा जाय कि--इसका आकार शूर-वीर है' । तात्पये यह 
कि शुर-बीर होना मनुष्य के झ्रात्मा का धर्म है, उसके आकार 
का नहीं, क्‍योंकि आकार ते जड़ है, से जिम प्रकार यह कथन 
कल्पित है, उसी प्रकार पूर्वोक्त व्यवद्दारों के! भी समम्रिए | 
यह है मम्मट-भट्ट आदि-प्राचीन विद्वानों का मत | 

पर पण्डिव-राज के विचार मित्र हैं। वे कहते हैं कि-- 
इन माघुये, श्रेज और प्रसाद गुणों को जो केबल “रस के घमे! 
ही बताया जाता है--यह माना जाता है कि ये केवत्न रस ही 
में रहते हैं --इसमे क्‍या प्रमाण है ? श्राप कद्देंगे कि--प्रत्यक्ष 
ही है; क्‍योंकि पूर्वोक्त रीति के श्रतुसार हमे उन्-उन रसों के 
आस्वादन से पूर्वोक्त चिचद्नत्तियों की उत्पत्ति का अनुभव होता 
है; ते हम कहेंगे कि--नहीं। जैसे श्रप्मि का काये दग्ध 
करना है और उच्ण स्पश उसका गुण है, इन देनें का हमें 
भ्रृथक -प्रथक_ अनुभव होता है--हम जल्ते नही, पर हमे उच्ण- 


( १४० ) 


स्पश का अनुभव है| सकता है; इस तरह रसों के कार जो 
दुति-आदि चित्तवृत्तियों हैं, उनके अतिरिक्त रसें में रहनेवाले 
गुणों का हमे अनुभव नहीं होता। आप कहेंगे--अच्छा, 
जाने दीजिए; प्रत्यक्ष नहीं होता ते न सही; पर माधुये-आदि 
गुणो से युक्त ही रस हुति-आदि के कारण होते हैं--भर्थात्‌ 
उन गुणों के साथ रहने पर ही रसों से द्गुति-झ्रादि चित्त- 
वृत्तियाँ उत्पन्न की जा सकती हैं, भरत: कारणता के अवच्छेदक-- 
अर्थात्‌ कारण में रहनेवाले एक विशेष घमें--के रूप में उनका 
अनुमान किया जा सकता है। से! भी ठोक नही, क्योंकि 
प्रत्येक रस जब कि बिना गुणों के ही उन वृत्तियों का कारण 
दे। सकता है, ते गुणों की करपना करने में गौरव ह--भर्धात्‌ 
केवज्न रसें को दी उन वृत्तियाँ का कारण न मानकर उनके 
साथ गुणों का भमेल्ला लगाने की क्‍्या'आवश्यकता है ? आप 
कहेगे कि ऋट्टार, करुण भर शान्त रसों मे से प्रत्येक को 
हुति का कारण मानने की अपेक्षा 'तीनों माधुय-गुण-थुक्त हैं, 
इस कारण तीनों से द्रुति उत्पन्न द्ोती है'--यह मानने में 
ल्ञाघव है--अर्थात्‌ दरुति के तीन कारण मानने की अपेच्ा हुति 
के प्रति माधुरय गुणवाद्‌ एक ही को कारण मान छेना सीधी 
बात है । तब हम कद्देगे कि मम्मट-भट्ट आदि कितने ही विद्वानों 
ने मधुरर्स से ह्रुति, अत्यन्त मधुररस से धझत्य॑त द्ुति-इत्यादिक 
जो कार्यों मे कमी-बेशी मानी है, उसके कारण भाधुर्य-गुय-युक्त 
- हे।ने से रस हुति का कारण द्वोता है--यह मानना पेषे (पेघाः 


( १४१ ) 


एक प्रकार की गाँठ, जो गल्ले-आदि में हे जाया करवी है) की 
तरह व्यथ है; क्योंकि पूर्वोक्त हिसाब से अन्तता गत्वा एक- 
एक कार्य का एक-एक रस को प्रथकू-प्थक्‌ कारण मानना ही 
पड़ेगा | सो इस तरह प्रत्येक रस का माधुये-आदि का पृथक्‌- 
पृथक कारण मानने में ही लाधव है | दूसरे, एक यह भी वात है 
कि आत्मा निर्गुण है और रस है आत्मरूप; अतः माधुर्यादिक 
को रस का गुण मानना वन भी नहीं सकता | पर यदि कहे 
कि रस के न सही, इनका उसके उपाधिरूप रति-आदि स्थायी 
भावों के द्वी गुण मान लीजिए; स्लो उनके गुण मानना भी नहीं 
बन सकता; क्योंकि प्रथम ते। इसमें कुछ प्रमाण नहीं, और 
दूसरे काव्यप्रकाश-कार आदि की रीति से रति-आदि सुल- 
रूप हैं, अत: वे स्वयं ही गुण हैं, से उन्तमें अन्य गुणों का 
मानना अनुचित भी है । 

अब यह शट्टा हे सकती है कि “शड्डार-रस मधुर दाता 
है??--इल्यादि व्यवद्दार, जे सब विद्वानों में प्रचलित है, कैसे 
वन सकता है ? क्योंकि आपके हिसाव से ते! माधुय-आदि 
गुण हैं ही नही । उसका समाधान यह है कि--हुति आदि 
चित्तवृत्तियो की प्रयाजकता (उन्हें पैदा करनेबाज्मा दाना), जो 
रसों मे रहती है, उसे ही माघुय-आदि समक्तिए; और उसी 
के रहने से रसें का मघुर-आदि कहा जाता है। अथवा, यों 
कहिए कि--द्रुति-आदि चित्तवृत्तियाँ ही जब ( किसी रस- 
झादि के साथ ) उभारने का ( प्रयाजकता ) संबंध रखती हैं, 


( १४२ ) 


ते उन्हें माधुय-आदि कहा जाता है। तब आप कह सकते हैं 
कि--थदि प्रयोजकता संबंध से रहनेवाली द्वुति-आदि चित्त- 
वृत्तियों का नाम ही माघुय है, ता ज्वञारसस मधुर ( माघुयय- 
गुण से युक्त ) द्वाता है? यह व्यवहार न बन सकेगा; क्‍योंकि 
द्ुति-आदि चित्तवृत्तियाँ रसों मे रहती ते हैं नहीं, उनसे 
उभार दी जाती हैं, फिर रसों को माघुय से युक्त कैसे कहा जा 
सकता है? हम कहते हैं कि जिस तरह असगंध ( एक 
ओऔषध ) उष्णता को उत्पन्न करती है--उसके खाने से शरीर 
में उष्णता उत्पन्न होती है, इस कारण लोग कहते हैं कि 'अस- 
गंध गरम द्वोती है?, इसी प्रकार हूंगार-आदि माधुये-आदि के 
प्रयोाजक (उत्पादक) द्वोते हैं, अतः उनको मधुर कट्दा जाता है | 

पर, संसार के जितने काम हैं, उन सबकी प्रयोजकता 
अद्ृष्ट ( धर्म, अधर्म ) आदि मे भी रहा करती है, बिना अष्ृष्ट 
आदि के प्रयोजझन हुए कोई काम द्वोता द्वी नहीं, अतः यह्द तो 
मानना ही पड़ेगा कि यह प्रयोजकता उससे भिन्न है, जो कि 
शब्द, अथे, रस और रचना मे रहती है। बस, यहाँ उसी का 
ग्रहण करना चाहिए जिससे कि पूर्वोक्त व्यवहार की अद्दृष्ट 
आदि मे अतिव्याप्ति नहीं हे सके । तात्पय यह है कि अदृष्ट 
आदि मे जो प्रयोजकता है, वह दूसरे ढंग की है और शब्द- 
अथे आदि मे जो प्रयोजकता है, वह दुसरे ढंग की; अतः दुति 
श्रादि की प्रयोजकता के रहने पर भी अद्ृष् आदि को मधुर 
नहीं कह्दा जाता । तब यह सिद्ध हुआ कि इस ढंग का माधुर्य 


( १५३ ) 
शब्द और अथे मे भी रहता है, केवज्ञ रस मे ही नहो, अतः 
'शब्द और अर्थ के माधुयं-आदि को कटिपत नहीं कहना 
-चाहिए ( जैसा कि प्राचीन विद्वान कहते हैं )। ये हैं हमारे 
'( पण्डितराज )-जैसे लोगों के विचार । 
अत्यन्त प्राचीन आचार्यो' का मत 

अत्यन्त प्राचीन आचायोँ का ते मत है कि-- 

इलेपः प्रसाद! समता माधुये सुद्ुगारता । 

अधव्यक्तिस्दारवमेज; कान्तिसमाधयः ॥ 

'श्लेष, प्रसाद, समता, माघुये, सुक्ुमारता, अथव्यक्ति, 
उदारता, ओज, कांति श्र समाधि ये दश शब्दों के गुण 
और दश ही अर्थों के गुण हैं। नाम दोनों के, वे ही हैं, पर 
लक्षण मिन्न-मिन्न हैं। अच्छा, क्रश:ः सुनिए-- 

है अल गा 

श्लेष 

इसलिये कि भिन्न-भिन्न शब्द भी रक हो 
शब्द से अतोत हैं, अत्यंत समोप-सभोषप में एक 
जाति के वर्णों' की विशेष अज्ञार कौ रचता 
जिसे गाढत्व भी कहते हैं, 'श्लेषगुण” कहलाता है। 
यही लिखा भी है--श्लिष्टमस्पष्टरौधिल्यम!; अर्थात्‌ उस 
रचना को श्लेषगुण से युक्त कहा जाता है, जिघ्रमे शिथिल्रता 
“दिखाई न दे। जैसे-- 


( १४४ ) 
*शनवरतबिद्वदू-द्ुमद्रो हिदारिद्रयमाव्यट्द्विपे- 


द्वामदर्षोचिविद्रावणप्रौदपझाननः ( अथवा, जैसे हिंदी 
की अमृतध्वनियाँ ) 


असाद 


रचना में गाहता ओर शियिलता का विपरीत 
मिश्रण--अर्थात्‌ पहले शिथिल और फिर गाह 
( चुस्त ) रचना का हेाना-अशाद-गुण” कह- 
लाता है; जेसे कि-- 


कि ब्रूमस्तव बौरतां वयममी, यस्मिन, धराखप्डल ! 
क्रीडाकुण्डलितभ्र्‌ू , शोणनयने दे।मेण्डलं पश्यति । 





क# किसी राजा का वर्णन है। कवि कहता है कि--( वह 
राजा ) 'विद्वानरूपी बृक्तो से स्वदा द्वोह करनेवाले दारिद्रयरूपी मस्त 
द्वाथी के मर्यादा रहित ग्े-समूह के नष्ट करने के लिये बड़ा भारी ' 
सिंह है?--अर्थात्‌ जिसके समीप जाते ही विह्ानें का बैरी दारिद्रय खड़ा 
ही नही रह सकता | 

' वर्णन पूर्ववत््‌ ही है। हे राजन्‌! आपकी वीरता को ये (बेचारे) 
हम क्‍या कहे । जिनके खेछ में भोंहो के गोल और नेन्नों को छाल 
करके भ्रुज-मंडल को देखने पर, तत्काछू ही, मारणिक्यावक्नि की कांतियों 
से अत्यंत नतोन्नत सहस्तों आभूषणों के समूहों से विंध्याचछ के वनो 
के गुफारूपी घरो में जो बृक्ष है, वे चमकने छग गए अर्थात्‌ खेल मे की 
हुईं आपकी पूर्वोक्त चेष्टा को सुनकर बेंचारे शत्रु लेग ठहर ही न सके, 
उन्हे भगकर वि'ध्य-वन के शरण में पहुँच जाना पड़ा । 


( १५४ ) । 


माणिक्यावलिकान्तिदन्तुरतरेभपासहस्रोत्करे 
विभ्ध्यारण्यगुहग्ृहवनिरुद्ास्तरकालमुछासिता; ।। 


इस पद्म मे “यस्मिन्‌! शब्द तक शिशिल्षता है, फिर 
भर! शब्द तक गाढ़ता है और फिर '*यने? शब्द तक शिथि- 
लता है--इत्यादि समझ लेना चाहिए । 


समता 


आरंभ से अंत तक एक हो अकार की रोति# 
( रचना ) में होने के। 'समत7” कहते हें। जेसे कि 
झागे-'माघुरय? के उदाहरण मे--है । वहां उपनागरिका बुत्ति 
से दी प्रारंभ और उसी से समाप्ति की गई है । 


माघुये 


जिनके आगे संयुक्त अछर हों ऐसे हस्वें के 
अतिरिक्त अन्य अक्षरों से रचना की गई है। और 
अलग-अलग पद दे--अर्थात्‌ समास तथा संधियाँ 
अधिक न हों, ते। 'माधुय' गुण कहलाता है। जैसे 


-- रीतिया तीन है--उ3पनागरिका, परषा और काोमढा। इन्हीं 
वो वैदर्सी, गाड़ी और पांचाज्ञी भी कहते हैं। पहली रीति माधुय 
का अक्ट करनेवाले दर्यों से युक्त, दूसरी ओज को प्रकट करनेवाले 
दरणों से युक्त और तीर री झाधुथ और छोज् दोनों गुणों को अकट करने- 
वाले वर्यों से अतिरिक्त प्रसाद गुणवाल्े अक्तरों से ही युक्त होती है । 


( १६६ ) 


औनितरां परुषा सराजवाला न मृणालानि विचारपेशलानि | 
यदि कामलता तवाड्॒कानामथ का नाम कथापि पह्चवानास्‌ ॥ 
सुझमारता 

कठेर वर्णो' के अतिरिक्त वर्णो' से रचित होने 
का नाम 'सुऊुसारता! है। जैसे-- 

'स्वेदाम्बुसान्द्कशशालिकपेलपालि- 

दे।लायितश्रवणकुण्डलवन्दनीया । 
आनन्दमंकुरयति स्परणेन काउपि 
रम्या दशा मनसि मे मदिरेक्षणाया। ॥ 
इसके पूर्वा्ध मे सुझ्रमारता है। उत्तराध मे ते माधु्य और 
सुकृमारता दोनो हैं | 
अधैव्यक्ति 

जहाँ शर्थ और अन्चय तत्काल विदित हे। 
जाये, वहाँ “अर्थव्यक्ति' गुण है।ता है। जैसे 

-» नायक नायिका से कइटता है कि-यदि तेरे अग कामछ हैं, तो 
( कहना पड़ेगा कि ) कमल्ले! की माछा भव्यंत कठोर है, और सयाढू 
ते इस विचार में आते की शक्ति भी नहीं रखते कि--जे तेरे अंगो के 
समान है अथवा नहीं; रहे पछव से उत्त बेचारे की तो बात ही क्या 
करना है---उनका तो तेरे अंगो की तुछ॒व! के लिये नाम लेवा भी दोष है। 

| नाक अपने मिन्न से कहता है कि--यस्ीते के जछ की सबन 
बूँदें से शासित कपोछ-स्थछ पर भूछते हुए कानों के कुण्डलो के 


कारण पशंघनीय और अनि्वेचनीय, सदमाते नेत्रवाली नायिका की 
रमणीय अवध्या, याद आते ही, हृदय मे आनंद को अंकुरित कर देती है 


( १५७ ) 


नितरां परुषा सराजमाला......! इत्यादि पूर्वोक्त पद्म 
आदि में | 
उदारता 

कठिन अक्षरों की रचना, जिसे विकठता माना 
जाता है, 'डदारता[! कहलातो है। जैसे-- 

#पमादभरतुन्दिलप्रमथदत्ततालावली- 

विनादिनि विनायके उमरुडिण्डिमध्वानिनि | 
ललाटतटबिस्फुटन्नवकृपी ट्येनिच्छटों 
हृठोद्धतजगोद्भटों गतपटो नटो वृत्यति |॥ 

अच्छा, यहाँ एक विचार और भी सुनिए। 'काव्यप्रकाश? 
के टीकाकार व्याख्या करते हैं कि 'पदों के नाचते-से प्रतीत 
होने का नाम विकटता है? और उदाहरण देते हैं 'रुवचरण- 
विनिविष्टैनू पुरैनत्तकीनास्‌! इत्यादि। इस विषय मे 
हमे यह कद्दना है कि--उनकी इस तरह की विकटतारूपी 
उदारता का श्रेज-गुण में समावेश करनेवाले काव्य-प्रकाशकार 
उनके अनुकूल कैसे हुए--इनकी और उनकी कैसे एक राय हो 
गई--इसे वे ही जाने. क्‍योंकि यहाँ ओज-गुण अधिकता से 

अत्यंत आनंद में फूले हुए प्रमथ लोगों की दी हुई 

तालियों से विनेदयुक्त विनायक-देव का डमरु डम-डमा-डम्र बज रहा 
है, और जिनके ढलाठ-स्थल से अग्नि की नवीन छूटा फूटकर निकछ 


रही है, वह बढात उद्चाडी हुईं जटा के कारण विकट नंगे नट--- 
शिव--नाच रहे है । 


( १४८ ) 
प्रतीत नहीं होता । हा, 'विनिविष्टैनूपुरैनैर्त' इस भाग मे भेज 
का अंश है भी, पर चमत्कारी नहीं, श्र न सहृदयों का उसमे 
नाचते-से पदों का ही अनुभव होता है। रहा अन्य अंश, 
से उसमें ते माघुये ही है। 


ओज 


जिनके आगे संयेग हे! रेसे हसवों की सचि- 
कवा के रूप में जे! गाढता होती है, उसे ओजः 
कहते हैं। जैसे निम्नलिखित पद्य में-- 
*साहइड्डारसुरासुरावलिकराकृष्टअ्रमन्मन्दिर- 
क्षुभ्यत्क्षीरधिवल्गुवीचिवलयशभ्रीगवसवेक्षषा: ! 
तृष्णाताम्यदमन्दतापसकुले! सानन्द्माले।किता 
भूमीभूषण ! भूवयन्ति शुुवनामे|ग भवत्कीतेय: ॥ 
अथवा, जैसे “अर्य॑ पततु निईयम्‌......?” इत्यादि पहले 
( रौद्र-रस मे ) उदाहरण दिए हुए पय मे । 





4 कंबि कहता है कि--हे एथिवी के अर्ंकार ! भ्रहंकार-सहित 
देवों और अथुरे की पंक्तिये। के हाथें से खींचे हुए, अतएव फिरते हुए, 
मंद्रावल से छुब्ध हुए च्षोर-समुद्ध की मवेहर तरंयों के संइछ की 
शोभा के गये को सर्वथा नष्ट कर देनेवा्ली और प्यास के मारे बतराए 
हुए तपस्ियें के समूहे! से ( तृषा-शांति का साधन समर ) 
-आनेद-पहित अवल्लेकत की हुई आपकी कीत्तियाँ समग्र-सेप्तार को 
ओमित कर रही है । 


(१ घ< ) 
कांति 

जिनके चतुर नहीं माना जाता, उन वैदिक 
श्रादि लोगों के भयेग के येग्य पदे| के अतिरिक्त 
अयेग किए जानेवाले पदों में जे झला किक शेभा- 
रूपी उज्ज्वलता रहतो है, उसे 'कांति! कहते हैं । 
जैसे--“नितरां पठुषा सरोजमाला ? इत्यादि पूर्वोक्त 
सदाहरण मे । 

समाधि 

रचना की गाठता श्र शियिलता के क्रम से 
रखना--पर्थात्‌ पहले गाह रचना का और पोछे 
शिथिल रचना का हाना--/धमाधिगु ण” कहलाता 
है। इन्हीं--गाइता मर शिथिलता--को प्राचीन आचार्य 
आरोह और अवराह कहते हैं | प्रसाद-गुण मे और इस गुण मे 
गाढ प्रौर शिथिज्ष रचना के क्रम का ही सेद है; क्योंकि 
प्रसाद-गुण मे वे व्युत्कम --विपरीत ढंग--से रहती हैं और इसमें 
क्रम से | तात्पयये यह कि प्रसाद-गुण मे पहले शिधिलता और 
पीछे गाढता रहतो है श्रार समाधिगुण मे पहले गाठता और 
फिर शिथिलता । समाधि का उदाहरण ल्लीजिए-- 

#सखगनिगतनिरगंलगड्भातुज्ञभज्जरतरज्डस खानाम । 

केवलामतमुचां वचनानां यस्‍्ये लास्यग्रहमास्यसरोजम || 
',. _» कबि कहता है कि--जिस ( राजा ) का मुख्न-कम्ल, स्वग से 
निकली हुईं श्रतएव बेराक-टोक चलनेषालों गेगा की ऊँची और 


( १६० ) 
यहाँ पू्वांधे मे आराह है और तीसरे चरण में अवरोह । 
यद्यपि गंगा आदि शब्दों मे माधुये को अभिव्यक्त करनेवाले 
वर्ण भी हैं, तथापि वे लवे समास के बीच में आ गए हैं, अत: 
माघुये ऊँचा नही हो सकता, वह समास के चक्कर मे आकर 
दव गया है। हो, उत्तराध में ते वह भी है। थे हैं दस 
च्दो के गुण | 
अरथंगुण 
श्लषेष 
इसी तरह--- 
चतरता से काम करना, उसके प्रकट न होने 
देना, उसके सिद्ध कर देनेवाली युक्ति, इनका 
रक के बाद दूसरी क्रिया द्वारा एक ही स्थल में इस 
अकार वणणन करना कि परस्पर का संबंध बना रहे 
इलेष कहलाता है। जैसा कि अमरुक कबि का निम्न- 
लिखित पद्म है-- 
दृषट कासनसंस्थिते प्रियतमे परचादुपेत्यादरा- 
देकस्या नयने पिधाय [विहितक्रीडासुवन्धच्छलः । 
इंपद्क्रितकन्धर! सपुलका प्रेमेल्लसन्मानसा - 
मन्तहांसलसत्कपेलफलकां धूर्त्तोष्परं जुम्बति ॥ 


छचकती हुई छहरे के मित्र ( अर्थात्‌ उनके समान ) एवं निरा अछत 
घरसानेचाले चचने की नाव्यशाढ्ा है--अर्थात्‌ जहाँ ऐसे वचन सर्वदा 
नाचते ही रहते है । 


( १६१ ) 
दोऊ प्यारिन देखि ढिंग-बैठी, इकके, आह | 
पीछे सं, मिस खेछ के, मीचे नैन हुराइ॥ 
मीचे नैन दुराइ नेंक करि ओदा नीची। 
घुछकित है, चितर्माहि प्रेम-रस सों अति सींची ॥। 
इँसत कपे।लन माहि, आन कहाँ, धूत सिसक बिन । 
चूमत, इहि' विध करत सुद्त से दोऊ प्यारित ॥ 
धूत्ते नायक ने देखा कि दोनों प्रियतमाएँ ( जिसे चूमना 
चाहता है वह, और दूसरी ) एक ही आसन पर बैठी हुई 
हैं। दबे पॉव “उसने, पीछे से, उनके समीप मे झाकर, एक 
(नायिका) के नेत्रों को, खेल करने के मिस से, बन्द कर दिया; 
अपनी गरदन को थेडी-सी टेढ़ी करके, प्रेम फे कारण चित्त में 
प्रसन्न द्वोती हुई भै।र (दूसरी नायिका न जान जाय, इस कारण) 
भीतर ही भीतर इँसने से जिसके कपाज्ञ शोमित हो रहे हैं-- 
ऐसी दूसरी नायिका को, रोमान्चित होकर, चूम रहा है | 
यहाँ एक नायिका को छोड़कर दूसरी नायिका का चूसना 
चतुरता से काम करना है; वह प्रकट भी न हुआ; क्योंकि दूसरी 
नायिका उसे न जान सकी; कर उसको सिद्ध कर देने की 
युक्ति है भ्ाख-मिचेननी का खेल । इन सब बातों का, पीछे से 
आना, झाँख मौांचना भैर खेल करना--आदि क्रियाओं के 
साथ-साथ, द्वोते रहना वर्णन किया गया है । 
प्रसाद 
जितना अयेजन है।, उतने ही पदे! का होना 


२०--११ 


( १६२ ) 
यह जे। आर्थ की निर्मेलता है, इसका नाम है 
्रसाद-गुण” । जैसे-- 
कमलानुकारि बदन किल तस्याः 


रे २५ े भर 
कमर अनुहरत तासु सूख 
उसका मुख कमल की नकत्ञ करनेवाला है। और 
यदि इसी को यों कहा जाय कि-- 
कमलकान्त्यनुकारि वकक्‍्त्रमू 
भर भर >९ भ८ 
कमल-कान्ति अनुददररत मुख 


( उसका ) मुख कमल की कान्ति की नकल करनेवाक्षा 
है ते। यह इसका प्रत्युदाहरण हो जायगा । 
समता 
जा प्रारम्भ किया गया है, वह टूटने न पावे-- 
ल्‍यों का त्यां निध जावे-यह जे! विषमता का न 
होना है, इसी के 'समता-गुण” कहते हैं। जैसे-- 
हरि; पिता हरिमाता हरिय्राता हरि। सुहत्‌ | 
हरि' सर्वत्र पर्यामि ररेसन्‍्यन्न भाति मे ॥ 
८ ८ >९ 4 


हरि माता हरि ही पिता हरि आता हरि मित्र । 
हरि ते आच न छखहुँ मै हरि देखें सर्ेन्न ॥ 


( १६३ ) 
एक झननन्‍्य भक्त कह रहा है--( मेरे ) हरि ही पिता हैं, 
हरि ही माता हैं, हरि ही भाई हैं और हरि ही मित्र हैं। मैं 
सब जगह हरि को ही देखता हैँ, सिवाय हरि के मुझे अन्य 
किसी का भान नहीं है । 
यहां यदि ( संस्कृत मे ) 'विष्छ्॒नांता' और ( हिंदी मे ) 
प्रभु श्राता! वना दिया जाय, ते! जो ( हरि शब्द के द्वारा 
सबंध दिखाना ) प्रारभ किया गया है, वह द्वृट जायगा प्र 
विषमता झा जायगी | 
माघुये 
एक ही बात के भिन्न भिन्न प्रकार से बार बार 
कहना--यह जे। उत्ति कौ विचिच्षता है, इसे 
माधुय-गुण” कहते हैं । 
विधत्तां निश्शक्ू' निरवधिसमाधि विधिरहो ! 
सुख॑ शेषे शेतां हरिरविरतं तृत्यतु हरः । 
कृत प्रायश्रिचेरलमथ तपेदानयजने: 
सवित्री कामानां यदि जग॒ति जागत्ति भवती ॥ 
५ ३ *प हर 
रहें सदैव समाधि-मप्न विधि चिन्दा तजि के । 
हरि हू सोने सुखित, शेष-लेजहि" सुढि सजि के ॥ 
शिव हू सँँग के भूत-प्रेत नित विरतत रहहू । 
अथवा नाना कथा शैकृतनया वे कहह्व ॥ 


( १६४ ) 
आयश्रित्त हु पूर्ण से बूथा दान, तप, यजन सब। 
सकल-मनोरथ-दैनि, तू जग मे जागति जननि जब॥ 
भक्त गड्जाजी से कहता है--अ्या निश्चित होकर, भनंत 
काल तक, समाधि लगाते रहें, भगवान्‌ विष्णु शेष-शय्या पर 
सुख से सोते रहे और शिवजी भी सतत हरुृत्य करते रहें, हमे 
किसी की कुछ परवा नहीं। हमारे ( सब पापों के ) प्राय- 
श्चित्त हो चुके और हमें तप, दान तथा यजन किसी की 
कुछ आवश्यकता नहीं, जब कि दे जगदंबे ! सब मने(रथो को 
पूर्ण करनेवाली तू जगत्‌ में जग रहो है। बता, फिर कोई 
हमारा क्‍या कर सकता है। 
यहाँ 'ब्रक्षा-आदि से हमे कुछ भो प्रयोजन नही हैः 
बात को 'समाधि लगाते रहे? इत्यादि प्रेरशाओं के रूप में, 
घक्ति की विचित्रता से, ( अनेक प्रकार से ) वर्णन किया गया 
है, अन्यथा अनवीकृतताः-नामक देष आ जाता | 
सुकुमारता 
विना अवसर के शोकदायी-पन कए न होना-- 
यह जे! कठारता का अभाव है, इसे 'सुकुमारता' 
कहते हैं । जेसे-- 
त्व॒रया याति पान्थेज्यं प्रियाविरहकावरः 
५ हर >८ ९ 


प्रिया-चिरह ते डरत यह पथिक तुरत घर जात । 


( १६५ ) 
एक स्री दूसरी ख्री से कह रही है--यह पश्चिक प्रियतमा 
के विरह से डरता हुआ जद्दी से जा रहा है । 
यही यदि 'प्रियामर्णकातर:? अथवा "प्रिया-मरन ते डरत 
यह! कर दिया जाय, तो मरण? शब्द के शोक-दायक दोने 
से कठोरता आ जायगी | यह कठोरता ( नवीन विद्वानों के 
मत से ) अश्तोलता?-नामक दे(ष के अंतर्गत है । 
अधेव्यक्ति 


जिस वस्तु का बणन करना है।, उसके असा- 
धारण काय और रूप का वर्णन करना 'अथ- 
व्यक्ति! गुण कहलाता है। जैसे-- 


गुरुम»ये कमलाक्षी कमलाभेण प्रदत्त काम माम्‌ | 
रदयन्त्रितरसनाग्रं तरलितनयनं निवारयाशक्रे ॥ 
7५ 2 ५ 94 
कम्तछ-बीज-सन हनत म्वहिं कमछ-नेनि गुरु-माँहि। 
दाँतन जीभ दबाई, करि तरल नन, किय नाँहि ॥ 
नायक अपने मित्र से कहता है कि--सास-ननद आदि 
गुरुजनों के वीच मे बैठों कमलनयनी ( नायिका ) ने जब 
देखा कि मैं कमल के मनका ( बीज ) से उसके ऊपर प्रहार 
करना चाहता हूँ, वो उसने दाँतों से जीभ के अग्र-भाग को 
दबाकर एव नेत्रों को चंचल बनाकर मना कर दिया--कह 
दिया कि ऐसा न करिएगा, भ्रन्यथा अनथे हे। जायगा । 


है 


( १६६ ) 
इसी का आधुनिक विद्वान 'स्वभावाक्ति' अलंकार 
कहते हैं । 
लदारता 
“चुम्बन देहि मे भायें ! कामचण्डालवृप्तये ।” 
है ५4 4 ८ 
चूमन दे स्वहि' मेहरिया ! करु तिरपत स्मग्-डोम । 

“अरी मेहरिया ! तू काम रूपी चंडाज्ञ को तृप्त करने के 
लिये मुझे चूम लेने दे” इल्यादि ग्रामीण बातों का हटा 
देना 'उदारता! कहलाता है। 

ओज 

मेज गुण” पॉच प्रकार का है-- 

१९--एक पद के श्र्थ का अनेक पदों में वन 
क ना, 

२--अनेक पदें का श्र्थ एक ही पद में वर्णन 
कर देना, 

(५ रै--एक वाक्य के शखथ का अनेक वाकयें में 
वणन करना, 

५ *“अनेक वाक्यें के शर्य का एक वाक्य में 
वणन शर । 

४--विशेषणों का किसी प्रयेजजन से युक्त हे।ना; 
निर्थक न हा।ना । 


( १६७ ) 
जैसा कि लिखा है-- 
पदार्थे वाक्यरचना वाक्याथें च पदामिषा । 
प्रौदिव्याससमासी च सामिप्रायत्वमस्य च ॥ 
अर्थात्‌ एक पद के अधे- में वाक्य की रचना, वाक्य के 
अथे मे एक पद का वर्णन करना एवं किसी भी बात का 
विस्तार और संक्षेप करना, यह चार प्रकार की प्रौढ़ि--भ्र्थात्‌ 
वर्णन करने की विचित्रता और विशेषणों का किसी प्रमिप्राय 
से युक्त हाना--इस तरह ओज-गुण पॉच प्रकार का 
होता है। जैसे-- 
सरसिजवनवन्धुश्रीसमारम्भकाले 
रजनिरमणराज्ये नाशमाझु प्रयाति । 
परमपुरुषवक्त्रादुदगता नां नराणां 
मधु-मधुरगिरां च प्रादुरासीद्धिनाद; ।॥ 
> ९ भर >९ 
जलूज-विपिन के घुजन केरि छुवि-जनम-समय में । 
रजनि-रमन के रम्य राज्य के होत विहृय में ॥ 
जनमे हैं जे परम-पुरुष के वदन-कमक-सन | 
करत वहे सुविवाद मछुज अरु मछ8र-वचन-गन ॥ 
जिस समय कमल-बन के वाँधव भगवान्‌ भ्रुवन-भास्कर 
की शोभा का आरंभ हो रहा था और निशा-नाथ चंद्रदेव का 
राज्य शीघ्रता से नष्ट हो रहा था, उस समय परम पुरुष 


( १६८ ) 


(जगदीश्वर ) के मुख से उत्पन्न हुए मनुष्यों ( अधांत्‌ जाह्मणों ) 
का और मधु के सददश मधुर बचने ( अर्थात्‌ श्रुतिया ) का 
विनोद प्रकट हुआ | इसका साराश केवल् इतना है कि प्रात*- 
काल मे ब्राह्मणों ने वेद-पाठ करना पारभ किया। 
यहाँ श्रातःकाल मे?ःइस एक पद का अथे वर्णन फरने 
के लिये पूर्वांध के दे! चरण बनाए गए हैं और '्राह्मणो! ठघा 
वेदों! इन एक एक पदों के लिये आगे का डेढ़ चरण । झतः 
यह एक पद के अथे मे अनेक पदो के वर्णन का उदाहरण हुआ । 
अब अनेक पदो के अथे का वर्णन करने के लिये एक पद 
के वर्णन क्वा उदाहरण सुनिए-- 
खण्डितानेत्रकज्ञालिमज्जु रज्ननपण्डिताः | 
मण्डिताखिलदिक्मान्ताइश्चण्डांशे।भान्ति मानव: ॥ 
र श्र )€ ५ 
उण्डित वनिता नेन-नक्िन रेंगिवे मे पढित। 
चउंड-किरन के किरन करत द्यि-सागन सद्धित 0 
खंडेता द्ियों के नेत्र-ऊमत्ों की पंक्तियों का सुंदरतवा 
रेंगने मे चतुर सूर्यदेद की किरण संपूर्ण दिग्भागों को भूषित 
करती हुई शोमित हा रही 
यहां 'यश्याः पराह्ननागेहात्‌ पतिः आतग है5- 
ज्चति। अर्धात्‌ जिसका पति दूसरी स्लो के घर से प्रात. 
काल अपने घर आधे! इस वाक्यार् के स्थान में केवल 
'खेडिता'पद वर्शन किया गया है। 


( १६७ ) 


अच्छा, अब एक वाक्य के अथे के लिये अनेक वाक्यों 
का वर्णन भी सुनिए--- 
अयाचितः सुख दो याचितश्व न यच्छति | 
सर्वस्वं चाप हरते विषिरुच्छुले इणाम्‌ || 
3 > > है 
बिन मयि सुख देत अरु माँगे कछु हु न देत । 
उच्छे ,खल विधि नरन का सरबस हू हरि लेत ॥ 
कोई बेचारा भाग्य का मारा उसे कोसता है। कहता 
है--5चछु खत विधाता बिना माँगे सुख देता है और मॉगने पर 
नही देता, श्रत्युत उनका सवेस्व भी लूट लेता है | 
यहाँ सब कुछ भाग्य के अधीन है? इस एक वाक्य के 
अथे में अनेक वाक्यों की रचना की गई हे, अतः यह विस्तार 
है, जिसे कि प्राचीन आचार्य “व्यास! नाम से पुकारते हैं । 
तपस्यते प्रुनेब॑क्त्राइदायमधिगत्य सः । 
वासुदेवनिविष्टात्मा विवेश परम॑ पदस ॥ 
> > ओर 
तप करते झुनि-वदन ते वेद-अरथ वह पाह। 
वासुदेव में मेत्रि मन गह्यो परम पद जाई || 
कोई मनुष्य किसी भक्त के विषय में कहता है कि--वह 
तपस्या करते हुए मुनि के मुख से बेद का भ्रथे प्राप्त करके 
वासुदेव मे चित्त लगाकर मोक्ष को प्राप्त है गया | 


( १७० ) 


यहाँ ( १ ) मुनि तप कर रहे हैं, (२) उनके मुँह से 
उसने वेद का अथे प्राप्त किया, ( ३ ) उसके बाद परबह्ष वाघु- 
देव मे चित्त प्रविष्ट किया और (४) तदनंतर मोक्ष को 
प्राप्त हे गया, इतने बाक्यों के अर्थो' का समूह शह्‌-प्रत्यय 
( तपस्यत: ), कत्वा प्रत्यय ( अधिगत्य ) भर बहुब्रोह्दि समास 
( वाह्तुदेवनिविष्टात्मा ) के द्वारा अजुवाद्य रूप से और तिहन्त 
( क्रिय। ) ( विवेश ) के द्वारा विधेय रूप से लिखकर एक 
वाक्याथे के रूप में कर दिया गया है । 
'सामिप्रायता? का अथे यह है कि जो वर्णन चल रहा है, 
उसको पुष्ट करना अर्थात्‌ सहायता पहुँचाना । जैसे-- 
गशिकाजामिलप्मुझुयानवता मवता बता5हमपि | 
सीदन्‌ भवमरुगर्ते करणमूर्चे ! न सर्वथोपेक्ष्य ॥ 
५ 4 २ रे 


गनिका-अजामेरू-आअदिक की रक्षा कीन्ही तुमने नाथ। 
भव-सद-खाडे मे सीदुत सम करुना-म्रति ! तजे न हाथ ॥ 


हे करुणामूर्तें। गणिका ( पिज्ञज्ञा ) और अजामिल आदि 
जिनमे मुझ्य हैं, उन ( बडे बड़े पापियों ) की रक्षा करनेवाले 
आप संसाररूपी मरुस्यल्न के ( निजल ) गड़ढे मे दुःख पांता 
हुआ जो मैं हूँ, उसकी सर्वथा उपेक्षा न करिएगा--मुझे 
विज्कुल्त ही न भुल जाइएगा ! 

यहाँ “उपेक्षा न करिएगा? इस बात को पुष्ट करने के लिये 
भगवान्‌ को “करुणामूत्तिः विशेषश दिया गया है, जिससे सिद्ध 


(१७१ ) 


होता है कि--झााप परम दयाहु हैं. आप मेरी उपेक्षा करे यह 
हे। ही नहो सकता । पर, यदि पापी समक्कर करुणा न 
करे , ते यह भी आपके खभाव के विरुद्ध है? इस वात को 
सिद्ध करने के लिये गणिका आदि का दृष्ठांत दिया गया 
है और अपना विशेषण दुःख पाता हुआ! लिखा है। से 
यहाँ एक भी पद निरथेक नही है, सबमे कुछ न कुछ 
अमिप्राय है । 
काँति 

रस के स्पष्ठतया प्रतीत हे।ने को कांति! कहते 
हैं। इसके उदाहरण रस प्रकरण मे वर्णन कर चुके हैं और 
आगे भी वर्णन किए जायेंगे । 

समाधि 

“पजस बात का में वणन कर रहा हूँ, वह पहले 
( किसी के द्वारा ) वर्णन नहीं की गई है, अथवा 
पूर्वोक्त की दाया हो है यह” जो कवि का सोचना 
है, इसे (समाधि! कहते हैं। झाप कहेंगे कि सेचना' 
एक प्रकार का ज्ञान है, और ज्ञान आत्मा का गुण है, अथे का 
गुण तो है नहीं, फिर इसे आपने अधथ-गुणों मे कैसे गिन 
लिया ? इसका समाधान यह है कि ज्ञान भी तो किसी न 
किसी अ्थे के विषय में ही होता है, अत: जिस तरह वह सम- 
वाय-संबंध से आत्मा मे रहता है, वैसे ही विषयता-संबंध से 
अथे में भो रहता है, सो उसे अधे-गुण मानने मे कोई बाधा 


( १७२ ) 


नहीं। उनमे से पहल्ा--अर्थात्‌ पहले बेन न की गई बात 
का वर्णन करना , जैसे-- 

# तनयमैनाकगवेषणलस्‍स्बीकृतजलधिजठरपर- 
विश्वहिमगिरिभुजायसानाया भगवत्या भागीरण्या: 
सखी । 

इत्यादि मे है, और दूसरा--पहले बर्णन की गईं बाते की 
छाया ते प्रायः सर्वत्र द्वी है। यह है अत्य॑त प्राचीन आचार्यो' 
का सिद्धांत । मे 
अन्य आचारये का मत 

गुण २० न मानकर ३ ही मानने चाहिए । 

अन्य विद्वाद ते उपयुक्त गुणों मे से कुछ को पूर्वोक्ति-- 
माधुये, ओज और प्रसाद नामक--तीन गुणों से एवं आगे 
वर्णन किए जानेवाले देषो के अभावो और अल्ंकारों से निर- 
थेक सिद्ध करते हैं, तथा कुछ को विचित्रतामात्र और कही 
कद्दी देषरूप मानते हैं, अतः उतने स्वोकार नहों करते। 
अर्थात्‌ वे २० न मानकर, ३ ही गुण मानते हैं। अच्छा, 
उनके विचार भी सुनिए | वे कहते हैं-- 

शब्द-गुशों मे से श्लेष, उदारता, प्रसाद और समाधि इन 
गुणों का ओज को ध्वनित करनेबालो रचना मे अतर्भाव हो 
जाता है। यदि आप कहे कि--श्लेष और उदारता, जे कि 
सब अंशों मे गाढ़ रचनारूप होते हैं, का अतर्भाव ओज को 

* इसका अर्थ छ० ४८ मे देखा । 


( १७३ ) 
ध्वनित करनेवात्ली रचना में कर लीजिए; पर प्रसाद और 
समाधि ते गाढ़ भर शिथिल दोनों प्रकार की रचनाओं के 
मिश्रणरूप द्वोेते हैं, अतः एक (गाढ़ ) अंश का ओज का व्यंजक 
मान लेने पर भी दूसरे ( शिथिल्र ) अंश का अंतर्माव किसमें 
होगा ? तो हम अनायास कह सकते हैं कि---माधुये अथवा 
प्रसाद की अ्रमिव्यंजक रचना में। श्रच्छा, चार की गति ते 
हुईं; अब आपके मांधुये को छ्लीजिए, वह ते। हमारे माधुये की 
अभिव्यंजक रचना हुई है। इससे यह सिद्ध देता है कि 
प्राचीनों के मत मे व्यंजकों ( रचना-आदि ) मे व्य॑ग्यों (माधुये 
आदि ) का प्रयोग लाक्षणिक है। झतएव ओ्रेज गुण का भी 
ओ्रेजिव्यंजक रचना मे अतर्भाव समझ लेना चाहिए | 
अब समता? की चर्चा करिए। सो उसका सर्वत्र दोना 

ते अनुचित ही है; क्योंकि सभी विद्वान, जिस विषय का 
प्रतिपादन किया जा रहा है, उसकी उद्धरता और श्रतुद्धरता 
के अनुसार, एक ही पद में, भिन्न भिन्न रीतियों के प्रयोग को 
स्वीकार करते हैं; जैसे-- 

निर्माणे यदि मार्भिकेज्सि नितरामत्यन्तपाकद्रव- 

न्मद्वीकामधमाधुरीमदपरीहारोद्धराणां गिराम्‌ । 

काव्यं तहिं सखे! सुखेन कथय त्वं सम्मुखे माहश्ां 

ने चेदष्कृतमात्मना कृतमिव खान्तादबहिमों कृथा! ॥ 


3९ हि २ ९ 


( १७४ ) 


अति पकिबे ते द्वत दाख अरु मधु को, पूरो। 
परस-साधुरी-गरव करत जे बढ़ि बढ़ि दूरो ॥ 
तिन बानिन निरमान मराहहि जो निपुन अहै तू। 
तो कविता कहु, परम मुदित ह्व, मो-ससुहै तू ॥ 
नतरू कर्ुं-कदु काव्य की कथा व्यथ, मदमत बनि। 
निज दुष्ट कर्म लैं हृदय ते बाहिर हू करु मूढ़ ! जनि ॥ 
यदि तू अत्यंत पकने के कारण भरती हुई दाख कौर 
शहद की मधुरता के मद को हटा देने मे तत्पर बचने की 
रचना का पूर्ण मर्मज्ञ है, ते हे सले ! तू अपनी कविता 
को मेरे जैसे छोगों के सामने आनंद से कह । पर यदि ऐसा 
न कर सकता हा, ते जिस तरह अपने किए हुए पाप को 
किसी के सामने प्रकट नहीं किया जाता, इसी तरद्द उसे अपने 
हृदय के बाहर न कर--मन की मन ही मे रख ते, जबान पर 
भत्त आने दे। 
यहाँ अलौकिक काव्य के निर्माण का वर्णन करने के लिये 
बनाए हुए तीन चरणों मे जिस मार्ग का अवल्लंबन किया गया 
है, उसका हीन-काव्य के प्रतिपादन करने के लिये बनाए हुए 
चैौथे चरण मे नहीं किया गया । से यहाँ विषमता दी गुण 
है, और यदि समता--अर्थात्‌ एक ही रीति--कर दी जाय, 
तो उल्नटा दोष हो जञायगी | 
अच्छा, झब रही कांति और सुकुमारता; से! वे म्राम्यत्व 
और कश्त्व नामक जो दोष हैं, उनका त्याग देना मात्र है; 


( १७४ ) 
अतः वे भी गताथ हैं। फिर केबल 'अधथ-व्यक्तिः रह जाती 


है, से। प्रसाद-गुण के मान लेने पर उसकी कोई आवश्यकता 
ही नहीं रहती । 

यह तो हुई शब्द-गु्ों की बात, अब अथ-गुणों को 
लीजिए | उनमे से श्लेष और ओज-गुण के पहले चार भेद तो 
केवल विचित्रता मात्र हैं, उन्हे गुणों मे गरिनना उचित नहीं, 
प्रन्यथा अत्येक श्लोक मे जो अर्थां की विलक्षण विल्नक्षए 
विचित्रताएँ रहती हैं, वे सब भी गुणों के अंतर्गत होने लगेगी, 
और आप उन्हे गिनते गिनते पागल हो जायेंगे। अच्छा, 
अ्रब आगे चलिए; अधिक पद न होने का नाम श्रसाद? है, 
थक्ति की विचित्रवा का नाम भाघुये?, कठारता न होने का 
नाम सुकुमारता?, आरम्यता न होने का नाम हदारताः और 
विषमता न होने का नाम समतठ? है, एवं पदों का साम्रिप्राय 
होना ओज-गुण का पाँचवाँ भेद है। ये सब क्रमश: अधिक- 
पदत्व, अनवीकृतत्व, अमंगलरूप अश्लीलवा, आम्यता, भग्त- 
प्रकमता और भ्रपुष्टाथतारूपी दोषों के हटा देने से गताथ हो 
जाते हैं। अर्थात्‌ ये दोषों के अभावमात्र हैं, गुण नहीं । अब 
जो खभाव के स्पष्ट वणेन करने क[ नाम अरथ॑व्यक्ति उसकी 
खभावोक्ति अलंकार श्रार रस के स्पट्टतया प्रतीत होने का नाम 
कांति है, उसकी रसध्वनि तथा रसवाद्‌ अलंकारों के खोकार 
कर लेने से, कोई आवश्यकता नददो रहती। अब केवज्त समाधि- 
गुण बच रहता है, वह कवि के अंतःकरण मे रहनेवाली 


( १७६ ) 
ज्ञानरप वस्तु है, सो वह कविता का कारण है, गुण नहीं । 
और यदि ऐसा न माने तो हम आप से कहेगे कि प्रतिभा 
को भी काव्य का गुण क्‍यों नहीं मानते, क्‍योंकि आश्लोचना 
और प्रतिभा दोनों ही एक प्रकार के ज्ञान हैं, फिर जब प्रतिभा 
को काव्य का कारण माना जाता है, तो आलोचना को गुण 
मानने में क्‍या प्रमाण है ? अत: अंतता गत्वा तीन हो गुण 
सिद्ध द्वोते हैं, वीस नहीं । यह है 'मम्मट-भट्ट'-आदि का कथन | 
साधयं-व्यश्ञक रचना 

उनमे से माघुये-गुय को ध्वनित करनेवाली रचना निम्न 
लिखित प्रकार की होती है। वह, ट्वर्ग के अतिरिक्त भ्रन्य 
वर्गों के प्रथम और ढतीय अक्षरों, तथा श-ष-स एवं य-र- 
ल-व से बनी हुई; समीप समीप में प्रयोग किए हुए भनुखारों, 
परसवर्थो" और केबल अनुनासिकों से शोमित; जिनका भागे 
वर्णन किया जायगा, उन--प्लाधारणवया और विशेषतया-- 
निषेध किए हुए संयोगादिकों के स्पश से शून्य और समास 
के प्रयोगों से रद्दित अधवा उसके कोमल प्रयोगों से युक्त 
होनी चाहिए। वर्गों” के दूसरे और चौथे अक्षर--खन्‍्ध 
आदि--यदि दूर दूर आए द्वे, तो वे इस गुण के न अलुकूल 
होते हैं, न प्रतिकूल | हॉ, यदि उनका समीप समोप मे प्रयोग 
हो और उनसे अलुप्रास बन जाते हैं, वे प्रतिकूल भी हो 
जाते हैं। कुछ विद्वानों का यह भी कथन है कि दवर्ग से 
भिन्न वर्गो' के पॉँचो अक्षर समान रूप से दो माधुये को 


( १७७ ) 
ध्वनित करनेवाले होते है#। अच्छा, अब माधुये का उदा- 
हरण सुनिए-- 
तान्तमाल-तरु-कान्तिलट्विनीं किल्नरीकृतनवाम्बुदत्विषम्‌ | 
खान्त! मे कलय शान्तये चिरं नेचिकी-नयन-चुम्बितां भ्रियम॥ 


जो किक्लूर किय नव-अ्रस्बुद-दुति, उलंघिय जे तमाछ-तरु-कान्ति । 
धेनु-नैन-चुम्बित तेहि शेभहिं मम्र मन, सुमिर चहसि जो शान्ति ॥ 
एक भक्त अपने हृदय से कहता है--हे मेरे हृदय, तू , शान्ति 
प्राप्त करने के लिये, जिसने तमाल-वृत्त की काँति का उल्लंघन 
किया है--3स बेचारी को पैरों के नीचे देकर निकाल दिया है, 
और जिसने नवीन मेधों की कांति को अपना आज्ञाकारी चाकर 
बना लिया है, उस, उत्तमेत्तम गायों के नेत्रों से चुंबन की हुई-- 
उनके द्वारा इकटक देखी गई (भगवान श्रीकृष्णचंद्र की) शोमा 
को खोकार कर--सदा उसे ही स्मरण करता रह | 
प्रथवा ; जैसे-- 
स्वेदाम्बुसान्द्रकशशालिकपोलपालि- 
रन्त+स्मितालसविलोकनवन्दनीया । 
आनन्दमंकुरयति स्मरणेन का5पि 
रम्या दशा मनसि मे मदिरिक्षणाया! ॥ 
5 है >प 4 
..._ + पर उन लोगों का ध्यान द्वितीय और चतुर्थ बर्यों के अनुग्रासों 
की तरफ नहीं गया, ऐसा प्रतीत दाता है।--अजुवादक । 
२०--१९२ 


(६ १७८ ) 


सेद-सलिछ के सघन कनन शोमित्त कपोल-चर । 
अन्तरगत झूहु हँसन, अछस चितवन ते सनहर ॥ 
अरुन-तयवि की वहे अकथ थिति, अतिसे सुन्दर । 
सुमिरत होत अनंद केर अंकुर उर-झअतर ॥ 
नायक अपने मित्र से कहता है कि--जिसका कपोत्तस्थल 
पसीने के जल की सघन दूँदो से सुशोभित है और जे भीतरी 
मंद द्वास तथा आल्स्ययुक्त चितवन से प्रशंसनीय है; वह मद- 
माते नेन्नवाली नायिका की रमणीय और अनिवेचनीय अवस्था 
स्मरण करते ही हृदय में आनंद को अंक्रित कर देती है | 
यहाँ पहले पद्म में, अतिशयोक्ति से अलंकृत, जो भगवान्‌ 
के ध्यान की उत्सुकता है, उसका; अथवा भगवान्‌ के विषय 
में जो प्रेम है, उसका ; अततो गत्वा शांत-रस में ही पर्यवसान 
देता है; अत: यह रचना शांत-रस के माधुये को अमभिव्यक्त 
करती है और दूसरे पद्य मे स्मरण फे सहारे उपस्थित हुए 
( स्मृत ) झंगार-रस के माघुये को श्रमिव्यक्त करती है। 
ओनजो-व्यंजक रचना 
ओज-गुण का बंध, समीप समीप मे प्रयाग किए हुए वर्गों" 
के दूसरे और चौथे अर्थात्‌ ख-घ-आदि-अक्तरो, टवर्ग के अक्षरों 
और जिनमें जिह्ामूलीय, उपध्मानीय, विसर्ग प्रैर सकार आदि 
अधिक हो---ऐसे अक्षरों से बना हुआ, वर्गों के ्रादि के चार 
अक्षरों अथवा रेफ के द्वारा वने हुए संयोग जिनके आगे हों--- 
ऐसे और समीप समीप में प्रयोग किए हुए हख खरो से युक्त 


( १७८ ) 
और बड़े बड़े समासवाक्षा होता है। इस बंध के अंदर 
आए हुए वर्गों के पहले और तीसखरे--..अर्थात्‌ क-ग आदि 
अक्षर यदि संयुक्त न हों, तो न अलुकूल होते हैं, न प्रतिकूल; 
और यदि संयुक्त दो, वो अनुकूल ही हे! जाते हैं। इसी तरह 
अ्नुखार शोर परसवर्णों को भी समम्तिए--वे भी न अनुकूल 
हैं, न प्रतिकूल । 
इसके उदाहरण हैं 'अयं पततु निर्यम्‌ ..आदि; जो कि 
पहले रौद्र-रस आदि के उदाहरणों मे लिखे जा चुके हैं। (हिंदी 
' में मह्ाकवि भूषण की रचना प्राय: इसी गुण का उदाहरण है ) 
भंखादव्यज्धक रचना 
जिसके सुनते ही वाक्य का अथे हाथ के बेर की तरह 
दीखने लगे---उसके समझाने फे लिए किंचित्‌ भो प्रयास न 
करना पड़े--बह रचना प्रसाद-गुण को अभिव्यक्त करनेवाली 
होती है। यह गुण सब--रस, भाव आदि--मे रहता है, 
किसी विशेष प्रकार के रस अथवा भाव मे द्वो रहता हो, से 
नहीं। प्रायः मेरे ( पंडितराज के ) सभी पद्च इस गुण के 
उदाहरण हो सकते हैं; तथापि जेसे-- 
चिन्तामीलितमानसे मनसिजः सख्ये विहीनप्रभा; 
प्राणेश! प्रणयाकुलः पुनरसावास्तां समस्ता कथा | 
एतत्‌ त्वां विनिवेदयामि मम चेदुक्तिं हितां मन्यसे 
मुस्धे ! मा कुरु मानमाननमिंद राकापतिजेष्यति || 
२ जद जद है क 


( १८० ) 


झुकुछित किय मन मदन सतत चिन्ता उपजाके | 
सखियाँ निष्मस भदे, प्रानपत्ति विनवत थाके ॥ 
रहे यहै सब, करो निवेदुद इतनें तोसों ।' 
राखत तू जो सखी। हितू को नातो मोसों | 
भारी! मान न करु, न तरु मान-मलिन यह मुख-नत्तिन । 
हारि जाइगो सरद्‌ के राकापति से जोति बिन ॥ 
मानिनी नायिका से सखो कहती है कि--कामदेव का चित्त 
चिन्ता से बिल्लकुल घिर गया है--उसमे सेचने की शक्ति ही 
नही रहा है, सखियाँ ( सोच के मारे ) कांति-हीन हो गई हैं 
और प्रायनाथ प्रेम के कारण अधोर द्वो उठे हैं---अब ते। हठ 
छोड दे। अच्छा, यह भी रहने दे; पर यदि तू मेरे कथन 
को भला समझती है--जैसा कि सदा से समझती आई है-- 
तो तुझसे इतना निवेदन कर देती हूँ कि मुग्धे! तू मान न 
कर; अन्यथा इस सुंदर मुखड़े को पूर्ण चंद्रमा जीत जाबेगा-- 
रोष से मुख में समत्तिनता भ्रा जाने के कारण उस कलह! की 
इससे तुलना हो जायगो जो पहले क़भी न थी। हाय रे। 
भोल्ञापन ! क्या अब भी प्रसन्न होना नहीं चाहती | 
यह पूरा पद्म प्रसाद-गुण को अभिव्यक्त करता है, भर किसी 
किसी अंश मे माघुय तथा ओज को भी, क्योंकि चिन्तामौ लित- 
सानसे। सनसिजः” कौर 'मा कुर सानमाननसिदस्‌” 
इन भागों से माधुय की, और 'सखझये विहीनप्रथा;****”! 
झादि भागों से ओज की भी अभिव्यक्ति द्वोती दै | 


( १८१ ) 


आप शंका कर सकते हैं कि यहाँ शंगाररस में रहने- 
वाल्ने माधुये को अमिव्यक्त करने के लिये उसके अनुकूल रचना 
भत्ते ही रहे; पर ओेज का यहाँ प्रसंग ही क्‍या है कि उसके 
अनुकूल अक्षरों का विन्यात किया गया। इसका समाधान 
यह दे कि--सखी ने नायिका का नान शांत करने के लिये 
अनेक यत्न किए और उसके भल्ते की वात कह रहो है, तथापि 
वह असन्न न हुई: अतः उसे क्रोध आ गया। से उसकी 
क्रोघयुक्तता का अभिव्यक्त करने के लिये वह विन्यास भी 
सफल है। अधिक कहते क्री आवश्यकता नहीं, ( यह 
सिद्धांव है कि ) जहाँ ओजसी रस और अमर्पादि भावों के 
वर्णन की इच्छा न हा, वहाँ भी यदि बेत्षनेबाले का क्रोधीपन 
प्रसिद्ध है, अथवा जिस अ्रथ का वर्णन किया ज्ञाता हो, वह 
अत्यंत कर हो, यद्वा जो निबंध लिखा जा रहा हो, वह आज्या- 
यिका आदि हो, तो कठिन वर्णों की रचना होनी चाहिए। 

अच्छा, छोड़िए इस सब पंचायती का, आप केबल प्रसाद 
शुण का दी उदाहरण सुनिए-- 
वाचा निर्मेलया सुधामधुरया यां नाथ ! शिक्षामदा- 

स्तां स्वप्नेषपि न संस्पृशाम्यहमहंभावाह्रतों निञ्नपः | 
इत्यागःशतशालिन पुनरपि स्वीयेषु यां विश्वत- 

स्वत्तो नाइस्ति दयानिधियंहुपते मत्तो न मत्तः परः || 


मद > 4 २६ 


( १८२ ) 


सुधा-मघुर निरमरू बानी ते जो ठुम शिक्षा दीन्ही नाथ! 
तेहिं सपनेहू छुवत न निररूज दा, परि अहक्ूर के हाथ ॥॥ 
इहि विधि शत-शत देोष-युक्त म्वहिं पुनि पुनि देत निज्नन में स्थान । 
तुम-लम करुनानिधि ना यदुपति, मो-सम मद्मातों ना आन ॥ 

है नाथ! आपने अमृत के समान मधुर और निर्मल वाणी 
से, जो शिक्षा दी, उसे अहड्डार से आच्छादित निहंज् 
मैं, सपने में भी, नही छूता । हे यदुपते ! इस तरह सेकड़ों 
अपराधों से युक्त मुझे, फिर भी आत्मीयों मे भरती करने- 
वाले आपसे अधिक कोई दयानिधि नहीं है, और मुझसे 
अधिक मदमत्त नही | 

यहाँ केवल प्रसाद-गुण है, उसके साथ अन्य किसी गुण 
का मिश्रण नहीं । 


रचना के दोष 
अब जिस रचना मे पूर्वोक्त गुणा का ध्वनित करने की 
शक्ति रहती है, उसके परिचय के लिये, साधारणतया--प्र्थात्‌ 
जिनको सब काव्यो मे छोड़ना चाहिए और विशेषतया अर्थात्‌ 
जिनका किसी रस में छोड़ना चाहिए और किसी में नही, 
वर्जनीयो का कुछ वर्णन किया जाता है-- 
साधारण दोप 
एक अज्ञषर का साथ ही साथ फिर से प्रयोग, यदि एक 
पद में और एक घार हो, ते सुनने मे कुछ अनुचित प्रतीत 


( १८३ ) 

होता है, जैसे--'ककुभधुरमि:', (विततगात्र:' भर 'पलल- 
मिवाभाति? इत्यादि में बड़े अक्षरों का। यदि वह्दी बार बार 
हा, तो अधिक अलुचित प्रतीत होता ' है; जैसे--“वितत- 
तरस्तरुरेष भाति भूमौ! । इसो तरह भिन्न भिन्न पदों में आते 
पर भी अधिक अनुचित प्रतीत होता है; जैसे--'शुक करोषि 
कर्थ विजने रुचिम? इत्यादि मे | और यदि भिन्न भिन्न पदों मे 
हो और बार-बार हो, तो और भी अधिक अनुचित होता है; जैसे 
“पिक ककुभे मुखरीकुरु प्रकामम? । 

इसी तरह पहले जिस वर्ग का अक्षर आया है, उसके साथ 
ही साथ उसी वर्ग के भ्रन्‍्य अक्षर का प्रयोग, यदि एक-पद मे और 
एक बार हो, ते कानो को कुछ अनुचित छगता है; जैसे-- 
“बितथस्ते मनोरथ:? यहाँ त और थ का । पर यदि बार- 
बार हे, तो अधिक अश्रव्य होता है, जेसे--'वितथतरं वचन 
तब प्रतीम:? यहाँ 'त-थ-त? का प्रयोग | इसी तरह यदि सिन्न- 
मिन्न पदों मे हो, तव भी अधिक अश्रव्य होता है; जेसे--.अथ 
तस्य बच: श्रुत्वा! इत्यादि मे । और यदि भिन्न मिन्न पदो मे 
ओऔर बार बार हा, तो और भी अधिक अश्रव्य होता है; 
जैसे--'अथ तथा कुरु येन सुख लगे! यहाँ 'थ-त-थः का प्रयोग । 
यह एक वर्ग के अ्च्तरो का सह-अयोग पहले के वाद दूसरे का 
और तीसरे के बाद चोथे का हो, तभी अनुचित होता है। 
पहले और तीसरे एवं दूसरे मोर तीसरे का सह-अयोग ते। उतना 
अश्रव्य नहीं द्वाता, कितु वहुत कम होता है, जिसे कि रचना 





( १८४ ) 
को ममंन्न ही समक सकते द। यह अथांत पहले के वाद 
वोसरे का और दूसरे के वाद तीसरे का प्रयाग भी चदि वार वार 
हुआ, ता उसे साधारण मनुष्य भी समकक सकते हैं, जेंसे-- 
खगकतन्नानिधिरंष विजुन्मते! ओर इति वदति दिवानिशं 
धन्य:? इत्यादि नें। पंचम वर्गा' अधथात्‌ ड्कारादिकों का तो 
नघुर होने कं कारण अपने वर्ग कं अक्षरों के पहले अथवा पीछे 
आना चुरा नहीं प्रतीव द्वाता, जैसे--'तनुत्ते तनुतां तनों 
इत्याढि सें। पर॑तु एक ही अचचर का साथ दी साथ वार वार 
प्रयाग तो उनका भो अ्श्रज्य हाता है: जेसे--'सभ्त महती 
सनसि व्यघा५५विरासीनू? यहाँ | 
ये अश्रव्यताएँ गुरु अक्षर के वीच ने आ जाने से हट जाती 
हैं; जेंसे--संत्रायर्ता कबड्कारं काके केक्ाक्षलखन:? । 
इत्यादि नें। अशवा, जैसे 
यथा यथा तामरसायतेश्नणा 
नया सरागं नितरां निपेद्िता | 
तथा तथा तत्त्ककथेव सबंता 
विद्भष्य मामेकरस श्कार सा॥ परदाँ । 


% नायक अपने मित्र से कद्दवा हैँ कि--मैंन कनक से विश्ञाल नेत्र- 
बाढी (इस चाबिक्का) छो ज्यों ज्यों असछद्वित पुर्णतवा सेवन किया बोंद्यों 
उठने लुले ठन्च्-कथा (अश्यविचार) की तरह, सव तरफ़ से खींचकर, एक 
रख ऋर लिया--अबांव जैसे ्यज्ञादी का सिवाय ब्रह्म के आर झुछ नी 
नहीं चूछता वैसे उन्े सिदाय उसके और छुछ नी नहीं सूक्धत उगा। 


( १८५ ) 


गुरु-अक्षर दो प्रकार के होंते हैं--एक दीघे, और दूसरे 
वे जिनके आगे संयोग होता है। उनमें से, पृर्वोक्त उदाहरयों 
मे दोधें' के बीच में आने के कारण अश्रव्यता मिट गई--यह 
दिखाया गया है! अब जिन अक्षरों के आगे संयोग होता 
है, उनके बोच मे भाने से अ्रश्रव्यता की निदृत्ति का उदा- 
हरण सुनिए-- 

*सदा जयानुपड्डाणामड्भानां सद्गरस्थलम । 

रहाज्णमिवामाति तत्तत्तुरगताण्डवे! ॥ 

यहाँ वत्ततु! में संयुक्त वकारों के द्वारा अश्रव्यता निवृत्त 
है गई। यहाँ एक बात और समझ लेने की है। वह यह 
कि गुरु-खर जिन दो अक्षरों के बीच मे आता है, उन दो मे 
एक के बाद दूसरे के आने के कारण, जो अश्रव्यता उत्पन्न हो 
जाती है, उसे द्वी दूर करता है, इस कारण, पूर्वोक्त 'यथा यथा 
तामरसायतेक्षणा. ..” इस पद्म मे 'यथा ता? इस भाग मे और 
विधा तथा त! इस भाग मे थकार के अनंवर जो तकार आए 
हैं, उनका देष दूर हो जाने पर भो तकार के बाद थकार आने 
के कारण जो अश्रव्यता आ गई है, वह ज्यों की त्यों है; क्‍योंकि 
उनके वीच में कोई गुरु नही, कितु हस्व अकार है 

« कवि भ्रद्ध देश के राजाओ का वर्णन करता है कि---जिनके पीछे 
सदा विजय फिरा करती है---जो अब तक कभी परास्त नहीं हुए, उन 


अंग देश के राजायो का वह युद्ध-स्थछ उन खेत के घोड़ो ऊे जृत्यों से 
नाटकधर के आँगन सा प्रतीत होता है । 


( १८६ ) 


इसी प्रकार तीन अथवा तीन से अधिक अक्षरों का संयोग 
भी प्रायः अश्नव्य होता है, जैसे--राष्ट्रे तवेष्टर. परितश्च- 
रन्ति? यहाँ रू! । इस तरह, अनुभव के भनुसार, ऐसे ऐसे 
कर्णकदुता के अन्य भेद भी समझ लेने चाहिए ! 
पूर्व पद के अन्त मे दीधे स्वर हो, और उसके आगे दूसरे 
पद में संयोग हो, ते। उसका एक बार भी प्रयोग अश्रव्य* होता 
है, और यदि बार-बार हो, ते बहुत ही अधिक । जैसे-- 
हरिणीप्रेश्षणा यत्र गहिणी न विलेक्यते | 
सेवितं सर्वृसंपद्धिरपि तद्भवर्न वनम्त्‌ ॥ 
यहाँ पूर्व-पद “हरियोी” शब्द के आगे पकार और रेफ का 
संयोग है। पर, यदि दी्घ खर और उसके आगे का संयोग 
देने! एक ही पद मे हों, ते वैसी अ भ्रव्यता नहीं देती, जैसे-- 
“जाथ्॒ता विचित: पनन्‍्था: शाचवायां वृथेद्यव:? इत्यादि में | 
पर-सवबर्ण के कारण जे। संयोग होता है, उसका दीर्घ के 
अनंतर विद्यमान होना, नाममात्र भी भ्रश्रव्य नहीं होता क्योकि 
वह सर्वथा मिन्न-पद् मे दाता नही, और मधुर भी होता है, 
जैसे--“तान्तमालतरुकान्तिलट्विनीम्‌ ..? इत्यादि पूर्वोक्त पद्म 





-- यह दोष हिंदी मे नही होता, क्योंकि वहा भिन्न-पद्‌ मे संयोग 
होने पर पूर्च-पद्‌ के स्वर पर जोर देने की रीति ही नहीं दै । 

' जहा स्गनयनी गृहिणी दिखाई नहीं देती, वह घर सब सपत्तियों 
से युक्त हाने पर भी वन है । 

7 यह सब शास्राथ भी केवछ संस्क्ृतवाले! के काम का है । 


( ८७ ) 
मे । यहाँ 'तान्तमाल' और “नीड्विड्टूरी” मे जे। पर-सवर्ण किया 
गया है, वह पूर्व पद से मी संबंध रखता है, इस कारण, इस 
संयोग को, मिन्न-पद से द्वोनेवाल्ा, नहीं कद्दा जा सकता। पर 
जिन लोगों का यह मत है कि--' संयुक्त वर्षों मे प्रत्येक की 
संयोग संज्ञा माननी चाहिए?” उनके विचारातुसार भी “वान्त- 
माक्ष”? में त और न दोनों संयोग हैं सह्दी पर तमाल का पहल्ा 
वर्ण व' संयोग भिन्न पद मे रहने पर भो 'ता” के दीघ आ से 
अव्यवहित पर नही है, क्योंकि बीच मे परसवर्ण “न! का 
व्यवधान है। अतः समुदाय की संयोग संज्ञा मानमे- 
वालों के मत से संयेग भिन्न पद-गत नहीं हुआ इससे, 
और प्रत्येक की संयोग संज्ञा मानमेवालों के मत से, संयोग 
होने पर भो वच्द वीच में व्यवधान डालनेवाक्षे परसवर्ण के 
आ जाने से अश्रव्य नही हुआ ) इसी पद्च मे 'नवाम्बुद! शब्द 
में नव! और 'अम्बुदः शब्द के व क॑ श्र भोौर अम्बुद के अ 
के स्थान मे जे। आ दीघ हुआ है, वह व्याकरण की परिभाषा 
के अनुसार एकादेश है, झतः वह दोनों पढ़ें से प्रथक्‌ प्रथक 
संबध रख सकता है# । से वह जब पूर्व पद का भाग गिना 
जाय, वर 'ग्बुः मे जो संयोग है, वह यद्यपि मिन्न-पद-गत भी 
है भार दीध से आगे भो कि जिसके बीच मे कोई व्यवधान 
नहा। वथापि यहा 'मिन्न-पद-गत” संयोग उसे ही माना 
गया है, जो किसी एक पद के अन्तर्गत न हा, भरत: कुछ 


४ देखे।--अन्तादिवश्च' सूत्र की कासुढी । 


( १८८ ) 

दाप नहीं। तात्पये यह हैं कि नव” और अस्बुदः पद 
यत्रपि मिन्न भिन्न हैं, तथापि वे समास में आ जाने के कारण 
'नवान्युढ? रूपी एक पद के अंतंगत हो गए हैं, अतः यहाँ 
अश्रवव्यता नही रही | 

पूराक्त भिन्न-पद-गत संयाग यदि वार वार आबे वा 
अत्यंत कर-कट्ठु हा जाता है; जैसे--- एवा पिया में कल 
गता चपाकछुला' इससे । 

उपयुक्त अश्रव्यताओं के कारण काव्य ल्ेगड़ा सेँगड्ा कर 
चलता सा प्रतीत होता है, उसकी सरस धारा में रुकावट आ 
जाता है, भ्रत: इनका परिहार आवश्यक है | 

#अचब संधियां के नियना की वात झुनिए। संधि का, 
अपने इच्छानुसार, एक वार भो न करना अश्रव्य द्वोता हैं; 
जसे-..' रन्‍्याणि इन्हुमुखि | ते किल्किब्चितानि! यहाँ णि' 
ओर ३! में संघि न करना । पर, प्रगृद्य संज्ञा के कारण जा 
संधि नहीं की जानी, वह वार वार आये तभी अश्रव्य द्वाती है, 
कंवन्न एक वार आने से नहीं, जसे-- अड़े अभो इन्हुसुखी- 
विज्ञासा:? यहाँ ओआ+अ आर ईइ+-इ सें। इसी तरह य 
और 'बः ऊं लाप के कारण जे संवि नही की जाती, वह भी 
यदि बार वार आबे ता खटकती है; जैसे--'भपर इपब रूते 
कानिनीना इगन्ता यहाँ अ+इ और अ+ए में । पर, यदि 
श्राप पृछ उठें कि तब आपने-.- 


5 5, ०. ० है डे हे 
“ यह रब भरी केचल् संन्ट्ृषत काब्यों के लिये दी उपयोगी है | 


( १८८ ) 


#श्ुजगाहितप्रकृतये! गारुउमन्त्रा इवाज्वनीरमण ! 
तारा इच तुरगा इबव सुखलीना मन्त्रिणां भवतः ॥ 

यह्द कविवा कैसे कर डाज्ी--यहाँ ते! इनकी भरमार है, 
ते हम उत्तर देते हैं कि--(कृपया) यकार का लोप न करके ' 
पढ़िए, अर्थात्‌ मन्त्रायिवा? 'तारायिव” 'तुरुगायिव? यों पढ़िए । 
इसी तरह रु? के 'उ!, हल पर रहते 'यः के ल्लोप, यण, गुण, 
वृद्धि, संवर्श-दीर्थ और पूर्ब-रूपादिकों का समीप समीप मे 
अधिक प्रयोग मो अश्रव्यता का कारण होता है| 

ये उपयुक्त सभी अभश्रव्यों के भेद सभी काव्यों में व्जतीय ' 
हैं, चाहे किसी रस का वर्णन हो, इन प्रश्नव्यताओं का न आने 
देना ही उचित है । 

विशेष दोष 

अर विशेषतया वजनीयों ( भ्र्थात्‌ जिन्हें किसी रस में 
छोड़ना चाहिए, ) का वर्शन किया जाता है। उनसे से, 
जे! दोष मधुर-रसें मे निषिद्ध हैं और जिनका भ्रभी वर्शन 
किया जावेगा, वे ओजस्वी रसों के अनुकूल द्वोते वहाँ 


# कवि कहता है--है राजन, आपके मंत्री, गारुद्ट मंत्रों की 
तरह, जिनका स्वभाव भुजगे! ( जारो +सरपपो' ) के लिये अह्वित है, 
ऐसे है---अर्थात्‌ जैसे गारढ़ मन्न ख्॒मावतः सपों' के विरुद्ध हैं, उसी प्रकार 
आपके मत्री स्वभाचतः गुंडों के विरुद्ध है, और, तारों की तरह तथा 
थोड़ी की तरदद, सुखछीन ( अच्छे आकाश में स्थित + अच्छी हृग्रास- 
चाल्ले + झानन्दुमरन) है । 


( १४० ) 


उनकी अवश्य क्ञाना चाहिए; और जे! मधघुर-रसों के अनुकूल 
वर्णन किए गए हैं, वे ओजसत्वी रसें के प्रतिकूल होते हैं, अतः 
उनसे उत्त रसों को बचाना चाहिए | यह एक साधारण निर्णय 
है, इसे अच्छो तरह ध्यान मे रखना चाहिए । 

अच्छा, तो अब मघुर-रसों मे निषिद्धों को सुनिए। 
मघुर-रसों मे लंबे समासों, जिनके आगे वर्गों के पहले, दूसरे, 
तीसरे और चौथे अक्षरो के संयोग हें।--ऐसे हस्वों, विस, 
विसगों' के आदेश सकारों, जिह्ामूल्ियों, उपध्मानीयों, टवर्ग के 
अक्तरों, और प्रत्येक वर्ग के आद्य चार अक्षरो, रेफ अधवा हकार 
द्वारा बने हुए संयोगों, तल, म और न के अतिरिक्त अन्य व्यंजनों 
के उन्हीं के साथ संयागॉ--श्रर्थात्‌ उनके द्वित्वों और वर्गों" के 
प्रथम से चतुर्थ पर्यत के वर्गों' में से किन्हों दे। के संयोगों के 
समीप समीप से बार बार प्रयोगों को छोड़ना चाहिए । और 
जिनके स्थान एवं प्रयत्न एक से द्वा--ऐसे वर्गों" के प्रथम से 
चतुथे तक के बने हुए संयोग और श-ष-स के अतिरिक्त किसी 
महाप्राण अक्षर के द्वारा बने हुए संयोग का एक बार भो 
प्रयेग न आने देना चाहिए। अब इनमे से प्रत्येक के उदा- 
हरण सुनिए । लंबा समास; जैसे-- 

#ले।लालकावलिवलबयनार विन्द- 

लीलावशंवदितकोकविकोचनया: ।__ 

.._ # चंचछ चअलकावलि और चढते हुए नेत्र-कमलें की लीला से 
जिसने सब मनुष्यों के नेच्रो के वशंवद कर लिया हे--ऐसी, साययकाल 


( १€१ ) 


सायाहनि प्रणयिने। भवन व्जन्त्या- 
इचेतेो न कप्य हरते गतिरज्ञनाया; ॥ 

यहाँ पृवाध में-- 

जिनके ञआ्ञागे वर्ग के पहले, दूसरे, तीसरे और 
चौथे वर्गों के संये।ग हों-रेसे हस्वे। की अधिकता; 
जैसे-- 

# हीरस्फुखदनशुप्रिमशेमि किश्व 
सान्द्राम्ृ॒तं वदनमेणविलेचनायाः । 
वेधा विधाय पुनरुक्तमिवेन्दुविस्वं 
द्रीकरोति न कर विदुषां व्रेण्यः ॥ 

इस पद्म मे 'ज्ि! शब्द पर्यन्त जो रचना है, वह झंगार रस 
के प्रतिकूल है, शेष सुंदर है। यद्यपि उत्तराधे मे, 'पुनरुक्तः 
शब्द मे, ककार ओर तकार का संयोग है, तथापि ऐसे संयोग 
की प्रचुरता न द्ोने के कारण देष नहीं गिना जा सकता। 
ओऔर यदि इसी पद्म के आदि मे 'दन्ठांशुकान्वमरविन्दरमा- 
पह्दारि...? बना दिया जाय, ते सभी पद्म सुन्दर हो सकता है। 
के समय, अपने प्रेमी के घर जाती हुईं अंगना की चाल किसका चित्त 
नहीं चुराती ? 

#% हीरो के समान चमकते हुए द॒ति की धवढता से शोमित और 
सघन अस्त से युक्त रूग-नयनी के सुख के बनाकर, विद्वानों में श्रेष्ठ 
विधाता पुनरुऋ के समान (नीरस) च'द्र-बिंब को क्यों नहीं हटा देता 
है--अवब भी इसे आकाश मे क्‍यों टाँग रक्खा है ! 


( १८२ ) 
विसर्गों' की बचुरता; जैसे-- 
#सानुरागा: सानुकम्पाइचतुराश्शीलशीतलाः । 
हरन्ति हृदय हन्‍त कान्‍्तायाः स्वान्तह॒त्तयः ॥॥ 
यहाँ दे। शकारों के संयोग पर्यन्त पूर्वांध का भाग मधुरता 
के अलुकूल नहीं है। 
जिहासूलोयें की अचुरता; जैसे-- 
+कलितकुलिशधाताः केअपि खेलन्ति वातार 
कुशछमिह कर्थं वा जायतां जीविते में । 
अयमपि वत ! मुज्नज्नालि ! माकन्दमोला 
चुलुकयति यदीयां चेतनां चश्वरीकः ॥ 
यहाँ दूसरे जिहामूलीय पर्यत का भाग मधुरता के अलु- 
कूल नही हैं। पर यदि “कथय_ कथमिवाशा जायतां जीविते 





# प्रियतना की प्रेस आर दया से युक्त, चतठर और शीतल चित्त- 
बुत्तियां, हाय ! हृदय के हरण किए लेती हैं । 

+ चिरहिणी कहती हैं कि---बज् के से आधात करनेवाले न जाने 
कौन से वायु खेल रहे है, फिर, भरा ! मेरे जीवन की कुशलता कंसे 
उत्पन्न हो सकती है । आर हे सस्जी ! बड़े ल्ेद की बात तो यह है कि 
आल की चोटी पर गूँज़ता हुआ यह भौंरा भी मेरे जीवन को चुढलू किए 
जारहा है । 

| कह, मरे जीवन की आशा केस हो सकती है, जब कि मठया- 
चल के चंदुनों से लिप हुए सपों के टगले हुए ये कालरूप 
वायु चछ रहे है । 


( १८३ ) 


में मलयभुजगवान्ता वान्ति बाता: ऋतान्ता:” यों बता दिया जाय 
ते यद्द देष नहीं रहता | 

डपधण्मानीयें की मचुरता; जैसे-- 

#अलका: फशणिशावतुस्यशीला नयनान्ता:परिए छ्वितेषुली ला॥। 

चपलेपमिता ख स्वयं या वद छेके सुखसाधनं कथं सा || 
यहाँ देने उपध्मानीय शान्त-रस के अनुकूल नहीं हैं | 
ठवर्ग और वर्गो' के प्रथम, द्वितीय, तुतीय और 

चतुर्थ वर्णो' की प्रचुरता; जैसे-- 

विचने तब यत्र माधुरी सा हृटि पूर्णा करुणा च केमलेज्भूतू । 

अधुना हरिणाक्षि ! हा! कथ॑ वा कड॒ता तत्र कगेरता<४विरासीत])। 
यदि इसी का उत्तराध “]अघुना सखि «तत्र हा ! कथ वा 

गतिरन्यैव विल्ञेक्यते गुणानाम? यों बना दिया जाय ते। माधुये 

के झनुकूल दे। जायगा । 

के पक विरही कहता हे--जिसके केश सर्प के बच्चों! के समान 
स्वभाववाले हैं, जिसके नयनग्रांत पंखवाले वाणे! की सी लीढा करने- 
वाले है और जो खब' बिनली के समान है, आश्चर्य है कि वह (स्त्री) 
संपार में सुख का साधन कैसे मानी जाती है ! 

* नायक कद्ता है कि--हे सुगनयने ! जिस तैरे वचन में वह अछु- 
पम्र सधुरठा थी और जिस कोसर हृदय में पूरी दया थी, हाय ! आज 
उन्हीं दोनें वस्तुओं मे कट्ठता और कठोरता केसे उत्पन्न हो! गईं ! 

[ दे सखि |! अब उन्हीं देने मे गुणों की गति दूसरी ही क्ैते 
दिखाई देती है ! 


7»- - 909 


( १४४ ) 


रेफों के द्वारा बने हुए संयाग का बार-बार 
अयेग, जेसे-- 
अतुलामनालेक्य निजामखवे गाराज्लि ! गव न कदापि याया; | 
लसन्ति नानाफलभारवत्ये। लता! कियत्यों गहनान्तरेषु ॥ 
पर, यदि तुल्लामनालेक्य महीतले(स्मिन्‌ः बना दिया 
जाय, ते ठीक हो जाय । 


ल, म श्लार न के अतिरिक्त अन्य व्यंजनों का 
उन्हीं के साथ संयेग का बार बार प्रयेग; जैसे-- 


बविगणस्य मे निकाय्य तामनुयातेउसि नेव तन्न्याय्यस्‌ । 


पर, ल, म और न का जो अपने आपके साथ संयोग 
हेतता है, वह ते उतना कठोर नही होता; जैसे-- 


8इयमुक्लसिता सुखस्य शेभा परिफुछ' नयनाम्बुजद्बयं ते। 
जलदालिमयं जगद्वितन्वन्‌ कलितः क्यापि किमालि! नीलमेघः॥ 


# नायक कहता है--हे गारागि ! अपनी समानता न देखकर 
तुझे अधिक अभिमान न करना चाहिए। जंगलों में अनेक फढ्वों के 
भार से झुकी हुईं कितनी छताएँ शेामित हे रही है । 

+ इस पथिवीतक पर समानता न देखकर'” *। 

[ नायिका नायक से कहती है-मेरे घर का निरादर करके (तू) उस 
( सपल्नी ) के पीछे छगा हुआ है, यह न्यायेचित नहीं है । 

$ सखी समोगचिद्धिता गोपी से कह रही है--हे सखी ! तेरे सुख 
की यह शोभा उल्लास युक्त हो रही है, और तेरे दोनों तयन-कमल पूरे 


( १८५ ) 
वर्गो' के प्रथम से ढेकर चतुथे पर्यत वर्णों मे से किन्हीं 
दे! के संयोग का बार-बार प्रयोग, जेसे-- ॒ 
#आ-साय सलिलभरे सबितारमुपास्य सादर तपसा | 
अधुना<ब्जेन मनाक्तद मानिनि ! तुलना मुखस्या&ञ्या ॥ 
यहाँ उत्तराधे सुंदर नही है। पर, यदि| 'सरसिजकुलेन 
संप्रति भामिनि ! ते मुखतुलाघिगता” ये वना दिया जाय, ता 
उत्तम दे! जाय | 
भझूयों अर्थात्‌ वर्गो' के प्रथम, द्वितीय, तृतीय 
खेर चतुर्थ वर्णो में से किन्‍्हों दे सपर्णो" के 
संयोग का एक बार अयेग; जैसे-- 
उंश्रयि | मन्द्र्मितमधुर बदन तन्वद्धि ! यदि मनाकक्ुरुषे । 
अधुनेव कलय शमित राकारमणस्य हन्त ! साम्राज्यम्‌ ॥ 


खिल रहे हैं, सा, कही, सब जगत्‌ को मेवमाढामय बनानेबाका नीछ-- 
मेघ (भगवान्‌ श्रीकृष्ण) मिछ गया है क्या ? 

-* दूधी अथवा सखी मानिनी नायिका से कहती है कि हे 
सानिनि ! सांस तक गहरे जल में रह कर, भगवान्‌ सूय्य की उपासना 
ऊरने के अनतर, अब--दूसरे दिन में--कमछ ने तेरे सुख की 
किज्चिन्मान्न समानता ग्राप्त की है । 

] दे कोपकारियी ” अब जाकर कमढों के संसूह ने तेरे मुख की 
समानता प्राप्त की है । 

[हे कृशांगि ! यदि तू अपने मुख को, थोडा सी, संदहास 
से मधुर कर ले, तो हप है कि निशानाथ चंह्र-बेव का साम्राज्य शांत 

,._ हुआ ही सम्रक, फिर उसकी तिथि कोई न पूछेगा । 


( १८६ ) 


यदि आप शंका करे' कि यहाँ जे। दो ककारो का संयोग है, 
*डसका ते व्यंजनों का, जो अपने आपके साथ, संयोग निषिद्ध 
माना गया है, उसी से निषेध हो जाता है, औ्रैर क ख का संयोग 
दो, तो, वह मद्दा-प्राणो के संयोग का जो निषेध किया गया 
है, उससे गताथे द्वो जाता है। रहा तीसरा संयोग, से! बह हो। 
ही नहीं सकता; अ्रतः दे! सब क्यों का निषेध जो आपने 
पृथक्‌ लिखा है, उसके लिये कोई अवकाश ही नहों रहता, 
फिर उसके लिखने से क्‍या फक्ष सिद्ध हुआ ९ इसका 
समाधान यह है कि दे। सवणे क्यों का संयोग यदि एक बार 
दे, तथापि दूषित होता है, से! यह उससे मिन्न है; अन्यथा 
'सनाक्कुरुषे! यह निर्दोष हो जायगा; क्योंकि यहाँ व्यंजन का 
झपने आपके साथ संयोग ते है, पर बार बार नहीं | 
महा माणे के द्वारा बने हुए संयेगग का प्रयेग; 
जैसे ( पूवोक्त श्लोक का पूर्वांध यों बना दीजिए )-- 
%# अयि मृगमदबिन्दु चेड्राले बाले | समातलुषे । 
और शेष उत्तराध वही रखिए | 
इसी तरह, (त्व” अत्यय, यढंत, यड्ल्लुइन्त तथा अन्य 
इसी प्रकार के प्रयोग, यद्यपि वैयाकरण लोगो को प्रिय क्गते 
हैं, तथापि मधुर-रस मे उनका प्रयोग नहीं करना चाहिए । 
इसी प्रकार कवि को उचित है कि वह, व्य॑ग्यों के आस्वादन से 





2 हे बाल्े ! यदि छछाट पर कस्तूरी की बिन्दी छगा लेगी; तो | 


( १४७ ) 


पृथक्‌, विशेष प्रकार के जाड-वेड़ की अपेक्षा रखनेवाले एवं 
ऊपरी तै।र से अधिक चमत्कारी भ्रन॒प्रासों के समूहों तथा यम- 
कादिको का, यद्यपि वे बन सकते है।, तथापि बनाने का प्रयत्न न 
करे; क्‍योंकि यदि वे अधिकता और प्रधानता से हुए, ते! उनका 
समावेश रस की चर्वणा मे न है| सकेगा, और वे सहृदय पुरुष 
के हृदय को-अपनी तर॒फ आवजित कर ल्ेगे; इस कारण रस 
से विमुख कर देगे-अर्थात्‌ सहृदय पुरुष उनके चमत्कार के 
चक्कर मे पडकर रस के आस्वादन से वंचित हो! जायगा। 
विशेषतः विप्रलंग-शंगार मे ते इस बात का पूर्ण ध्यान रखना 
चाहिए; क्योंकि वह रस सबसे अधिक मधुर होता है, और 
इसी कारण, उसे शुद्ध मिश्री के बनाए हुए शरबत की उपमा 
दी जाती है; उसमे यदि वहुत थेड़ी सी भी फोई बरतु ऐसी 
' हुई कि जे अपना अडुगा अल्लग जमाने क्गे, ते वह सहृदय 
पुरुषों के हृदय मे खटक जाती है, इस कारण ऐसी वस्तु का 


उसके साथ रहना सर्वधा अनुचित है। जैसा कि कहा भी 
गया है-- 


ध्वन्यात्मभूते शूज्धारे यमकादिनिवन्धनम्‌ । 
शक्तादपि प्रमादित्व॑ विप्रलम्भे विशेषतः ॥ 
श्र्थात्‌ जिस ध्वनि काव्य का आत्मा क्लोकोत्तरचमत्कार- 


कारी ऋगार रस है उसमे यम्क-आदि की रचना करना 
यदि कवि में उनकी रचना करने की शक्ति होा--वे स्वभावत 


( £#८ ) 
आ जाते हों, ते भी कहना चाहिए कि उसकी असावधानता है, 
जे उसने उन्हे आ जाने दिया । और यदि बिश्रह्वंभ-श्ैंगार के 
काव्य में आ गए, तब वो विशेष-रूप से असावधानता 
समझी जायगी | 


परंतु जो झनुप्रासादिक क्लिष्ट तथा विस्तृत न होने के 
कारण प्रथक अनुसंधान की आवश्यकता नहीं रखते, कितु 
रसें के आस्वादन मे ही अत्यंत सुखपूवंक आस्वादन कर लिए 
जा सकते हैं, उन्हें छोड़ देना भी उचित नहीं | जैसे कि-- 


कस्तूरिकातिलकमालि ! विधाय सायं 
स्मेरानना सपदि शीलय सैधमालिम्‌ । 

प्रौहि' भजन्तु कुम्र॒दानि सुदासुदारा- 
मुछासयंतु परिता हरिते मुखानि ॥ 


कक कै ध् ध् 
करि कस्तूरी-तिलक सखी री | साँक-समे तू । 
मंद मंद सुसकात महरू की छात रमे तू ॥ 
ते यह निदचे जाजु कुछुद सुद महा छहेगे ! 
सुखमा सुखद समग्र दिशा-मुख हुरूसि गहेगे ॥ 
सखी नायिका से कहती है--द्टे सखी ! तू सॉम के 
समय कस्तूरी का तिज्ञषक लगाकर, तत्काल, मह्त की छत का 


( १८८ ) 

परिशोत्ञन कर; जिससे कि झुझुद आनंद की अत्यंत अधिकता 
को प्राप्त हे! जाये--अर्थात्‌ पूरी तरह खिल उठें और दिशाएं 
अपने मुखे को पूर्णतया उल्लासयुक्त बना लें--उनके प्रारंभिक 
भाग अच्छी तरह प्रकाशित हे! जाय | इल्यादि मे | अथवा, 
विदह्ारी के इस दोहे मे--- 

नभ छाती, चाली निशा, चटकाली घुनि कीन | 

रति पाली आली ! अनत आए वनसाढी न ॥ 


इस तरह, प्रसंग आ जाने के कारण, मधुर-रसों को अमि- 
व्यक्त करनेवाली रचना के इन दोषों का थोड़ा सा निरूपण 
कर दिया गया है | 


संप्रह 


एमिविशेषविषयेः सामान्यैरपि च दूषणे रहिता । 

माधुरय-भार-मंगुर-सुन्दर-पद-वर्ण-विन्यासा ॥। 

व्युपत्तिजन॒दूगिरंती निममातुर्या प्रसादयुता । 

तां विवुधा वैदर्भी ब्॒दंति इत्ति ग्रहीतपरिपाकास ॥| 

जो इन विशेष और साधारण--दोलें प्रकार के--दोषो से 
रहित हो, जिसके पदों और वर्णों की रचना साधुर्य-गुण के 
भार से फटी पड़ती दो, जिससे वनानेवाले कवि की व्युत्पत्ति 
प्रकाशित होती हो, जो प्रसाद-गुण से युक्त हो, और पूर्ण 
परिपक्व--अर्थात्‌ रस की धार वॉध देनेवाल्ी हो, उस रचना 


( २०० ) 


को विद्वान लोग 'वैदर्भी वृत्ति' कहते हैं। इस रचना के 
कितने ही पद्म ददाहरणों मे आ ही चुके हैं; अथवा, जैसे-- 


आयातैब निशा, निशापतिकरें! कोण दिशामंतरम्‌ 
भामिन्यों भवनेषु भूषणगणेरुद्छासयन्ति भ्रियम्‌ | 
वागे ! मानमपाकराोधि न मनागद्यापि रोषेण ते 
हा! हा!! वालमृणालतोः्प्यतितमां तन्‍्वी तमुस्ताम्यति॥ 
ध्‌ठ कक ६५] डे 
आ ही गई रजनी, रजनी-पति केरि मरीचि भरी दिग-प्रेतर। 
सैौनन-भौनन भामिनिर्या बहु भूषन साजि रद्दै छुबि सु'दर ॥ 
रंचहु मान भई न कमी अजहू तुव, वास | गये सब वासर। 
वाल-म्रणाल्लहु ते ढुबरो तन ये रिस्र ते कुम्हिलात निरंतर ॥ 
नायक नायिका से कहता है--प्रिये, अब रात आ ही गई 
है---आने मे थोड़ो भी देरी नहीं है; देख, निशानाथ--चंद्रदेव-- 
की किरणो से दिशाओं के मध्यभाग व्याप्त हो चुके हैं। जो 
स्त्रियों प्रथथ कोप से भो युक्त थी, वे भी अनेक आभूषण पहिन- 
पहिनकर भवनों में शोभा के उंबर वॉध रही हैं । हे वामे | 
है संसार-भर से उल्लनटे रास्ते पर चलनेवाली ! तू अब भी मान 
को किंचित्‌ भी कम नही कर रही है| द्ाय | द्वाव ! | देख 
ते सद्दी ! यह नए मृणाल से भी अत्यंत दुर्वल तेरा शरीर रोष 
के मारे घवरा रहा है। जाने दे, यदि हमारे ऊपर दया नहों 
करती तो मत कर; पर इस सुकुमार शरीर पर तो दया कर | 


(३०१ ) 
इस रीति के निर्माण करते समय कबि को अत्यंत साव- 
धान रहना चाहिए, अन्यधा परिषाक का भंग हो जायगा-- 
रस जितना मधुर बतना चाहिए उतना न बन सकेगा । जैसा 
कि अमदक कवि के पद्म मे हुआ ऐ-- 


शुन्य' वासगहं विलेक्य शयनाहुत्याय क्िंचिच्छनै- 
निद्राव्याजमुपागतस्य सुचिर निर्वेष्ये पत्युम्ु खम्‌ । 

विद्रव्ध॑ परिचुम्ब्य जात-पुलकामालेक्य गण्डरथलों 
लज्जानम्रमुखी, ग्रियेण हसवा, वाला चिर॑ चुम्बिता ॥ 


बालिका ने जब देखा कि भ्रव निवास-गृद्द विल्कुल् शून्य 
हो गया है--कही किसी की भनक भी नहीं सुनाई देती, 
वे शब्या से धीरे-धीरे कुछ उठी गौर भूठ-मूठ निद्रा ्षेते हुए 
पति के मुख को बहुत समय वक देखती रही। जब उसे 
विश्वास है! गया कि पति महाशय गहरी नोद में हैं, ते उसने 
उसके भुख को अच्छी तरह चूमा; पर चूम चुकते के बाद जब 
उसने देखा कि पति के कपोत्न प्रदेश रोमांचित है। उठे हैं, ते। 
लजा के मारे मुँह नीचा हो गया--सायने न देख सकी | 
फिर क्‍या था ? प्यारेजी की बन पड़ो, उन्होंने हँस-हँसकर 
बढ़ी देर तक चूमा । 

इस पद्म में 'उत्पाय' श्र 'किचिच्छने:! इन दे खानों 
पर ढे-दो सवर्ण सयों का संयोग है, श्रैर वह भी सप्ीप- 
सभोप मे; भरत: धत्यत प्रश्नच्य है। इसी तरह इसी स्थान 


( २०२ ) 


पर भयो के द्वारा बने हुए संयोग जिनके आगे हैं, उन हखों 
का भी प्रयोग है। तथा 'शनैनिद्रा! इस जगह पौर 'निर्वे्ण्य 
पत्युमु खम्‌! इस जगह रेफ के द्वारा बने हुए संयोग की, भौर 
भायों के द्वारा बने हुए संयोग जिनके आगे हैं, उन हसों की 
प्रचुरता है। एवम्‌ “विस्रब्धम! इस जयह महाप्राणों के 
द्वारा बना हुआ संयोग, 'क्षज्जा” इस जगह दे। सवरण रूयों का 
अपने ही साथ संयोग और 'मुखी प्रियेश” इस जगह भिन्न-पद- 
गामी दोध के पहले संयोग है। इसी प्रकार 'क्त्वा? प्रत्यय 
का पाँच बार और “लोक” घातु का दे बार प्रयोग भी कवि 
के पास रचना की सामग्री की कमी को प्रकाशित करता है | 
पर, जाने दीजिए, दूसरों के काव्यों पर विचार करने की हमे 
क्या आवश्यकता है । 


अच्छा, ते इस तरह रसे का संक्षेप से निरूपण है| चुका। 
भाव 
भाव का लक्षण 
अब 'भाव-ध्वनि? का निरूपण किया जाता है। यहाँ 
सबसे पहले यह विचार करना है कि भाव” कहते किनको 
हैं? उनका क्‍या लक्षण है ? आप कहदेगे कि--इसमे कान 
कठिन बात है, सीधा ते है कि “विभावों और अलुभावों के 
अतिरिक्त जो रखें के व्यंजक हो---जिनसे रस अभिव्यक्त हों, 
उनका नाम भाव! है? । पर, यद्द ठोक नहीं; इस लक्षण की 


( २०३ ) 


रसें के प्रतिपादन करनेवाल्ले काव्य की पदावलि में अरतिव्याप्त 
हो। जावी है, क्योंकि अथे के द्वारा शब्द भी रसें को ध्वनित 
करते हैं। आप कह सकते हैं कि इसो लक्षण में जो बिना 
किसी द्वार के रसे का व्यंजक हो! इस तरह व्यंजक का एक 
विशेषण और बढा देंगे, ते पदावलि मे अतिव्याप्ति न होगी । 
पर, यदि ऐसा किया जाय, ते। लक्षण में असंभव दोष भरा 
जायगा, अर्थात्‌ यह भाव का लक्षण ही न होगा, क्‍योंकि भाव 
भो भावना--बार-बार अनुर्संधान--के द्वारा ही रस को ध्वनित 
करते हैं। दूसरे, भावना मे शअ्रतिव्याप्ति भी हो जायगी; 
क्योंकि बिना किसी द्वार के रसें को वही ध्वनित करती है । 
और, जिस तरह, लक्षण मे, 'विभावो और अलुभावों के अति- 
रिक्त” विशेषण दिया गया है, उसी तरह यदि शब्द के अति- 
रिक्तः यह्द व्यंजक का विशेषण और रख दें, ते भो छुटकारा 
नही, क्योंकि फिर भो भावना मे ते अतिव्याप्ति रहे ही गी | 
एवम्‌, जो भाव प्रधानतया ध्वनित होता है, वह रसें का व्यंजक 
नहीं होता, अत: उसमे लक्षण की अव्याप्ति भो होगी--अर्थात्‌ 
उस भाव का यह लक्षण नहीं बन सकेगा । शाप कहेगे कि 
जहाँ भाव की ध्वनि प्रधान होती है, वहाँ भी अन्तते गत्वा 
तो रस की अभिव्यक्ति द्वाती ही है, अत: उसमे भी रख-व्यंज- 
कता है ही; ते हम कहेंगे कि फिर 'भाव-ध्वनि? का लोप ही हो 
जायगा | यदि फिर भी कहो कि--भाव के अधिक चमत्कारी 
होने के कारण उसे 'भावष्वनि! कहा जाता है यद्यपि वहाँ भी, 


( २०४ ) 


अन्ततो गत्वा, रस की अभिव्यक्ति होती है, तथापि उसके चम- 
त्कारी न होने के कारण उसे 'रस-ध्वनि! नहों कहा जा सकता 
से! यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि चमत्कार-रहित रस की 
अभिव्यक्ति मे कोई प्रमाण नहीं--रस चमत्कार-रहित होता ही 
नहीं। हम पहले ही कह चुके हैं कि--जिस प्रमाण से रस- 
पदार्थ का अनुभव होता है, उसी के द्वारा यह भी सिद्ध है 
कि “रस आनन्द के अंश से रहित द्वोता ही नहीं? । अब यदि 
आप कहें कि--रपत की अपेक्षा भाव के गोण होने पर भी 
वाच्य की पपेक्षा प्रधान होने के कारण, अथवा विवाह में 
दूल्नह बने हुए दीवान वगैरह के पीछे चल्नते हुए राजा की 
तरह ( क्योंकि वहाँ राजा की अपेक्षा दूलनद की प्रधानता रद्दती 
है ) रस की अपेक्षा भाव की प्रधानता होने के कारण काव्य 
को “भाव-ध्वनि? कहा जा सकता है तो हम प्रधानतया ध्वनित 
दौनेवाले भाव को भी अतते। गत्वा रस का अभिव्यंजक मान लेते 
हैं; पर, तथापि देश, काल्न, भ्रवस्था और स्थिति-आदि अनेक 
पदार्थों से बने हुए पद्म के वाक्याथे से अतिव्याप्ति हो। जायगी; 
क्योंकि वह विभाव और अनुभाव से भिन्न भो है और रस का 
व्यंजक़् भी है। से यह लक्षण गड़बड़ ही है । 

अब यदि आप यह लक्षण बनावें कि---'जो आस्वादन रस 
को अभिव्यक्त करता है, उस झाखादन मे आनेंवाली (आखा- 
दविषय) चित्तवृत्ति का नाम 'भाव? है? और साथ मे यह कहे” 
कि--इस लक्षण की भावों के आस्वादन मे अतिन्याप्ति न होने 


( २०५ ) 


के लिए आखादन में आनेवाली? यह चित्तश्ृत्ति का विशेषणश 
रक़्खा गया है। से भो ठोक नहों; क्योंकि-- 


कालागुरुद्रव॑ ता हालाइलवद्धिजानती नितराम्‌ | 
अपि नीलेत्पलमाला वाला व्यालावलिं किलामलुत ॥ 


के मे के झः 


अखित-अगर विष-सरिस वह सम्लकृति मन में वारू । 
नीछ-कमलछ-मालहिं मदो सानत व्याढ कराढू॥ 


एक सखी दूसरी सखी से एक वियोगिनी की कथा कह 
रही है कि---अगर को जहर के समान समभनेवाली वह 
बालिका'नीज्-कसलों की माला को भी, माना. सर्पो' की 
पंक्ति मानती है । 

इस स्थान पर, सहृदय भावक का, जे! जहर की वरावरी 
का ज्ञान हे। रहा है, उसमें इस लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । 
वह ज्ञान विप्रत॑भ-श्ंगार का अनुभाव है--उसके द्वारा उत्पन्न 
हुआ है; अतः रस को ध्वनिव करनेवाले आल्ादन मे आनेवाल्ा 
भी है; क्योंकि जैसे भावों का आखादन किया जाता हैं वैसे ही 
अनुभावों का भी किया जाता है; और वह ज्ञान है, झतः 
चित्तवृत्ति रूप भी है।. - 

अब यदि यह कहे कि--भावों में जे भावत्र घर्म रहता 
है, वह अखण्ड-ठपाधि है, अवः उसके लक्षण-वत्तण की कुछ 


( २०६ ) 


आवश्यकता ही नही; से भी नहीं हे सकता; क्योंकि 'भावत्व? 
का अखण्ड भानने में कोई प्रमाण +# नही | 

ये ता हुई पूर्व-पक्ष की बाते; अब सिद्धान्त मे भाव किसे 
कहते हैं, सो सुनिए-- 

विभावादिकों के हारा ध्वनित किए जानेवाले 
हर्ष झादिके। ( जिनकी गणना आगे की जायगो ) सें से 
केाई-एक है।, ते उसे भाव?! कहा जाता है। 

जैसा कि कहा भो है-. 'व्यभिचाय जिते! भाव:-- 
अर्थात्‌ ध्वनित द्वोनेवात्वे व्यभिचारी-साव का 'भाव! कहा 
जाता है? | 

भाव किस तरह ध्वनित होते हैं ? 

भावों के ध्वनित द्वोने के विषय मे यह सिद्धात हैं कि-- 
जो हर्षादिक सामाजिकॉं--अर्थात्‌ नाटकादि देखनेवालों और 
काव्य पढ़ने सुननेवालों के अंदर ( वासना रूप से ) रहते हैं, 
उन्हीं की, स्थायी भावों की तरह, अभिव्यक्ति होती है। पर 
कुछ विद्वानों का मत है कि--वे भो रस की तरह ही अभिव्यक्त 
होते हैं । अन्य विद्वान यह भी कहते हैं कि उनकी अभिव्यक्ति, 
अन्य व्य॑ग्यों--अर्थात्‌ वस्तु अलंकारादिकों ( जिनका वर्णन 
दूसरे आनन के प्रारंभ मे है ) की तरह, होती है। 

के नागेश का सत है कि--इस छक्षण से यदि 'अज्ुभाव के अतिः 


रिक्त! इतना और निवेश कर दिया जाय, ते यह छक्षण भी ठीक 
हो सऊता है । 


( २०७ ) 
भावों के व्यंजक कोन हैं ! 

भावों के अभिव्यक्त करनेवाले केवल विभाव और झनुभाव 
ये दे दी हैं। एक व्यमिचारी के ध्वनित करने मे दूसरे 
व्यभिचारी को व्यंजक मानना आवश्यक नही; क्योंकि यदि 
ऐसा माने' ते वही ( व्यंजक ही ) प्रधान हे जायगा | कारण 
यह है कि जैसा यह व्यमिचारी भाव अमिव्यक्त देता है, वैसा 
ही वह भी अमिव्यक्त होता है उसमें अ्रभिन्‍्यंजजता अधिक 
है। श्रतः भावों के दे ही व्यंजह्ष मानना उचित दै। पर, 
वास्तव में देखा जाय, ते प्रकरणादि के अ्रधीन होने के कारण 
यदि एक भाव प्रधान हो, और उसको ध्वनित करनेवाली 
सामग्रो के द्वारा, अन्य भाव से रहित केवज्न प्रधान भाव 
ध्वनित ही न होता हो इस फारण, यदि कोई अन्य भाव 
भी अमभिव्यक्त हे जाय, और वह भाव ग्रकरण-प्राप्त भाव 
की अपेक्षा हीन होने के कारण, यदि उसका झंग बन जाय, 
ते भी कोई हानि नहीं। जैसे कि गव-आदि मे अमर्ष और 
अमर्ष-आदि मे गब। आप कहेंगे कि यदि ऐसा हुआ, ते 
उस काव्य को भावध्वनि? नहीं कह सकते, कितु वह 'शुण्यो- 
भूत व्यंग्य” हे! जायगा; क्‍योंकि उसमे एक भाव दूसरे भाव 
की अपेक्षा गाण हे! गया है। से नहीं हो सकता; क्योंकि 
जे भाव पृथक्‌ विभावों झौर अलुभावषों से अ्रभिव्यक्त हुआ हो, 
और जिसका अल्ुभाव, विभाव के रहने से अभिव्यक्त होना 
आवश्यक हो, ते! उसको गुणीभूतव्यग्य कहा जा सकता है; 


( २०८ ) 
अन्यथा गर्वादिकों की ध्वनि का लोप ही हो जायगा, क्योंकि 


वे कभी अमर्षादि से रहित ध्वनित ही नहों हाते । विभाव-शब्द 
से भो यहाँ व्यसिचारी-भाव का साधारण निमित्त कारण क्षिया 
जाता है; रस की तरह सर्वथा झालंबन और उद्दोपन दाना अपे- 
जक्षित नहीं । पर, यदि कहीं ऐसे विभाव हों कि जो भाव के 


झालम्बन और उद्दीपन दो सके ते निषेध भी नही है। 


भावों की गणना 

हर्षादिक भाव ३४ हैं। उनमे से--हर्ष, स्मृति, ब्रीडा, 
मोह, धृति, शंका, ग्लानि, देन्‍्य, चिंता, मद, श्रम, गे, निद्रा, 
मति, व्याधि, त्रास, सुप्त, विबाध, अमर्ष, अवषित्था, उम्रता, 
उन्‍्माद, मरण, वितर्क, विषाद, 'औत्सुक्य, आवेग, जड़ता, 
आल्स्य, असूया, अपस्मार, चपत्नता और प्रतिपक्षी के द्वारा 
किए गए तिरस्कार-आदि से उत्पन्न हुआ निवंद ये ३३ व्यमि- 
चारी हैं और चौतीसवों है गुरु, देवता, राजा और पुत्र-आदि 
के विषय में द्वोनेदात्षा प्रेम । 


धवात्सल्य! रस नहीं है 
पूर्वोक्त गणना से यह्ट सिद्ध होता है कि--जो कुछ विद्वानों 
का यह कथन है कि 'पुन्नादिक जिस रति के आल्वंबन होते हैं, वह 
'वात्सल्यः नामक भी एक रस है?, से परास्त कर दिया गया; 
क्योंकि भरत-मुनि के वचन के आगे उनकी उच्छु खलता-- 
मनमानी--नहीं चल खकती | उसे भाव ही मानना उचित है | 


( २०४ ) 
१--हर्ष 
'उनमें से वाज्छित पदार्थ कौ प्राप्ति आदि से 
जे एक अकार का सुख उत्पन्न हेता है, उसे हर्ष! 
कहते हैं। यही कहा भी गया है-- 
देवभर्त गुरुखामिप्रसाद;, प्रियसज्मः | 
प्रनारथाप्तिरपाप्यमनेहरधनागमः ॥ 
तथोत्पत्तिश्व॒ पुत्रादेबिगावे। यत्र जायते। 
नेत्रवक्‍त्रप्सादअ प्रियोक्तिः एलकेद्गमः || 
अभुस्वेदादयआनुभावा हर्ष तमादिशेत्‌ | 
देवता, पति, गुरु और खामी की प्रसन्नता, प्रिय समागम, 
इच्छित वस्तु की प्राप्ति, दुर्लभ भौर लोभनीय धन का ज्ञाभ तथा 
पुत्र आदि का जन्म जिसके विभाष द्वोते हैं, झोर नेत्र तथा मुख 
की प्रसन्नता, प्रिय वचन, रोमांच, आँसू और प्रस्वेद आदि जिसके 
अनुभाव होते हैं, उसके हर्ष” कहते हैं। उदाहरण लीजिए-- 
अवभे दिविसावसानकाले भवनद्वारि विलेचने दधाना | 
अवलेक्य सम्रागर्त तदा मामथ रामा विकसन्युखी वभूव ॥ 
4 हर ५ रे 
अवधि-द्विस संका-समे दिए दीठि ग्रह-द्वारि। 
भई प्रिया विकसितसुखी आये मोहिं निहारि ॥ 
नायक अपने मित्र से कहता है कि--अवधि का दिन था, 
सॉम का समय था; प्रिया ने अपनी आँखें घर के द्वार पर 
२०--१४ 


( २१० ) 
लगा रखीं थी वह टकटकी लगाकर दरवाजा देख रही 
थी, उसी समय उसने देखा कि मैं झा गया हूँ, फिर क्‍या 
था, उसका मुँह खिल उठा | 
यहाँ प्यारे का आगमन विभाव है और मुँह का खिल 
उठना अलुभाव | 
२---स्मृति 
दाथों के देखने सुनने-अआदि से जे। हृदय पर 
संस्कारे हा जाता है, उस संस्कार के द्वारा 
जे ज्ञान उत्पन्न है।ता है, उसे स्मृति! कहते हैं। 
जैसे-... 
तन्मझ्ञमन्दहसित॑ श्वसितानि तानि 
सा वे कलंऋविधुरा मधुराननश्रो; । 
अद्यापि मे हृदयमुन्मदयन्ति हन्त ! 
सायन्तनाम्बुजसहेदरलेचनायाः || 
> १९ )९ भ 
चह मंजर झूहु हसन, साँस पे सुभग सुगंधित। 
वह कलंक ते विधुर मधुर आनन-दुति विकसित ॥ 
संझ्रा-सरासिज-सरिस तासु लेचन अनियारे । 
अजों करत उन्मत्त अमित हिय हाय ! हमारे॥ 
नायक अपने मित्र से कहता है--खॉक के समय के 
कमलें के समान, अध-मेंढे, नेत्रोंचाल्षी नायिका का वह सुंदर 


(२११ ) 


मंद हास, वे श्वास, वह कल्तंकरददित और मधुर मुख की शोभा, 
हाय ! आज तक भी मेरे हृदय को उन्मत्त बना देते हैं। 

यहाँ एक प्रकार की चिंता विभाव है; मींहों का ऊँचा 
करना, शरीर का निश्चक्ष होना--जे। कि ऊपर से समझ लिए 
जा सकते हैं--अनुभाव हैं। यद्यपि यहाँ इस स्मृतिरूपी 
संचारी भाव, नायिकारूपी विभाव और 'हंतः अथवा 'हायः 
पद के द्वारा व्यंग्य हृदय की विकलता रूपी अनुभाव--इन सब 
के संयोग से “विप्रलंभ-रस? की अभिव्यक्ति होती है, इस 
कारण यहाँ 'रस-ध्वनि” कही जा सकती है, तथापि प्रथम 
स्तरति की ही स्फ़ूत्ति होती है--सबसे पहले वही हृदय में 
झाती है भर चमत्कारिणी भी है, इस कारण इसे '€्मृति (भाष) 
ध्वनि? का उदाहरण माना गया है। 

यहाँ एक शंका होती है। नेयायिकों की पदा्थे-विज्ञान- 
के अनुसार “तत्‌ (बह)! पद के अथे के विषय मे दे सत हैं। 
एक यह कि--जिस पदार्थ का 'तत्‌' पद से वर्णन किया जाता 
है, उसका तत्‌ पद के द्वारा, असाधारण रूप मे ही बोध होता है, 
पर उस्त दशा में वह पदार्थ बुद्धिस्ग! विशेषण से विशिष्ट समझता 
जाता है। अर्थात्‌ “तत्‌ हसितम्‌?” यहाँ तत्‌? पद का श्रथ है 
बुद्धिस्थ कषोकात्तर सैन्दययुक्त। यहाँ हसित का विशेषण (मेदक) 
ज्ञोकात्तर सैन्दर्य है ग्रेर उसका उपत्क्षण है बुद्धिस्थतत। ऐसे 
हसित को बेघन करने की तत्‌पद में शक्ति है अतः हसित तत्पद 
का शक्य (प्रथ) है। विशेषण शक्यतावच्छेदक (किसी शक्य 


( २१२ ) 


अथ मे वतमान शक्‍्यता को इतर शक्यताओ से प्रथक्‌ करने- 
वाला धर्म ) कहक्षाता है अतएव हसित का विशेषण लेकोत्तर 
सौन्दर्य शक्यतावच्छेदक हुआ | शक्यतावच्छेदक के बाधन 
करने की शक्ति भी पद मे माची जाती है। तत्पद से मिन्न भिन्न 
विशेषयों से विशिष्ट जगत्‌ के समस्त पदार्थ समभे जाते हैं । उन 
समस्त विशेषणों को भी व्यवस्थित करने के लिये उनका कोई 
वास्तव धर्म न होते हुए भी उनमें बुद्धिस्थत्व धरम उपलक्षणरूप से 
एक माना जाता है। इसी की एकता से तत्पद में समस्त 
पदार्थी के बोधन करने की एक शक्ति सिद्ध होती है और तत्पद 
नानाथे नहों माना जाता। यही बुद्धिस्थत्व धर्म या बुद्धि 
सकल शक्यतावच्छेदकों का अनुगमक या व्यवस्थापक कहा 
जाता है। यद्द अनुगमक किसी पद का शक्‍्य अथे नहीं माना 
जाता। यही इस मत का रहस्य है। दूसरा मत यह है कि-- 
उस्र पदार्थ का असाधारण रूप मे बाघ नही होता, कितु बुद्धिस्थ 
पदार्थ के रूप मे ही द्वोता है। अब सेचिए कि बुद्धि और ज्ञान 
दाने एक ही पदाथे के नाम हैं, और स्पृति भी एक प्रकार का 
ज्ञान ही है; अतः दोनों द्वी मते। मे “तत्‌” शब्द से स्वृति का कुछ 
संबंध अवश्य हो जाता है। इस कारण--अथांत्‌ यहाँ तत्‌? 
शब्द का प्रयाग होने के कारण--यह काव्य स्थति-भाव! को 
ध्वनि न हो सकेगा; क्योंकि ध्वनि? कहलाने की योग्यता 
तभी दे! सकती है, जब कि व्यंग्य का वाच्य से कुछ संपर्क न 
हा।। इसका समाधान यह है कि--पहल्ले मत के अनुसार 


( २१३ ) 


तत्‌ः पद का वाच्य असाधारण रूपवाल्ा ( खास ) पदार्थ 
ही है, बुद्धि तो शक्यताबच्छेदक का अनुगमन करानेवात्ती 
है, अतः वाच्यता बुद्धि का रपशें नद्दी कर सकती अर्थात्‌ 
बुद्धि वाच्य ( शक्य ) नहां हे! सकती। दूसरे मत मे भी 
धुद्धिस्थ! पदार्थ तत्पद का वाच्य है, अतः बुद्धि-साधारण ज्ञान 
के ततूपद से प्रतिपादित द्वो जाने पर भो स्वृति के रूप में ते 
उसका बोघ व्यंजना के द्वारा ही होता है। से। इस शंका 

को भी अवकाश नहीं | | 
यद्यपि यहाँ स्ट्ृति पूरे वाक्य से ध्वनित होती है, तथापि 
'तत्‌” यह एक पद ही उसका स्वरूप खड़ा करता है, इस कारण 
यहाँ यह भाव पद के ही द्वारा ध्वनित होता है--यह समझना 
चाहिए | इससे, लोगों का जे यह कथन है कि--भाव यदि 
'पद? के द्वारा अभिव्यक्त दा, ते उनमे कुछ विचित्नता नहीं 

रहती, से! उड़ जाता है । 
यहाँ आँखें को जे! सॉक् के कमलों की उपमा दी गई है, 
उससे यह ध्वनित होता है कि आँखे आगे-से-आगे अधिक मिचती 
जा रही हैं, जिससे नायिका की आनंद-मग्नता प्रकट होती दे | 
दरानमत्कन्धरवन्धमोष जिमी लित ख्तिग्धविलाचनाब्जम्‌ । 

अनद्पनिःश्वासभरालसाहुं स्परामि सं चिरमज्नायाः ॥ 
भर / ३८ १८ हे 

कहु नत ओऔवा, अ्रधमिंचे नेही नैन, सु-अग। 

अति सासन ते शियिल जहँ से! सुमिरों तिय-संग ॥ 


( २१४ ) 


नायक अपने मित्र से कहता है कि---मैं, देरी तक, अगना 
के उस संग का स्मरण करता रहता हूँ, जिसमें गरदन 
कुछ कुकती रहती है, प्रेम-पूर्ण नेत्र-कमल कुछ कुछ मिच 
जाते हैं ग्रौर सब अंग, अत्यंत श्वास के कारण, आ्तस्य- 
युक्त दो जाते हैं । 

यहाँ जो स्पति है, वह भाव? नहीं कद्दी जा सकती; 
क्योंकि वह स्मृतिवाची शब्द ( 'स्मरामि! अथवा सुमिरों? ) 
के द्वारा वणेन की गई है, अत: व्यंग्य नहीं हो सकती | न 
स्मरणालंकार! ही है; क्‍योंकि यह स्मरण किसी प्रकार की 
समानता के कारण उत्पन्न नही हुआ है । और, यह सिद्धांत 
है कि--समानता के कारण जो स्मरण दोता है, उसे स्मरणा- 
लंकार! और स्मरण यदि व्यंग्य दो, ते। 'स्तृति भाव! माना 
जाता है। से यह मानना चाहिए कि इस पद्च मे केवल 
विभाव ( नायिका ) का द्वी वर्णन है, परंतु चमत्कार-जनक 
होने के कारण, उसका किसी तरह रस में परयेवसान हो 
जाता है । 

३--अीडा ( छ्ज्जा ) 

स्ल्रियों में पुरुष के सुख देखने आदि से और पुरुषों 
में प्रतिन्ञाभंग तथा पराजय आदि से उत्पन्न हेने- 
वाली और विवणता तथा नीचा-मख शादि अनु 
भावें के उत्पन्न करनेवाली जे! एक प्रकार की 
चित्तवृत्ति है, उसे ब्रीडा! कहते हैं। जैसे-- 


( २१४ ) 


कुच-कलशयुगान्तर्मामकीन नखाहूं 
सपुलकतलनु मन्दं मन्दमालेकमाना। 

विनिहितवदन मां वीक्ष्य वाला गवाक्षे _ 
चकितनतनताज्ली सभ सद्यो विदेश || 


५ हि ९ हर 


कुच-कलशन जुग बीच भये जो भेरो नख-छुत | 
पुलक-सहित तन, मंद मंद तेहि' रही विज्ञेकत ॥ 
ताहि समय मुहि' देखि गोख मे दीन्हे आनन। 
चकित,नमाइ सरीर , सदन महू प्रविशी तत-छन ॥ 
नायक अपने मित्र से कहता है कि--कलशों के समान 
देनें कुर्चों के मध्य मे जे! मेरे नल का ज्षत हो गया था--- 
नख उभड़ू आया था--उसे वह (नायिका ) पुल्नकितांगी 
दोकर धीरे-धीरे देख रही थी; पर, ज्योंही, उसने भरोखे 
में मुख डाले हुए मुझे देखा, त्योंही चकित हे! गई पर 
शरीर बिल्कुल संकृचित करके सिमिटकर तत्काल घर 
मे जा घुसी । | 
यहाँ नायिका को प्रियतम का दिखाई देना, और 
उसके कुचों के भीतर प्रियतम के नख-क्षत के देखने से उत्पन्न 
हुए हर्ष की सूचना देनेवाक्षे रोमांच आदि का प्रियतम को 
दीख जाना विभाव है तथा तत्काल घर मे घुस जाना अनुभाव 
है। भप्रथवा, जैसे-- 


(२१६ ) 


निरुद्धथ यान्तीं तरसा कपो्ती कूजत्कपे।तस्थ पुरो ददाने | 
मयि स्मितादें वदनारविन्दं सा मन्दमन्द नमयाम्बभूव ॥ 
4 ९ ५ ५ 
घरत मोहि', कूजत कपोत-ढिंग, रोकि कपोतिहि । 
देखि, कछुक सुसक्‍याइ, मुखाम्ब॒ुज नाइ लिये! तिहि ॥ 

नायक अपने मित्र से कहता है कि--मैने जाती हुई कवू- 

तरी का, जबरन्‌, रोका और ( कामातुरता के कारण ) कूजते 

हुए कबूतर के सामने घर दिया; यद्द देखकर उस (नायिका) ने, 

मन्द हास से भीने, मुख-कमल को धीरे धीरे नीचा कर लिया। 

पहले उदाहरण मे जैसे कुछ त्रास की अभिव्यक्ति होती है, 

उसी प्रकार यहाँ भी किचिन्मात्र हर्ष अभिव्यक्त होता है; पर 

वह ल्ज्जा के अनुकूल ही है--उससे उसकी पुष्टि ही होती है। 

प्यारे का कबूतर के आगे कबूतरी धरना विभाव है और मुँह 
नीचा करना अनुभाव | 

४--मोह 

भय-वियेग आदि से जे! एक रेसो चित्तवृत्ति 

उत्पन्न होती है कि जिसके कारण वस्तु की 

यथार्थता के पहचानना असंभव है। जाता है-- 

नुष्य श्ादि के सामने खड़े रहने पर भी वह 

असुक है--वह नहीं पहचाना जा सकता--उसका 

नाम 'माह' है, जो कि अनन्‍्तःकरणशून्यता के नाम 


(२१७ ) 


से युकारी जानेवालो चिन्ता है। अर्थात्‌ जिस 
चिन्ता में कुछ नहों सूकता, उसे मे।ह कहा जाता 
है। प्रतएव नवीन 'विद्वानो का मत है कि यह भी चिन्ता 
ही है, केबल अवस्था का भेद है। अर्थात्‌ चिन्ता ही जब 
इस दशा को पहुँच जाती है कि सूफना-साभना वन्द हे जाय, 
वो उसे मोह कहते हैं; इस कारण इसे चिन्ता से प्रथक नहीं 


गिनना चाहिए | उदाहरण लीजिए--- 


विरहेश विकलह॒दया विल्पन्ती दयित दयितेति | 
आगतमपि त॑ सविधे परिचयहीनेव वीक्षते वाला ॥ 
भर | )< ५ 
विरह-सहानक विकरक हिय पिय-पिय कहि बिछ॒छात। 
निकटहु आए अपरिचित-लाँं तेहि दयित दिखात ॥ 
एक सखी दूसरी सखी से कहती है कि---उस (नायिका) 
का हृदय विरह्र के मारे विकल हो गया है और प्यारे प्यारे! 
पुकारती हुईं वह, पास मे आए हुए भी प्रिय को, इस तरह 
देख रही दे कि मानो उसे जानती ही न हो । 
यहाँ पति का वियोग विभाव है तथा इन्द्रियों 
की विकलता और लजादिक का अभाव अनुभाव हैं। 
अथवा, जैसे-- 
श॒ण्डादण्डं कुण्डलीडुत्य कूले 
कल्लोलिन्याः किखिदाकुशिताक्षः । 


( ११८ ) 
नैवा5ल्कर्षलम्बु नेवाउम्बुजालि 
कान्तापेतः कृत्यशून्यों गजेन्द्र! ॥ 
भर भर भर | 
किए सूंड कु डछ-सरिस ऊँघत तटिनी-तीर। 

कामिनि त्रिव जड़ गज गहत ना नीरज ना नीर ॥ 
एक दशक कहता है कि--हथिनी से वियुक्त हाथी 
निश्चेष्ट होकर, सूँड़ को गोल किए हुए और आँखें को 
सिकोड़े हुए नदी के तट पर ते खड़ा है; पर न जल्ल को खींचता 

है न कमलों की पंक्ति को । 


“+शृति 
जिस चित्तवृत्ति के कारण लोभ, शेकक ओ 
भय आदि से उत्पन्न होनेवालें उपद्रव शान्त 
हैे। जाते हैं, उसका नाम 'धूति' है। उदाहरण 
लीजिए--- 
सन्तापयामि हृदर्य धाव॑ धावं धरातले कफिमहस्‌ । 
अस्ति मम शिरसि सतत नन्दकुमारः प्रश्ठ परमः ॥ 
+९ नै ३ ९ 
घाइ-घाइ है। घरनि-तलछ हिय तपात केहिं काज । 
राजत सम सिर सरबदा घस्ुवर श्रीव्रजराज ॥ 
एक भक्त कद्दता है कि---मैं प्रथिवीतल में देड़ देड़कर 
क्यों अपने हृदय को संतप्त कर रहा हूँ । मेरे सिर पर परम 


( २१८ ) 
प्रभु, सब स्वामियों के स्वामी, नन्‍्दनन्दन स्वदा विराजमान 
हैं-.मुके क्या चिन्ता है, वे अपने-आप संभाल लेगे। 
यहाँ विवेक और शाख्न-संपत्ति आदि विभाव हैं और 
चपत्नता आदि की निवृत्ति अनुभाव है। यदि आप कहें कि 
थहाँ उत्तराधे से ते यही बाव व्यक्त होती है कि 'मुक्के चिन्ता 
नही है?, फिर इस पद्म को घृति-भाव की ध्वनि कैसे बताते दो, 
ते इसका उत्तर यह है कि पूर्वोक्त बात धृति-भाव के लिये 
उपयुक्त होकर दी अ्रमिव्यक्त द्वोती है, अधथेत्‌ उससे धृति की 
प्रतीति में सहायता मित़्ती है अतः उसका प्रत्ञग अडंगा 
नहीं समका जा सकता | 
६--श्ढा 
मेरा क्या अनिष्ठ हेगा' यह जो एक प्रकार 
की चिक्त-बुत्ति है, उसका नाम “श्र! है। उदाहरण 
ल्ीजिए.-... 
विधिवश्वितया मया न यातसम्‌ 
सखि ! सड्ढत-निकेतनं प्रियस्य। 
अधुना बत | कि विधातुकामो 
पयि कामे हृपतिः छुनने जाने ॥ 

भर भ दे है 

विधि-वच्चित है। ना गई सखि ! संकेत-निकेत । 

अब जानें सम मद्न-नुप कहा करे इहि-देत ॥ 


( १२० ) 
नायिका सखी से कही है कि--हे सखी ! विधाता ने 
मुझे धोखा दिया और मैं अपने प्यारे के संकेत-स्थान पर न 
जा सकी | पश्रब भय है कि, न जाने, महाराज कामदेव, मेरे 
विषय मे, क्‍या करना चाहते हैं। 
यहाँ राजा का अपराध विभाव है और, ऊपर से समझ 
लिए गए, मुँह का फीका पड़ना आदि अलनुभाव हैं। इसमें 
और चिन्ता मे यही भेद है कि यह भय आदि उत्पन्न करती 
है, अतः कंप-आदि का कारण है, परन्तु चिन्ता उन्हें उत्पन्न 
नहीं करती | 
७--क्षानि 
मानसिक कष्ठ और रोग झादि के कारण जो 
निर्बलता उत्पन्न हे। जातो है, उससे उत्पन्न हेने- 
वाला रुवं विवणता, अंगों की शियिलता और 
नेचों के फिरने लगने श्ादि अनुभावों के। उत्पन्न 
करनेवाला जो रुक अकार का दुःख है, उसे 
“लानि! कहते हैं। जैसे-- 
शयिता शैवलशयने सुषमाशेषा नवेन्दुलेखेव । 
प्रियमागतमपि सविधे सत्कुरुते मधुरवीक्षणरेव ॥ 
८ ह ८ ५ 2९ +५ 
कान्ति-शेष शशि-रेख सम सोई सेवक सेज । 
मधुर चिताौननि ही सविध थित पिय रही सह्देज ॥ 


(२१११ ) 

एक सखी दूसरी सखी से कहती है कि--जिसमे केबल 
कान्ति ही बच रही हो ऐसी नवीन चन्द्र-कला के समान, 
सेवाल् की सेज पर सोई हुई, वह सुन्दरी समीप मे 
आए हुए भी पति का केबल मधुर चितवनों से ही सत्कार 
कर रही है । 

यहाँ प्रेमी का विरह विभाव है और 'मधुर चितवनों से 
ही? यहाँ ही? के द्वारा समकाई हुई, खागत के लिये सामने 
जाने, प्रणाम करने और आलिगन करने आदि की निवृत्ति 
अनुभाव है। यहाँ श्रम-भाव की शका करना उचित नहीं; 
क्योंकि यहाँ किसी भी श्रमेत्पादक कारण का वर्णन नही है।, 

कुछ विद्वाब “रोगादि से उत्पन्न होनेवाले बल्ल के नाश को 
ही “लानि! ?? कहते हैं। पर, उनके मत मे यद्द बात विचा- 
रने योग्य है कि--जितने भाव हैं, वे सब चित्त-इृत्तिरुप हैं, 
फिर उनमे नाश ( अभाव ) रूप ग्लानि का समावेश कैसे 
होगा ? अतः उनका यह कथन झुछ जेंचता नही। यद्यपि 
प्राचीन आचायोँ के “बलस्थाइपचये। ग्लानिराधिव्या- 
घिससझुदुभवः--अर्थात्‌ मानसिक कष्ट और रोगो से उत्पन्न 
होनेवाद्षे बल के अपचय का नाम ्लानि? है?” इस लक्षण में 
अपचय” शब्द से नाश का ही बाघ होता है, तथापि पूर्वोक्त 
अनुपपत्ति के कारण, बल के नाश से उत्पन्न होनेवाले दुःख को 
ही बल का अपचय! इस शब्द से कहना अभीष्ट है, यह 
, समभना चाहिए | 


( २२२ ) 
८--दैन्य 
दुःख, दरिद्रता तथा अपराध आदि से उत्पन्न 
हुई झार अपने-आप के विषय सें हौन-शब्द बोलने 
कादि अनुभावों के उत्पन्न करनेवाली एक प्रकार 
की चित्तवृत्ति 'दैन्स! कहलातो है। उदाहरण क्ीजिए- 
हतकेन मया वनान्तरे जलजाक्षी सहसा विवासिता | 
अधुना मम कुत्र सा सती पतितस्येव परा सरखती ॥ 
८ २९ मर न्‍( 
सहसा, मैं हत, दीन्ह व कसलू-नयनि निकराय । 
पतितद्दि' श्रुति-सम वह सती मोहि' कहाँ अब हाथ ! 
मेरी बुद्धि मारी गई, मैंने कमल-नयनी ( सीता ) को जंगन्न 
में निकाज्न दिया। झब, वह पतित्रता, पतित पुरुष को बेढ-बाणी 
की तरह, मुझे कहाँ प्राप्त हो सकती है ? यह सीता के 
परिद्याग के अनंतर भगवान रामचंद्र का वचन है । 
यहाँ सीता का परित्याग अथवा परित्याग करने से उत्पन्न 
हुआ दुःख विभाव है श्रौर 'पतित के समान बताना? रूपी जो 
अपने विषय मे हीनता का भाषण है, से भ्रठुभाव है। दैन्य- 
भाव के विषय मे लिखा है कि--- 
वित्तौसुक्यान्मनस्वापादौगत्याध विभावतः। 
अनुभावात्त शिरसेः्प्याहततेगांत्रगारवात्‌ ॥ 
देहेपस्करणल्यागाद्‌ दैन्‍्यं भाव॑ विभावयेत्‌ ॥ 


( १२३ ) 


अर्थात्‌ चित्त की उत्सुकता, मन का ताप और दरिद्वता इन 
विभावों से और सिर हिलाना, शरीर का भारीपन और देह के 
सजाने का त्याग इन अनुभावों से देन्य-भावः को पहिचान 
लेता चाहिए। और यह कि-- 

देगत्यादेरनाजस्य॑ देन्य' मलिनतादिद्धत्‌ । 

अर्थात्‌ दरिद्रता आदि फे कारण जो ओलखिता का प्रभाव 
दो जाता है, उसे 'दैन्‍्य” कहते हैं। वह मल्तिनता ब्रादि को 
उत्पन्न करता है | 

यहाँ मैंने उसे निकाल दिया है---न कि विधाता ने!-..इस 
बात की पुष्टि 'पतितः की उपमा से ही होती है, शूद्रादिक की 
उपभा से,नहीं; क्योंकि शूद्रादिक के लिये ते बिधाता ने, 
खभावत: ही, श्रुति दुलंभ कर दो है, उनको उसके पढ़ने 
का अ्रधिकार ही नहीं प्राप्त है। पर, त्राक्मणादिक जो पतित हो 
जाते हैं, उनका खभावतः ते श्रुति सुज्षम थी, किंतु उन्होंने 
वैसा पाप करके, अपने-आप, श्रुति को दूर कर दिया है। 
इस कारण, अपनी ( श्रीराम की ) पतित से समानता और श्री 
सीता की श्रुति से समानता, यह जो उपमालंकार है, वह 
दैन्य-भाव को झलंकृत करता है। सो वह भी दैन्य-भाव 
का पोषक है । 

यहाँ 'मैंने! और “उसे? इन दोनें पदें मे उपादानलक्षणा 
है, जिसके कारण 'मैंने! का जिसे उसने अत्यन्त क्लेश मे भी 
न छोड़ा, उस मैंने? यह, और “उसे? का “वन-बास की सह- 


बे 


( २२४ ) 


चरी उसे? यह अधथ प्रतीत होता है, जिससे अपनी ऋतप्नता 
और उसकी कऋतज्ञता एवं अपनी निर्देयवा और उसकी दया- 
छुता आदि अनेक घमम ध्वनित होते हैं, जिनसे दैन्य-भाव और 
भी पुष्ट हो जाता है। इसी तरह “उसे? शब्द के द्वारा जो स्मृति 
की थोड़ो-सी प्रतीति होती है, उस्लसे भी दैन्य-भाव की पुष्टि 
होती है। अतः यहाँ दैन्य भाव ही प्रधान व्यंग्य रहा | ऋृतन्नता 
आदि व्यंग्य गुणोभूत रहे । इसलिये यहाँ दैन्य-ध्वनि हुई । 
-“चिन्ता 
बांछित वस्त के प्राप्त न होने ओर अनिष्ठट वस्त 

के प्राप्त हे जाने से उत्पन्त हेनिवालो और विव- 
णंता, ध्रूमि का लिखना ओर सुख का नौचा हे 
जाना आदि अनुभावों के। उत्पन्त करनेवाली एक 
प्रकार की चित्तवृत्ति का नाम चिन्ता? है। जैसा 
कि कहा है--- 

विभावा यत्र दारिदयमैश्वयश्र शन॑ तथा | 

इष्टार्थापहति;, शश्वच्छवासेच्छवासावधेसुखम्‌ ॥ 

सन्‍्ताप), स्मरण' चेव काश्य  देहानुपस्‍्कृतिः । 

आध्ृतिश्ाष्तुभावा स्युः सा चिन्ता परिकीत्तिता |। 

वितकेस्याः क्षणे पूर्वे पाश्चात्ये वेषजायते ॥ 

अर्थात्‌ जिसमे दरिद्रता, ऐश्वय ( राज्यादिक ) से च्युत हो 
जाना और वांछित वस्तु का अपहरण विभाव हों, कर निरं- 


( २२५ ) 
तर श्वास्त तथा उच्छास, नीचा भुख, संताप, स्मरण, दुबलता, 
देह को न सजाना और घैये का अभाव ये अनुभाव हों, उसे 
(चिन्ता? कहा जाता है। , इसके पहले अथवा पिछले क्षण में 
वितर्क ( जिसका लक्षण आगे आवेगा ) उत्पन्न “हुआ करता 
है। और यह कि--- 
ध्यानं चिन्ता हितानाप्ते! सन्‍्तापादिकरी मता । 

अर्थात्‌ लाभदायी वस्तु के प्राप्त न होने से जे विचार होता 
है, उसे चिन्ता? कहते हैं, और वह सनन्‍्ताप आदि को उत्पन्न 
करती है। उदाहरण लीजिए-- 


अपरधुतिरस्तपह्चवा, मुखशेभा शशिक्रान्तिलट्विनी। 
अकृंत्रतिमा तनु! कृता विधिना कर्य कृते मगीदशः॥ 
| ५८ ५९ हे 
पछव-जयिनी अरधर-द्युति मुख-छुवि ससि-सिरताज। 
अनुपम तन म्रग-नयनि के किय विधना केहिं काज ॥ 
नायक मन में कद्द रहा है कि--विधाता ने मृगनयनी के, 
ये पन्नवों की शोभा को पराजित करनेवाली पअघरों की कान्ति, 
चन्द्रमा की छवि को उर्लंघन करनेवाली मुख की शोसा तथा 
जिसके सहदृश कोई नही उत्पन्न किया गया वह शरीर, किसके 
लिये बनाए हैं। 
यहाँ नायिका का न प्राप्त होना विभाव है और, ऊपर से 
समझ लिए गए, पश्चात्तापादिक अनुभाव हैं | “यहाँ यह 
२०--१५ 


( १२६ ) 
पद्य उत्सुकता की ध्वनि है! यद्द शट्दा। नहों करनी चाहिए ; 
क्योंकि ( पद्म के ) किसके लिये? इस कथन से किसी झनि- 
श्चित व्यक्ति के विषय मे दोनेवाली चिन्ता ही ध्वनित होती है; 
इस कारण, यद्यपि यहाँ उत्सुकता विद्यमान है, तथापि वह इस 
वाक्य के द्वारा प्रधानतया नहीं बोधित होती । 
१०--भद 
भद्य-जादि के उपयाग से उत्पन्न हानिवाली 
जैौर शयन-रेादन आदि अनुभावें के। उत्पन्न क ने- 
वाली उल्लास-नामक जो एक प्रकार की चित्तवृत्ति 
है, उसे 'मद” कहते हैं । जैसा कि कह्दा गया है-- 
संमेहानन्दसंभेदे। मंदे! मयोपयेगजः । 
अर्थात्‌ संमाह और आनन्द के मिश्रण का नाम मद है 
और वह मद्य के उपयोग से उत्पन्न होता है । 
मद के उत्पन्न दोने पर उत्तम पुरुष सोता है, मध्यम पुरुष 
इईँसता और गाता है मर नीच पुरुष रोता तथा गाली वगैरह 
देता है॥। यह मद तीन प्रकार का है--तरुण, मध्यम और 








* यद्यपि यह कथन 'काव्य-प्रदीप! के--- 
उत्तमसर्वः प्रहसति, गायति तद्बच्च मध्यमग्रकृतिः | 
परुषवचनाभिधायी शेते रोद्त्यधससत्त्वः ॥ 
अर्थात्‌ मद के कारण उत्तम प्रकृति का पुरुष हँसता है, मध्यम प्रकृति 
का पुरुष गाता है और अधम प्रकृति का पुरुष गाकियाँ देता है, सोता है 
और रोता है ।--इस वचन से विरुद्ध है। तथापि अनुभव रसर्गगाघर- 


( २२७ ) 
झधघम । उनमे से जिसमे अक्तरों की अस्पष्टता, वाक्यों की 
असंबद्धता और पत्यन्त मृदु तथा फिसलती हुई चाल का 
अभिनय किया जाता है, वह तरुण-सद कहलाता है। जिसमे 
हाथें के फटकारे, फिसल पड़ने और घूमने झ्रादि का झमि- 
नय किया जाता है, वह मध्यम-मद होता है और जिसमे गति 
रुक जाने, स्मृति नष्ट हो जाने और हिचकी तथा वमन होने 
श्रादि का भ्रमितय किया जाता है, वह अधम-मद होता है | 
उदाहरण लीजिए--- पर 
मधुर-तरं स्मयमानः स्वस्मिन्‍नेवाज्लपन्‌ किमपि । 
केकनदय॑द्रिलेकीमालम्पनशून्यमीक्षते क्षीबः ॥ 
> ् १६ > 
मघुर-मधघुर कछु-ऊछु हँसत करत मनद्वि-सन बात। 
निरालंब देखत अरुन-वरन जगत मद-मात ॥ 
अत्यन्त मधुर रूप में थेड़ा-थेड़ा हँसता हुआ झैर अपने- 
आप ही कुछ भी बोलता हुश्रा एवं न्िल्लोकी को--आँखों की 
ललाई के फारण--रक्त-कमल-सी बनाता हुआ मद-मत्त 
मनुष्य देख रहा है; पर उसे पता नहीं कि वह क्‍या 
देखना चाहता है । 
कार! के ही मत को धुष्ट करता है; क्योंकि नशे में हँसना उत्तम-पुरुष 


का काम नहीं । उसे यदि नशे का अधिक चक्कर हुआ ते वह प्षो जायगा, 
इल्यादि सहृव॒यों के प्रह्मत्त से सिद्ध है ।--अज्ुवादक । - 


( १२८ ) 


यहाँ मादक वस्तु का सेवन विभाव है और अस्पष्ट बेलना- 
श्रादि अनुभाव हैं। इस पद्च में जे मत्त पुरुष के स्वभाव का 
वर्णन किया गया है, वह उसके मद को ध्वनित करने के लिये 
किया गया है, इस कारण मद-भाव ही प्रधान है, स्वभा- 
वोाक्तिः अल्नड्टार नही, किन्तु बह उसकी ध्वनि का शोमित 
करनेवाक्ञा ही है | 
पर, यदि कहो कि 'क्षीब? शब्द का अथे भत्तः है, अतः 
उसमे विशेषण रूप से मद भी आ जाता है; और यह 
सिद्धांत है कि 'जिसमे किसी प्रकार भी वाच्य-वृत्ति का रपशे 
न हो, वही व्यंग्य चमत्कारी होता है?; ते हम स्वीकार करते 
हैं, कि यहाँ 'स्वभावोक्ति” अलंकार को ही प्रधान मानना 
उचित है, मद-भाव की ध्वनि को नहीं; अतः दूसरा 
उदाहरण ल्लीजिए-- 
मधुरसाम्मधुरं हिं तवाज्य तरुणि | -मह॒दने विनिवेशय । 
मम गृहाण करेण कराम्बुजं प-प-पतामि हृहय ! म-म-भूतले ॥ 
प है र् हर 
मधुर मधुहुते तुव अघर मो-मुख दे छडें चूमि। 
सस कर-अम्बुज कर पकरु प-प-प-परयो भ-म-भूमि ॥ 
नायक नायिका से कहता है--हे तरुणि ! मधु फे रस से भी 
मधुर अपने अधर को मेरे मुंह मे डाल दे और मेरे कर-कमल 
को अपने हाथ में पकड़ ले; देख ते, ज-ज-जमीन पर प-प- 
पड़ा जा रहा हैँ । - 


( २२ ) 


यहाँ भी वही (मादक वस्तु का सेवन ही) विभाव है भर 
अधिक वर्ण बेलना-आदि अनुभाव हैं | पूर्वांध का प्राम्य-नचन 
और उत्तराध मे ल्री के हाथ को कमत्॒ की उपसा देने की जगह 
अपने हाथ को उसकी उपमा देना भी “मद-ध्वनिः का ही 
पोषण करते हैं । 
११--अम 
झत्यन्त' शारीरिक काय करने से उत्पन्न होने 
वाला राव निःश्वास, झंगडाई तथा निद्रा झ्ादि 
के उत्पन्न करनेवाला जे! रक प्रकार का खेद 
होता है, उसे अम! कहते हैं। जैसा कि कहा 
गया है-- 
अध्वव्यायामसेवाधेर्विभावैरनु भावकै! । 
गात्र -संवाहनेरास्य-सड्ोचेरड-मेटनेः ॥| 
निःश्वासेज म्मितमंन्दे! पादेस्‍्क्षेपैः अ्रमे मतः ॥ 
अर्थात्‌ मार्ग में चलना, व्यायाम करना और सेवा आदि 
विभाषों से और शरीर दबवाना, मुँह सिक्ुड़ जाना, अँगड़ाइयॉं 
नि:श्वास, उबासिया और धीरे-धीरे पैर पछाड़ना--इन प्रनु- 
भावों से श्रम समझा जाता है। अथवा यह कि- 


श्रमः खेदा<्ध्वगत्यादेनिद्राश्वासादिकृन्पतः 
अथांत्‌ मार्ग में चल्तने-आदि से जे खेद होता है, उसे “अमर! 
कहते हैं और वह निद्रा, निःश्वास आदि उत्पन्न करता है। 


( २३० ) 
यह बल्ल के विद्यमान होने पर भी उत्पन्न हो जाता है और 
शारीरिक कायोँ से ही होता है; किन्तु ग्लानि इस तरह नहीं 
होती, अत: ग्लानि का श्रम से भेद है। उदाहरण लीजिए--- 


विधाय सा मद॒दनानुकूलं कपे।लमूल हृदये शयाना | 
चिराय चित्रे लिखितेव तन्वी न स्पन्दितु' मन्दमपि श्षमासीत्‌ 


५९ है २९ भर 
हिय साई, करि ओआव मम सुँह-समुहे, बल-छीन । 
चित्र-लिखित-सी सुचिर कै रंचहु विचछ सकी न ॥ 

नायक अपने किसी मित्र के खामने विपरीत-सुरत के 
ग्रनन्तर की स्थिति का वर्शत कर रहा है। वच्द कहता है 
कि--बह कृशाज्ञो अपनी गरदन के अगजल्ले हिस्से को मेरे मुंह 
के सामने करके मेरे हृदय पर से। रही, और, चित्र मे लिखी 
हुई की तरह, बहुत देर तक, थेड़ी भी न ह्विल् सकी । 

यहाँ विपरीत-सुरतरूपी शारीरिक कार्य विभाव है और 
बिना हिले सोए रहना-आदि अनुभाव ! 

यहाँ यह शंका न करनी चाहिए कि यह पद्मनिद्रा-भाव 
को ध्वनित करके गताथे हो जावा है; क्योंकि यदि निद्रा होती, 
ते उसमे मनुष्य को ज्ञान नहीं रहता, इस कारण चेष्टा का 
अभाव होता; और थिड़ा भी न हिल सकी? इस कथन का 

. कोई भी विशेष प्रयोजन नही रहता | दूसरे, 'शयाना? अथवा 

चोई? इस कथन से निद्रा वाच्य हो जाती है, सो वह व्यंग्य 


( २३१ ) 


हा भी नहीं सकती। रहा श्रम, से उसके लिये ते इनका 
( विभावादिकों का ) भ्रनुकूक्ष द्वोना उचित है | 
१२--गे 
रूप, धन और विद्या झ्रादि के कारण अपने 
उत्कष का ज्ञान होने से जो दूसरे की अवज्ञा 
करना है, उसे गव! कहते हैं। उदाहरण लीजिए-- 
आमृूलाद्रत्सानोमेलयवलयितादा च कूलात्पयोपे 
यावन्‍्तः सन्ति काव्यप्रणयनपठवस्ते विश बदन्तु । 
प्रद्दीकामध्यनियन्मसण रसमरीपाधुरीभाग्यभाजां 
वाचामाचारयताया; पदमन भवितु' के।उस्ति घन्यो मदन्य॥॥ 
भर >< > २९ 
मेस्मूल ते सहय-बढूय-सय जरूधि तीर तक | 
जेते कविता-कर्म-निपुण, ते कहे छाँड़ि सक ॥-- 
निकरत द्वाक्षामध्य भाग जे! चिकनी रस-मर | 
तिनको अति-माधुये भाग्य मे जिनके निरभर ॥ 
तिन बानिन के सकछ-जग-वंद्ित जो आचाय-पद। 
तेहि' कहु मोते अन्य के धन्य भोगिहे रूहि प्रमद्‌ ॥ 
एक कविजी (पण्डितराज ) कहते हैं कि--सुमेरु पर्वत की 
तरहटी से लेकर मल्याचल से घिरे हुए समुद्र के तर तक, जितने 
कविता करने मे चतुर पुरुष हैं, वे साफ़ साफ कहें कि--दाखों 
के अन्दर से निकलनेवाली चिकनी ससघारा की मधुरता का भाग्य 


( २३२ ) 


जिन्हें प्राप्त है--अर्थात्‌ जे उनके समान मधुर हैं, उन वाणियों 
के आचार्य-पद का अनुभव करने के लिये मेरे अतिरिक्त और 
कैान पुरुष धन्य है, यह सौभाग्य और किसे प्राप्त हे सकता 
है ? उसका अधिकारी ते एक मैं ही हूँ । 

यहाँ अपनी कविताओ्रों को अन्य कविताओं के समान न 
समभना--सबसे उत्कृष्ट समकना--विभाव है, प्लौर अन्य 
कवियों का तिरस्कार करने के अभिप्राय से इस तरद्द के वाक्य 
का प्रयोग करना अनुभाव है। इस ( गवे ) को किसी अश 
में असूया भी पुष्ट करती है । 

वीर-रस की ध्वनि मे उत्साह प्रधान होता है और गवं गुप्त 
रहता है; और इस ध्वनि मे गये प्रधान रहता है। यही 
उससे इसमें विशेषता है। जैसे--वीर-रस के प्रसंग में जो 
“यदि वक्ति गिरां पति: खयम्‌...?, यह उदाहरण दिया गया है, 
उसमे बृहरपति और सरखती के साथ भी मैं वाद करूँगा! 
इस कथन से जो उत्साह ध्वनित दाता है, उसको 'सब पण्डितों 
से मैं अधिक हूँ? इस रूप में ध्वनित द्वोनेवाल्षा गये पुष्ट करवा 
है; न कि उपयुक्त पद्य की तरह 'प्रथिवी पर मेरे अतिरिक्त 
अन्‍य कोई नहों है? इस प्रकार स्पष्ट वर्ेन किए हुए चिढ़ा देने- 
वाल्ले बचनरूपी अछुभाव से प्रघानतया प्रतीत द्वोता है । 

१३--निद्रा 

अम-आदि के कारण जो चित्त का सुंद जाना 

है, उसे “निद्रा! कहते हैं। नेत्रों का मिच जाना, अंगों 


( २३३ ) 


का निश्चेष्ट हे जाना-आदि इसके अनुभाव हैं। उदाहरण 
लीजिए--- 
सा मदागमनबृ हिततेषा जागरेण गमिताखिलदेषा । 
बेधिताअपि बुबुधे मधुपैन प्रातराननजसारभलन्धेः ॥ 
> ५ ३९ भ९ 
मम आवन ते मुद्िति वह जाग्रि गमाई रात | 
मसुख-सैरभ-ले।मी मधुप बेधेहु जगी न श्रात ॥ 
नायक अपने मित्र से कहता है कि--मेरे आ जाने से 
उसकी प्रसन्नता मे बाढ़ आ गई और उसने सब रात जागरण 
करके बिताई। प्रातःकाल के समय मुख की सुगन्ध के लोभी 
मैंरों के जगाने पर भी बह न जग सकी ! 
यहाँ रात्रि मे जगने का श्रम विभाव है और जौंरों के 
जगाने पर भी न जगना अलनुभाव है । 
१४--मति 
शांस्थादि के विचार से जो किसी बात का 
निणय कर लिया जाता है, उसे 'मति? कहते हैं। 
इसमे निरभेय देकर उस काम को करना और संदेह नष्ट दो 
जाना-झादि अलुभाव होते हैं। उदाहरण लीजिए-- 
निखिल जगदेव नहवरं पुनरस्मिन्नितरां कलेव्रम | 
अथ तस्य कृते कियानयं क्रियते हनत | मया परिश्रम! ॥ 
)८ | )८ > 


( २३४ ) 
नासमान सब जगत ही तामे पुनि यह काय। 
तेहिँ द्वित कितनो करत मैं यह महान श्रम हाय [ 
एक विरक्त पुरुष कहता है कि--( प्रथम ते ) सब जगत्‌ 
ही विनाशशील है--उसकी कोई वस्तु सिर नही। भर, फिर 
जगत्‌ मे भी यह शरीर सबसे अधिक विनाशशील है। इसका 
कुछ भी पता नहों कि यह आज या कल्ञ भी रह सकेगा । मुझे 
खेद है कि मैं उसके लिये यह कितना परिश्रम कर रहा हूँ | 
यहाँ “शरीरमेतज्जलबुदुबुदो पम स्‌ ( भर्थात्‌ यह 
शरीर जल के बबूले के समान है )?” इत्यादि शाश्न की पर्या 
लेचना विभाव है, भार “हंतः-पद से प्रतीत होनेवाली अपनी 
निदा, राज-सेवा-आदि का त्याग और रृष्णा की शून्यता-झादि 
अनुभाव हैं। यहा कट से मति-भाव का ही चमत्कार प्रतीत 
होता है, से इस पद्म को ध्वनि” कह्दे जाने का कारण वही है, 
शान्त-रस नहीं; क्‍योंकि वह विज्ञंब से प्रतीत होता है। 
१४--व्याधि 
रोग और वियेग आदि से उत्पन्न हेने- 
बाला जो मन का ताप है, उसे 'व्याधि कहते हैं। 
इसमें अंगो की शिथिज्रवा और श्वास-आदि भअलुभाव दोते 
हैं। जैसा कि लिखा है-- 
एकेकशो इन्डशो वा त्रयाणां वा प्रकेपतः 
वातपित्तकफानां स्युव्यांधये। ये ज्वरादय; ॥ 
इृह तत्म भवे। भावे। व्याधिरित्यभिधीयते । 


(२३५ ) 


अर्थात्‌ वात, पित्त और कफ नामक देषों के, एक-एक, 
देा-दे! अथवा तीनों के, प्रकोप से जे ज्वर-आदि रोग उत्पन्न 
द्वोते हैं, उनसे उत्पन्न हुईं चित्तवृत्ति का नाम, साहित्यशाद्य में, 
व्याधि? कहा जाता है। उदाहरण लीजिए--- 

हृंदये कृतशेवछानुषड़ा मुदृरज्ञानि यतस्ततः लिपन्ती । 
तदुदन्तपरे झुखे सखोनामतिदीनामियमादधाति दृष्टिय || 
५ भर ञ ५ 
हिय सेवालनि धारि, अंग इत-उत डारति, छीन | 
पिय-बातनि रत सखिन मुख देत दीठि अति*दीन ॥ 

एक सखी दूसरी सखी से कहती है कि--छेवालो को 
हृदय से चिपटाए हुए, अंगों को इधर-उघर पटकती हुई, यह 
( भायिका ) उस ( प्यारे ) की बातों में तत्पर सखियां के मुख 
पर अपनी अत्यन्त कातर दृष्टि डाल रही है---उनको तरफ बड़ी 
दीनता से देख रही है । 

यहाँ विरह विभाव है और झंगो का पटकना-आदि 
अनुभाव । 

१६--त्रास 

डरपेक मनुष्य के हृदय में व्याप्रादि भयंकर 
जन्तुओों के देखने और बिजली की कड़क सुनने 
आदि से जो एक मकार की चित्तवृत्ति उत्पन्न होती 
है, उसे 'चास” कहते हैं। इसके अलुभाव रोमांच, केंपकर्पी, 
निश्चेष्टता और अम्र-झदि हैं। जैसा कि कहा गया है-- 


( ९२३६ ) 


ओत्पातिकेमनःप्षेपद्धासः कम्पादिकारकः । 

अर्थात्‌ उत्पातकारी वस्तुओं से जो मन का विक्षेप होता 
है, उसे 'त्रास” कहते हैं, और वह कम्प-प्रादि को उत्पन्न 
फरता है। उदाहरण लीजिए-- 
आलीषु केलीरमसेन बाला मुहुमेमालापमुपालपन्ती | 
आराहुपाकर्ण्य गिरं मदीयां सोदामनीयां सुषमामयासीत्‌ ॥ 

> > ञ९ + 
बार बात मम सखिन बिच बार-बार बतंरात | 
दूरहि ते मम सबद सुनि लहि बिज्ञुरी-दुति तात ॥ 

नायक अपने मित्र से कहता है कि--बालिका कीड़ा के 
जेाश मे आकर, सखियों मे, मेरी बात-चीत को दुद्दरा-दुह्दरराकर 
कह रही थी; पर, दूर से, ज्योंद्दी मेरी आवाज सुनी, तत्काल 
बिजली का-सा चमक्का कर गई--देखते-देखते ओ्रेफल हो गई । 

यहाँ पति का अपनी बातें सुन लेना विभाव है और भग 
जाना अनुभाव । इस पद्च में लज्जा व्यंग्य है? यह शंका न 
करनी चाहिए; क्योंकि 'बाल्ला? शब्द के प्रयोग से बालकपन के 
कारण ल्ब्जा आपही निवृत्त हो जाती है भर्थात्‌ बाल्यावस्था 
मे कब्जा नहीं, किन्तु त्रास ही हुआ करता है । 

पर, यदि कद्दो कि यहाँ बाला-पद से नायिका के शिशुत्व 
का वाध कराना अभीष्ट नही है, किन्तु उससे नायिका की 
विशेषता ( अल्पवयस्कता ) सूचित होती है, तो यह ७दा- 
हरण ज्नीजिए-- 


( २३७ ) 


मा कुरु कशां कराब्जे कव्णावति ! कम्पते मम खान्तस। 
खेलन्न जातु गेपेरम्त ! विरम्ब॑ करिष्यामि ॥ 

भर भर >८ ५९ 

करु न काररा कर, कपत हिय, कयनावति अस्ब ! 

गोपन सँग खेलत कबहुँ करिहें। अब न विलंब ॥ 
झरी दयावती ! तू अपने कर-कमल में कोरड़ा न ले, मेरा 
हृदय घड़क रहा है। मैया ! गोपालों के साथ खेलते हुए 
अरब कभी विलंब न करूँगा । यह लीज्षा से गोपकिशोर बने 

हुए भगवान श्रीक्ृष्णचंद्र की उक्ति है । 
१७---सुप्त 

निद्रारुपी विभाव से उत्पन्न हुए ज्ञानका 
नाम 'सुप्त! है; जिसे शाप स्वप्न! कह सकते हें। 
इसके अलनुभाव हैं बढ़बडाना-आदि। नेत्र मोंचना-झादि 
ते निद्रा के द्वी अनुभाव हैं, इसके नहीं; क्योंकि वे स्वप्न के 
कारण नही होते और जे प्राचीन आचायाँ ने “भ्रत्या'्जुभावा 
निम्वतगात्ननेत्ननिमीलनम्‌ ( अर्थात्‌ इसके अनुभाव शरीर की 
निश्चेष्टता और नेत्र-मीचना हैं ) ?? इत्यादि लिखा है, से! वे 
अमुभाव यद्यपि निद्रा के कारण अन्यथा सिद्ध हैं ध्र्थात्‌ वे 
केवल स्वप्न मे ही नहीं रहते, कितु बिना खप्न के केवल निद्रा 
मे भी रहते हैं; तथापि इस भाव मे भी वे व्यापक रूप से रहते 
हैं---यह भाव भी उनसे खाली नहीं है, इस कारण लिख दिए. 
गए हैं। से यह आप भी सोच सकते हैं। उदाहरण लीजिए--- 


( शश्८ ) 


“अकरुण ! मृपाभाषासिन्धे। | विम्ुश्व ममाश्वलम , 

तब परिचित; स्नेह; सम्यडः ममे!”तल्यभिभाषिणीम्‌ ॥ 

अविरलगलद्वाष्पां तन्‍वीं निरस्तविभूषणां, 

क इह भवतीं भद्दे ! निद्र | बिना विनिवेदयेत्‌ ॥ 

हा | कर 2२ 
“हे ऋठन सिरमार ! निदेयी ! तजु मम अंचल, 
तेरे जानये नेह भल्े' मैं” यों कहती कछ ॥ ,» 
अधिरल आंसुन घार मरति कृशतन गतभूषन | 
प्यारिहिं तो विन नीं दु ! करे को देवि ! निवेदन ॥ 

“हे दयाहीन ! हे मिथ्या-भाषणों के समुद्र ! मैंने तुम्हारे 
प्रेम को अच्छी तरह पहचान लिया । तुम मेरा पद्चा छोड़ 
दे! |” इस तरह कहती हुईं और अविरत्न अश्रुधारा बहाती 
हुईं भूषशरहित कशांगी को, हे कल्याणकारिणी निद्रे ! तेरे 
बिना कान मिलता सकता है ? देवि! इस तरह मिल्षा देने 
का सौभाग्य केवल तुमे ही प्राप्त है। यह स्वप्न में भी इस 
तरह कहती हुई प्रियतमा को देखनेवाले किसी विदेशगत 
नायक की दरक्ति है | 

यद्यपि यहाँ "हे निद्रे | तेंने प्यारी की इस तरह की अवस्था 
का निवेदन करके मेरा महाच््‌ उपकार किया है?” यद्द बात 
और विप्रल्॑भ-शंगार दोनों प्रतीति मे झा जाते हैं, वथापि प्रथम 
स्वप्न की दी स्फूरत्ति होती है, अत: इस पद्च मे खप्त के ध्वनित 
होने का उदाहरण दिया गया है; परंछु यदि इसी पद्म से अंत 


( २३८४ ) 


मे बे देने भी ध्वनित होते हैं, ते ख्प्त की अभिव्यक्ति उन्हे 
रेक नहीं सकती | 


१८--बविवोध 


निद्रा के नह होने के झनंतर जे। घोध उत्पन्न 
होता है, उसे 'विबेषध' कहतें हैं। निद्रा का नाश 
निद्रा के पूरे हे! जाने, स्वप्न का अंत हे! जाने और बलवान 
शब्द तथा सपशे से द्वोता है, इल कारण वे इसके विभाव हैं 
पैर आँखें मक्तना, शरीर का मर्देन करना आदि प्नुभाव हैं। 
संक्षेप से उदाहरण लीजिए-- 
नितरां हितयाज्य निद्रया मे बत | यामे चरमे निवेदिताया । 
सुदशे वचन श्रणामि यावन्पयि तावञ्चुकेप वारिवाहः ॥ 
है ५ हर ९ 
पहर पाछुले सुनयनिहिं नांद मिलाई आज । 
वचन सुनन पूरब कुपित भये। जल्द बिन काज ॥ 
नायक अपने सित्र से कहता है--आजनंद का विषय है 
कि मेरा हित चाहनेवाली निद्रा ने, पिछले पहर मे श्र्थांत्‌ 
सबेरा द्वोते-दोते, मुझसे मेरी प्रिया को मिल्लाया, पर ज्योंही 
मैं उसका वचन सुनता हैं, त्योंद्दी मेरे ऊपर जल्षधर कुपित हो 
गया; उसने गरजकर सब सज़ा किरकिरा कर दिया। 
यहाँ गर्जना सुनना विभाव है और प्रिया के वचन सुनने 
के लिये जे उच्चास हुआ था, उसका नाश झलुभाव है; पर 


( २४० ) 
उसे तकंना करके समझ ल्लेना चाहिए, उसका यहाँ स्पष्ट 
शब्दों में वर्णन नहीं है । 
झछ लोग विवेक को अविद्या के नाश से उत्पन्न होने- 
वाला भी मानते हैं। उनके हिसाब से-- 


नष्टो मोह स्मृतिलेब्धा त्वत्ासादान्मयाञ्च्युत ! 
स्थितेउस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचन तब ॥ 


भ्रजुंन कहता है कि--द्े अच्युत ! आपकी कृपा से मेरा 
मोह नष्ट हो गया और मुझे स्मृति प्राप्त हो गई अर्थात्‌ जिन 
बातें को मैं भूल रहा था, वे मुझे फिर से उपस्थित हो गई । 
अब मैं संदेहरद्दित देकर स्थित हूँ, आपकी झ्राज्ञा का पात्न 
करूँगा । इस भगवद्गोत्रा के पद्य को उदाहरण देना चाहिए। 

यहाँ “नितरां हितयाएत्य निद्रया मे!" *' इस पद्म का वाक्‍्याथे 
मेघ के विषय में होनेवाली असूया है?” यह शंका करना ठोक 
नही । क्‍योंकि जब पहले विवाध का ज्ञान हे। जायगा, तब 
विवेध की अनुचितता का--बे मैके होने का--पता लगेगा; 
और उसके पनंतर हे।गी अनुचित विबेधध के उत्पन्न करनेवाले 
मेघ मे असूया। से वह विबाध का मुँद देखनेवाली दै 
अतणएव विलंब से प्रतीत द्वोती है, इस कारण उसकी प्रधानता 
नही हे! सकती । हा, उसकी ग्रधानता हे। सकती है; पर 
तब, जब कि मेघ के विषय में निदेयता आदि का बोध कराने- 
वाला कुछ भी द्वे । इसी तरह यहाँ खप्त-भाव भी वाक्याथे 


( २४१ ) 


नहीं हे। सकता; क्योंकि मेघ की गजेना से उसके नाश का ही 
बोध होता है, उसका नहीं। पर, यदि कटद्दे कि--यहाँ मूल 
पदय में मेघ के लिये 'वारिवाह' शब्द है, और वारिवाह शब्द का 
अथ पनभमरा (जल भरनेवा्ा) भी द्वोता है; से इस तरह के 
निद्ष्ट शब्द के प्रयोग से असूया ध्वनित दो सकती है; भार खप्न- 
भाव की शान्ति की ध्वनि को ते भाप भी खोकार कर चुके हैं | 
ते हम कहते हैं कि--क्षाम्रे, असूया और खप्तभाव की शांति 
के साथ इस भाव का संकर (मिश्रण) खीकार कर लेते हैं । 

निम्नशिखित पद्य को तो इस भाव के उदाहरण में नहीं 
देना चाहिए--- 


गाठमालिड्ञ्य सकलां यापिनीं सह तस्थुपीम | 
निद्रां विहाय स प्रातरालिलिज्ञाउ्प चेतनाम्‌ ॥ 
भर श्र श | 
करि आलिज्लन सब रजनि रही नींद जो साथ । 
तेहि' तजिके अब वह परयो आत चेतना-हाथ ॥ 
एक दशेक कहता है कि--जे! नींद रात भर गहरा 
आलिंगन करती रही--जिसने उसे पूर्णतया अपने वश में कर 
रखा था उसने, उसे छोड़कर, अब प्रातःकात्न चेतना को 
आलिगन किया है ।' 
क्योंकि यहाँ जे। चेवना शब्द है, उसका अर्थ विवाध है 
झतः वह वाच्य दो! गया है। से “जिस तरह एक सत्यप्रतिज्ञ 
२०-१६ 


( २४२ ) 


नायक, उपभोग के लिये, दे! नायिकाओं को दे--शथक्‌ 
प्रथकू--लमय देकर, यथेचित समय पर एक नायिका को भोगने 
के अनंतर, दूसरे समय पर, उसे छोड़कर, दूसरी धायिका 
के भोगता है; वैसे ही इसने भी रात्रि मे निद्रा को और 
आ्रात:काल मे चेतना को आलिंगन किया है”” | यह समासोक्ति 
( अछट्टार ) ही यहाँ प्रकाशित होती है । 


१-८--अभर्ष 


दूसरे के किए हुए अपमान आदि अनेक 
अपराधों से उत्पन्न होनेवाली और मोौन तथा 
वचनों की कठारता आदि के उत्पन्न करनेवाली 
जो एक अकार की चित्तवृत्ति है, उसे 'अमर्ष” कहते 
है'। पहले ही की तरह कारणों को विभाव और कार्यों को 
अनुभाव समझ लेना चाहिए । उदाहरण लीजिए-- 
वक्षोजाग्र पाणिनाउध्पृष्य दूरे 
यातस्य द्रागाननाब्ज प्रियस्थ । 
शाणाग्राम्यां भामिनी लेचनामयां 
जोष' जाप जोष॑ंगेवाब्वतस्थे ॥ 


र्प ६ ९ हर 


पिय चूजुकनि दुबाइ कर गये दूर ततकाढू। 
तेहि' मुख जेइ-जाइ-ज्ञोइ रहि भामिनि करि चख छाछ॒॥ 


( २४३ ) 


प्रियवम कुचें के अग्रभाग को हाथ से दबाकर तत्काल 
दूर चल्ला गया; भर क्रोधयुक्त नायिका, जिनके अग्रभाग लाल 
हो रहे हैं ऐसे, नेत्रों से देखती देखती चुप रह गई। 

यहाँ प्रकस्मात्‌ स्तनों के अम्रभागों का स्पशे करना विभाव 
है और नयनों की छत्ञाई तथा टकटभ्नी लगाकर देखना 
अनुभाव हैं । 

यहाँ आप पूछ सकते हैं कि . स्थायी-भाव क्रोध और 
संचारी-भाव अमर्ष मे क्‍या भेद है? इसका उत्तर यह है 
कि--देनों के विषय मिन्न भिन्न हैं-यही भेद है। और 
विषयों के भिन्न होने का बाघ उनके कार्यों की विज्ञक्षणता से 
होता है। देखिए, क्रोध: के कारण भट से प्रतिपक्षी के 
नाश भादि मे प्रवृत्ति होती है और अमर्ष के कारण कंवत्न 
चुप रहना-भादि ही होते हैं। तात्पये यह कि वही भाव 
जब कोमलावस्था में रहता है ते श्रमर्ष कहल्ाता है और 
उत्कट अवस्था को प्राप्त हो नाता है ते! क्रोध ! 

२०--अव हि त्थ 

हर्ष श्रादि अनुभाषों को, लज्जा श्ादि के 
कारण, छिपाने के लिये जो एक प्रकार की चित्त- 
रा उत्पन्न होती है, उसे अवहित्य? कहते है । 

कि लिखा है-- 

अनुभावपिधानार्थोज्वहित्थं भाव उच्यते । 

तद्विभाव्यं भयव्रीडाधाष्टय कैटिल्यगैरवेः ॥ 


( २४४ ) 


अर्थात्‌ अनुभावों को छिपाने के लिये जे भाव उत्पन्न 
देता है, उसे अवहित्थ” कहते हैं। उसके विभाव भय, 
लज्या, धृष्टता, कुटिलवा और गौरव होने चाहिएँ। जैसे-- 


प्रसंगे गेपानां शुरुष महिमान यदुपते- 
सुपाकर्ण्य खिद्वत्पुलकिंतकपेला कुलवधू! । 
विषज्वालाजालं कमगिति वमतः पन्मनगपतेः 
फणायां साश्चये' कथयतितरां ताण्डबविधिम्‌ ॥ 
>् ह ५९ ५ 
गोपनि बातनि करी, गुरुत बिच, परम बड़ाई। 
जदुपति की, इलनारि सुनी, से थ्रति मन भाई ॥ 
सए कपोद्वनि सेद-सलित अर पुल्कनि पत्ती । 
होन त्ग्यों अति हरख प्रकट वाका इहिं भाँती ॥ 
से विष-क्ारनि साज्ञ अति वमत कालि फनिपति फतनि। 
निरतन की कहिबे लगी बात सखिन अचरज-करनि ॥ 
एक सखी दूसरी सखी से कहती है कि--गोपों ने, प्रसंग 
आ जाने पर, गुरुजनों के बीच में, भगवान छृष्णचंद्र की 
बड़ाई कर दी। पास में बैठी हुई एक छुछनारी ने भी यह 
प्रसंग सुन लिया । फिर क्या था, प्रेम के कारण कपोलों पर 
पसीना और रोमांच उत्पन्न हे। गए। कुलवघू ने देखा कि अब 
सब चैपट हुआ जाता है, झ्रत: उसने विषज्वाला के समूह 
को सपाटे से उगलते हुए अधिराज कालिय के फर्यों पर 


( २४५ ) 


( भगवान कृष्ण के ) तृत्य का आश्चये-सद्दित वर्णेन करना 
प्रारंभ कर दिया, जिससे लोग समझ लें कि यह स्वेद भौर 
रेमाँच ऋष्ण से प्रेम के कारण नही, किन्तु उनके पराक्रम- 
वर्णन के कारण हुआ है ! 

यहाँ कब्जा विभाव है और वैसे ( भयंकर ) कालिय सपे 
के फर्यों पर तांडव करने की कथा का प्रसंग अनुभाव है | 
इसी तरह भयादिक के द्वारा उत्पन्न द्वोनेवाले अवहित्थ-भाव 
का भी उदाहरण समझ्त लेना चाहिए । 


२१०--अग्रता 


तिरस्कार तया झपमान आदि से उत्पन्न देने 
बालो इसका क्या कर डालू? इस रूप में, जे। 
चित्तवृत्ति हातो है, उसे 'डग्गनता' कहते हैं। जेसा 
कि लिखा है--- 


तपापराधेसदहोपकीत्तन चौरधारणस्‌। 

विभावाः स्थुरथे। वन्धे! वधस्ताडनमत्सने | 

एते यत्राब्तुभावास्तदेय निर्देयतात्मकम्‌ ॥ 

अर्थात्‌ राजा का अपराध, झूठे दोषों का -वर्णन प्रौर 
अपने चार को रख लेना ये जिसमे विभाव हों श्र बॉघना, 
मारना, पीटना श्लौर धमकाना ये अनुभाव हों, बह “उम्रता 
होती है, जे! कि निर्देयवारूप है। जैसे-- 


( २४६ ) 


अवाप्य भज्ज॑ खल सद्गराज्णे नितान्तमज्ञाधिपतेरमज्ञलम | 
परप्रभाव॑ मम गाण्डिवं धनुर्विनिन्दतस्ते हृदयं नकम्पते ॥ 


हर ९ ६ रे 


रन-आँगन लहि करन ते अझुभ पराजय आज । 
मिंदत मम गांडिव धनुष तुव हिय कंप न लाज ॥ 
रखणांगण में अंगराज करण से अत्यंत अमंगल हार खाकर 
तू आाज मेरे परम प्रभावशाली गांडीव धनुष की निंदा कर रहा 
है। तेरा हृदय कंपित नही दोता !! यह कर्ण से पराजित 
झौर गांडीव की निदा करते हुए यरुधिष्ठिर के प्रति भजुन 
की चक्ति है | 
यहाँ युधिप्टिर की की हुई गांडीव धनुष की निंदा विभाव 
है ओर मारने की इच्छा अनुभाव | 
यहाँ यह भी समझ लेना चाहिए कि--अमर्ष कौर 
उग्रता में कुछ भेद नह्ठी है? यह कह देना उचित नहीं; क्योंकि 
पहले जो अमर्ष की ध्वनि का उदाहरण दिया गया है, उसमें 
उम्रतां नहीं है, से आप देनों उदाहरणों का मिल्लाकर स्पष्ट 
समभ सकते हैं। तात्पय यह कि अमर्ष निर्देयतारूप नहीं 
और यह तद्प होती है। न इसे क्रोध ही कद सकते हैं; 
क्योंकि वह स्थायी-भाव है और यह संचारी भाव। भर्धात्‌ 
यही भाव जब स्थायीरूप से श्रावे तो क्रोध समझना चाहिए 
श्रौर संचारीरूप से झाबे ते उम्रवा | 


( २४७ ) 
२२--उन्साद 


वियेग, परम आनंद और महा-आपत्ति से 
उत्पन्न होनेवाली, जो किसी मनुष्य अथवा वस्तु 
में किसी दूसरें मनुष्य अथवा वस्तु कौ मतीोति 
होती है, उसे 'उन्माद' कहते हैं। यहाँ “उत्पन्न होने- 
वाली? तक का जो कथन है, वह सीप में चॉदी के भान- 
रूपी श्रम मे इस लक्षण की अतिव्याप्ति न होने के लिये है 
क्योंकि वहाँ नेत्र दोष और भ्रन्धकार आदि कारण है न कि 
वियोग भादि । उदाहरण लीजिए-- | 
“अकरुणहृदय प्रियतम ! मुश्चामि त्वामितः परं नाआहम!! | 
इ्यालपति कराम्वुजमादाया5छीजनस्य विकला सा ॥ 

३८ भर >८ ३ - 
“अकरुन-हिय पिय ! तोहिं हैं। ना दरों अब पाइ ।?” 
यों बोलत गहि कर-कमल आलिन को अकुलाइ ॥ 

वह सखी के हाथ को पकड़कर “हे निर्देय हृदयवाले 
प्रियतम |! मैं ( जो छोड़ चुकी से छोड़ चुकी ) अब इसके 
वाद तुम्हे छाड़ती ही नहीं ।!” इस तरह विकल द्वोकर बातें 
करती रहती है। यह प्रवास मे गए हुए ओर अपनी प्रिय- 
तमा के समाचार पूछते हुए नायक के प्रति किस, संदेश- 
वाहिनी--दूती--की दक्ति है । 

यहाँ प्यारे का विरद्र विभाव है और असंवद--वेमेज्-- 
वार्ते करना अन्लुभाव है। उन्‍्माद का यद्यपि व्याधि-भाव में झअत- 


( शष्ट८ ) 


भाँव ह। सकता है, तथापि इसे जो प्रथक्‌ लिखा गया है, से 
यह समभने के लिये कि इस व्याधि में अन्य व्याधियों की 
अपेक्षा एक प्रकार की विचित्रता है--अर्थात्‌ अन्य रोगों से 
इस रोग का ढंग कुछ निरात्षा ही है| 
२३--मरण 

रोग आदि से उत्पन्न होनेवाली जो मरण के 
पहिले की मृच्छारूप अवस्या है, उसे 'भरण” कहते 
हैं। यहाँ 'प्राणों का छट जाना? रूपी जे मुख्य मरण है, 
उसका ग्रहण नही किया जा सकता; क्योंकि ये जितने भाव हैं, 
वे सब चित्तवृत्तिरूप हैं, उनमें उस प्रकार के मरण का कोई 
प्रसंग ही नहीं । दूसरे, शरीर-आय-संयोग हर्ष भादि सभी 
व्यभिचारी भावों का कारण है। वह ऐसा कारण नहीं कि 
केबल फाये की उत्पत्ति के पूर्व ही वर्तमान रहे, किन्तु ऐसा 
कारण है जे काये की उत्पत्ति के समय भी रहतां है। इस 
अवस्था में मरणभाव मुख्य सरण ( शरीर-प्राथ-वियोग ) रूप 
में नहीं जिया जा सकता; क्योंकि उसकी उत्पत्ति के समय 
शरोर-आण-संयोग उसका कारण नहीं रह सकता। अपश्रतः 
भरण के पूर्वकाल्न की वित्तवृत्ति ही यहाँ मरणनामक व्यम्ि- 
चारो भाव है। क्योंकि उसकी उत्पत्ति के समय शरीर-प्राथ- 
संयोग रहता दै। उदाहरण ल्लीजिए--- 

दयितस्य गुणानजुस्मरन्ती 
शयने सम्पति या विलेकिताअधसीत्‌ | 


( २४६ ) 
अधुना खलु हन्त ! सा कृशाड़ी 


गिरमड्ीकुर्ते न भाषितारंपि || 
्र 4 तर भर 
जेहिं पिय-गुन सुमिरत अबहिं सेज विल्षेकी द्वाय ! 


अब वह बेलति ना सुतनु थके चुलाय बुलाय ॥ 

एक सखी दूसरी सखी से कहती है कि--जिसको, अभी, 
प्रियतम के गुणों का स्मरण करते हुए, शय्या पर, देखा था; 
हाय ! वह कृशांगी, इस समय, बुलाने पर भी नही बोलती-- 
उसकी जबान बंद हो गई है। 

यहाँ प्यारे का विरह विभाव है और जबान बंद हो जाना 
अनुभाव । इस पद्य में हँत” अथवा “हाय? पद श्रत्येत उप- 
कारक है, भ्रत: यद्यपि यह भाव वाक्य भर का व्यंग्य है, तथापि 
यहाँ पद का व्यंग्य हो! गया है। इससे “भाव यदि पद से 
व्यंग्य हो ते उसमे अधिक विचित्रता नहों रहती” यह 
कथन परास्त हो जाता है। “'प्रियतम के गुणा का स्मरण 
करते हुए?” इस कथन से यह बात सूचित होती है कि-- 
“यहाँ ध्वनित दोनेबाली जे अंतिम अवस्था है, उसमें भी 
उसे प्यारे के गुणों का विस्मरण नहीं हुआ था??, औौर 
वह अत मे अभिव्यक्त होनेवाले विप्र्डभ-इंगार को अथवा 
करुण-रसः के स्थायी-भाव शोक को पुष्ट करती है। यहाँ 
यह समझ लेने का है कि यह भाव, संदर्भ मे, इस वाक्य 
के झनंतर आनेवाले दूसरे वाक्य से यदि मायिकादिक के पुन- 


( २४० ) 


जीवन का वर्गन किया जाय, तब तो विग्रल्न॑ंभ को, अन्यथा 
करुण-रस को, पुष्ट करता है| कवि लोग इस भाव का प्रधान- 
तया वर्णन नहीं करते, क्योंकि यह भाव प्रायः अमंगल्ष है । 
२४--वितके 
संदेह झादि के अनन्तर उत्पन्न हानेवाली 
तकना के “ितर्क' कहते हँ। वह निश्चय के अलु- 
कूल ( उत्पादक ) होता है। जैसे-- 
यदि सा मिथिलेन्द्रनन्दिनी नितरामेव न विद्यते शुवि । 
अथ मे कथमस्ति जीवित न विना55ल्म्बनमाश्रितस्थितिः 
) भर )८ )९ 
“जनक-सुता महि पर नहीं?” यह बच जो आदेय । 
ता किमि मस थिति ? रहत ना बिन अधार आधेय ॥ 
यदि जनकनंदिनी प्रथिवी पर सर्वथा है ही नहीं; तब 
फिर मेरा जोवन किस प्रकार विद्यमान है; क्योंकि बिना 
आधार के आधेय ( झाधार मे रहनेवाली वस्तु ) की स्थिति 
नही रहती । तात्पये यह कि जनकनंदिनी ही इस जीवन 
का आधार है, उसके चले जाने पर यह रह ही कैसे सकता 
है ? यह भगवान्‌ रामचंद्र का अपने मन में कथन है| 
यहाँ “सीता पृथिवी पर है अथवा नही” यह संदेह 
विभाव है और पद्म मे वर्णित न होने पर भी आ्राक्षिप्त मां 
तथा अगुलियों का नचाना अनुभाव है। “इस पद्य का व्यंग्य 
चिता है?” यह नहीं कह्दा जा सकता; क्योंकि चिंता किसी 


( २५१ ) 


निश्चय को द्वी उत्पन्न करे, यह नियत नहीं है। दूसरे, इन 
देने भावों के विधय भी भिन्न भिन्न मिलते हैं! देखिए, चिंता 
का आकार है “क्या होगा”? “कैसा द्वोगा” इत्यादि; और वितके 
का भ्राकार है “प्राय: इसका ऐसा होना उचित है?” यह | एवं 
श्र्धान्‍्तरन्यास अलझ्टार के रूप में ' बिना आधार के......!” 
इत्यादि कथन भी वितक के ही अनुकूछ है, चिंता के नहीं। 
२५-- विषाद 
वाज्चित के सिद्ध न होने तथा राजा और गुद 
शादि के अपराध आदि से उत्पन्न हेनिवाले पश्चा- 
त्ताप का नाम 'विषाद! है। उदाहरण लीजिए-- 
भारकरसूनावस्त' याते जाते च पाण्डवोत्कष | 
दुर्येधनस्य जीवित ! कथमिव नाञ्यापि निर्यासि ॥ 
५ हर ५ 2९ 


अथएु करन सहारथी लही पांडवनि जीत। 
कुरुपति के जीवन न तू अजहू भरे व्यतीत ॥ 


दुर्योधन अपने-आप कहते हैं कि--सूर्यसुत कणे के अस्त 
हो जाने और पांडवों का विजय दे जाने पर भी, हे कर्ण के 
दशन पर्यत ही जीनेबाले, अथवा ग्यारह अक्षौहिणियों के 
पतियों से प्रणाम किए जानेवाले, यद्ठा प्रदाप से पांडवो के तेज 
को न गिननेवाले, किंवा पांडवों को वनवासादि दुःख देनेवाल्े 
दुर्योधन के जीवन [| तू आज भी किस तरह नहीं निकल रहा 
है ? क्‍या अब भो और कोई दुःख देखना शेष रह गया है ९ 


( २५२ ) 


यहाँ अपने अपकर्ष और शन्रुओं के उत्कषे का देखना विभाव 
हैं और जीवन के निकलने की चाहना और उसके द्वारा 
आक्तिप्त सेंह नीचा करना आदि अनुभाव हैं । इसी विषाद 
की ध्वनि को, “दुर्योधन के? यह अधींतर-संक्रमित वाच्य- 
ध्वनि--जिससे अत्यंत दुःखीपन आदि व्यक्त होता है--अलु- 
ग्ृहीत ( परिपुष्ट ) करता है। "यह पद्म 'त्ास-भाव” की 
ध्वनि है” यह शंका करना उचित नहीं; क्‍योंकि परमबीर दुर्थो- 
धन को त्रास का ल्ेश भो स्पशे नही कर सकता। न चिता 
की ही ध्वनि कही जा सकती है; क्योंकि उसका यह निश्चय 
है कि “मैं युद्ध करके मरूँगा |” दैन्य की ध्वनि मानें सो भो 
नही; क्‍योंकि सब सेना का क्षय होने पर भी उसने विपत्ति को 
गिना ही नहीं। बीर-रख की ध्वनि भी नहों बन सकती; क्‍योंकि 
चह अपने वचन में मरण को अपना रक्तक कह रहा है; और 
उत्साह का प्राण है दूसरे को नीचा दिखाना, से। वह यहां है नहीं 
और बिना उसके 'वीर-रस” की बात उठाना ही अनमिज्ञता है। 

निम्नलिखित पथ को विषादध्वनि का उदाहरण कहना 
उचित नहीं--- 

अयि | पवनरयाणां निर्दयानां हयानां 
इलथय गतिमहं ने सद्भरं द्रष्डमीहे | 
श्रुतिविवरममी मे दारयन्ति प्रकुप्य- 


द्वुनगनिभश्ुजानां बाहुमानां निनादाः | 
५ हर रच रु 


( २५३ ) 


करु हरुए रे ! नेक निर्देयी हय-गन की गति। 
है। ना चाहत समर देखिबा, कंपत से मति ॥ 
सर्प-सम उम्र भ्रुजनवारे छुत्रिव के। 
सुनि सुनि नाद विदीर्ण होत मम छिद्‌ श्रतिन के ॥ 
भोरु पुरुष विराट-पुत्र उत्तर अपने सारथि बृहन्नत्ञावेषधारी 
अजुन से कह रहा है--ए मैया ! तू इन नि्देयी घोड़ों की गति 
को संदी कर दे, मैं युद्ध देखना नहीं चाहता | देख ते, क्रोधी 
सपे के समान जिनकी भुजाएँ हैं, उन्त क्षत्रियों के नाद मेरे 
काने के छिद्रों को विदीर्ण किए देते हैं--उन्हें सुन सुनकर मेरे 
काने के परदे फटे जा रहे हैं। 
यहाँ त्रास ही प्रतीत हो रहा है, इस कारण विषाद की 
प्रतीति नहीं है। सकती । पर यदि किसी अंश में प्रतीति मान भी 
ले, वधापि उसका भी श्राप्त में ही अनुकूछ होना उचित है; सेः 
बह इस योग्य नही कि इस काव्य को उसकी ध्वनि कहा जाय | 


२६--ैत्सुक्ष्य 
“यह वस्तु मुझे इसी समय आप्त हे। जाय” इस 
इच्छा के। ख्ात्सक्य! कहते हू । वांछित का न प्राप्त 
होना इसका विभाव होता है और शीघ्रता, चिता आदि 
भ्रनुभाव दोते हैं। जैसा कि कटद्दा गया है--- 
संजातमिष्विरह्ददुद्दीम्ं प्रियसस्म॒तेः | 
निद्रया तन्द्रया गात्रगारवेण च चिन्तया || 
अनुभावितमाख्यातमेत्सुक्यं भावकाविदे!॥ 


( २४७ ) 


अर्थात्‌ वांछित के विरह से उत्पन्न होनेवाल्ा और प्रिय की 
स्वरृति से उद्दोपन किया जानेवाल्ला, तथा जिसके निद्रा, आत्वस्य, 
शरीर का भारीपन और चिता झनुभाव हैं, उस भाव को, भावों 
के समभनेवाल्ें ने, भैत्सुक्य' कहा है। उदाहरण लीजिए--- 

निपतद्बाष्पसंरोधमुक्तचाश्वल्यतारकम्‌ । 

कदा नयननील्ञाब्जमालेकेय मृगीदशः ॥ 

९ ९ >९ >९ 


परत आसुवन रोघ हित भट्ट थिर तारा जासु | 
नेन नील-नीरज पहै कबें निरखिहों तासु ॥ 


नायक के जी मे आ रहा है कि--( जिस समय मैं चलने 
जगा, उस समय, इस भय से कि कही झ्पशक्रुन न द्वो जाय ) 
गिरते हुए ऑसुश्रे। के रोकने से जिसके तारा ने च॑चल्नता छोड़ 
दी थी--स्थिर हो रहा था, क्योंकि यदि वह थोड़ा भी हिलता 
ते संभव था कि ऑसू गिर पड़ते, सुगनयनी फे, उस नयन- 
रूपी नीलकमल को कब देखूँ । 
२७--भ्रावेग 
झनथ की अधिकता के कारण उत्पन्न होने- 
वाली चित्त कौ संभ्रम नासक वृत्ति के आवेग! 
कहते हूं । उदाहरण लीजिए-- 
लीलया विहितसिंधुबंधनः सेज्यमेति रघुवंशनन्दन; 
दपदुविलसिता दशानन; कुत्र यामि निकदे कुलक्षयः ॥ 


२ शर्ट है 


( २४५५ ) 


लीढा ते बाध्य जलूधि से यह रघुपति आत। 
दरप भरथो दुसवदुन, कहें जाएँ, निकट कुछघात ॥ 

बिन्होंने लीला से समुद्र का सेतु तैयार कर दिया, वे रघु- 
वंशनंदन--रामचंद्र--ये भा रहे हैं; भैर रावश है पूरा घमंडी-- 
वह कभी झुकनेवाला नहीं। अब, में कहाँ जाऊँ, कुल का 
नाश बिलकुल नजदीक भा गया है--कोई बचाव की सूरत 
नही दिखाई देती । यह मंदेदरी का मन-ही-मन कथन है। 

यहाँ रघुनेंदन का आता विभाव है क॥कौर कहाँ जाऊँ” इस 
कथन से अभिव्यक्त होनेवाला स्थिरता का अभाव प्रनुभाव है। 
यहाँ यह नहीं कहा जा सकता कि इस पद्म मे चिंता प्रधान- 
तथा अभिव्यक्त द्वोती है; क्योंकि “कहाँ जाऊँ? इस कथन से 
स्पष्ट प्रतीत द्वोनेवा्े स्थिरता के अभाव से जिस तरह दद्वेग 
की प्रतीति होती है, उस तरह चिता की नही दवोती । परंतु 
आावेग के आस्वादन मे, उसके परिपोषक रूप से, गैणतया, 
चिता भी अनुभाव मे आ जाती है। 

श८--जड़ता 

चिंता, उत्कंठा, भय, बिरह और प्रिय के अनिष्ठ 
के देखने सुनने आदि से उत्पन्न हानिवाली और 
अवश्य करने येग्य कार्यों के अनुसंधान से रहित 
जे चित्तवृत्ति हे!तो है, उसे 'जड़ता” कहते हैं। 
यह मोह के पहले और पीछे उत्पन्न हुआ करती है। जैसा 
कि कहा गया है-- 


( २४६ ) 
कार्याविवेके जडता पश्यतः शृण्वतो5पि वा । 
तद्विभावाः प्रियानिष्टद्शनश्रवणे रुना ॥ 
अनुभावास्त्वमी तृष्णीम्भावविस्मरणादयः । 
सा पूर्व परते वा स्थान्मेहादिति विदां मतम्‌ | 
अर्थात्‌ देखते अथवा सुनते हुए भी कर्त्तव्य का विवेक न 
होने को जड़ता कहते हैं । उस के विभाव हैं प्यारे अथवा प्यारी 
के झ्निष्ट का देखना-सुनना तथा रोग; और चुप हो जाना, भूल 
जाना--आदि अनुभाव हैं। वह मोह के पहले अथवा पीछे 
उत्पन्न हुआ करती है। यह विद्वानों का मत है। उदाहरण-- 
यदवधि दयिते विलेचनाम्यां 
सहचरि ! दैववशेन दरतोज्भूत्‌ । 
तदवधि शिथिलीकृतो-मदीये 
रथ करणेः प्रणये। निमरक्रियासु ॥ 
2 


जब ते सखि ! दयितददि दुई कीन्ह लेचननि दूर । 
तब त॑ मम ईद्विन क्रिया करी शिथिक्त भरपूर ॥ 
नायिका अपनी सखी से कहती है--हे सद्देशी ! देवाघीन 
होने के कारण जब से प्रियतम आँखें से दूर हुए हैं, तब से 
मेरी ईंद्रियों ने अपने अपने कामे। से प्रेम शिथिल् कर दिया 
है--अब वे काम करना चाहती ही नहीं । 
यहाँ प्यारे का विरह विभाव है और आँख-कान झ्रादि 
इंद्रियों का अपने अपने ज्ञानों में प्रेम शिधिल्ष कर देना--अर्थात्‌ 


( २४७ ) 


आँख आदि से रूप आदि का जैसा चाहिए वैसा ज्ञान न 
होना झनुभाव है। मोह में नेत्रादिकों से देखना आदि कार्य 
होते ही नहीं; परंतु इस भाव मे यह बात नहीं । इस भाव में 
वस्तुओं के दशेन पश्ादि ते होते हैं; पर, प्रायः, उनका विशेष 
रूप से परिचय नहीं होता--अर्थात्‌ न जानना मोह का काम 
है और जैसा चाहिए वैसा न जानना जड़ता का | यही उससे 
इसमें विशेषता है। इसी कारण उदाहरण-पद्य में “शिथिज् 
कर दिया है? लिखा है, 'छोड़ दिया है? नहीं | 
२६--भालस्य 

घत्यन्त तृप्त है। जाने तथा गर्भ, रोग और परि- 
श्रम आदि के कारण जे चित्त का कार्य से विदयुख 
हाना है, उसे 'आलस्‍स्य” कहते हैं। इसमें न भशक्ति 
देती है और न कर्तव्य-पकत्तंव्य के विवेक का श्रभाव; श्रतः 
काये न करने रूपी अ्रनुभाव के समान होने पर भो ग्लानि शौर 
जढ़ता से इसका भेद है। उदाहरण लीजिए--- 


निखिलां रजनीं प्रियेण दूरा- 
दुपयातेन विवोधिता कथामिः | 
अधिक न हि पारयामि वक्तुम्‌, 
सखि [ मा जल्प, तवाध्यसी रसज्ञा | 
3 ५ 4 4 


पिय आए शअ्रति बूर ते करी बात सब रात । 
तुब रसना सखि | लेह की हों ना बेलि सकात ॥ 


२०५०-१७ 


हे ( २५८ ) 


पतिदेव दूर से आए थे, उन्होंने सब रात भर अनेक 
कथाएँ समझाई' । सो हे सखी | मैं अधिक नहीं बोल 
सकती, तू बात न कर; मालूम द्वोता है तेरी जीभ ते कोइ की 
है, तू क्या थकती थोड़े ही दै। यह, पति के आने के दूसरे 
दिन, बार बार रात का वृत्तांत पूछती हुई सखी के प्रति रात 
मे जगने से आज्ञस्ययुक्त, किसी नायिका की यक्ति है। 

यहाँ रात मे जगना विभाव है प्लेर अधिक बोलने का 
अभाव अनुभाव। जहुता का नियम है कि वह मोह से 
प्रथम अथवा पीछे हुआ करती है; पर इसमें यह बात नही, 
से आज्षस्य मे यह एक पलौर भी विशेषता है । 

यहाँ एक बात और समभ लेने की है। वह यों है-- 
यदि यह माना जाय कि यहाँ जे! कथा-शब्द भ्राया है, वह 
झसली बात छिपाने के लिये लाया गया है; अतएव अविव- 
जितवाच्य है। सो कथा? शब्द का असल्ली अरथे है सुरत; 
आर उसका व्यंग्य है नायिका का अत्यंत श्रमयुक्त होना। तो, जो 
अम-भाव अ्भिव्यक्त दोता है, वह भल्ते ही आलस्य का परि- 
पोषक रहे; क्योंकि जा आल्स्य श्रम से उत्पन्न हुआ है, उसमे 
श्रम का पोषक दोना अतिवाये है। पर, इसका अथे यह नहीं 
है कि जहाँ जहाँ आत्वस्य द्वोता है, वहाँ उसका विभाव श्रम 
ही होता है। अ्रतएव जहदों अ्रत्यंत ठृप्त होने आदि से आल्वस्य 
उत्पन्न होता है, वहाँ आल्लस्य का विषय श्रम नहीं होता, 
कितु अति-तृप्ति आदि होते हैं । 


( शशछू ) 


३००-सूया 

दूसरे का उत्कर्ष देखने आदि से उत्पन्न होने- 
वालो और हूसरे की निदा आदि का का ण, जो 
रक प्रकार की चित्तवृत्ति होतो है, उसे 'असूया! 
कहते हैं । इसी को असहनः झथवा असहिष्णुता? 

आदि शब्दों से भी व्यवहार किया जाता है। जैसे-- 

कुत्र गैवं धनुरिद क चाय प्राकृतः शिशु) । 

भंगस्तु सर्वसंह्ना कालेनेव विनि्मितः ॥ 

4 है # *र् 


कहाँ शम्भु के धनुप यह कहे यह प्राकृत वाढू । 
याके। भंजन तो किये। सरब-सेंहारी काछ 


कहाँ यह शिव का धनुष और कहाँ यह साधारण वालक; 
इसका भंग ते ख़ब वस्तुओं के संद्वार करनेवाले काल ने ही 
कर दिया । इसका भावार्थ यह है कि इस धनुष का, इतने 
समय तक पड़े रहने के कारण, अपने आप ही चूरा हो गया 
है, अन्यथा यह काम इस साधारण क्षत्रिय वालक--रामचंद्र--- 
के वश का नहों है। यह, शिव-धनुष को तेड़नेवाले भगवान्‌ 
रामचंद्र के पराक्रम को न सहनेवाले, उप सभा में बैठे हुए, 
राजाओं का कथन है । 

यहाँ श्रोमाच्‌ दशरथनेदन के वल्ष का सबसे उत्कृष्ट दिखाई 
देना विभाव है और साधारण बालक” इस पद से प्रतीत देते- 
वाली निदा अनुभाव है| 


( २६० ) 
दृष्णालेलविलेचने कलयति प्राची चकेाखने 
मैन मुश्जति किश्व केरवकुले, कामे धनुधु न्वति । 
माने मानवतीजनस्थ सपदि प्रस्थातुकामेश्युना 
घातः ! कि तु विषा विधातुस॒चिता धाराधराहंबरः ॥ 
भर है 9९ ह 
चंचछ नेन चकार तृषित है प्राचिहि” जावत, 
कुमुद हु छॉड़त मौन रहे जे अब लों सावत। 
घुनत धनुष मद्नेश मान हूु' तजत मानिनिनि । 
कह्दा डचित या समय विधे,! विधु पै कादम्बिनि ॥ 
कवि विधाता से कहता है+--चकोरों का समूह भ्राशा से 
चंचक्ष नेत्र किए हुए पूषे दिशा को खोकार कर रहा है-- 
टकटकी लगाकर उसी तरफ देख रहा है, कुमुदों के बूंद भी 
मैन छोड़कर चटक रहे हैं, कामदेव अपने घनुष को कंपित 
करके टंकार शब्द कर रहे हैं और मानिनिये। का मान प्रत्धान 
करना चाहता है--कमर बांधे खड़ा है; हे विधाता | ऐसे समय 
मे क्या आपको यह उचित है कि चंद्रमा पर मेघा्ंबर करें! 
राम ) राम |! आपने बहुत बुरा किया | 


% यह पद्म किसी ऐसे अवसर पर लिखा गया प्रतीत होता है 
जब कि किसी राजकुमार की उपस्थिति की अत्यन्त आवश्यकता थी; परंतु 
वह किसी देवी कारण से उपस्थित न हो सका। क्योंकि “अरस्तुतराज- 
कुमारादिवृत्तांतस्य”” इत्यादि आगे का अंथ तभी सँगत हैे। सकता है । 

““अनवादुक 


(२६१ ) 


यहाँ, यद्यपि “विधाता की उच्छ खत्तता झादि के दिखाई 
देने से उत्पन्न होनेवाली और उसकी--अभनुचितकारितारूपी-- 
निंदा के प्रकाशित होने से अनुभव में आनेवाली, विधाता के विषय 
में, कवि की असूया अभिव्यक्त होती है?” यह कहा जा ख़कता 
है; तथापि यहाँ जे झसूथा के काये श्रौर कारण वर्णन किए 
गए हैं, वे ही अमर्ष के काये और कारण हे। सकते हैं; अतः 
कार्य-कारयों की.समानता के कारण वह अम से मिश्रित ही 
प्रतीत देती है, उससे रहित नहीं । यदि झाप कहें कि इसी 
तरह आपके पूर्वोक्त उदाहरण (कन्न शैवम्‌, .....) मे भी अमर्ष 
और असूया का मिश्रण क्‍यों नहीं कद्दा जा सकता ? ते 
इसका उत्तर यह है कि--जिस तरह दूसरे पद्य में विधाता का. 
अ्रपराध स्पष्ट प्रतीत द्वाता है कि उसने राजकुमार को ऐसे 
आवश्यक समय पर उपस्थित न रहने दिया; इस तरह भग- 
वान्‌ राम का कोई अपराध नहों है, जिससे कि कवि की तरह 
वीरों का भी अ्रमषे अमिव्यक्त हो। आप कहेंगे कि धनुष- 
भेंग करके राजाओं का मानभदन फर देना रामचंद्र का भी 
ते अपराध है। से यह कहना ठोक नहों; क्योंकि अत्यंत 
उन्नत काये करना वीर-पुरुषों का खभाव है--वे उसे किसी का 
दिल दुखाने के लिये नहीं करते । 

अब, यदि आप कहें कि--यहाँ चंद्रमा का इत्तांत तो 
प्रसंगप्राप्त है नहीं; अतः यह मानना पड़ेगा कि उसके द्वारा 
प्रसंगप्राप्त राजकुमारादिकों का जृत्तांत ध्वनित होता है; से 


( २६२ ) 
इस पद्य को असूया-भाव की ध्वन्ति मानना ठीक नहीं । ते 
इसका उत्तर यह है कि--एक ध्वनि का दूसरी ध्वनि से विरोध 
नही है--अर्थात्‌ एक ही पद्म साथ-ही-साथ दे। भ्र्थों की भी 
ध्वनि हे। सकता है; क्‍योंकि यदि ऐसा न माने। ते महावाक्य 
की ध्वनियों का अवांतर वाक्यों की ध्वनियों क़े ख्राथ होना 
और अ्रवांतर वाक्यों की ध्वनियों का पदों की ध्वनियों के साथ 
होना, कहीं भी, न बन सकेगा । 
३१--अपस्मार 
वियेग, शेक, भय और घृणा आदि की अधि- 
कता तथा म्रूत-प्रेत के लग जाने आदि से जे। एक 
प्रकार का रोग उत्पन्न हो जाता है, उसे 'अपस्मार! 
कहते हैं। इसकी भी गणना यद्यपि व्याधिभावः में ही हो 
जाती है, तथापि इसे जे विशेष रूप से लिखा गया है, से इस 
बात को समझाने के लिये कि वीभत्स” और भयानक? रसों 
का यही व्याधि अंग होती है, अन्य नहीं। परन्तु विप्रलंभ- 
ऋंगार के ते भ्रन्यान्य व्याधियाँ भी अंग हो सकती हैं। 
उदाहरण लीजिए-- 
हरिमागतमाकण्ये मथुरामन्तकान्तकम्‌ | 
कम्पमान; इवसन्‌ कंसे। निपपात महीतले ॥ 
हर है है ६ 
अतक के अंतक दरिददि मथुरा आए जानि। 
साँस लत अरु कैपत महि परथो कंस भय सानि॥ 


” (२६३ ) 
कवि कहता है--काल के भौ कालरूप भगवान ओकृष्ण- 
चंद्र को जब मथुरा मे आए सुना ते कंस कंपित हा गया, उसे 
खॉस चढ़ने लगा और प्रथिवी पर गिर पड़ा | 
यहाँ भय विभाष है और कॉपना, अधिक सॉस ज्लेना तथा 
गिर पड़ना आदि अनुभाव हैं। 


३२-चपत्तता 
असष आदि से उत्पन्न होनेवाली और कठेर 
वचन आदि के उत्पन्न करनेवालो चित्तवृत्ति 
के। चपलता” कहते हूं। जैसा कि कहा है-- 
अमपप्रातिकूश्येष्यारागढ पाश्व मत्सरः | है 
इति यत्र विभावाः स्युरतुभावास्तु भत्स नम )| 
वाक्पारुष्य' प्रहास्थ ताडने वधवन्धने | 
तब्चापलमनालाच्य कार्यकारित्मिष्यते | इति ॥ 
अर्थात्‌ जिसमे अमर, प्रतिकूलता, ईर्ष्या, प्रेम, द्वेष शोर 
असहिध्ष्ता ये विभाव हों और घमकाना, बचन की कठोरता, 
चोट पहुँचाना, पीटना, मारना और कैद करना ये अलुभाव हों, 
उसे 'चपल्ता? कहते हैं; जिसे कि 'बिना सेचे विचारे काम 
करना? समक्तिए । उदाइरण लोजिए--- 
अहितिव्त ! पापात्मन ! मेव॑ं मे दर्शयाधननम्‌। 
आत्मानं हंतुमिच्छामि येन त्वमसि भावितः ॥ 


| र् २६ है 


( २६४ ) 
अद्वित नियम तुव, पापमय, मोहि' सुख न यों दिखाय । 
हैं। आपुद्दि' मारन चह्तत जेहि' ताहि' दिय उपजाय ॥ 

है अनिष्टकारी नियमों के पालन करनेवाले दुरात्मन ! 
तू इस तरह सुझे मुख मत दिखा । मैं अपने को मार देना 
चाहता हूँ, जिससे कि तू उत्पन्न किया गया है। यह हिरण्य- 
कशिपु का, प्रह्माद के प्रति, उस समय का, कथन है, जब कि 
उसे उसकी भगबद्धक्ति के हटने का कोई उपाय न सूक पड़ा | 

यहाँ भगवान्‌ के द्वंष के द्वारा उद्दीप्त किया हुआ पुत्र का 
द्वेष विभाष है और आत्महत्या की इच्छा अनुभाव । 

यहाँ यह न कहना चाहिए कि--इस पद में 'अ्रमर्ष! ही 
व्यंग्य है; क्योंकि सदा से ही भगवाद्‌ से प्रेम करनेवाले प्रह्मद 
के साथ हिरण्यकशिपु का जे! अमर्ष था, वह बहुत समय से 
संचित था; अत: यदि झमर्ष के कारण ही उसकी आत्महत्या 
की इच्छा हुई--यह माना जाय, ते इस इच्छा का इस समय 
ही पहले बार होना नहीं बन सकता; यदि यह इच्छा उसी 
कारण से हुई होती ते। इतने वर्षों तक ही क्‍यों न दो गई 
होती। अब, जब कि वह इच्छा पहले-पहल उत्पन्न हुई है, वे। 
उसका कारण भी पहलते-पहल उत्पन्न हुआ दै--यह मानना 
चाहिए । तब पुरानी चित्तवृत्ति जो अ्रमर्ष है, उससे भिन्न 
चपत्ञता नामक चित्तवृत्ति ही उसका कारण सिद्ध होती है। 
पर, यदि कद्दो कि झ्रात्महत्या आदि का कारण असर्ष 
की अधिकता ही है, अतः यहाँ उसी की अभिव्यक्ति माननी 


( २६५४ ) 
चाहिए; ते! हम कहते हैं कि अधिकता भी बत्छु के खाभा- 
विक रूप से ता वितकक्षण होती है--अर्थात्‌ खामाविक रूप में 
और अधिकता में भेद होता है, यह ते! अवश्य ही मानना 
पड़ेगा । बस, ते उसी पदाये का नाम चपतता है; अर्थात्‌ 
प्रकष्ट अम्रष ही चपलता कइलाता है।... 7: 

३३- निर्बेद 

जो नौच पुरुषों में गालियाँ मिलने, तिरस्कार 
होने, रोगी है! जाने, पिठ जाने, दरिद्र होने, 
वांछित के न मिलने और हूसरे कौ संपत्ति देखने 
आदि से और उत्तस पुरुषे| में अवज्ञा आदि से उत्पन्न 
होती है और जिसका नाम विषयों से द्वष है, 
तथा जिसके कारण रोना, लंबे साँस और चेहरे 
पर दोनता आदि उत्पन्न है। जाते हैं, उस चित्त- 
वृत्ति का नाम 'निर्वेद! है। उदाहरण लीजिए-- 
यदि लक्ष्मण ! सा मुगेक्षणा न मदीक्षासरणि' समेष्यति | 
अमुना जठजीवितेन में जगता वा विफल्लेन कि फलम )| 
है ५ हम न्‍ 


छछ्ठमन, जे! वह स्गनवति मे सेननि ना आय | 


या जड़जीवन अरु विफलक्ष जग ते का फल हाथ ॥ 
श्रोरामचंद्र सीता के वियाग में लक्ष्मण से कह्ट रहे हैं-- 


है शक्मण ! यदि वह मृगनयनी मेरे नेत्रपथ में न आवेगी-- 
भुके न दिखाई देगी, तो इस जड़--अर्थात्‌ चेश-रहित--जीवन 


( २१६६ ) 


से अथवा निष्फल जगत्‌ से क्‍या फल्न है ! मेरे लिये न यह 
जीवन काम का है, न जगत्‌ । 
यहाँ यदि आप शंका करे कि निवेद? शांव-रस का 
स्थायी भाव है, सो इस पद्म को शांत-रस की ही ध्वनि क्‍यों 
न मान लिया जाय, भाव की ध्वनि क्‍यों माना जाय; 
ते इसका समाधान यह है कि जो निर्वेद शांत-रसख का 
स्थायी भाव है, वह नित्य और अनित्य वस्तुओं के विवेक से 
उत्पन्न हुआ करता है; पर यह बैसा नहीं है; सो इस निर्वेद 
के कारण यह पद्म रस की ध्वनि नहीं कहा जा सकता | 
३४--देवता आदि के विषय में रति 
जैसे-- 
भवदूद्वारि क्रुध्यज्नयविजयदण्टाहतिदल- 
त्किरीयास्ते कीट इब विधिमहेन्द्रपभृतया । 
वितिष्ठन्ते युध्मन्नयनपरिपातेत्कलिकया 
ब्राकाः के तत्र श्षपितमुर ! नाकाधिपतय) ॥ 


५८ ५८ »< ञ 
क्रोघयुक्त जय-विजय-द'ड॒ की गहरी चोटढन। 
दलित किरीट, सुकीट-सरिस, विधि ओ बलछसूदन ॥ 
नैनपात की चाह रहे ठाढे तुब द्वारे। 
कौन मुरारे | तहाँ नाकपति है बेचारे ॥ 
भक्त की भगवान के प्रति उक्ति है कि--हे मुरारे! झ्रापके 
द्वार पर, क्रोधयुक्त जय-विजय नामक पार्षदों के डंडों की चोटों 


( २६७ ) 


से जिनके किरीट हूटे जा रहे हैं, वे ब्रह्मा और महेंद्र आदिक 
देववा, आपके नेन्रपरिपात की--एक बार श्रच्छी तरह देख 
छेने की--उत्कंठा से खड़े रहते हैं, फिर बेचारे खर्ग के खासी 
यम, कुबेर आदिक कौन चीज हैं--न्‍्हें ते! गिनता ही कान है। 

यद्यपि आप कह सकते हैं कि यहाँ, अपमान सहन 
करके भी भगवान्‌ के द्वार की सेवा करने श्र उनके कटाक्ष- 
पात की इच्छा आदि? से भगवान्‌ के विषय मे ब्रह्मादिकों का 
प्रेम अभिव्यक्त नहीं होता, किंतु भगवान्‌ का ऐश्वये वचन 
झौर मन के द्वारा अवर्शनीय तथा अज्ञेय है? यही भ्रमिव्यक्त. 
होता है; तथापि हम कहेंगे कि यहाँ कवि का भगवद्वधिषयक 
प्रेम अभिव्यक्त होता है प्रौर उसका अनुभाव है उस प्रकार के 
भंगवदैश्वय का वर्शेन करना । से इसे देववताविषयक रति की 
ध्वनि का उदाहरण मानने में कोई बाधा नहीं । 

पर यदि झाप कह्दे कि यहाँ प्रधानतया ऐश्वय का ही 
वर्णन है, कवि की रति तो गाण है; ते छाड़िए भगड़ा, यह 
उदाहरण लीजिए--- 


न धन न च राज्यसम्पदं न हि विद्यामिदमेकमर्थये | 
मयि धेहि मनागपि प्रभे ! करुणाभज्ञितर ज्ञितां दशम्‌॥ 


3 है ९ ६ 


ना घन, ना नृप-संपदा, ना विद्या की चाह। 
यही चहें मे। पै करहु करुताभरी नियाह॥ 


( २६८ ) 


भक्त भगवान्‌ से कह्दता है--मैं न धन चाहता हूँ, न राज्य 
की संपत्ति चाहता हूँ और न विद्या ही चाहता हूँ। मैंते 
एक यही चाहता हूँ कि हे प्रभो--हे मेरे स््रामिब--तू मेरे 
ऊपर, दया की रचना से लह्दराती हुई दृष्टि को, यदि अधिक 
न हो सके ते थोड़ी सी ही, डाल दे । 

यहाँ घनादिक की अपेक्षा से, रहित भक्त की भगवान्‌ 
के कटाक्षपात की अमित्ाषा उनके विषय मे उसके प्रेम को 
अभिव्यक्त करती है| 

इस तरह संक्षेप से भावों का निरूपण कर दिया गया है। 


भाव २४ हो क्यों हैं ! 

अब्र यह प्रश्न उपस्थित द्वाता है कि भावों की संख्या 
का नियम कैसे हो सकता है, वे ३४ ही क्‍यों हैं ? क्योंकि 
काव्यादिकों मे अनेक स्थलों पर मात्खये, उद्बेग, दंभ (कपट), 
ईर्ष्या, विवेक, निर्णय, क्हौब्य ( कायरपन ), क्षमा, कौतूह्त, 
उत्कंठा, विनय (नम्नता ), संशय और धघृष्टवा झ्रादि भाव भी 
दिखाई देते रहते हैं, सो यह संख्या ठीक नहीं । इसका उत्तर 
यह है कि पूर्वोक्त भावों में ही उनका भी समावेश हो जाता 
है, अतः उन्हे प्रथक्‌ गिनने की कोई झावश्यकता नहीं । यद्यपि 
वास्तव में असूया से मात्सये का, त्रास से उद्बेग का, भ्रवहित्य 
से दंभ का, भ्रम्प से ईर्ष्या का, सति से विवेक और निर्णय 
का, दैन्य से क्लैब्य का, धृति से क्षमा का, भैत्सुक्य से कैतृहल 
और उत्कंठा का, कब्जा से विनय का, तर्क से संशय का और 


( २६< ) 


चपल्षता से घृष्टता का सूक्षम भेद है; तथापि ये भाव एक दूसरे 
के बिना नहीं रह सकते--अ्र्थात्‌ जहाँ असूया होगी वहाँ 
मात्सय अवश्य ही द्वोगा--इत्यादि; अतः इन्हे उनसे प्रथक्‌ नहीं 
माना गया; क्योंकि जहाँ तक सुनि ( भरत ) के बचन का 
पाक्षन हे। सके, उच्छु खलता करना अनुचित है | 

इन संचारी भावों मे से कुछ भाव ऐसे भी हैं, जो दूसरे 
भावों के विभाव और झनुभाव हो जाते हैं; जैसे ईर्ष्या निवेद 
का विभाव है श्रौर झसूया का अनुभाव; चिंता निद्रा का 
विभाव है और औत्सुक्य का अनुभाव इत्यादि स्वय॑ सेचच 
छ्ेना चाहिए | 

रसांसभास 

अच्छा, अब रसाभास की बात सुनिए | उसके लक्षण के 
विषय में कुछ विद्वानों का मत है--'अनुचित विभाव के 
आतलंबन मानकर यदि रति आदि का अनुभव किया जाय तो 
'रसाभास” हो जाता है। रहा यह कि किस विभाव को 
अ्रनुचित मानना चाहिए और किसको उचित, से यह लोक- 
व्यवहार से समझ लेना चाहिए । भर्थात्‌ जिसके विषय मे 
लोगों की यह बुद्धि है कि यह अयोग्य है?, वही अनुचित 
है।” पर दूसरे विद्वान इस लक्षण का सुनकर चुप नहीं 

# चिंता को निद्रा का विभाव बताना कहाँ तक ढीक है, इसे 
सहृदय पुरुष सोच देखें । 

--अजुवादुक 


( २७० ) 


रहना चाहते । वे कद्दते हैं--इस लक्षण के द्वारा यद्यपि 
मुनिपत्ना आदि के विषय मे जो रति शआादि होते हैं, उनका 
संग्रह दो जाता है; क्‍योंकि इतर भलुष्य सुनि-पत्नी आदि 
को अपना प्रेमपात्र माने यह अनुचित है; तथापि अनेक नायकों 
के विषय में होनेवाली और प्रियतम-प्रियतमा दोनों मे से केवल 
एक दी में दहोनेवाली रति का इसमें संग्रह नहीं होता; क्योंकि 
वहाँ विभाव ते अनुचित है नहों, कितु प्रेम गनुचित रूप से 
प्रवृत्त हुआ है; अतः 'अनुचित' विशेषण रति प्रादि के साथ 
लगाना उचित है। भ्र्थात्‌ यह लक्षण बनाना चाहिए कि 
“जहां रति आदि अनुचित रूप से प्रवृत्त हुए हों, पदों रसा- 
भास होता है?! । इस तरह, जिसमे अनुचित विभाव आहल॑- 
बन हो, जो अनेक नायकों के विषय मे हो और जो प्रियतम- 
प्रियतमा दोनों मेन रहती दवा, उस' रति का भी संग्रह हो 
जाता है। अल्लुचितता का ज्ञान तो इस मत में भी .पूर्ववत्‌ 
( लेक-व्यवहार से ) ही कर लेना चाहिए। .. 
रसाभास रस ही है अथवा उससे भिन्न ? 
रसाभासों के विषय में एक और विचार है। कुछ 
विद्वानों का कथन है--“जहाँ रसादि के आभास होते हैं, 
वहा रस आदि नहीों होते और जहाँ रस आदि होते हैं, 
वहाँ रसाभास आदि नहीं होते, उन दोनों का साथ साथ 
रहना नियम-विरुद्ध है; क्योंकि जो निर्मत्ष हों--जिसमें अहु- 
चितता न हो--उसी का नाम रस है; जैसे कि जो द्ेव्वाभास 


(२७१ ) 
होता है, वह हेतु नही होता |” दूसरे विद्वानों का कथन है-- , 
“झनुचित होने के कारण स्वरूपनाश नहीं हो सकता अर्थात्‌ 
वह रस ही है, कितु देषयुक्त होने से उन्हें आभास कहा जाता 
है; जेसे कोई अश्व ( घोड़ा ) दोषयुक्त हो, ते लोग उसे 
अश्वाभास कहते हैं |! 
उदाहरण क्षीजिए-- 
शतेनेपायानां कथमपिं गतः सौधशिखरं 
सुधाफेनखच्छे रहसि शयितां पृष्पशयने। 
विवोध्य क्षामाद्नीं चकितनयनां स्मेरवदनां 
सनिःश्वासं श्लिष्यत्यहह ! सुकृती राजरमणीम॥ 


4 है २८ है 

करि सैकरनि उपाय शिखर पे पहुँच्यो महरूनि। 

सोई अख्तफेन-सुच्छ सेजा रचि कहुसुमनि ॥ 

चकितनयनि स्मितसुखी विरह-कृशतल्ु दुप-रमनिहि' । 

भेटत, धन्य, जगाइ, उसासनजञ्ञत, श्रम-शमनिहि ॥ 
कवि कहता है-सैकड़ों उपाय करके, किसी प्रकार, 
महल्लों की चोटी पर पहुँचा और झमस्त के फ्ागो के समान 
निर्मत्ञ पुष्पो की सेज पर सेई हुई कृशांगी के जगाया । उसने 
जगते ही उसे चकित नेत्रों से देखा और उसका मुखकसल 
खिल उठा। अहह | इस अवस्था मे स्थित राजांगना को 

पुण्यवान्‌ पुरुष, सास भरे हुए आलिंगन कर रहा है। 


( २७२ ) 


यहाँ जिससे प्रेम करना अनुचित है, वह राजांगना भाल॑- 
बन है। एकांत कऔर रात्रि का समय आदि उद्दीपन हैं। 
साहस करके राजा के जनाने मे जाना, प्रायों को परवा न 
करना, सॉस भर जाना और आल्षिगन करना आदि श्रनु- 
भाव हैं एव' शंका आदि संचारी भाव हैं। यहाँ प्रेम का 
आलंबन जो राजांगना है, वह लोक तथा शात्र के द्वारा निषिद्ध 
है, इस कारण रस आमासरूप दो गया है | 

यदि आप कहें कि यहाँ राज-रमणी के निषिद्ध होने के 
कारण रस आभास नहीं हुआ है, कितु राज-रमणो का जो 
'चकितनयना? विशेषण है, उससे यह अ्रभिव्यक्त होता है कि 
उसे पर-पुरुष के स्पशे से त्रास उत्पन्न हे गया है, भार तब यह 
सिद्ध द्वो जाता है कि नायिका को कामी से प्रेम नहीं है, से 
प्रेम फे अन्ुभयनिष्ठ--अर्थात्‌ केवल नायक में--होने फे कारण 
रस आभास हे! गया है ते यह ठोक नहीं; क्योंकि, यद्यपि 
नायिका बहुत समय से इस पर आसक्त है, तथापि अंत:पुर 
में पर-पुरुष का जाना सर्वथा असंभव है, अतः “यह मुझे कान 
जगा रहा है? इत्यादि समकर उसे त्रास द्वोना उचित ही 
है। परंतु उसके अरनंतर जब उसे उसका परिचय हुआ, ते 
उसने सोचा कि “यह मेरा वह प्रियतम, मेरे लिये प्रायों को 
तिनका समझकर--उनकी कुछ परवा न करके, यहाँ झाया 
है? तब उसे द्ष उत्पन्न हुआ। इसी हर्ष को अभिव्यक्त 
फरता हुआ राजरमणी का 'स्मेरवदना? विशेषण उसके प्रेम को 


( २७३ ) 


अभिव्यक्त करता है। परंतु इस पद्म मे है नायक के प्रेम की 
ही प्रधानता; क्योंकि पूरे वाक्य का अथ वहीं है--यह पद्म 
उसी के वर्णन मे लिखा गया है । 
अच्छा, अब श्रनेक नायकों के विषय मे प्रेम का उदा- 
हरण सुनिए---- 
भवन करुणावती विशन्ती गमनाज्ञालवलामलालसेघु | 
तरुणेषु विलेचनाब्नगालामय वाला पथि पातयाम्बभूव | 


०4 ८ >८ है 
विशत भवन, देखे गवन, आयसु चहत, दयाढू । 
बाढू, तठन-गन पे करी, नैन-नीरजनि साल |॥ 
कवि कहता है--बालिका जब अपने घर में घुसने लगी 
ते। उसने देखा कि मांग मे युवा पुरुषों की एक टोल्ली की टोलो 
बिदाई के लिये किचिन्मात्र भ्राज्ञा प्राप्त करना चाहती है। 
करुणयावती वाज्षिका से न रहा गया, उसने सव युवाओं के 
ऊपर एक ही साथ नेत्र-कमल्रों की माला गिरा दी--सभी को 
ग्रेमभरी दृष्टि से देख लिया । 
यहाँ, काई-एक नायिका कहों से आ रही थी; रास्ते मे 
उसके रूप-यावन ने कुछ युवकों का चित्त चुरा लिया और वे 
छ्गे उसके पीछे पोछे चलने । नायिका जब घर में घुसने 
लगी, ते उसने देखा कि वेचारे युवक अपनी सेवा की सफलता 
समभने के लिये, बिदाई के प्राज्ञारूपो ज्ञाभ के लिये, ललचा 
रहे हैं; श्रौर उसे उनका परम परिश्रम स्मरण हे। आया--उसे 


२५००-१८ 


( २७४ ) 

याद आया कि बेचारे कब से पीछे पोछे डोल रहे हैं, से 
दया आ गई; तब नायिका ने उन पर नयन-कसलों की मात्ता 
डाल दी । यह नयन-कमलो की माला डालना रूपी जा अनु- 
भाव है, उसके वर्णन से नायिका के प्रेम की अभिव्यक्ति द्वोती 
है, और “तरुणेषु! इस बहुवचन के कारण 'वह अनेकों के विषय 
मे है? यह सूचित होता है; से। यह भी रसाभास है। 

अच्छा, अब अनुभयनिष्ठा रति का उदाहरण भी सुनिए-- 


भ्ुजपक्षरे ग्रहीता नवपरिणीता बरेश वधू) । 
तत्काल-नालपतिता बालकुरंगीव वेपते नितराम्‌ |। 
4 )< भर ५८ 
नव दुरूहिन भुज-पींजरे पकरी वर, बेहाढू । 
काँपत, ज्यो बालक झगी परी जाछू ततकाल ॥ 
एक सखी दूसरी सखी से कहती है-नई ब्याही हुई 
दुललहिन को, वर ने, भुजा-रूपी पींजरे मे पकड़ लो; से बह 
बेचारी तत्काल जाल्न में पड़ी हुई हरिण की बच्चा की तरह 
कॉप रही है। । 
यहाँ नववधू को प्रेम का थोड़ा भी स्पश नहीं है, से रति 
अनुभयनिष्ठ होने के कारण आभासरूप हो गई । जैसा कि 
कहा गया है--- 
उपनायकसंस्थायां मुनिगरुपत्नीगतायां च | 
बहुनायकविषयायां रते तथाउत्ुुभयनिष्ठायाम्‌ | इति ॥| 


( २७५ ) 

अर्थात्‌ जहों उपनायक ( जार ), भुनि और गुरु की सो 
के विषय मे तथा अनेक नायकों के विषय मे प्रेम हो, एवं स्री- 
पुरुष दाने। मे से एक को प्रेम हो और एक को नहीं, ( वहां 
. रसाभास हुआ करता है )। यहाँ मुनि और गुरु शब्द उप- 
लक्षणरूप से श्राए है, अ्रत: इन शब्दों से राजादिकों का भी 
अहण समभ्क लेना चाहिए । 

अच्छा, अब बताइए, निम्न-लिखित पद्च मे क्या व्य॑ग्य है 

व्यानम्राथलिताश्चैव स्फारिताः परमाकुलाः | 
ः पाए्डुपुत्रेषु पाश्चार्याः पतन्ति प्रथमा हश! ॥ - 
| भर )८ 2 
परत पांडवन पै अथम ह्ुपद-सुता के संजु । 
अतिनत, चंचछ, विकसित रु अति ध्याकुल श्ग-कंज !! 
कवि कहता है कि--पांडवों के ऊपर, द्रौपदी की सबसे 
पहल्ो दृष्टियों अत्यंत नम्न, चंचत, विक्रसित और परम व्याकुल 
होती हुई गिर रही हैं। 

“यहाँ नम्नता से, युधिष्टिर के विषय मे, धर्मात्मा होने 
के कारण, भक्तियुक्त होने का, चचल्ञता से, भीमसेन के विषय 
मे, भारी डीज-डौल द्वोने के कारण, त्राध-युक्त द्ोने का, विक- 
सितता से, श्रजजुन के विषय में, अ्रत्ाकिक वीरता सुनने के 
कारण, इर्षयुक्त द्वोने को तथा अत्यंत व्याकुल्ञ होने से, नकुत्त 
और सहदेव के विषय मे, परम सुंदर दवोने के कारण, उत्सु- 


( २७६ ) 
क॒ता को अभिव्यक्त करती हुई दृष्टियां के द्वारा द्रौपदी का 
अनेक नायकों के विषय मे प्रेम अभिव्यक्त होता है, इस कारण 
यहाँ रसाभास ही व्यंग्य है।?” यह है नवीन विद्वानों का मत | 
पर प्राचीनों# का ता मत है कि 'अविवाहित अनेक नायकों 
के विषय मे होने पर ही रति आभास रूप द्वोती है, अन्यथा 
नहीं; अतः यहाँ विवाहित नायकों के विषय मे प्रेम होने के 
कारण रस ही है” । 
विपलंभाभास 
व्यत्यस्तं लपति क्षण' क्षणमथे। मेन समालम्बते 
स्वरिमिन्‌ विद्धाति किश्व विषये दृष्टि निरालम्बनाम्‌ । 
श्वासं दीघमुरीकरोति न मनागड़ षु पत्ते प्रति 
वेदेहीकमनीयताकवलिता हा ! हन्त !! ल्ढेइवरः ॥ 
> ३९ )८ भर 
अटपट बाढूत बैन छुनहि', छुन मैच रहत है । 
सबहि वस्तु पै देत दीठि, पै कछु न गहत है ॥ 
लेत सास अति दीह, तनिक हु न धीरज धारत | 
हा! ढंकेशहि" जनक्सुता-सैंदय सँद्दारत ॥ 


-- इस संत में अरुचि हे, और उसका कारण यह है कि--जिस 
तरह अविवाहित अबेक नायकें से प्रेम अनुचित होता है, उसी प्रकार 
विवाहितों से भी। से यहाँ विवाहित-अविवादहित का पचड़ा ढरूगाना 
ठीक नही, और न लक्षण में ही विवाहित-अविवाहित के किये एथक्‌ 
व्यवस्था की गई है। यह है नागेश का अभिप्राय | 


( २७७ ) 


श्रीमती जनकनंदिनी के सौंदय से प्रत्व किया हुआ 
लंकेश्वर-रावण बड़ा बेहाल हो रहा है। वह थोड़ो देर अट- 
संट वोलतवा है ते थेड़ी देर चुप है जाता है। सब चोजों को 
देखता है, पर उपकी आँखें कहो जम नहों पातों । वह लंवे 
सांस लिया करता है और उसके आगें मे तनिक भी धीरड 
नहीं है। कभी हाथ पटकता है कभी पैर, उम्तसे थोड़ा भी 
शांत नहों रहा जाता | 

यहाँ सीता के विषय मे जो लंकइश का विरहावध्या का प्रेम 

है, से! अतुभयनिष्ठ -केवन्न रावण में--दवेने के कारण और 
जादुगुरु भगवान्‌ राप्तचंद्र की पन्नो के वियय मे होने के कारण 
आभास! रूप है। उसे (प्रेम को ) झ्टपठ वोक्षने के द्वारा 
असिवध्यक्त होनेवात्ञा उन्प्राद, चुप होने के द्वारा व्यक्त हेनेवाला 
श्रम, आलंपनरहित देखते से अमित्यक्त दे।नेवाज्ञा मोह, लवे 
सॉँसे के द्वारा अभिव्यक्त हेनेवाल्ी चिंता और आगें की 
भधीरता के द्वारा अभिव्यक्त देनेवाज्ञी व्याधि, ये संचारी भाव 
भी जगदगुरु की पत्नी के विषय में होने के कारण आभासरूप 
होकर, पुष्ट करते हैं, और उतके द्वारा पुष्ट की हुई आभासरूप 
रति इस पद्म को ध्वनि ( उत्तप्रोत्तम काव्य ) कहे जाने 
का कारण है । 

इसी तरह क्लेशकारी कुपूत आदि के विषय मे वर्णन किया 
जानेवाला भर वीतराग--अ्रथांत्‌ संसार से प्रेम छे/ड़ देनेषाले--- 
पुरुषों मे वन किया जानेबाज्ञा शोक, नरक्षविद्या के अनधिक्रारी 


( २७८ ) 
चंडाल्ादिकों मे वर्शन किया जानेवाल्ा निर्वेद, निदनीय और 
कायर पुरुषों मे तथा पिता प्रश्ुति के विषय में वन किए जाने- 
वाले क्रोध और उत्साह, बाजीगर आदि के विषय में वर्णन 
किया जानेवाल्ला विस्मय, गुरुजन आदि के विषय मे वन किया 
जानेवाल्ञा हास, महावीर में वर्णन किया जानेवाज्ञा भय और 
यज्ञ के पशु के चरबी, रुधिर और मांस आदि के विषय में 
वर्णन की जानेवाली जुगुप्सा 'रसाभास” होते हैं। विस्तार 
हे जाने के भय से हमने यहाँ इनके उदाहरण नहीं लिखे हैं, 
सुबुद्धि पुरुषों का चाहिए कि वे सेच निकाले ! 
भावाभांस 
इसी तरह जिनका विषय भनुचित द्वोता है, वे भाव 
'भावाभास”? कहलाते हैं। जैसे-.. 
सर्वेथपि विस्मृतिपरं विषयाः प्रयाता 
विद्यापि खेदकलिता विम्मुखीबभूव । 
सा केवलं हरिणशावकलेचना मे 
नेवाउपयाति हृदयादधिदेवतेव ॥ 
( हर ६ >( 
सबै विषय बिसरे, गईं विद्या हू विछलात | 
हिय ते वह अधिदेवि-सम हरिननैनि ना जात ॥ 
सभी विषय विस्मरण के मार्ग में पहुँच गए और विद्या भी 
खिन्‍न द्वोकर विभुख दे गई; पर केषल्ञ वह हरिण के बच्चे के 


( २७७ ) 


से नेत्रवाल्वी, अधिदेवता के समान, मेरे हृदय से नहीं हट रही 
है--आज भी ज्यों की तो हृदय में वसी है। यह गुरुकुल में 
विद्याभ्यास करते समय, गुरुजी की पुत्री के ल्ावण्य से मोहित 
हुए पुरुष की अथवा जिधका गमन अत्यंत निषिद्ध है, उस ख्रो 
को स्मरण करते हुए अन्य किसी कौ--जब वह विदेश से 
रहता था, तब की--वक्ति है। 

यहाँ माला, चंदन आदि इंद्रियों के सेग्य पदार्थों में और 
बहुत समय तक सेवन की हुई विद्या मे, अपने को छोड़ देने के 
कारण छतप्नता, और हरिणनयनी ने नही छोड़ा इस कारण 
उसकी अल्लौकिकता, व्यतिरेक ( एक अल्लंकार ) रूप से, अभि- 
व्यक्त होती है। पर वे दोनों स्मृति को ही पुष्ट करती हैं, 
से 'स्पृति-भाव! ही प्रधान है। इसी प्रकार न छोडने मे भी 
जा सार्वदिकता (सब समय रहना ) है, उसे श्रभिव्यक्त 
करनेवाल्ली अधिदेवता# की उपमा भी उसी को पुष्ठ करती है । 
यह स्मृति अनुचित (गुरुकन्या अथवा बैसी ही भ्रन्य) के विषय 
में होने के कारण और अनुभयनिए दोने--अर्थात्‌ केबक्ञ नायक 
से संबंध रखने--के कारण 'भावाभास” है। पर, यदि यह माना 
जाय कि यह उस ( हरियनयनी ) के वर की द्वी वक्ति है, ते 
यह पद्म भावध्वनि? ही है, यह समझना चाहिए । 


शास्त्रीय सिद्धात है कि प्रत्येक वस्तु मे एक अधिदेवता रद्दता है, 
और वह उसे कभी नहीं छोंड्ता । 


( २८० ) 
भावशांति 
जिनके स्वरूप पहले वर्शन किए जा चुके हैं, 
उन भावों में से किसी भी भाव के नाश के भाव- 
शांति! कहते हैं। पर, वह नाश उत्पत्ति के समय का ही 
होना चाहिए--अर्थात्‌ भाव के उत्पन्न होते ही उसके नाश 
का वर्णोन दाना चाहिए, उसके काम कर चुकने के बाद का 
नहीं; क्‍योंकि सहृदय पुरुषों को वही चमत्कव करता 'है। 
उदाहरण लोजिए-- 


मुश्वसि नायापि रुष भामिनि ! प्रुद्िरालिरुदियाय । 
इति तन्व्या पतिवचनैरपायि नयनाब्जकेोणशे।णरुचिः || 
व... #४ >९ भर 
“ज्ञामिनि! अजहु न तजसि तू रिस उनईं धन-पांति ।?? 
गये सुतनु-दग-कोन रेंग सुनि पिय-बच इहि भाति ॥ 

“हे कोपने | तू अब भी रोष नहीं छोड़ती, देख तो, 
मेघों की माला उदय दो आई है?” इस तरह पति के बचनों ने, 
कृशांगी के नेत्र-कमत्ष के फोने में जे प्ररुशकांति थो, उसे, पी 
डाल्ला-वह उत्पन्न द्ोते होते ही उड़ गई । 

यहाँ प्यारे के पूर्वोक्त चचन का सुनना विभाव है, नेत्न के 
कोने मे उत्पन्न हुई ल्ञाई का नाश, भ्रथवा उसके द्वारा श्रमि- 
व्यक्त द्ोनेवाल्रो प्रसन्‍नता श्रतुभाव है और इनके द्वारा उत्पत्ति 
के समय मे द्वी रोष का नष्ट हो जाना व्यंग्य है । 


( २८१ ) 
भावोदय 
इसी तरह भाव की उत्पत्ति के! भावादय कहते 
हैं। उदाहरण लीजिए-- 


वीए्ष्य वक्षसि विपक्षकामिनीहारलक्ष्य दयितरय भामिनी | 
असदेशवलयीकछृतां क्षणादाचकर्ष निजवाहुबरलहरीस ॥ 
है र 4 २ 
देखि भामिनी दुयित-उर हारचिह्न दुख-सूरि । 
गढ लिपदी निञ-भ्रुजज्ञता कीन्हदी छिन में दूरि ॥ 
कोधिनी नायिका ने, प्यारे की छाती पर, सौत के हार का 
चिह् देखते ही, जे वाहु-लता कंधे के चारों ओर लिपट रही 
थी, उसे तत्काल खींच लिया | 
यहाँ भी प्यारे के वक्त;स्थल् पर सात के हार का चिह्न 
दीखना विभाव है और उसके कंधे पर से लिपटी हुईं भुजल्नता 
का खीच लेना अनुभाव है। इनसे रोषादिक व्यंग्य हैं | 
यद्यपि भावशांति मे किसी दूसरे भाव का उदय और 
भावादय मे किसी पूर्व भाव की शाति आवश्यक है, तात्पय यह 
कि भावशांति और भावेदय एक दूसरे के साथ नियत रूप से 
- रहते हैं, झत:ः इन देने के व्यवहार का विषय प्रथक्‌ प्थक नहों 
है। सकता । तथापि एक ही स्थल पर दोनों ते चमत्कारी 
हो नहीं सकते, और व्यवहार है चमत्कार के झ्धोन-- 
- अर्थात्‌ जो चमत्कारी द्वागा उसी की ध्वनि वहाँ कह्दी जायगी; 


( रपर ) 


अतः देने के विषय का विभाग हो जाता है, चमत्कार के 
अनुसार उनको पृथक्‌ प्रथक्‌ समझा जा सकता है । 


भावसंधि 


इसी तरह, एक दूसरे से दबे हुए न हों, पर एक 
हूसरे के दबाने की योग्यता रखते हों, रेसे दे। भाषे 
के एक स्थान पर रहने के। 'भाव-संधि” कहते हैं ॥ 
उदाहरण लीजिए--.. 
योौवनेहमनितान्तशक्लिता। शौलशैयबलकान्तिलेमिताः । 
संकुचन्ति विकसन्ति राघवे जानकीनयननीरजश्रियः || 
३९ भर भर ५ 
जाबन-उद्गम ते सु अहै जे अतिसे शंक्तित। 
शीछ, शौय, बल्ल, कांति देखि पुनि जे है लेमित ॥ 
ते मिथिराधिप्सुता-नयनकमढनि की शोभा। 
सेकुचत विकसत निरखि रामतन छहि-छ॒हि छोभा ॥ 
एक सखी दूसरी सखी से कहती है--यावन के उत्पन्न हो _ 
जाने के कारण अत्यंत शंकायुक्त और सच्चरित्रता, शूरवीरता, 
बल और कांति के कारण ल्ोभयुक्त श्रीज्ककनंदिनी के नेत्र- 
कमलों की शोभाएँ, श्री रघुबर के विषय में, संकुचित और 
विकसित हो रही हैं । 
यहाँ भगवान्‌ रामचंद्र के अंदर संसार भर से श्रेष्ठ यौवन 
की उत्पत्ति का एवं वैसी ही सच्चरित्रता, शूरवीरता आदि 


( २८३ ) 


का, देखना विभाव है, तथा नेत्नों के संकोच और विकास 
अलुभाव हैं; और, इनके द्वारा लजा और ओऔत्सुक्य मामक 
भावों की संधि व्यग्य है | 


भावशवत्तता 


रक दूसरे के साथ बाध्य-बाधकता का संबंध 
रखनेवाले अथवा उदासौन रहनेवांले भावों के 
मिश्रण के 'भावशबलता' कहते हैं। मिश्रण शब्द का 
अथे यह है---कि अपने अपने वाक्य मे पृथक पृथक रहने पर 
भी, महावाक्य का जे चमत्कारोत्पादक एक वोध द्वोता है, 
उसमे सबका अल्ुभूत हे जाना । उदाहरण जल्ीजिए-- 
पापं.हनत | मया हतेन विहित सीताअपि यद्यापितां _ 
सा मामिन्दुम्ुखी बिना वत ! बने कि जीवित धास्यति। 
आलोकेय कर्थ॑ मुखानि कृतिनां कि ते वद्ष्यन्ति माम्‌ 
राज्यं यातु रसातलं पुनरिदम्‌, न प्राणितं कामये ॥ 
८ ९ ८ ५ 
जो सीतहि में म्तक तजी हा ! किया पाप यह। 
मे। बिन वन में कहा जिएगी विधुवदनी वह ॥ 
किमि सज्जन-मुख नेन यहे मस देखि सकेंगे । 
अँगुरिन मोहि दिखाय हाय ! वे कहा कहेंगे ॥॥ 
जाय राज्य पाताछ् यह मोहि' न याक्ी , चाह है। 
प्रान हु करें पयान सुदि' इनकी ना परवाह है॥ 


( २८७ ) 


सीता को वनवास देने के अनंतर भगवान्‌ राम कहते हैं-. 
अरे । मुझ सतक ने सीता को भी (जो पतित्रताओं मे 
प्रधान है ) निकाज्न दिया--यह पाप किया है, हाय | क्‍या 
चह चंद्रवदनी मेरे बिना जंगल मे जी सकती है? मैं भत्ते 
मानुसों का मुँह कैसे देखूँ। वे मुझे क्या कहेंगे । यह 
राज्य रसातल मे जाय, में जीना नहो चाहता ! 

यहाँ अरे | मुझ मृतक ने! इस शब्द खंड से श्रसया 
सीता को भी निकाल दिया? इससे विधाद्‌, “यह पाप किया 
है?! इससे मत्रि, वह चंद्रवदनी” इससे रश्नुति, क्या मेरे 
विना जी सकती है ?! इससे वितके, में भत्ते मानों का 
मुह कैसे देखूँ।” इससे लज्जा, वे मुझ्ते क्या कहेंगे? इससे 
शंका, और “यह राज्य रसातत्ष मे जाय, मैं जीना नहीं 
चाहता !! इससे निवंद्‌; ये भाव पूर्वोक्त विभावों के द्वारा 
अभिव्यक्त दोते हैं और उनकी यहाँ शब्ञता हो गई है । 


शबलता के विषय में विचार 


काव्यप्रकाश की टीका लिखनेवालो ने जे यह लिखा है कि 
“उत्तरोत्तर भाव से पूर्व पू भाव के उपमर्द (दबा दिए जाने) 
का नाम शबल्नता है”; से। ठीक नहीं; क्योंकि 'पश्येत्‌ कश्चि- 
चचल चपत्न रे ! का त्वरा५हं कुमारी, हस्तालंबं वितर हहहा | 
व्युक्कमः कासि यासि ।? इस पद्म में शंका, झछूया, धृति 
स्वृति, श्रम, देन्‍्य, मति और श्रौत्सुक्य भाव, यद्यपि एक दूसरे 


( २८५ ) 

का छोशसात्र भी उपमद नहीं करते--परस्पर किचिन्मात्र भी 
नही दबाते--तथापि स्वयं काव्यप्रकाशकार ने ही, पॉँचवें 
डरलास में, इन सवकी शवत्ञता को राजा की स्तुति में गुणी- 
भूत बतत्ाया है। यदि आप कद्टे कि--- अनेतरभावी विशेष- 
गुण से पूर्वभावी विशेष-गुण का नाश हो जाया करता है?” 
यह नियम है, और चित्तदृत्तिऱृप भावों का, नैयायिकों के 
सिद्धांत के अनुसार , इच्छा झादि विशेष-गुण मे समावेश होवा 
है, अत: बिना पूर्वभाव का नाश हुए उत्तर भाव उत्पन्न दी 
नहीं हो सकता, से आझ्रापका कद्दना ठीक नहीं। ते हम 
कहेंगे कि--आप जिसकी वात कर रहे हैं, बह नाश न ते 
व्यंग्य होता है, न उसका नाम उपमर्द है, न चमत्कारी ही है 
कि उसे व्यंग्यों के भेदों से पृथक गिना जाय | इस कारण 
यों मानना चाहिए कि-- 


नारिकेलनलक्षीरसिताकदलमभिश्रणे । 
विलक्षणे यथा>स्वादा भावानां संहता तथा || 


अर्थात्‌ जिस तरद्द नारियक्ञ के जल्न, दूध, मिश्री और 
केलें के मिश्रण में विज्कत्तण स्वाद उत्पन्न हो ज्ञाता है, उसी 
प्रकार भाव के मिश्रण मे भी होता है। तात्पय यह कि-- 
जैसे पूर्वोक्त नारियल के जल्ल आदि पदार्थ, मिलने पर, एक 
दूसरे का स्वाद नष्ट नहीं करते, कितु सब सिलकर, अपना- 
अपना स्वाद देते हुए भी, एक नया स्वाद उत्पन्न कर देते हैं; 


( र८६ ) 
उसी तरह भाव भी अपना अपना आस्वादन करवाते हुए भी एक 
नया आस्वादन उत्पन्न कर देते हैं | 


भावश्ांति आदि की ध्वनियों में भाव प्रधान 
होते हैं, अथवा शांति आदि ! 


यहाँ यह समझ लेने का है कि जे। ये भावशांति, भावो- 
दय, भावसंधि भर भावशबत्लता की ध्वनियाँ उदाहरणों में दी 
गई' हैं, वे भी भावध्वनियों ही हैं। जिस तरह विद्यमानता 
की अवस्था मे भावों का आखादन किया जाने पर अवस्था का 
प्राधान्य नहों, कितु भावों का प्राघान्य माना जाता है, इसी 
प्रकार उत्पन्न होते हुए, विनाश द्ोते हुए, एक दूसरे से सटते 
हुए और एक साथ रहते हुए श्राखादन किए जाने पर भी 
भावों की ही प्रधानता उचित है, क्योंकि चमत्कार का विश्राम 
वहीं ( भाव की चर्वणा मे दी ) जाकर होता है, केवल्न अवस्या 
मात्र से नहीं। यद्यपि उत्पत्ति, विनाश, संधि और शब- 
लता का तथा उनसे संबंध रखनेवाले भावों क्ा--देनें का-- 
आस्वादन समानरूप मे होता है, अत: कौन प्रधान है श्रै।र 
कौन अप्रधान यद्द नहों समक्ता जा सकता; तथापि जब स्थिति 
की अवध्था मे भावों की प्रधानता मानी जा चुकी है, तब भाव- 
शांति आदि मे भी जिनके शांति आंदि हैं, उन अभिव्यक्त 
होनेवाले भावों मे ही प्रधानता की कल्पना करना उचित है। 
पर यदि यह खोकार करोगे कि भावशांति आदि में भाव 


हे ( श८७ ) 
प्रधान नहीं हैं! किंतु गौण हैं और शांति आदि प्रधान हैं, ते 
जिन काव्यों मे भाव व्यंग्य होते हैं और शाति आदि वाच्य 
होते हूँ, उनके आप भावशांति श्रादि की ध्वनियों नहीं कह 
सकते । जैसे कि-. 

उपसि प्रतिपन्ननायिकासदनादन्तिकमश्वति प्रिये | 

सुदशे। नपनाब्नकेणये[रुदियाय लस्याःरुणग्रुति! ॥ 

भर | | भ८ 


सैति-सदन ते निञ्निक्ट पिथ आए छखि आत | 

सुतनु-नयन-काननि उदे भद्दे तुरत दुति रात ॥ 
एक सखी दूसरी सखी से कहती है कि--विरेधिनी 
नायिका ( सौत ) के घर से, सवेरे के समय, जब प्रियतम 
अपने घर आए, ते घुनयनी नायिका के नयनकमलो के कोजों 

में कट अरुण काति उदय हो आई। 

यहाँ मूल मे 'उदियाय” शब्द के द्वारा भाव के डदय की 
प्रतीति वाच्यरूप से ही कराई जा रही है। पर यदि आप 
कहे कि उदय के वबाच्य होने पर भी भाव के वाच्य न होने 
के कारण इस काव्य को ध्वनि मानने में कोई बाधा नहीं 
ते हम कह सकते हैं कि आपके हिसाब से जो प्रधान है 
उदय, वह जब काव्य को ध्वनि कहलवाने की योग्यता नहीं 
रखता, तब अग्रधान ( भाव ) के कारण काव्य को ध्वनि 
कहना कैसे बन सकता है ? पर हमारे मत में ते उत्पत्ति 


( र८८ ) 


के वाच्य होने पर भी जो उत्पत्ति से व्याप्त अमरष-भाव प्रधान 
है, उसके वाच्य न होने के कारण, इस पद्म को भावादयध्वनि' 
कहना उचित ही है। 

इसी तरह आपके मत से भाव ध्वनित देता हे और शांति 
वाच्य हो, ते वहाँ भी भावशांति की ध्वनि न होगी । जैसे-- 


क्षमापणेकपदयेः पदये। पतति प्रिये। 
शैर्रुः सरोजनयना नयनारुणकान्तयः ॥ 


रे ९ > ५ 


छुमा करावन झुख्य थक चरन परे जब कांत । 
कप्तठनयनि के नयन की अरुन काति भई शात ॥ 
एक सखी दूसरी सखी से कहती है कि--क्षमा करवाने 
क॑ सब प्रधान स्थान चरशो पर पति के गिरते ही कमलनयनी 
के नेत्रों की अरुण कांतियाँ शांत हो गई । 
यदि आप कहें कि--शन पद्मों“मे, शब्दे के द्वारा वाच्य 
जो शांति आदि हैं; उनका अन्वय अरुणकांति के साथ ही है, 
अमर्थष आदि भावों के साथ ते है नही; अतः यहाँ अरुणकाति 
के शांति आदि ही वाच्य हुए, न कि उनसे अभिव्यक्त होने- 
वाले रोषशांति आदि | कारण, व्यग्य और व्यंजक दोनों 
पृथक्‌ पृथक द्वोते हैं--यह ते। अवश्य मानना पड़ेगा; से यहाँ 
अरुणकाति की शांति के वाच्य होने पर भी रोष की शांति 
व्यंग्य ही रद्दी; क्योकि अरुणकांति की शांति व्यंजक है और 


( रद्द ) 


शेष की शांति व्यंग्य । यदि हम कहें कि--भरुणता के द्वारा 
व्यंग्य जे! रोष है, उसी का वाच्य शांति झादिं के साथ झन्वय 
है-..अ्र्थात्‌ हम व्यंग्य का ही वाच्य के साथ अन्वय मान लेते 
हैं तो आप कहेंगे, यह उचित नहीं। क्योंकि यह सिद्ध 
है कि पहले वाच्य की प्रतीति द्वावी, है,फिर व्यंग्य की; तब यह 
मानना पड़ेगा कि--जिस समय वाच्यों का भ्रन्वय होगा, उस 
समय व्यंग्य -उपस्थित ही नहीं हो सकता; फिर बताइए वाच्यों 
के साथ व्यंग्यों का झन्वय कैसा ? दूसरे, यदि ऐसा ही मानों 
ते प्रथम-पद्म (उधसि, ..) मे 'सुनयनी के नयन-कमल्षों में? इस 
वाक्यखंड का अन्वय नहीं हो सकता; क्योंकि झमर्ष तो चित्त- 
वृत्तिरूप है, वह झोँखें मे आधेगा केहों से ? अतः उंन वाच्य 
शांति आदि का अरुणकांति आादि के साथ ही अन्वय मानना 
ठीक है; से इन पद्यों में भावशांति आदि वाच्य नेंहाँ हो सकती। 
पर ऐसा न कहिए । क्‍योंकि ऐसा मानने पर भी-- 
निवांसयन्तीं धरतिमड्नानां शोभां हरेरेणहशों घयन्त्याः । 
चिरापराधस्मृतिमांसलोपि रोष क्षणप्रापुणिके वभूव ॥ 
>९ ८ ् 

स्मृति ते अतिबल भई सुचिर अपराधनि गन की। 

कीन्हीं जाने परम विवशता निज तन-मन की॥ , 

सो रिस मिस से कीन्ह भई पाहुनि इक छुन की | 

जुवतिन धीरज-हरनि निरखि शामा हरि-तन की॥ 

२००७-१७ 


( २६० ) 


एक सखी दूसरी सखी से कहती है कि--ञ्रियों के थैये को 
बल्ात्‌ निकाल फेंकती हुई भगवान्‌ कृष्णचंद्र की शोभा सृगनयनी ' 
ने ज्योंदी पान की, ट्योंद्ी बहुत समय के अपराधों के स्मरण के 
कारण अत्यंत प्रबल्ल हुआ भी रोष एक क्षण भर का पाहुना हे। 
गया--उसका थोड़ा भी साहस न हुआ कि कुछ ते ठहरे | 
इत्यादिक प्य भी भावशांति की ध्वनियों होने तञगेंगे। 
क्योंकि यहाँ यद्यपि रोष भाष वाच्य है, तथापि आपके हिसाब 
से जे प्रधान है, पद शांति “ज्ञण भर का पाहुना हुआ” इस 
अथे से व्यंग्य है। अब यदि झाप कहें कि भाव और 
शांति दोनों का व्यंग्य देना प्पेक्षित है, ते यह भी ठीक 
नहीं; क्‍योंकि पूर्वोक्त दोनों पद्मों में शांति रूप से शांति 
(फिर वह रोष की दे! चाहे अरुण कांति की ) और इसी 
तरह उदय रूप से उदय (फिर वह अमर्ष का हो चांद 
झरुण कांति का ) वाच्य हे गए हैं, अतः वे पथ्य उन दोसों 
ध्वनियों के उदाहरण न हो सकेंगे। और इस बात को 
सोकार कर लेना--कह देना कि हम ते इन्हें भावशांति और 
भावादय की ध्वनियाँ मानते ही नहीं, सहृदयों के दिये अनुचित 
है। अतः यह सिद्ध होता है कि भावशांति आदि में भी प्रधान- 
तया भाष ही चमत्कारी होते हैं, शांति आदि ते गाौण दोते 
हैं; से उनका वाच्य द्वोना देष नही ! 
हॉ, भावों की ध्वनियों से भावशांति आदि की ध्वनियों 
के चमत्कार की विज्कक्षणता मे मुख्य कारण यह है कि भाव 


( २६१ ) 


ध्वनियों में भावों का स्थिति के साथ अ्रमषे श्रादि के रूप में 
अथवा केवल अमर्ष आदि के रूप में ही आखादन द्ोता है; 
पर भावशांति आदि की ध्वनियों में भावों के साथ शांति आदि 
को अवश्यावाले होने का भी भास्वादन देता है । 


रसें की शांति आदि की ध्वनियाँ क्‍यों नहीं होतीं १ 
रसें मे तो शांति आदि होते ही नहीं; क्‍योंकि उनका 
मूल है स्थायो भाव; और यदि उसकी भी उत्पत्ति और शांति 
होने लगे ते उसका स्थायित्व दी नष्ट हे। जाय, उसमें और 
साधारण भावों मे भेद ही क्‍या रहे ? पर यदि कहो कि 
स्थायी भाव की भी श्रमिव्यक्ति के तो नाश आदि द्ते हैं, 
बस, उनका ही उसके शांति आदि मान लेंगे, से उसमे 
कुछ चमत्कार नहीं; क्योंकि झ्रभिव्यक्ति के नाश के उपरांत 
रहेगा ही क्या ? इस कारण उसका यहाँ विचार नहीं किया 
जा रहा है। 
रस भाव आदि अलक्ष्यक्रम ही हैं अथवा लक्ष्यक्रम भी ! 
यह जो पूर्वोक्त रति आदि व्यंग्यो का प्रपंच है, वह जहाँ 
प्रकरण स्पष्ट हो, वहां, जो पुरुष अत्यंव सहृदय है, उसे 
तत्काल विभाव, अरठुभाव और व्यमिवारी भावों का ज्ञान हो 
जाता है, और उसके होते ही, बहुत ही थोड़े समथ में प्रतीत हों 
जाता है, भरत: अलनुभवकर्त्ता को कारण शोर कार्य की पूर्वा- 
परता का क्रम्न नहो दिखाई पड़ता, से इसे झत्लस्यक्रम! कहा 


( रचुरे ) 


जाता है। पर, जहाँ प्रकरण विचार करने के अनंतर ज्ञात 
होता है| और जहाँ प्रकरण के स्पष्ट होने पर भो विभावादिकों 
की तर्कना करनी पड़े, वहाँ सामग्री के विलब के अधीन 
होने के कारण चमत्कार मे कुछ मंदापन आ जाता है, वह 
धीरे धीरे प्रतीत होता है; से वहाँ यह रति आदि व्यंग्य- 
समूह संलक्ष्यक्रम भी होता है। जैसे--“वल्पगताएपि च॑ 
सुतनुः'***** ” इस्र पय में, जो कि पहले उदाहरण मे आ चुका 
है, 'संप्रति! इसके अथे का ज्ञान विलंब से होता है। से 
उन्हे संलक्ष्यक्रम व्यंग्य भी मानने मे कोई बाधा नहीं। और 
यह भी नहीं है कि रति आदि की ध्वनियाँ जिस प्रमाण से 
प्रहण की जाती हैं, उस प्रमाण से उनकी असंल्तक्ष्यक्रमव्यंग्यता 
सिद्ध होती हो, जिससे कि हमे उन्हें झसंलक्ष्यक्रम व्यंग्य 
मानने के लिये बाध्य होना पड़े । तात्पये यह कि वे संज्षक्ष्य- 
क्रम व्यंग्य होते ही न हों, सो बात नही है। अतएव लक्ष्य- 
क्रमा के प्रसेग मे आनन्द्वर्धनाचाये (ध्वन्यालेककार ) का यह 
कथन है कि “शवंवादिनि& देवों पाश्व पितुरधे- 
_मुखी। लींलाकमलपचाशि गणयासास पावती ॥ 

-* यह पद्य 'कुमारसंभवः का है। इसका पूर्व प्रसंग और अर्थ 
यों है। पावेती देवी की तपस्या से प्रसन्न द्वेकर भगवान्‌ ।शव ने उन्हें 
चरण करने के लिये वरदान दिया । और उसका परिपाकन करने के 
लिये उन्होने सहषि नारद को पार्वती के पिता पर्वतराज हिसालय के 


पास सेज्ञा। जब वे उससे विवाह प्रसंग की बात कर रहे थे, उस समय 
की कवि की उक्ति है कि--.. 


( २७३ ) 


इस पद्य मे बालिकाप्रें के खभाव के अनुसार भी सुख .की 
नम्नता सहित खेलने के कमश्नों के पत्रों का गिनना सिद्ध हो 
सफता है; अतः, थोड़े बिलंब से, जब नारदजी के किए हुए 
विवाह फे प्रसंग का ज्ञान होता है, तब, पीछे से, क्ज्जा का 
चसत्कार होता है, से यह ( क्ष्जा की ) ध्वनि ( अभिव्यक्ति ) 
छक्ष्यक्रम है।” ओर अमिनवशुप्ताचाय ( ध्वस्यात्ञाक की 
टीकाल्लोचन के कत्ता ) का भी यह कथन है कि “रस भाव 
आदि पदार्थ ध्वनित ही होते हैं, कभी वाच्य नहीं होते, 
तथापि सभी भ्रत्नक््यक्म का विषय नहों हैं--श्र्थात्‌ वे 
संत्नक्ष्यक्रम भी हैं !?” 

पर, यहाँ यह कहा जा सकता है कि यदि ये रसादिक 
संलक्ष्यक्रम भी हों, ते प्रनुरणनात्मक ध्वनियों के भेदों के 
प्रसेग मे “अ्रथेशक्तिमूलक ध्वनि के बारह भेद होते हैं” । यह 
अमिनवगुप्त की उक्ति और “से यह बारह प्रकार का है”- 
यह मम्भट भट्ट की उक्ति असंगत हो जायगी | क्योंकि व्यंजक 
धरंथे दे! प्रकार का होता है--एक वस्तुरूप, दूसरा अलंफाररूप | 
प्रौर उनमे से प्रत्येक खतःसंभवी ( अर्थात्‌ संसार में उपब्ध 
हो सकनेवात्ञा ), कविश्रौद्ोक्तिसिद्ध ( प्र्थात्‌ कविकल्पित कथन. 
मात्र से सिद्ध ) और कविनिबद्धवत्तपौद़ोक्तिसिढ़ ( अर्थात्‌ कंवि: 
ने जिसका पपने प्रंथ मे वर्शेन किया है, उस वक्ता की ग्रौद्ोक्ति 
अप कक 2क पक: 82404 + पक 2:34 28 


नारदजी ने पिताजी के पास इस तरह बात की, ते पावती नीचां 
झुंह करके जे खेलने के कमछ थे, उनके पन्नों को गिनने छृगी | 


( २६४ ) 


मात्र से सिद्ध ) इन तीन तीन उपाधियों से युक्त होते हैं; ध्रतः 
जिस तरह व्यंग्य वस्तु और अलंकार ६-६ रूपों मे अभिव्यक्त 
होते हैं, उसी श्रकार रखादिक भी ६ रूपों में अमिन्यक्त 
होंगे, और इस तरह पूर्वोक्त मेद, बारह की जगह झठारह 
होने चाहिएँ। 

इसका प्रत्युत्तर यह है कि अभिनवगुप्तादिकों के श्रमि- 
प्राय का इस तरह वर्णन कर दे कि स्पष्ट भ्रतीत होनेवात्ने 
विभाव, अनुभाव और व्यमिचारी भावों के परिज्ञान होने के 
अनंतर, क्रम का ज्ञान न होकर, जिस रति आदि स्थायो भाव 
की अभिव्यक्ति होती है, वही रसरूप बनता है, क्रम के क्कक्तित 
होने पर नहीं । क्योंकि रखरूप होने का अर्थ ही यह है कि 
स्थायी भाव का, झट से उत्न्न होनेवाल्षे अलौकिक चमत्कार 
का विषय बन जाना, यह नहीं कि धीरे धीरे समझने के बाद 
उसमे अलौकिक चमत्कार का उत्पन्न हे जाना। अतः जिस 
रति-आदि की प्रतीति का क्रम लक्षित हो जाता है, उसे वर्तु- 
मात्र--अर्थात्‌ केवज्ञ रति आदि ही--कहना चाहिए, रसादिक 
नहीं । से! उनकी उतक्तियों का विरोध नहीं रहता । तात्पये यह 
कि इस तरह रस आदि के छः: भेद भी वस्तु के ही अंतर्गत हो 
जाते हैं, सो अ्रठारह भेद लिखने की आवश्यकता नहीं रहती । 
पर, इस बात को सिद्ध करने के लिये कि अल्क्ष्यक्रम दोने पर 
ही रस मानना चाहिए और लक्ष्यक्रम होने पर नहीं”; युक्ति 
विचारने की आवश्यकता है। अर्थात्‌ इस कथन में कोई युक्ति 


( ररूर ) 


नहीं है, अतः संत्क्ष्यक्रम होने पर भी रस मानने में कोई वाधा 
नहीं# । रहा पूवोक्त अभिनवगुप्त का वाक्य, से। उसमे जो 'रस, 


« यहाँ भी बागेश भट्ट की टिप्पणी है, और मार्मिक हैं। वे कहते हैं 
कि विभाव आदि की अतीति और रस की पअतीति में जो सूक्ष्काल 
का अंतर होता है, जिसे कि क्रम कहा जाता है, उसकी यदि सहृदय 
पृरुष को अतीति हो जावे, तो विभावादिकों के और रस के पृथकू-प्रथक्‌ 
अतीत होने के कारण, रति आदि की प्रतीति के समय भी विभावाविकों 
की अतीति प्रथक रहेगी, ओर इस तरह विगलितवेद्यांतरता--अर्थात्‌ रस 
के ज्ञान के समय दूसरे ज्ञातब्य पदार्थों का न रहना-नहीं वन सकती। 
आर जब तक वह न बने, तब तक उसे रस कहा ही नहीं जा सकता | 
रही रस की विगलितवेद्यांतरता, से! वह तो सभी सहृदयें के। सेमत है, 
अत. आप ( पंडितराज ) का भी है ही । से इस बात में साधकयुक्ति 
है, फिर इसे धुक्तिरहित कहना ठीक नहीं । यह तो है प्राचीन विद्वानों 
की रीति से समाधान | 

अ्रव नवीन विद्वानों का समाधान सुनिए | वे कहते हैं कि--कोई 
पद अथवा पदार्थ वक्ता आदि की विशेषता और अकरण झआादि का साथ 
होने पर ही व्यंजक दे! सकता है; अतः यह सिद्ध दाता है कि उनके 
सह्दित ही विभावादिक्नों का ज्ञाब होने के अनंतर रख की अतीति होती 
है, और विभाव आदि के ज्ञान तथा रस की प्रतीति के मध्य में जो क्रम 
रहता है, उसके न दिखाई देने के कारण अल्ध्ष्यक्रम कहा जाता है । 
अब सोचिए कि यदि अ्रकरण आदि के ज्ञान का विलंब होने से विभाव 
आदि के ज्ञान में विलंव है| भी जाय, तथापि, पूर्वोक्त उदाहरण में, 
अलक्ष्यक्रमता से कोई बाधा नहीं होती | क्योकि विभावादिकों के ज्ञान 
श्रार उसके उत्पन्न करनेवाले अकरणादि के ज्ञान के क्रम को लेकर 
अलक्ष्यक्रमता नहीं मानी जाती, किंतु विभावादिकों के ज्ञान से उत्पन्न 
देनेवाले रस आदि के ज्ञान के क्रम को लेकर मानी जाती है । इसी 


( २ूूई ) 


भाव आदि! अर्थ लिखा है, वहाँ 'रस आदि! शब्द का अथे 
(रति झादि! समझना चाहिए, वास्तविक रस नहीं । 


घ्वनियों के व्यंजक 


से इस तरह यह जो रस आदि ध्वनियों का व्यंजक 
निरूपण किया गया है, उसकी अभिव्यक्ति पदों, वर्णों, रच- 
नाओ्रों, वाक्‍्यों, अ्रबंधों ( मंथें ) और पद के शशों एवं जो 
अक्षररूप नहों हैं, उन रागादिकों के द्वारा निरूपण की जाती 
है। उनमें से प्रत्येक का विवरण सुनिए-- 

पदध्वनि 

यद्यपि वाक्य के अंतर्गत जितने पद द्वोते हैं, वे सभी 
अपने अपने झथ्थ को उपस्थित करके, समान रूप से ही, वाक्यार्थ 
के ज्ञान का साधन होते हैं, तथापि उनमें से कोई एक ही पद 


अभिप्राय के अनुसार “अरथेशक्तिम्ूलक के १२ भेद होते हैं?” इस अभि- 
नवगुप्त की उक्ति के और विभावादिकों के अतिरिक्त अन्य किसी 
चाच्याथ की अपेच्ा से क्रम भी ग्रहण किया जा सकता है, से रूक्ष्यक्रम 
होने की उक्ति कोे--दोनें के--किसी तरह ठीक कर लेना चाहिए | 
सहृदये| का अनुभव इस बात की साज्षी नहीं देता कि विभावादि की 
प्रतीति के अतिरिक्त अन्य किली वाच्याथे की अतीति होने पर भी बिग- 
लितविद्यांतरता दो जाय, कि जिससे वाच्याथ और विभावादि के क्रम 
का ज्ञान होने पर भी रखसत्व नष्ट हो जाय। तात्पय यद कि विगलित- 
वेयांतरता विभावषादि की घतीति और रस की प्रतीति का क्रम न 
जानने पर हो जाती है, वाच्यार्थ और विभावादि छे क्रम से उससे कुछ 
संबंध नह । 


( २७७ ) 


काम कर जानेबाला अतएव चमत्कारी होता है कि जिसके 
कारण वाक्य को ध्वनि ( उत्तमात्तम काव्य ) कहा जा सके | 
जैसे-..'मंदमाक्षिपति?? प्रथवा “हरुए रही उठाय” इसमे 
#संदमू? अथवा, #हुरुए? शब्द हि 
वर्ण, रचना ध्वनि 

रचना और भ्रक्षर, यद्यपि पदों और वाक्यों के अंतर्गत 
द्वोकर ही व्यंजक द्वोते हैं, क्योंकि प्रथक्‌ रचना और अक्षरमात्र 
ते व्यंजक पाए नहीं जाते; अत: यह कहा जा सकता है कि 
वैसी रचना और बरण से युक्त पद और वाक्य व्यंजक द्वोते 
हैं। से उनकी व्यंजकता मे जे। पदार्थ विशेष रूप से रहने- 
वाल्षे हैं, उन्हीं में इनका भी प्रवेश हो जाता है, भ्रतः इन्हें 
खतंत्र रूप से व्यंजज मानने की आवश्यकता नहीं रहती, 
तथापि पदों और वाक्यों से युक्त रचना और वर्ण व्यंजक है 
अ्रथवा रचना और वर्ण से युक्त पद और वाक्य, इन दोनों मे 
से एक बात को प्रमाणित करने के लिये कोई साधन नहीं है, 
इस कारण प्रत्येक की व्यंजकता सिद्ध द्वो जाती है। जेसे कि 
घड़े का कारण चाकसहित डंडा माना जाय अथवा डंडा- 
सहित चाक; इनमे से जब एक बात को सिद्ध करने के लिये 
फोई प्रमाण नहीं है, वब--चाक और उसे फिराने का डंडा-- 
देनों प्रथक्‌ प्रथक्‌ कारण मान लिए जाते हैं। से! वर्ण और 
रचना को भी प्रथक्‌ व्यंजक मानना अजुचित नहीं। यह ते है 
प्राचीन विद्वानों का मत | 


( २८८ ) 


परंतु नवीन विद्वानों का उनसे मतभेद है। वे कहते हैं 
पकि--वर्ण और उनकी भिन्‍न भिन्‍न प्रकार की वैदर्भी आदि 
रचनाएँ माधुय आदि गुणों को ही अभिव्यक्त करती हैं, रसों 
को नहीं; क्योंकि ऐसा मानने मे एक ते व्यथे ही रसादिकों 
के व्यंजकों की संख्या बढ़ती है; दूसरे, इस्रमें कोई प्रमाय भी 
नहीं। पर, यदि आप कहे कि माधुये आदि गुण रसों मे रहते 
हैं, अतः उन्हें अभिव्यक्त किए बिना केवल गुणों की अभिव्यक्ति 
कैसे की जा सकती है ? से ठीक नहीं; क्योंकि बिना गुणी 
की अमिव्यक्ति के गुणों की प्रमिव्यक्ति न देती हो--यह कोई, 
नियम नहीं है। देखिए, इस नियम का, नासिका आदि 
तीन इंद्रियों मे, भंग हो गया है। थे गंघ आदि गुणा को 
अमिव्यक्त करती हैं, पर उन गुणों से युक्त प्रथिवी भादि 
पदार्थों को नहीं। अर्थात्‌ नाक से प्रथिवी का अनुभव नहीं 
होता, फेवल गंध का ही होता है इत्यादि। इस तरह यह 
सिद्ध देता है कि गुणी, गुण कऔर इनके अतिरिक्त अन्य 
तटस्थ पदार्थों को अपने अपने अभिव्यंजक उपस्थित करते हैं; 
फिर वे कभी परस्पर संमिलित रूप से और कभी उदासीन रूप 
से उन उन ज्ञानों ( दशन-श्रवणादिकों ) के बिषय हो जाते हैं, 
वैसे ही रस और उनके गुण भी अभिव्यक्ति के विषय देते हैं-- 
अर्थात्‌ वे प्रथकू प्रथक्‌ व्यजकों से उपस्थित किए जाते हैं, 
और, फिर कभी सम्मिलित रूप से तथा कभी उदासीन रूप से 
अहय किए जाते हैं। सारांश यद्द कि वर्यों प्रौर रचनाओं को 


( रेचड ) 
रसें का व्यंजह सानना ठीक नही, उन्हें केवल गुणों का 
व्यंजक मानना चाहिए । 
वर्णों भार रचनाओं की व्यंजतता का उदाहरण “ता 
' तमालतरकांतिलंधिनौस्‌.,.?! इत्यादि पहले बता ही 
चुके हैं। 


वाक्यभ्वनि 
वाक्यों की ब्यंजकवा का उदाहरण भी ''झाविभूता यद- 
बधि मधुस्य॑दिनी, ... ..!? इत्यादि दिखाया जा चुका है | 
प्रबंधध्वनि 


प्रबंधा--अर्थात्‌ मंथों--की व्यंजकता फे विषय से सुनिए । 
शांद-रस का उदाहरथ है “योगवासि9” एवं करुण-रस का 
उदाहरण है “रामायण”? । और रत्नावत्ञो आदि ते शऋगार 
के व्यंजक द्वोने के कारण प्रसिद्ध ही हैं। रहे भाव के उदा- 
हरण, से उन्तमे मेरी ( पंडितराज की ) बनाई हुईं “गंगा- 
खइरी” आदि पॉच लहरियाँ हैं | 

पदैकदेशध्वनि 

पदों के झंशों की ब्यंजजता का उदाहरण, जेसे पूवोक्त 
“निखिलमिदं जगदंडक॑ वहामि?” इस पद्यांश मे अ्रल्पाथेक 'कः 
रूपी वद्धित-प्रत्यय बीर-रस का भ्रमिव्यंजक है। अर्थात्‌ उस 
प्रद्यय से वाक्य का यह तात्पये हो गया, कि यह छाठा सा 
जगत्‌ का गोल्षा क्या चीज है, जिससे वक्ता का उत्साह, जो 
वीर-रस का स्थायी भाव है, प्रतीत द्वोता है। इसी तरह 


( ३०० ) 
रागादिकों की भी व्यंजकता 
मे सहदयों का हृदय ही प्रमाण है। अर्थात्‌ यदि उन्का 
अज्ुभव है, तो उसे भी स्वीकार करना चाहिए | 
इस तरद्द इन रसादिकों के प्रधान होने पर उदाहरण निरू- 
पण॒ कर दिए गए हैं। जब ये गौण हो जाते हैं, तब उनके 
उदाहरण और नाम ( रसवान्‌ आदि ) वर्णन किए जायेंगे [* 


एक विचार 


इस विषय से भी विद्वानों का मतभेद है। कुछ विद्वान 
कहते हैं कि--“जब ये रखदिक प्रधान होते हैं, तभी इनको 
रसादिक कहना चाहिए, अन्यथा रति आदि ही कहना 
चाहिए। सो गैौणता की अवस्था में, “रखवान्‌” नाम में जे 
रस शब्द है, उसका अथे रति आदि ही है, ःगार 
आदि नही [? 

दूसरे विद्वानों का कथन है कि “रसादिक तो वे भी हैं, 
पर उनके कारण उन काव्यों को ध्वनि ( उत्तमोत्तम काव्य ) 
नहीं कहा जा सकता |” 


:मशाामु्ाकाममम-ााााा पक," 


-- खेद है कि पंडितराज अपनी इस प्रतिक्षा को पूर्ण न कर सक्हे। 
डनका अंथ अपूर्य ही प्राप्त होता है और उससें यह प्रकरण नहीं 
आ सका । 
“-अजनुवादक 


(हिंदीरसगंगाघर' में आए रुए पद्मों की सूची 


पद्म का प्रथमांश 

ञर 
श्रकरुण सृषाभाषा 
अकरुणहदय 
अरद्श्यदशने इसे 
अधरदातिरस्तपद्चवा 
ध्रध्वव्यायामसेवा्: 
अनुभावपषिधानाथों 
अनुभावास्त्वमी तूष्णा 
भ्रनोचिाहते 
अपहाय सकल 
अपि बहल्दहनजालं 
अपि वक्ति गिर्रा पति: 
अमप्रातिकूस्येरष्या 
अयाचितः सुर 
अयि पवनरयाशा 


संस्कृत-पत्य 


प्ृष्ठाक 


पद्य का प्रथमांश.. प्रष्ठांक 
अयि मन्दस्मित श्ड्प्‌ 
अयि मृगमद १८६ 
अझल्काः फणिशाब १८३ 
झवयीा दिवसावसान २०5 


अवाप्य भूँ २४६ 
अष्टाबेव रसाः पे 
अहिततब्रत पापा २६३ 
ता 
आकुच्चिताक्षि मन्द्र च १२१ 


आत्मस्थः परसंस्थश्व॒ १२१० 
आमूलाद्ल्नसाना:. २३१ 
आयातैव निशा २०० 
आलीबु फेलीरमसेन. २१६ 
आविभूता यदवधि. <€५, 
ग्रासाय सलिलभरे.. १८४ 


( २ ) 


पद्म का प्रथमांश पृष्ठांक | पद्म का प्रथमांश पृष्ठांक 


ड् फाल्ागुरुद्रयं सा २०४ 
इ्यमुन्नसिता मुखस्य १४४ | कार्याविवेको जडइ़ता -२५६ 
ड़ | किच्चिल्नच्चितदन्‍्तश्च॒ १२१ 


उत्क्िप्ता: कबरीभमरं_ १३६ | कि ब्रमसतव वीरता. १६४४ 
उत्तमानां मध्यमाना १२० | कियद्दिमधिकं मे. १०४ 
उत्पन्तिजेमदप्मित: १०८ | कुचकल्शशयुगान्त २१५ 
उत्फुछनासिका हासो १०१ | कुण्डलीकृतकादण्ड. १३० 
उपनायक संस्थायां २७४ | कुन्न शैब॑ घनुरिदं २४६ 


उल्चास: फुछ्नपड़ें ५३ | कृतमनुमतं दृष्ट' १०३ 

उषसि प्रतिपक्ष २८७ । क्षमापणैकपदया: . ९८८ 
ए्‌ ख 

एकेकशो इन्दृशो वा २३४ | खण्डितानेत्रकजालि १६८ 

एमिविंशेषविषये: १८ , गे 

एवंवादिनि देवों २८२ | गणिकाजामिलमुख्यानू १७० 
50 गाठमालिड्ञग सकता २४१ 

ओपण्गिहं दे।ज्वन्न' ३६ | गुरुमध्यगता मया ३० 
ऋ[ गुरुमध्ये कमल्ाक्षी... १६५, ' 

औत्पातिकर्मन: क्षेप. २३६ च ' 
कः चराचरजगज्नाल ११७ 


कलितकुलिशघाता:._ १€२ + चित्तौत्सुक्यान्मनस्तापाव्‌१२२ , 
कस्तूरिकातिल्ञक १८८ | चित्र महानेष श्श्प, 


पद्म का' प्रथर्माश 
चिन्तामीलितमानसे 
चिर चित्ते(व॒तिएन्ते 
चुम्बन देहि मे भार्ये 
त्‌ 
तथालत्तिश्व पुत्रादे: 
तन्‍्मव्जु मन्दद्सितं 
तपस्यते मुनेवेक्त्रात्‌ 
तस्पगतापि च सुतलुः 
तां तमात्षतरुकान्ति 
तुज्ञाभनाल्नोक्य 
तृष्णाल्ेत्ञाविल्लोचचने 


लरया याति पान्थो प्य॑ 


द्‌ 
दयितस्य गुणाननु 
दरानभसत्कन्धरबन्ध 
दृष्टीकासनसंस्थिते 
देवभत्त गुरुखामि 
देग॑त्यादेरनैजस्य॑ 

घ्‌ 
धनुर्विद्लनध्यनि 
'न्यात्ममृते खड़े 


( ३) 

पृष्ठांक | पद्य का प्रथमांश.. प्रष्ठांक 

१७ न 
८६ | न कपातकपोतकस्‌ ११० 
१६६ | न कपोत भवन्‍्त ११० 
नसरेविंदारितानत्रायाँ. १२३ 
२०४६ | न जातु कामान्न भयांत्‌ ११३ 
२१० | न धर्नेन च राज्य २६७ 
१६७८ | नयनाअ्वज्ञावमशे' है 
३१ भवेच्छलितयौवन १०० 
१७७ | नशो मोह: स्मृति २४० 
१८४ | नारिकेशजल्न्बीर र्‌प्‌ 
२६० | निखिल जगदेव २३३ 
१६४ | निखिर्ला रजनी २५७ 
नितर्रा हितयाज्य २३८७६ 
२४८ | लितरां परुषा १५६ 
२१३ | नितान्तं यावनोन्मत्ता: १३८ 
१६० | निपतद्वाष्पसंरोध श्प्४ 


२०४ | निमग्मेन कलेशे: भू 
२२३ | निरुध्य यान्‍्ती श्१ृ६ 

निर्माणे यदि १७३ 
१०२ | निर्माय नूतन ७ 
१४७ | निर्वासयन्ती श्पद 


पद्म का प्रथमांश 
निःशेषच्युतचन्द्न 
नीचेपपहसितद 
लुपापराधे एस दोष 

प्‌ 
पदार्थ वाक्‍्यरचना 
परिमृद्तिमणाली 
परिद्रतु धरां 
परिष्कुव॑न्त्वर्थान्‌ 
पश्यामि देवान्‌ 
पाप॑ इन्त मया 
पाषाणादपि पीयूष 
प्रद्युद्तता सविनयं 
अमेदभरतुन्दित 
प्रसंगे गोपानां 
प्रहरविरतो मध्ये 

ब्‌ं 
ज्द्मन्नध्ययनस्य 

भें 


भम धम्मिञ्न वीसत्यो 


भवद्द्वारि कुष्यजय 
भवने फरुणावती 


( ४) 


पृष्ठांक 
इ२ 
१२१ 
२४५ 


१६७ 
प्पर 
११५ 
६ 
११ 
श्प३े 
2 
१३४ 
१५७ 
२४४ 
४६ 


१४६ 
३४ 


२६६ 
शर७रे 


पद्य का प्रथमांश 
भास्करसूनावरस्त 
भुजगाहितप्रकृतयो 
भुजपखरे गृहीता 
भ्रेशदिग्धान 

प्त 
मधुरतरं स्मयमानः 
मधुरसान्मघुरं 
मननतरितीयोें 
मलयानिल्काल 


मा कुरु कशां कराब्जे 


मिन्रान्निपुत्रनेत्राय 
मु्चसि नाद्यापि 

य्‌ं 
यथा यथा तामरसा 
यदवधि दयितो 
यदि लक्ष्मण सा 
यदि सा मिथिलेन्द्र 
यस्योद्ामदिवानिशा 
यावनेद्गमनितान्त 

र 
रखे दीनान्‌ देवान्‌ 


ध्ज 


पृष्ठांक 
२५१ 
श्८ड 
२७४ 
१३१२ 


२२१७ 
श्र्८ 


२३७ 
छर्द 
२८० 


१८४ 
२५६ 
२६५ 
२४० 
१०६ 
श्पर 


१११ 


( ४५) 


पद्म का प्रथमांश.. प्ृष्ठांक | पद्म का प्रथमांश._ प्रृष्नांक 
रतिदेवादिविषषा. १२७ | विरुद्धरविरुद्धर्वा ८६ 
रत्यादय: स्थायिभावा: ८७ | वीक्तष्य वत्तसि श्८१ 
रसगड्डाधरनामा ८ | व्यत्यस्तं पति र७ई 
राघवविरहज्वाला ४३ | व्यानम्नाश्वत्षिताश्बैव २७५ 
ल्‌ व्युत्तत्तिमुदृगिरत्ती. १८5 
लीज्ञया विदहितसिन्धु २५४ श 
लेलाज्कावलति १८० | शतेनापायानां २७१ 
व्‌ शयिता शैवल्शयने. २२० 
पत्तोजाओं पाणिना २४२ | शयिता सविधेप्यनीश्वरा २७ 
बचने तव यत्र १८३ | शाडदेबेन गदिता . १२१ 
वाक्पारुष्य॑ प्रहास्थ २६३ | शान्तस्य शमसाध्यत्वात्‌ ८२ 
बागर्थाविष संप्क्ती,.. €&३ | शुण्डादण्ड कुण्डली २१७ 
वाचा निर्मेत्या १८१ | शून्य बासपहद २०१ 
बाचो माजुलिकी: <४ | श्येनमम्बरतला १२२ 
विधत्तां निश्शडूं १६३ | श्रम: खेदाध्वग्यादे: २२७ 
विधाय सा मद्वदना २३० | श्रीतातपादैविंहिते. ११७ 
विधिवच्चितया सथा २१७ | ओ्रोसउ्ञानेन्द्रमिक्षो; | 
विनिर्गत॑ मानदमात्म ४१ । शल्षेष: प्रसाद: समता १६३ 
विभावा यत्र दारिदय २२४ सर 
विमानपयेड्रूलले.. १३२ | सच्छिन्ममूल: ५१ 
विरहेण विकलह॒दया २१७ | सजातीयविजातीयै: ८६ 


पद्य का प्रथमांश 
सचातमिध्विरहत्‌ 
संतापयामि हृदय॑ 
संताप: स्मरण चैव 
सदाजयानुषज्ञाणां 
संभाहानन्दसंभेदः 
सपदि विल्लयमेतु 
सरसिजवनबन्धु 
सर्वेपपि विस्मृतिपर्थ 
सशोणितै: क्रव्यभुजां 
सानुरागा: सान्ुकम्पा: 
साब्धिठ्ठी पकुलाचल्लां 
सा मदागमनबृ'द्वित 
साहंकारसुरासुरा 
घुरस्ोतस्िन्या: 


ञ््‌ 
अकरुन-हिय पिय 
अटपट बेतत बैन 


( ६ ) 


पृष्ठाक | पद्य का प्रथमांश पृष्ठांक 


२५३ | सुराड्ुनामिराश्लिष्टा: १३१ 
२१८ | स्मितं च हसित॑ प्रोक्त १२० 
२२४ | स्प्रतापि तरुणातप॑ > 
१८५ | खच्छन्दोच्छलदच्छ.. ५२ 
२२६ ।| खगनिगतनिरगंज्ञ १४६४ 
११३ | स्वेदाम्बुसान्द्रकण १४६, १७७ 
१६७ हे 

२७८ | हतकेन मया बना. २२२ 
१३२ | इरिः पिता हरिमाता १६२ 
१८२ | हरिशीभ्रेत्षणा यन्न॒ १८६ 
१०७ | हरिमागतमाकण्ये २६२ 
२३३ | इसन्तमपरं दृष्टा १२० 
१५८ | द्दीरस्फुरद्दन १४१ 
<प | हृदये ऋतशैवल्ला श्श५ 


२ 
हिंदी-पद्म | 
| भ्ति कल्लेश ते' मनन ४५ 


२४७ | अति पकिबे ते द्रवत १७४७ 
२७६ | अथए करन महारथी २५१ 


( ७ ) 
पद्म का प्रथाश . पृष्लांक | पद्म का प्रथभाश प्र॒ष्ठांक 
अरपे याचत दुजचिं. १०४ | करे परिव्कृत गहरे... ६ 
अवधि-द्विस सेफा २०७ | कहाँ शंसु का धनुष २५७ 
असित अगर विष २०५ | कांतिशेष शशिरेख २२९० 








अहित नियम ठतुव २६४ | किए सूँड कुंडल सरिस २१८ 
अंतक के अ्रतक २६२ | कुच-कलखसन जुग श्१५ 
ञा कुंडल्त सम घनु १३० 
आही गई रजनी २०० | क्रोधयुक्त जय-विजय २६६ 
ड ख़ 
उदधि, दीप, कुल्-अचल १०७ | खंडित बनिता नैन- 
ऊ नतिन १६८ 
ऊंचे कबरिन १३६ ग 
कृ गनिका अजासेल आदिक १७० 
कछु नत भीवा २१३ | गोपनि बातनि करी २४४ 
कमल अनु हरत १६२ च्‌ 


कमल्ष-कान्ति अनुद्दरत १६२ | चंचल नेन चकार . २६० 
कमल-बीज सन १६५ | चूमन दे म्वहि मेहरिया १६६ 


करि झालिंगन सब २४१ छ 
करि कर्तूरी-तित़्क. १८८ | छमा फरावन मुख्य ९८८ 
करि सैंकरनि उपाय. २७१ | ज्‌ 


करु न कोाररा कर २३७ जनक-सुता सहि पर नहीं २६० 
करु हरुए रे | नेक २४५३ जनमी जब ते जग मे. <€६ 


( ८) 


पद्म का प्रथमांश.. प्रष्ठांक | पद्म का प्रथमांश.._ प्रष्ठांक 
जनि कपोत तुद्धिं ११० घ 
जनि कपोत-पोतद्दि ११० | धनु-विदलन को शब्द १०२ 
जब ते सख्ि दयितद्दि २५६ | धरत मोहि कूजत. २१६ 
जल्नज विपिन के १६७ | धरी बनाइ नवीन ७ 
जाचक जन हित १०६ | धाइ-धाइ हैं घरनि. २१८ 
जिनकी लीला ते घर न 
जिन ज्ञानेद्र मिचु ते. ४ | नभ ते ऋषटत १२३ 
जेहि पिय-गुन सुमिरत २४४ | नभ ज्ञाली चालो १ 
जे। किकर किय १७७ | नव-जाबन की बाढ़ ते १०० 
जाबन उदगम तें २८२ | नव दुलहिन भुज २७४ 
जो सीतहिं मैं मस्तक २८३ | ना धन ना नृप संपदा २६७ 
त॒ नाखमान सब जगत २३१४ 
तप करते सुनि वदन. १६८ नैन-कोन को मिलन ६ 
तरनि-तनूजा-तट ३३ े 
के परत आऑसुवन रोध_ २५४ 
मा परत पांडवन पै २७५ 
थावर जंगम जगत ११७ | पहुवजयिनी झ्रधर._ २२१५४ 
द्‌ पद्दर पाछले सुनयनिद्धि २३७ 
दादाजी किय दंग १२० | पिय आए अति दूर ते २५४७ 
दीन देवतनि दशवदन १११ | पिय-गान-समै ्छ 
देखि भामिनी दयित-उर २८१ | पिय चूचुकनि २४२ 


पद्म का प्रथमांश 
प्रिया विरह दे 
फृ 
फनिपति धरनिद्धि 
फाड़ि नखन शव 
ब्‌ 
बाल बात मस 
बिन मॉंगे सुख देत 
भ 
भत्रे' अहित जन 
भामिनि | अजहु न 
| 
सधघुर-मधुर कछु 
मधुर मघुहु ते 
म्नतन-तरी तरि 
मम आवन ते 
मत्य-प्रनिल अरु 
मुकुलित किय सन 
मेरु-मूल ते म्ञय 
य 
यदि बोलै' बाक्पति 


( ४ ) 


पृष्ठांक 


१६४ 


११६ 
१२३ 


२३६ 
१६४ 


११४ 
र८० 


श्२७ 
श्र्८ 
८ 
२३३ 
्द्प 
१८० 
२३१ 


११४ 


पद्य का प्रथमांश पृष्ठांक 
रु 
रघुवर-विरहानल ४३ 
रन-ओॉगन लहि २४६ 
रसगंगाघर नाम यह ०. 
रहें सदैव समाधिमम्न १६३ 
लें 
लद्मन जो वह २६५ 
लोजा ते बॉध्यो जलधि २४५ 
वें 
वह मंजुल मृदु हँसन २१० 
विधि वंचित हैं। २१८ 
विरद्द महानल २१७ 
विज्ञय द्वोहु ततकान्च ११३ 
विशत भवन देखे २७३ 
श 
श्रोगंगा के पुलिन चर 
सर 
सब बंघुन को सेच. &€७ 
सबै विषय विसरे. २७८ 
सहसा मैं इृत ९२२ 
सुवा-मधुर निर्मल १८२ 


( १० ) 


पद्म का प्रथमांश. प्रृप्ठांक 
सुमिरत हू जा ३३ 
सुरनारिन सेंग १३१ 


सेज-सुई हू सुत्ठु ३१ 
सेद सलिल के सघन १७८ 
साई सविध सकी २७ 
साति-सदन ते २८७ 
समर के सचिव-समान १३४ 


पद्म का प्रथमांश 
स्मृति ते अतिबत्न 

हर 
हनी शुरुन बिच 
इरि माता हरि ही 
हिय सेवालनि धारि 
हिय सोई करि 
है फ;ूँठन सिरमै।र 


पृष्ठांक 
श्पड 


३० 
१६२ 


प्र 


३४ 
३४ 
३६ 
श्द 
श्र 
श्८ 
रद 
७छे 
७द 
१०४ 
११० 
१११ 
१२१ 
११४ 
१६० 


पुस्तक पढ़ने से अयम कृपया इतना 
अवश्य सुधार लोजिए। 


पह्डि अशुद्ध शुद्ध 

८ मभडुर मनहुर 
१६ करते ही मात्र से ही 
श्ष वी खत्यो बीसत्ये। 
२० दरी असीहेण दरीअसीहेण 
११ आण्णिद ओेण्णिहं 
२० गाज्नात्रे योजान्रे 

रू द्रोद्दो क द्रोद्दोद्रेक 

६ बारा बटेरा ( सकोरा ) 
॥- जाता जा सकता 
श्प मान मानस 

प्‌ का द्वारा के द्वारा 

२० निर्देयत से. निदेयता ते 
3 तनिक हूँ तनिक 

२१ बसे जूमे' 

१७ ४ सता इँसता 

७ दे कद्दते दे 


श्८ सपुल्ञका सपुल्षक: 


( २) 


पृष्ठ पड़ि अशुद्ध शुद्ध 

१६६ १३६ कना करना 

१७१ १५ है यह” है?” यह 

१७५ १८ अ्रथेव्यक्ति अधेव्यक्ति है, 

१८० न रहा है रही है 

१८9 पू वर्गों वबणां 

श्यद १६  द्वोता नहीं ते होता नहां 

(८७ १७ आगे ऐसा भ्रागे 

१६४० ८ जिहामूलियों जिहामूलीयों 

१८६५ श्र बगाँ बणीं 

१८१ ३. पूवाध में पूर्वार्ध मे 

१६१ ४ बगों बणीं 

१८४. २२ शांत इसी समय शांत 

१८६ | तीसरा संयोग तीसरे अक्षर का 
संयोग 

२०६ ८ व्यमिचाये' जिता व्यमिचायेजलिता 

२०७ ७. अभिव्यजकता. केपत पभिव्यखकता 

२१३ ५ बुद्धि-साधारण बुद्धि साघारण 

श्श्८ १७ तवाएघ तवाएघर 

श्र १४ वक्षोजाप्म बच्षोजाप्र॑ 

श्ष्प ८. छट जाना छूट जाना 

श्र ५५ अन्लुभाव अनुभव 


प््ठ्ठ 
२४६८ 
२६१ 
२७४ 
श्ष्प 
श्पद 
२८६ 


रन 
ण्द ७ &छ “७ &७ “० हद 


आम, 


कायणु 


जा 
नयना नयना 
प्रा 

व्यंजक 


शुद्ध 
कारण 
अमर 

जो 
नयनानयना 
द्वारा 

प्रप॑च